अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
अत्रस्वरूपविज्ञानीयाध्यायः ६ ]
सूत्रस्थानम्
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काकमाची का वर्णन—काकमाची ( मकोय की पत्तियों ) का शाक तीनों दोषों का शमन करने वाला, कुष्ठरोग का विनाशक, वीर्यवर्धक, कुछ उष्णवीर्य, रसायन गुणों से युक्त, सर ( मल को सरकाने वाला ) तथा स्वरयन्त्र के लिए हितकर होता है।
—चाङ्क्यैर्यस्माऽग्निदीपनी ॥ ७४ ॥
ग्रहण्यशौडनिलश्लेष्महितोष्णा ग्राहिणी लघुः ।
चांगेरी ( तिपतिया ) का शाक—यह स्वाद में अम्ल, अप्रिवर्धक, ग्रहणीरोग, अशौरीरोग, वातविकार तथा कफविकार नाशक होता है। यह उष्णवीर्य, मल को बाँधने वाला और लघु ( शीघ्र पचने वाला ) होता है ॥ ७४ ॥
बक्तव्य—सुनिषण्णक और चांगेरी के आकार में क्रमशः चार पात और तीन पात का अन्तर है, वे दोनों पत्रशाक हैं।
पटोलसप्तलारिष्टशाङ्गुष्ठाबलुजाऽमृताः ॥ ७५ ॥
वेत्राग्रबृहतीवासकुतिलीतिलपर्णिकाः । मण्डूकपर्णीककौटकारवेल्कपर्यताः ॥ ७६ ॥
नाडीकलयागोजिह्वावार्तिकं वनतिक्तकम् । करीरं कुल्कं नन्दी कुचैला शकुलादनी ॥ ७७ ॥
कटिलं केम्बुकं शीतं सकोशातककर्कशम् । तिक्तं पाके कटु ग्राहिं वातलं कफपित्तजित् ॥ ७८ ॥
पटोल आदि शाक—पटोल ( परबल ), सप्तला ( सातला ), अरिष्ट ( नीम ), शाङ्गुष्ठा ( काकतिक्ता —चक्रपाणि ), अबलुजा ( बाकुची के पत्ते, फलियाँ तथा बीज ), अमृता ( गिल्लेय या गुरुच के पत्ते ), वेत्राग्र ( बेंत के नये अंकुर ), बृहती ( वनभण्टा ), वासा ( अडूसा ), कुन्तली ( छोटा तिल-विशेष का पौधा ), तिलपर्णिका, मण्डूकपर्णी ( ब्राह्मीभेद के पत्ते ), कर्काट ( ककोड़ा का फल ), कारवेल्क ( करेला ), पर्यट ( पित्तापड़ा ), नाडी ( नाडीशाक ), कलया ( मटर ), गोजिह्वा ( गाजवाँ ), वार्तिक ( गैंगन ), वनतिक्तक ( पथ्यसुन्दर अर्थात् हरीतिकी—चक्र.टी.च.सू. २७।१५ ), करीर ( कैर के फल या बीस के अंकुर ), कुल्क ( छोटा जंगली करेला ), नन्दी ( पारसपीपल के पत्ते ), कुचैला ( काली पाठा ), शकुलादनी ( कुटकी ), कटिल ( दीर्घपत्रा पुनर्ना ), केम्बुक ( करमू ), कोशातक ( कुतबेधन तरोई ) और कर्कश ( स्वरूपककोटकः—चक्र. कबीला के पत्र )—ये द्रव्य शीतवीर्य, स्वाद में तिक्त, पाक में कटु हैं, मल को बाँधने वाले हैं, वातकारक, कफ तथा पित्त दोषशामक हैं ॥ ७५-७८ ॥
बक्तव्य—ऊपर जिन २८ शाकों के नाम गिनाये गये हैं, उनमें अनेक परिचय की दृष्टि से विवादास्पद हैं, अतएव कोई टीकाकार किसी द्रव्य का कोई पर्याय दे रहा है तो कोई कुछ। यह विवाद औषधद्रव्य-विशेषज्ञों के सामूहिक निर्णय की अपेक्षा रहता है। विशेषज्ञ भी वे हैं जो पूर्वाग्रह या दुर्ग्राह से ग्रस्त न हों, क्योंकि विगृह्यसम्भाषा से निर्णीत विषय सिद्धान्त रूप में परिणत नहीं हो पाते। ऐसा ही एक द्रव्य है—वनतिक्तकम्। आचार्य चक्रपाणि इसे पथ्यसुन्दरम्, श्री अरुणदत्त बत्सकः, श्री हेमाद्रि किराततिक्तम्, शब्दमाला—हरीतकी, वैद्यकनि—लोघ्रवृक्ष तथा रत्नमाला—वनतिक्तायां, पाठायाम्। इसी प्रकार अन्य अनेक द्रव्य हैं।
हृद्यं पटोलं कुमिनुत्वादुपाकं रुचिप्रदम्।
परबल का शाक—यह हृदय के लिए हितकारक, क्रिमिनाशक, पाक में मधुर तथा भोजन के प्रति रुचि ( इच्छा ) को उत्पन्न करता है।
पित्तलं दीपनं भेदि वातन्नं बृहतीद्वयम् ॥ ७९ ॥
बृहतीद्वय का वर्णन—वनभण्टा तथा कण्टकारी के फलों का शाक पित्तवर्धक, जठराग्नि को प्रदीप्त करने वाला, मलभेदक तथा वातनाशक होता है ॥ ७९ ॥
वृषं तु वमिकासन्धं रक्तपित्तहरं परम्।
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अष्टाङ्गहृदये
अहूसा का वर्णन—अहूसा के पत्तों का शाक वमन, कास ( खाँसी ) तथा रक्तपित्तरोग का नाश करने में उत्तम होता है।
कारवेलें सकटुकं दीपनं कफजित्यरम् ॥८०॥
करेला का शाक—यह कुछ कटु ( तित्तरस युक्त ), अग्निदीपक तथा कफनाशक द्रव्यों में उत्तम है ॥८०॥
बक्तव्य—लोलिम्बराज ने करेला का आलंकारिक वर्णन किया है। देखें—वैद्यावतंस।
वार्ताकं कटुं तित्तलोष्णं मधुरं कफवातजित्। सक्षारमग्निजननं हृदं रूच्यमपित्तलम् ॥८१॥
बैगन का शाक—यह दो प्रकार का होता है—१. कटु तथा तित्त, २. मधुर। दोनों प्रकार के बैगन उष्णवीर्य, कफ तथा वात नाशक होते हैं। इनमें कुछ क्षार अंश भी होता है। ये जठराग्नि को बढ़ाने वाले, हृदय के लिए हितकर, रक्तकारक तथा कुछ पित्तकारक भी होते हैं ॥८१॥
बक्तव्य—‘अपित्तलम्’—यहाँ पित्त शब्द के साथ जो नज्रसमास किया गया है, वह ‘ईषत्’ अर्थ में है, ऐसा समझना चाहिए। श्रीहेमाद्रि कहते हैं—‘अपित्तलत्वं बालपक्वव्यतिरेकेण’। यहाँ श्रीहेमाद्रि ने सुश्रुतसम्मत व्याख्यान किया है। देखें—‘जीर्ण सक्षारपित्तलम्’। ( सु.सू. ४६।२६९ )
करीरमाध्मानकरं कषायं स्वादुं तित्तकम्।
करीर का शाक—यह आध्मान ( अफरा ) कारक होता है, रस में कषाय, मधुर तथा तित्त होता है।
कोशातकाबल्यजकौ भेदिनावग्निदीपनौ ॥८२॥
तोरई तथा बाकुची का शाक—ये दोनों बंधे हुए मल का भेदन करने वाले तथा अग्निदीपक होते हैं ॥८२॥
तण्डुलीयो हिमो रूक्षः स्वादुपाकरसो लघुः। मदापेतविषाघ्नः—
तण्डुलीय ( चीलाई ) का शाक—यह शीतवीर्य, रूक्ष, रस तथा पाक में मधुर एवं लघु होता है। यह मदविकार ( मदात्यय ), पित्तविकार, विषविकार तथा रक्तविकार ( विशेषकर रक्तप्रदर ) का विनाश करता है।
—मुञ्जातं वातपित्तजित् ॥८३॥
स्निग्धं शीतं गुरुं स्वादुं बृंहणं शुक्रकृत्परम्।
मुञ्जातक ( कन्द-विशेष ) का शाक—यह वात तथा पित्तविकारों का नाशक होता है; स्निग्ध, शीत, गुरु, स्वाद में मधुर, शरीर को पुष्ट करने वाला तथा शुक्रवर्धक होता है ॥८३॥
गुर्वी सरा तु पालङ्ग्या—
पालक का शाक—यह गुरु होने के कारण देर में पचता है तथा मलभेदक होता है। देशभेद से इसका स्वादभेद भी देखा जाता है।
—मदघ्नी चाप्युपोदिका ॥८४॥
उपोदिका ( पोई ) का शाक—यह भी गुरु एवं सर गुणों से युक्त होती है तथा मद का नाश भी करती है ॥८४॥
पालङ्ग्यावत्स्मृतश्चञ्चुः स तु सङ्ग्रहणात्मकः।
चञ्चु का शाक—इसके सामान्य गुण पालक के समान होते हैं। इसका विशेष गुण है—ग्राही होना।
अन्नस्वरूपविज्ञानीयाध्यायः ६ ]
सूत्रस्थानम्
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वक्तव्य —करीर या करील को 'क्रकरीपत्र' भी कहा गया है। यह अन्य वृक्षों की भाँति बहुत पत्तों वाला नहीं होता, तथापि इसकी नवीन शाखाओं में विरल पत्ते होते हैं। निषण्टुकारों ने इसे 'मरुभूरुह' कहा है। इसकी कली तथा फलों का अचार भी बनता है। औषधीय उपयोग में इसकी कली, फल एवं झाल लिये जाते हैं। मुञ्जातक —एक कन्द-विशेष का नाम है, इसके गुण राजनिषण्टु में देखें। इसके अभाव में तालमञ्जा का प्रयोग किया जाता है। सु.सू. ३९।९ में कफनाशक द्रव्यों में इसका भी परिगणन किया गया है।
विदारी वातपित्तध्नी मूत्रला स्वादुशीतला ॥ ८५ ॥
जीवनी बृंहणी कण्ठचा गुर्वी वृष्या रसायनम्।
विदारी ( बिलाई ) कन्द —यह वात-पित्तनाशक, मल-मूत्र को निकालने वाला, स्वाद में मधुर, शीतवीर्य, जीवनीय शक्ति को देने वाला, स्वास्थ्यवर्धक, कण्ठ के लिए हितकर, पाचन में गुरु, वीर्यवर्धक तथा रसायन होता है। ८५ ॥
वक्तव्य —इसकी सुदीर्घ लताएँ होती हैं, उनकी जड़ों में गाँठ के रूप में यह कन्द पाया जाता है। छिलका उतारने पर दूध जैसा सफेद द्रव इसमें से निकलता है। यह खाने में आरम्भ में अत्यन्त मधुर किन्तु अन्त में कुछ कसैलापन इसमें पाया जाता है। पहाड़ी क्षेत्रों में यह जाड़े का मेवा है। वर्षभर के बाद इनका स्वाद वैसा नहीं रह जाता।
चक्षुष्या सर्वदोषध्नी जीवन्ती मधुरा हिमा ॥ ८६ ॥
जीवन्ती का शाक —यह दृष्टि के लिए हितकर, त्रिदोषनाशक, मधुर तथा शीतवीर्य है। ८६ ॥
कृष्माण्डतुम्बकालिङ्गककाँवरितिण्डिशम्। तथा त्रपुसचीनाकचिर्भट कफवातकुत्त ॥ ८७ ॥
भेदि विष्टम्भ्यभिष्यन्दि स्वादुपाकरसं गुरु।
कृष्माण्ड आदि का वर्णन —कृष्माण्ड ( कोहड़ा, पेठा ), तुम्ब ( जिसकी साधु लोग तुम्बी या कमण्डलु बनाते हैं ), कालिंग ( तरबूज ), कर्कारि ( खरबूजा ), उर्वरि ( ककड़ी या खीरा ), तिण्डिश ( टिंटे ), त्रपुस ( बड़ा खीरा ), चीनाक ( चीना ककड़ी ) और चिर्भट ( फूट )—ये सभी कफकारक, वातकारक, मलभेदक, विष्टम्भी, अभिष्यन्दी, विपाक तथा रस में मधुर एवं गुरु होते हैं। ८७ ॥
वल्लीफलानां प्रवरं कृष्माण्डं वातपित्तजित् ॥ ८८ ॥
बस्तिशुद्धिकरं वृष्यम्—
कृष्माण्ड ( कोहड़ा ) के गुण —लताओं में फलने वाले उक्त सभी फलों में कृष्माण्ड उत्तम माना गया है। यह वात तथा पित्त विकार का शमन करता है, बस्ति ( मूत्राशय ) को शुद्ध करता है और वीर्य को बढ़ाता है। ८८ ॥
—त्रपुसं त्वतिमूत्रलम्।
त्रपुस का वर्णन —त्रपुस ( बड़ा खीरा ) कृष्माण्ड आदि से अधिक मूत्रकारक होता है।
तुम्बं रुक्षतरं ग्राहि कालिङ्गैर्वारिचिर्भटम् ॥ ८९ ॥
बालं पित्तहरं शीतं विद्यात्यक्वमतोऽन्यथा।
तुम्ब या तुम्बा ( गोल लौआ या लौकी ) —तरबूज, ककड़ी, फूट ये सब अत्यन्त रुक्ष तथा मल को बाँधने वाले होते हैं। ऊपर कहे गये फल जब तक बाल ( मुलायम ) रहते हैं तब तक इनका गुण पित्तनाशक होता है और ये शीतवीर्य होते हैं। जब ये पक जाते हैं, तब पित्तकारक एवं उष्णवीर्य हो जाते हैं। ८९ ॥
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अष्टाङ्गहृदय
शीर्णवृन्तं तु सक्षारं पित्तलं कफवातजित् ॥१०॥ रोचनं दीपनं हृद्यमष्ठीलाऽऽताहनुल्लघु ।
शीर्णवृन्त-फलशाक—शीर्णवृन्त ( जो शाकफल अपने डण्डल से अलग हो गया हो ) शाक कुस खरापन, पित्तकारक, कफद्रोष तथा वातद्रोष का विनाशक, रुचिकारक, जठराग्निदीपक तथा हृदय के लिए हितकर होता है। यह वाताष्ठीला तथा आनाह ( अफरा ) रोगों का विनाशक एवं लघु होता है ॥१०॥
वक्तव्य—यहाँ 'शीर्णवृन्त' शब्द से भलीभाँति पके हुए फल का ग्रहण करना चाहिए। जैसा कि मुभूत ने कहा है—'शुक्लं लघुणं सक्षारं दीपनं बस्तिशोधनम्' ( मु.सू. ४६।२१३ ) श्री अरुणदत्त अपनी व्याख्या में कहते हैं—'शीर्णवृन्त' = कर्कूरम्।
शीर्णवृन्त—यहाँ इस नाम से एक शाक-विशेष का वर्णन किया गया है। 'वृन्त' शब्द का प्रयोग—फल तथा वृक्ष या लता से जुटे हुए भाग को डण्डा या डण्डल कहते हैं। शीर्ण का अर्थ है—गला हुआ। प्रायः सब फलों के वृन्त पकने पर गल या झड़ जाते हैं, किन्तु लाल कुम्हड़ा या सीताफल या कद्दू नाम का एक लताफल ऐसा होता है, जिसका वृन्त पकने पर भी अलग नहीं होता। इसे अंग्रेजी में Red gourd कहते हैं, इसका अर्थ लाल कुम्हड़ा होता है। वामभट ने श्लोक ८८ में जिस कृष्माण्ड का वर्णन किया है, वह 'पेठ की मिठाई' वाला है।
मृणालबिसशातूककुमुदोत्पलकन्दकम् ॥११॥
नन्दीमाषककेलूटभृङ्गटककसेरकम्। क्रीञ्चादनं कलोड्यं च रूक्षं ग्राहि हिमं गुरु ॥१२॥
मृणाल आदि का वर्णन—मृणाल ( कमलनाल ), बिस ( कमल की जड़ = भर्सीडा ), शातूक ( कमलकन्द ), कुमुद ( कुई ) एवं उत्पल के कन्द, नन्दी ( तुण्डिकेरी ), माषक ( वास्तुल ), केलूट ( किसक नामक उदुम्बर भेद ), भृंगटक ( सिंधाड़ा ), कसेरु, क्रीञ्चादन ( मृणाल, पिपली, घेञ्जुलक, चिञ्चोटक ) और कलोड्य ( पद्मबीज )—ये सभी द्रव्य रूक्ष, ग्राही ( मल को बाँधने वाले ), शीतवीर्य एवं गुरु ( देर से पचने वाले ) होते हैं ॥११-१२॥
कलम्बनालिकामार्पकुटिञ्जरकुतुम्बकम्। चिल्लीलङ्काकलोणीकाकुरुटकगवेधुकम् ॥१३॥
जीवन्तसुञ्जवेडगजयवशाकसुवर्चलाः। आलुकानि च सर्वाणि तथा सूर्यानि लक्ष्मणम् ॥१४॥
स्वादु रूक्षं सलवणं वातस्लेष्मकरं गुरु। शीतलं सूष्टविष्णूम्रं प्रायो विष्टम्ब्य जीर्यति ॥१५॥
स्विस्रं निष्पीडितरसं स्नेहादृष्टं नातिदोषलम्।
कलम्ब आदि का वर्णन—कलम्ब ( कदम्ब या करमू ), नालिका ( नालीशाक ), मार्प ( मरसा ), कुटिञ्जर ( ताम्रमूलक या तन्दुलक ), कुतुम्बक ( द्रोणपुष्पी—गूमा ), चिल्ली ( क्षारपत्रक शाक, लाल बधुआ ), लट्वाक ( गुग्गुलशाक ), लोणीका ( लोणार, सलूनक, कुलफा ), कुरुटक ( स्थितिवारक, शितिवारी ), गवेधुक ( तुणधान्य ), जीवन्त ( जीवन्ती ), सुञ्जु ( चुञ्चू ), ऐडगज ( चक्रवड ), यवशाक ( छोटे पत्तों वाली चिल्ली या जी के कोमल पत्ते ), सुवर्चल ( हलहल ), सभी प्रकार के आलू, सभी प्रकार के वे अन्न जिनकी दाने बनायी जाती हैं ( जैसे—चना, अरहर, मूँग, उड़द, मसूर, कुलथी आदि ) और लक्ष्मण ( मुलेठी के पत्ते )—उपर्युक्त सभी शाक स्वाद में मधुर, रूक्ष, लवणरस युक्त, वात तथा कफ कारक, देर में पचने वाले, शीतवीर्य, मल-मूत्र निकालने वाले और प्रायः ये देर से पचते हैं। यदि इन्हें उबाल कर इनका रस निचोड़ कर या या तेल में भलीभाँति भूँज लिया जाता है, तो ये दोषकारक नहीं होते ॥१३-१५॥
लघुपत्रा तु या चिल्ली सा वास्तुकसमा मता ॥१६॥
चिल्लीशाक का वर्णन—चिल्ली नामक शाक दो प्रकार का होता है—१. बड़े पत्तों वाला तथा २. छोटे पत्तों वाला। इनमें से दूसरे के गुण-धर्म बधुआ के समान होते हैं ॥१६॥
अन्नस्वरूपविज्ञानीयाध्यायः ६ ]
सूत्रस्थानम्
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तर्कारिवरणं स्वादु सतिक्तं कफवातजित्।
तर्कारी आदि शाक का वर्णन—तर्कारी ( अरणी ) तथा वरणा के कोमल पत्तों एवं फलों का शाक स्वाद में मधुर, कुछ तीतापन युक्त होता है। ये दोनों कफदोष तथा वातदोष नाशक होते हैं।
वर्षाभौ कालशाकं च सक्षारं कटुतिक्तकम् ॥१७॥
दीपनं भेदनं हन्ति गरशोफकफानिलात्।
पुनर्नवा एवं कालशाक—दोनों प्रकार की ( छोटी तथा बड़ी ) पुनर्नवाओं का तथा कालशाक ( काला मरसा का शाक ) कुछ खारा, स्वाद में कुछ कटु एवं कुछ तिक्त रस वाला होता है। ये दोनों शाक जठराग्नि को प्रदीप्त करते ( सुलगते ) हैं, मल का भेद करके उसे निकालते हैं। दूषीविष, शोफ ( सूजन ), कफदोष तथा वातदोष का विनाश करते हैं ॥ १७ ॥
दीपनाः कफवातघ्नाश्चिरिबिल्ववाङ्कुराः सराः ॥१८॥
करंज का शाक—करंज के कोमल पत्तों या अंकुरों का शाक जठराग्नि को प्रदीप्त करने वाला कफ एवं वात नाशक होता है और मल की रूकावट को दूर करता है ॥ १८ ॥
शतावर्षइंकुरास्तित्का वृष्या दोषत्रयपहाः।
शतावरी के अंकुरों का शाक—यह स्वाद में हल्का तिक्तरस वाला, वीर्यवर्धक तथा तीनों दोषों का विनाशक होता है।
बक्तव्य—शतावरी या शतावर वृष्य ( वीर्यवर्धक ) औषधों में उत्तम है। नैनीताल तथा अलमोडा आदि पर्वतीय क्षेत्रों में यह पर्याप्त रूप में पायी जाती है। इसके अंकुरों को पर्वतीय भाषा में 'कैरुआ' कहा जाता है। ये चैत्रमास के अन्तिम दिनों से आषाढ़ तक अधिक मात्रा में निकलते रहते हैं। आरम्भ में ये दो-चार दिनों तक सुकोमल होते हैं। इनका संग्रह कर छोटे-छोटे टुकड़े काटकर सब्जी बना ली जाती है। इसे रोटी के साथ खाया जाता है। यह पौष्टिक तथा रुचिवर्धक होती है। यह अंकुरशाक है।
रुक्षो वंशकरीरस्तु विदाही वातपित्तलः ॥१९॥
वंशकरीर का शाक—बाँस के नये अंकुर का शाक—शतावरी के अंकुरों की भाँति बाँस के भी अंकुर निकलते हैं, इनका भी शाक, आचार तथा मुरब्बा बनाया जाता है। नेपाल में इसके आचार का अत्यन्त प्रचार है, वहाँ इसे 'तामा' कहते हैं। इसके गुण—यह रुक्ष, विदाहकारक तथा वातपित्तकारक होता है ॥ १९ ॥
पत्तुरो दीपनस्तितकः प्लीहार्शःकफवातजित्।
पत्तुर ( मछेछी ) का शाक—यह अग्निदीपक, स्वाद में तिक्त, कफ तथा वात दोष का नाशक है। यह प्लीहाविकार तथा अशोरीग को शान्त करता है।
कृमिकासकफोत्तलेदान् कासमर्दो ज्येत्तरः ॥१००॥
कासमर्द ( कर्तादी ) का शाक—यह क्रिमिरोग, कासरोग, कफज विकार तथा उत्कल्लेद ( शरीर में उत्पन्न गोलिपन ) को जीत लेता है। यह मलभेदक है ॥ १०० ॥
रुक्षोष्णमस्लं कौसुम्भं गुरु पित्तकरं सरम्।
कुसुम्भ का शाक—कुसुम्भ ( कुसुम ) के पत्तों का शाक रुक्ष, उष्णवीर्य, अम्ल, गुरु ( देर से पचने वाला ), पित्तकारक तथा सर ( रेचक ) होता है।
गुरुष्णं सारप्यं बद्धविष्णूत्रं सर्वदोषकृत् ॥१०१॥
सरसों के पत्तों का शाक—यह पाचन में गुरु, उष्णवीर्य, स्वाद में कुछ अम्ल, पाचन में गुरु, मल-मूत्र की प्रवृत्ति में रूकावट डालने वाला तथा त्रिदोषकारक होता है ॥ १०१ ॥
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अष्टाङ्गहृदये
बक्तव्य —साहित्यदर्पणकार श्रीविश्वनाथ ने भी सर्पपशाक की प्रशंसा की है, परन्तु यह भी कह दिया है कि इसे ग्राम्य लोग बड़े चाव से खाते हैं—‘तरुणं सर्पपशाकं’ इत्यादि। इसे पंजाब में बड़े आदर के साथ खाया जाता है, अन्यत्र भी लोग खाते ही हैं।
यद्वालमव्यक्तसरं किञ्चित्क्षारं सतिक्तकम्। तन्मूलकं दोषहरं लघु सोष्णं नियच्छति ॥ १०२ ॥ गुल्मकासक्षयश्वासव्रणतेत्रगलामयान्। स्वराग्निसादोदावतीपीनसांश्च—
बालमूली का शाक —जो मूली कच्ची (रूढ़ न हुई हो) वह अव्यक्त रस वाली या कुछ खारापन तथा तीतापन लिये होती है। वह तीनों दोषों का नाश करती है, लघु तथा कुछ उष्णवीर्य वाली होती है। मूली गुल्म, कास, क्षय, श्वास, व्रण, नेत्रविकार, कण्ठविकार (स्वरभेद आदि), ज्वररोग, अग्रिमान्द्य, उदावर्त तथा पीनस रोगों को नष्ट करती है ॥ १०२ ॥
—महत्पुनः ॥ १०३ ॥
रसे पाके च कटुकमृणवीर्यं त्रिदोषकृत्। गर्वभिष्यन्दि च—
वृद्धमूली का शाक —बड़ी मूली रस एवं विपाक में कटु, उष्णवीर्य, त्रिदोषकारक, देर में पचने वाली तथा अभिष्यन्दी होती है ॥ १०३ ॥
—स्निग्धसिद्धं तदपि वातजित् ॥ १०४ ॥
स्नेहसिद्ध मूली का शाक —यदि बड़ी मूली को घी में भलीभाँति पका लिया जाय तो यह वातनाशक होती है ॥ १०४ ॥
बक्तव्य —आकृतिभेद से मूली दो प्रकार की होती है—१. गोल तथा २. लम्बी। लम्बी मूली भी छोटी-बड़ी भेद से दो प्रकार की होती है—१. लघुमूलक और २. नेपालमूलक। ये भी नयी एवं पुरानी भेद से पुनः दो प्रकार की होती है। गर्मियों में मिलने वाली मूली स्वाद में कटु होती है, जाड़ों में होने वाली मूली मधुर होती है। इसे नमक-मिरच लगाकर खाया जाता है। कच्ची मूली का शाक भी बनाया जाता है और सलाद के रूप में कच्चा भी खाया जाता है। इसी के भेद हैं—गाजर, चुकन्दर, सलजम आदि।
मौसम में मूली को काट कर सुखा लिया जाता है। बाद में पानी में भिगाकर इसका भी शाक के लिए प्रयोग होता है। यह सब वर्णन किसी भी जाति की बालमूली का है। जब यह रूढ़ हो जाती है, इसके भीतर जाली पड़ जाती है और बाहर का भाग कड़ा हो जाता है तब यह अग्राह्य हो जाती है। इसके विशेष गुण-धर्मों के लिए देखें—सु.सू. ४६।२४०-२४३। सुखाये सभी शाक विष्टम्भी तथा वातकारक होते हैं, केवल सुखाए हुए मूली के शाक को छोड़कर।
वातश्चलेष्महरं शुष्कं सर्वम्—
सूखी मूली का शाक —सुखायी गयी सभी प्रकार की मूलियाँ वात एवं कफ नाशक होती हैं।
—आमं तु दोषलम्।
कच्ची मूली का शाक —सभी प्रकार की कच्ची मूलियाँ वात आदि दोषकारक होती हैं।
कटूष्णो वातकफहा पिण्डालुः पित्तवर्धनः ॥ १०५ ॥
पिण्डालु नामक कन्द का शाक —यह कुछ कटु, उष्णवीर्य तथा पित्त को बढ़ाने वाला है ॥ १०५ ॥
बक्तव्य —सुश्रुत ने पिण्डालु का जो वर्णन किया है, वह उक्त बाभटोक्त गुण-धर्मों के विपरीत है। देखें—‘पिण्डालुकं कफकरं गुरु वातप्रकोपणम्’। (सु.सू. ४६।३०४)
भक्तस्वरूपविज्ञानीयाध्यायः ६ ]
सूत्रस्थानम्
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आयुर्वेद में 'आलुक' नाम से अनेक कन्दों का ग्रहण होता है। जैसे—१. काष्ठालुक ( कटालू )। २. शंखालुक—यह सफेदी लिये होता है, ऐसा लगता है कि बाजारों में बिकने वाला यही शंखालू ही आलू है। ३. हस्त्यालुक—बड़े-से-बड़े आकार का आलू, इसके दर्शन प्रदर्शनियों में किये जा सकते हैं। ४. पिण्डालुक—हमारी मान्यता के अनुसार यह वही है, जिसका विवेचन हमने इसी प्रकारण में आगे किया है। जो इसे 'सुथनी' मानते हैं, उन्हें इसका समावेश 'मध्वालुक' में अथवा 'रक्तालुक' में करना चाहिए, क्योंकि यह लाल तथा सफेद भेद से दो प्रकार का पाया जाता है। ५. मध्वालुक—यह आकृति से दो प्रकार का होता है—१. छोटा और २. बड़ा। इनमें छोटा छीलने पर भीतर से सफेद और बड़ा छीलने पर रक्ताभ होता है। हिन्दी में इन्हें छोटी सुथनी तथा बड़ी सुथनी कहते हैं। ६. रक्तालुक—यह भी वर्णभेद से दो प्रकार का होता है। १. जंगली सफेद और २. घर में लगाया हुआ लाल रंग का। जंगली अधिक-से-अधिक १ या २ इंच गोलाई में मोटा, घरेलू ५ या ६ इंच मोटा या इससे भी अधिक। इसे तरूड़ या रतालू भी कहते हैं। इन्हीं कन्दों में एक शकरकन्द भी है। यह शक्कर की भाँति खाने में मीठा होता है, अतएव इसे 'शकरकन्द' कहते हैं।
नैनीताल तथा अलमोड़ा आदि जिलों में 'पिण्डालू' नाम से सुप्रसिद्ध एक कन्द मिलता है, जिसका शाक क्षेत्रीय लोगों को अतिप्रिय है। वहाँ इसकी खेती भी होती है। मैदानी स्थानों में इसे 'अरूई' या 'घुइयाँ' कहते हैं। ये पिण्डालू या पिनालू के उपकन्द हैं। पिण्डालू के जिस मूल अवयव को यहाँ बण्डा कहा जाता है, उसे पर्वतीय क्षेत्रों में 'गडेरी' कहते हैं। हमारे विचार से सुश्रुत ने जिस 'पिण्डालू' के गुण-धर्मों का वर्णन किया है, वह यही 'पिण्डालू' कन्द है।
कुठेरशिग्रसुरससमुखासुरिभूस्तुणम्। फणिज्जाजकजम्बीरप्रभृति ग्रहि शालनम्॥ १०६॥ विदाहि कटु रूक्षोष्णं हृदयं दीपनरोचनम्। वृक्षशुक्रकृमिहृतीक्ष्णं दोषोत्प्लेशकरं लघु॥ १०७॥
कुठेरक आदि शाक—कुठेरक ( बनतुलसी—बवई ), शिग्रु ( सहजन की फली ), सुरस ( काली तुलसी ), समुखा ( तुलसीभेद ), आसुरि ( राई के पत्ते ), भूस्तुण, फणिज्जक, अजक, जम्बीर आदि के पत्तों के शाक ग्राही ( मल को बांधने वाले ) तथा उत्तम होते हैं। यह विदाहकारी, स्वाद में कटु, रूक्ष, उष्णवीर्य, हृदय के लिए हितकारी, जठराग्नि को प्रदीप्त करने वाले तथा रुचिकारक होते हैं। ये दूषितनाशक, शुक्र तथा क्रिमि नाशक होते हैं। ये गुणों में तीक्ष्ण, वात आदि दोषों को उन्माडने वाले तथा पाचन में लघु होते हैं॥ १०६-१०७॥
वक्तव्य—'फणिज्जाजकजम्बीरप्रभृति' इस 'प्रभृति' शब्द से अष्टांगसंग्रह अध्याय ७ में कहे गये—धान्य, तुम्बूर, शैलये, यवानी, भुंगवेर, पण्णाश, गुंजन, अजाजी, कण्डीर, जलपिप्ली, खराशवा, काल्मालिका, दीप्यक, क्षक्कृत, द्वीपि और वस्तगन्धा का ग्रहण कर लेना चाहिए। अष्टांगहृदय में उक्त द्रव्यों को 'हरितकवर्ग' में गिना है।
हिध्माकासविषश्वासपार्थरूपृतिगन्धहा। सुरसः—
सुरसा का शाक—हिचकी, कास, विषविकार, श्वास, पार्श्वशूल ( पसलियों में पीड़ा का होना ) तथा सुख की दुर्गन्ध का विनाश करता है।
—सुमुखो नातिविदाही गरशोफहा॥ १०८॥
सुमुख नामक तुलसी का शाक—यह अधिक विदाहकारक नहीं होता है। दूषीविष तथा शोथरोग का विनाश करता है॥ १०८॥
आर्द्रिका तित्तमधुरा मूत्रला न च पित्तकृत।
हरा धनिया का शाक—यह थोड़ा तीता तथा मधुर होता है। मूत्रल तथा पित्तकारक नहीं होता।
११०
अष्टाङ्गहृदये
लशुनो भृशतीक्ष्णोष्णः कटुपाकरसः सरः ॥ १०९ ॥
हृद्यः केशयो गुरुर्वृष्यः स्निग्धो रोचनदीपनः । भयसन्धानकृद्दुल्यो रक्तपित्तप्रदूषणः ॥ ११० ॥ किलासकुच्छगुल्माशौमेहक्रिमिकफानिलान् । स हिधमापीनसम्भासकासान् हन्ति रसायनम् ॥
लशुनकन्द का शाक—इसका कन्द विशेष करके तीक्ष्ण एवं उष्णवीर्य होता है। इसका विपाक कटु होता है। यह सर है, हृदय के लिए तथा केशों के लिए हितकर है, पचने में गुरु, वीर्यवर्धक, स्निग्ध, दीपन, पाचन, अस्थिभ्रम को जोड़ने वाला, बलवर्धक, रक्त एवं पित्त को दूषित करने वाला है। यह किलास ( श्वित्र ), कुच्छ, गुल्म, अर्श, प्रमेह, क्रिमिरोग, कफविकार, वातविकार, हिचकी, पीनस, श्वास और काम रोग का विनाश करता है। यह रसायन है ॥ १०९-१११ ॥
बक्तव्य—यहाँ लहसुन के केवल कन्द के गुण दिये गये हैं। प्रसंगवश उसके अन्य अंगों का वर्णन भी प्रस्तुत है—इसके पत्र खारे तथा मधुर होते हैं और इसका मध्यभाग अधिक मधुर एवं पिच्छिल होता है। कभी-कभी इसके मध्यभाग में भी लशुनकन्द पाये जाते हैं, औषध में इनका भी महत्त्वपूर्ण स्थान है। अष्टाङ्गहृदय-उत्तरस्थान ( ३९।१११-१२९ ) में इसकी विस्तृत रसायनविधि देखें। इसके अतिरिक्त 'काश्यपसंहिता' में भी इसके विविध कल्पों का अवलोकन करें।
पलाण्डुस्तदुणन्यूनः श्लेष्मलो नातिपित्तलः ।
पलाण्डु ( प्याज ) का शाक—यह लहसुन से कुछ कम गुणों वाला होता है। यह कफकारक है तथा पित्तकारक कम होता है।
कफवातार्शसां पथ्यः स्वेदेऽभव्यवहृतौ तथा ॥ ११२ ॥
तीक्ष्णो गुञ्जनको ग्राही पित्तान् हितकृत्त सः ।
गुञ्जनका शाक—यह कफविकार, वातविकार तथा अशरिग में हितकर होता है। ब्रणशोथ आदि पर इसका लेप कर के स्वेदन किया जाता है एवं शाक बनाकर इसे खाया भी जाता है। गाजर का शाक तीक्ष्ण गुणवाला, मल को बाँधने वाला तथा यह पित्तविकार वालों के लिए हितकर नहीं है ॥ ११२ ॥
बक्तव्य—वास्तव में उक्त ११२वें पद्य को 'पलाण्डु....तथा'। इस प्रकार दो पंक्तियों में पूरा होना चाहिए था। ऐसा मत श्री अरुणदत्त एवं श्रीचन्द्रनन्दन का था, किन्तु श्रीहेमद्रि का कथन है कि ये गुण-धर्म पलाण्डु के नहीं अपितु 'गुञ्जन' के हैं। अतः उक्त दो पंक्तियों को यहाँ एक साथ रखा है। वास्तव में स्वेदन के लिए 'पलाण्डु' तथा गुञ्जन दोनों का ही प्रयोग होता है। देखें—ब.सू. २७।१७४।
दीपनः सूरणो रुच्यः कफघ्नो विशदो लघुः ॥ ११३ ॥
विशेषादर्शसां पथ्यः—
सूरण का शाक—यह अग्निदीपक, हविकारक, कफनाशक, विशद ( पिच्छिलतानाशक ), लघु ( शीघ्र पचने वाला ), विशेष करके यह अशरिगियों के लिए हितकर होता है ॥ ११३ ॥
बक्तव्य—अशौनाशक 'शूरणमोदक' योग, देखें—शैषज्जरत्नावली-अशौरोगाधिकार में—१. स्वल्प-शूरणमोदक, २. बृहत्शूरणमोदक तथा अन्य अनेक योग। सूरण-परिचय—यह दो प्रकार का होता है—एक वह जिसे खा लेने से मुख तथा गले में काँटे जैसे चुभते-से प्रतीत होते हैं, दूसरा वह जो पहले की तुलना में कम कष्टकारक होता है। पाककर्मकुशल व्यक्ति दोनों की सच्ची सूखी अथवा रसेदार बनाते हैं, बड़े शौक से खायी भी जाती है। वे इसके टुकड़ों को इमली ( किसी प्रकार के अम्ल में ), चूना या फिटकिरी आदि में डालकर उबाल कर घी में भलीभाँति तलकर इसका पाक किया करते हैं। कुछ टीकाकारों ने 'सूरण' को ही भूकन्द माना है। 'कन्द' शब्द की दृष्टि से उनका सोचना उचित ही है, किन्तु 'सूरण' के उक्त गुणों के बाद उसे 'अतिदोषज' कहना कहीं तक युक्तिसंगत होगा ?
अन्तरूपविज्ञानीयाध्यायः ६ ]
सूत्रस्थानम्
१११
—भूकन्दस्तत्त्वतिदोषलः ।
भूकन्द का शाक—यह अत्यन्त दोषकारक तथा दोषवर्धक होता है।
वक्तव्य—भूकन्द के सम्बन्ध में विद्वानों के मतभेद—कोई इसे 'जिमीकन्द', दूसरे विद्वान इसे 'मृस्रोटा' इत्यः प्रावृद्धे उद्भवः' अर्थात् यह संवेद शाक है। हिन्दी में इसे—भुईछता, खुमी आदि कहते हैं। अंग्रेजी में 'Mushroom' कहते हैं। यह वर्षाकाल में जोरदार वर्षा होने पर सहसा पैदा हो जाता है। इसका आकार छता का जैसा होता है, रंग सफेद या बादामी सफेद होता है। यह भक्ष्य (खाने योग्य) तथा अभक्ष्य (जहरीला) भेद से दो प्रकार का होता है।
पत्रे पुष्पे फले नाले कन्दे च गुरुता क्रमात् ॥ ११४ ॥
शाकों में उत्तरोत्तर गुरुता—पत्रशाकों से पुष्पशाक गुरु, इनसे अधिक गुरु फलशाक, फलशाकों में भी अधिक गुरु नालशाक (सरसों के नाल = गन्दल), इनसे भी अधिक गुरु कन्दशाक होते हैं ॥ ११४ ॥
वक्तव्य—श्रीहेमाद्रि उक्त श्लोक का क्रम 'पुष्पे पत्रे' इस प्रकार चाहते हैं, क्योंकि सुश्रुत ने एक तो 'नालशाक' का ग्रहण नहीं किया है और दूसरा जहाँ श्रीहेमाद्रि 'लघवः' पाठ को उद्धृत करते हैं, वहाँ सुश्रुत ने 'गुरुवः' पाठ दिया है, जो सर्वथा युक्तियुक्त है। देखें—सु.सू. ४६।१४२। 'गुरुवः' के स्थान पर 'लघवः' शब्द का छप जाना सम्पादकीय प्रमाद प्रतीत होता है।
वरा शाकेषु जीवन्ती सारपं त्ववरं परम्।
इति शाकवर्गः ।
उत्तम-अधम-निर्णय—शाकवर्ग में परिगणित शाकों में जीवन्ती (डोड़ी) शाक उत्तम तथा सरसों की पत्तियों एवं नाल का शाक अधम माना गया है।
वक्तव्य—शाकवर्ग के आरम्भ में छः प्रकार के शाकों का परिगणन किया गया था। तदनुसार यहाँ कहा गया 'भूकन्द' संवेदज शाकों में गिना जाता है। संक्षेप में शाक-परिचय—१. पत्रशाक—बथुआ, पोई, मरसा, चौलाई आदि। २. पुष्पशाक—गोभी, अगस्तिया के फूल, केले के फूल, सेमल के फूल आदि। ३. फलशाक—पेठा, लौकी, करेला, बैगन, परवल, टिण्डा आदि। ४. नालशाक—सरसों, राई आदि के नाल। ५. कन्दशाक—मूली, सूरण (जिमीकन्द), आलू, पिण्डालू, रक्तालू, वाराहीकन्द, गेठी, तरुड़ आदि। ६. संवेदज शाक—छत्रक, खूब आदि। आचार्य खरनाद ने कहा है कि भोजन कर लेने के बाद फलों का सेवन करना चाहिए, अतः अब इसके बाद यहाँ फलवर्ग का प्रस्ताव है।
अथ फलवर्गः
द्राक्षा फलोत्तमा वृष्या चक्षुष्या सुष्टमूत्रविद ॥ ११५ ॥
स्वादुपाकरसा स्निग्धा सकपाया हिमा गुरुः। निहन्त्यनिलेपिताम्रतित्कास्यत्वमदात्ययान् ॥ तुष्णाकासश्चमध्वासस्वरभेदक्षतक्षयान् ।
द्राक्षा-परिचय—द्राक्षा (दाब या मुनकका) सब फलों में उत्तम है। यह वीर्यवर्धक, आँखों के लिए हितकर, मल-मूत्र को सुचारू रूप से निकालती है। विपाक तथा रस में मधुर, स्निग्ध, कुछ कपाय रसयुक्त, शीतवीर्य तथा देर में पचने वाली है। यह वात, पित्त तथा रक्त विकारों का विनाश करती है। मुख का तीतापन, मदाल्यरोग, तुष्णा (प्यास का अधिक लगना), कास, थम (थकावट), श्वास, स्वरभेद, क्षत (उरःक्षत) एवं क्षय इन रोगों का विनाश करती है ॥ ११५-११६ ॥
वक्तव्य—अंगूर आकार-भेद से दो प्रकार के होते हैं—१. छोटे, जिनके किसमिस बनाये जाते हैं और २. बड़े, जो आकार में लम्बे होते हैं, इनके मुनबके बनाये जाते हैं। फिर ये बीज वाले तथा बीज-
११२
अष्टाङ्गहृदये
रहित भेद से भी दो प्रकार के होते हैं। स्वाद-भेद से भी ये दो प्रकार के होते हैं—१. खट्टे और २. मीठे। वर्ण-भेद से भी ये दो प्रकार के होते हैं—१. काले तथा २. सफेद या हरिताभ सफेद। मुनक्का या किसमिन् बनाने के लिए इन्हें थोड़ा पकाना पड़ता है, नहीं तो ये जल्दी सुखते नहीं अपितु सड़ जाते हैं।
उद्विकृत्पित्ताज्ययति त्रीन्दोषान्स्वादु दाडिमम् ॥ ११७ ॥
पित्ताविरोधि नात्युष्णमस्मं वातकफापहम्। सर्वं हृद्यं लघु स्निग्धं ग्राहि रोचनदीपनम् ॥ ११८ ॥
दाडिम-फल का वर्णन—यह स्वादभेद से दो प्रकार का होता है—१. मधुर और २. अम्ल ( खट्टा )। मधुर दाडिम के गुण—इसी को 'अनार' कहते हैं। यह पित्त-प्रधान तीनों दोषों को शास्त करता है। खट्टा दाडिम—यह खट्टा होने पर पित्तदोष को प्रकुपित नहीं करता। यह अधिक उष्ण भी नहीं होता है। यह वात तथा कफ दोष का विनाशक होता है।
सभी प्रकार के दाडिम हृदय के लिए हितकर, शीघ्र पचने वाले, स्निग्ध, ग्राही ( मल को बाँधने वाले ), रुचि तथा जठराग्नि को बढ़ाने वाले होते हैं ॥ ११७-११८ ॥
बक्तव्य—पर्वतीय क्षेत्रों में दाडिम के वृक्ष पर्याप्त रूप में पाये जाते हैं। इसके वृक्ष चिरायु होते हैं। स्थानीय लोग खट्टे तथा मीठे दाडिमों की चटनी बनाकर रख लेते हैं। इसे 'काली चटनी' कहते हैं। यह लाल, सफेद वर्णभेद से दो प्रकार का होता है। इसके छिलकों को धूप में सुखाकर चूर्ण बनाकर रख लिया जाता है। यह चूर्ण पित्तातिसार, प्रवाहिका, काम, बालको के दांत निकलने तथा टाउन्सिल में प्रयोग किया जाता है। यद्यपि सभी अम्ल पदार्थ पित्तवर्धक तथा उष्णवीर्य होते हैं, तथापि अनार एवं आँवला फल इसके अपवाद हैं।
मोचखजूरपनसनारिकेलपुरुषकम्। आम्रतातालकाशमर्यराजादनमधूकजम् ॥ ११९ ॥
सौवीरबदराङ्गुल्लफलगुश्लेष्मातकोद्भवम्। वातामाभिपुकाओडमुकूलकनिकोचकम् ॥ १२० ॥
उरुमाणं प्रियालं च बृंहणं गुरु शीतलम्। दाहक्षतक्षयहर् रक्तपित्तप्रसादनम् ॥ १२१ ॥
स्वादुपाकरसं स्निग्धं विष्टम्भि कफशुक्रकृतं।
केला आदि फलों का वर्णन—मोच ( केले का फल ), खजूर ( खजूर या छुहारा ), पनस ( कटहल ), नारियल, पुरुषक ( फालसा ), आम्रत ( आमड़ा ), तालफल, काशमर्य ( गम्भारी का फल ), राजादन ( खिरनी ), महूआ का फल, सौवीर ( बड़ा बेर का फल ), बेर का फल, अंकोल, फलु ( गुलर ), श्लेष्मातक ( लिसोड़ा ), बादाम, अभिपुका ( पिस्ता ), अखरोट, मुकूलक ( यह भी पिस्ता की जाति है ), निकोचक ( चिलगोजा—बीज का बीज ), उरुमाण ( खुमानी या खुरमानी ) और प्रियाल ( चिरौंजी )—ये सभी फल बृंहण ( शरीर को बढ़ाने वाले ), गुरु ( देर में पचने वाले ) तथा शीतवीर्य होते हैं। दाह, क्षत ( उरु:क्षत ) तथा अन्य स्थानों में लगे घावों का शमन करते हैं। रक्त तथा पित्त को शुद्ध करते हैं। ये सभी विपाक में मधुर हैं, स्निग्ध, विष्टभकारक ( मलावरोधक ), कफ एवं शुक्रधातु को बढ़ाते हैं ॥ ११९-१२१ ॥
फलं तु पित्तलं तालं सरं काशमर्यजं हिमम् ॥ १२२ ॥
शक्रुन्मूत्रविबन्धच्छं केश्यं मेध्यं रसायनम्। वातामाशुण्णवीर्यं तु कफपित्तकरं सरम् ॥ १२३ ॥
परं वातहर् स्निग्धमनुष्णं तु प्रियालजम्। प्रियालमज्जा मधुरो वृष्यः पित्तानिलापहः ॥ १२४ ॥
कोलमज्जा गुणैस्तद्भुट्टुर्द्विः कासजिच्च सः।
ताल आदि फलों का वर्णन—ताल ( ताड़ ) का फल पित्तकारक तथा सर ( रेचक ) होता है। गम्भार का फल शीतवीर्य, मल तथा मूत्र की रूखावट को दूर करता है, बालों एवं मेधा ( धारणाशक्ति ) के लिए हितकर, रसायन गुणों से युक्त होता है। बादाम आदि फलों के गुण—ये उष्णवीर्य, कफकारक, पित्तकारक, सर, वातनाशक द्रव्यों में श्रेष्ठ तथा स्निग्ध होते हैं, किन्तु प्रियाल ( चिरौंजी ) उष्णवीर्य नहीं होता। प्रियालमज्जा के गुण—चिरौंजी की गिरी मधुर, वीर्यवर्धक, पित्त तथा वातविकार का नाश करती
अक्षरस्वरूपविज्ञानीयाध्यायः ६ ]
सूत्रस्थानम्
११३
है। बेर की मज्जा के गुण—इसके गुण भी प्रायः प्रियात्मज्जा के समान होते हैं, किन्तु यह तुष्णा तथा कास का विनाश करती है॥ १२२-१२४॥
वक्तव्य —'वातामादि'—यहाँ आदि शब्द से अभिप्रेत ( पिस्ता ), अखरोट, मकूलक, निकोचक ( चिलगोजा ) और उरुमाण ( खुमानी ) तक के द्रव्यों को लेना चाहिए। उरुमाण फल पर्वतीय प्रदेशों ( नैनीताल, अलमोड़ा, शिमला, मंसूरी, काश्मीर आदि ) में होता है। इसका बाहरी गूदा भी और भीतर की गिरी भी खायी जाती है, जो बादाम के आकार की तथा स्वाद में मधुर होती है। यह आकार-भेद से दो प्रकार की होती है—छोटी तथा बड़ी। बड़ी खुमानी के भीतर से निकलने वाली गिरी के ये गुण हैं।
पक्वं सुवर्जं बिल्वं दोषलं पूतिमास्तम्॥ १२५॥
दीपनं कफवातघ्नं बालं, ग्राह्यभ्यं च तत्।
बिल्ब का पका फल —पका हुआ बेल का फल बड़ी कठिनता से पचता है, दोषकारक होता है तथा इसका सेवन करने से अपानवायु दुर्गन्धयुक्त निकलता है। कच्चा बेल का फल अग्नि प्रदीप्त करता है, कफ तथा वात दोष का नाश करता है। ये दोनों प्रकार के बेल ग्राही ( मल को बांधने वाले ) होते हैं।
कपित्यमामं कण्ठघ्नं दोषलं, दोषयाति तु॥ १२६॥
पक्वं हिंश्चावमथुजित्, सर्वं ग्राहि विषापहम्।
कैथ का कच्चा फल —यह कण्ठ ( स्वरयन्त्र ) को हानि पहुँचाता है, दोषकारक होता है। कैथ का पका फल दोषशामक, हिचकी तथा वमन का विनाश करता है। दोनों प्रकार के कैथ ग्राही होते हैं और विषविकार को नष्ट करते हैं॥ १२६॥
जाम्बवं गुरु विष्टिम्भि शीतलं भुशवातलम्॥ १२७॥
सङ्ग्राहि मूत्रशकृतोरकण्ठचं कफपित्तजित्।
जामुन का फल —यह गुरु ( देर में पचने वाला ), विष्टम्भी, शीतवीर्य, वातविकार को अत्यन्त बढ़ाने वाला, मल-मूत्र को रोकने वाला, स्वरयन्त्र के लिए अहितकर, कफ तथा पित्त विकार को जीतने वाला होता है॥ १२७॥
वक्तव्य —राजजम्बू को संस्कृत में 'फलेन्द्रा' तथा हिन्दी में 'फरेना' कहते हैं। इसके अतिरिक्त जामुन के ये भेद पाये जाते हैं—शुद्रजम्बू, काकजम्बू, भूमिजम्बू तथा जलजम्बू। 'राजजम्बू का ही वर्णन महाकवि कालिदास ने मेघदूत में इस प्रकार किया है—'श्यामजम्बूवनान्ताः'। ( पूर्वमेघ )
वातपित्ताम्रकृद्वालं, बद्धास्थि कफपित्तकृत्॥ १२८॥
गुर्वाग्रं वातजित्यक्वं स्वाद्वस्तं कफशुक्रकृत्।
आम का वर्णन —जिसमें अभी गुठली नहीं पड़ी हो ऐसा बाल ( छोटा ) आम वातकारक, पित्तकारक तथा रक्तधातु को दूषित करता है। गुठली पड़ जाने पर अर्थात् कुछ बड़ा होने पर वह कफकारक तथा पित्तकारक होता है। पका हुआ आम पाक में गुरु, वातनाशक, स्वाद में मधुर होता है। पका हुआ खट्टा आम कफकारक तथा शुक्रवर्धक होता है॥ १२८॥
वृक्षाम्भं ग्राहि रूक्षोष्णं वातश्च्लेष्महरं लघु॥ १२९॥
वृक्षाम्भ का वर्णन —वृक्षाम्भ ( विषाविल, कोकम ) का फल ग्राही, रूक्ष, उष्णवीर्य, वात तथा कफदोष नाशक तथा पाचन में लघु होता है॥ १२९॥
वक्तव्य —इसकी उत्पत्ति कोकण, कनारा आदि दक्षिणी प्रान्तों में होती है। बीज निकाल कर सुखाये हुए फल को अमसूल या कोकम कहते हैं। इसके बीजों से तेल निकाला जाता है। इसे कोकम का घी या तेल कहते हैं। यह तेल स्तम्भन एवं व्रणरोपण होता है। इसके छिलकों की चटनी बनायी जाती है।
८ अ० ह०
११४
अष्टाङ्गहृदये
अतिसार, रक्तातिसार आदि में इसका फाण्ट ( चाय ) बनाकर दिया जाता है तथा पित्तजनित विकारों में इसे घोलकर इसका शरबत बनाकर दिया जाता है। इससे लाभ भी होता है।
शम्या गुरुष्णं केशधन् रूक्षम्—
शमी का फल—यह पाक में गुरु, उष्णवीर्य, केशनाशक तथा रूक्ष होता है।
बक्तव्य—शमी को हिन्दी में 'छोंकर' कहते हैं। इसका वर्णन 'भानप्रकाश' तथा 'धन्वन्तरि' निघण्टुओं में भी आया है। यह छोटी-बड़ी भेद से दो प्रकार की होती है। धार्मिक कार्यों में इसका बड़ा महत्त्व है। इसकी कच्ची फलियों का शाक बनाकर मारवाड़ तथा पंजाब में खाया जाता है, दशहरा के पुण्य पर्व पर इस वृक्ष की पूजा की जाती है। विशेष देखें—च.सू. २७।१५९; सु.सू. ४६।१९३।
—पीलु तु पित्तलम्। कफवातहरं भेदि प्लीहार्षःकृमिगुल्मनतु॥ १३०॥ सतित्तं स्वादु यत्पीलु नात्युष्णं तत्त्रिदोषपजित्।
पीलु का फल—यह पित्तकारक, कफ तथा वात नाशक, मलभेदक ( दस्तावर ), प्लीहारोग, अशौरीग, क्रिमिरोग तथा गुल्मरोग नाशक होता है। जो पीलु कुछ तीता एवं मधुर होता है, वह अधिक उष्ण नहीं होता और वह त्रिदोषनाशक भी होता है॥१३०॥
बक्तव्य—इसके वृक्ष राजस्थान, बिहार, कोंकण, दक्षिणप्रदेश, कर्नाटक, बलुचिस्तान आदि सूखे स्थानों में पाये जाते हैं। यह पीलु छोटा-बड़ा भेद से दो प्रकार का होता है।
त्वक्तिकटुका स्निग्धा मातुलुङ्गस्य वातजित्॥ १३१॥
बृंहणं मधुरं मांसं वातपित्तहरं गुरु। लघु तलेसरं कासश्वासहिध्याममात्ययान्॥ १३२॥ आस्यशोषानिलरूक्षम्बिबन्धच्छयीरोचकान्। गुल्मोदराश्वःशूलानि मन्दाग्निर्व च नाशयेत्॥
मातुलुंग ( बिजौरा नीबू ) की त्वचा—यह तित्त एवं कटु होती है और स्निग्ध तथा वातनाशक होती है। उसका मांस ( गूदा ) बृंहण, मधुर, वात तथा पित्त नाशक और गुरु होता है। बिजौरानीबू का केशर लघु, कास, श्वास, हिचकी, मदात्यय, मुखशोष, वातरोग, कफरोग, विबन्ध ( कञ्चित्त ), वमन, अरोचक, गुल्मरोग, उदररोग, अशौरीग, शूलरोग एवं मन्दाग्नि का विनाश करता है॥१३१-१३३॥
बक्तव्य—नैनीताल, अलमोड़ा आदि पर्वतीय स्थानों में 'बिजौरानीबू' पर्याप्त रूप में पाया जाता है। इसका छिलका बाहरी और भीतरी भेद से दो प्रकार का कहा गया है। बाहरी छिलका को त्वक्, भीतरी छिलका को मांस और उसके भीतर मिलने वाले अम्ल पदार्थ को केसर कहा गया है। अब आप इसका अर्थ इस प्रकार लगायें—बाहरी छिलका को अत्यन्त पतला छीलकर फेंक दिया जाता है, उसके गुण हैं—'त्वक्तिका'...'वातजित्'। इस बाहरी छिलका में तेल का अंश पाया जाता है, जो छीलने बाने के हाथ में लग जाता है। इसका वह भाग जिसे बाभट ने 'मांस' कहा है, इसे मित्रमण्डली या परिजनों के साथ बैठकर खाया जाता है, जिसे 'सीगात' = 'स्वागत' माना जाता है। यह अत्यन्त कोमल तथा मधुर होता है।
इसी का एक भेद 'मतकाकड़ी' भी है, जिसे आयुर्वेद में 'मधुकर्कटी' कहा है। इसके विपरीत जो निघण्टु-ग्रन्थों में इसे चकोतरा कहा है, यह भ्रम है। आप देखें—मधुकर्कटी और मतकाकड़ी शब्दों में कितना साम्य है? इसी प्रकार बिजौरानीबू और मतकाकड़ी में क्रमशः छोटे-बड़े मात्र का अन्तर है। इसी बहाने आप पर्वतीय यात्रा करें और देखें—इन दोनों फलों को। 'चकोतरा' जिसे कहते हैं, उसका बाह्य का छिलका फेंक दिया जाता है और भीतर का केशर मीठा होने के कारण खाया जाता है। उक्त बिजौरानीबू तथा मतकाकड़ी का केशर अत्यन्त खट्टा होता है। ये दोनों के परस्पर विभेदक लक्षण हैं।
भरलातकस्य त्वइमांसं बृंहणं स्वादु शीतलम्। तदस्य्यग्रिसमं मेधयं कफवातहरं परम्॥ १३४॥
अक्षररूपविज्ञानीयाध्यायः ६ ]
सूत्रस्थानम्
११५
भिलावा का वर्णन —भिलावा का छिलका तथा गूदा बृहण ( शरीर को स्थूल करने वाला ), रस में मधुर तथा शीतवीर्य होता है। भिलावा की गुठली अग्नि के समान तीक्ष्ण ( दाहक ), बुद्धिवर्धक एवं अत्यन्त कफ एवं वातनाशक होती है ॥ १३४ ॥
वक्तव्य —भिलावा के फल हृदयाकृति होने पर भी ये दो भागों में मूलतः विभक्त होते हैं। जब इसका ऊपरी भाग दाहक होता है और नीचे का भाग पकी नारंगी के सदृश हो जाता है, तब उसे खाया जाता है। इसी का वर्णन ऊपर प्रथम पंक्ति द्वारा किया गया है।
स्वाद्भ्रम्लं शीतमृण्णं च द्विधा पालेवतं गुरु। रुच्यमत्यग्निशमनं—
पारेवत का वर्णन —पारेवत मधुर तथा अम्ल भेद से दो प्रकार का होता है। मीठा पारेवत शीतवीर्य होता है तथा अम्लपारेवत उष्णवीर्य होता है। ये दोनों पारेवत पाचन में गुरु, रचिकाकारक तथा अत्यग्नि ( भस्मक रोग ) का शमन करते हैं।
वक्तव्य —उक्त गुण-धर्मों से युक्त द्रव्य को चरक ने 'पारावत' कहा है। देखें—च.सू. २७।१३४। यह फल कामरूप ( आसाम ) आदि देशों में पाया जाता है ( चक्रपाणि )
—रुच्यं मधुरमारुकम् ॥ १३५ ॥
पक्वमाशु जरां याति नात्युष्णगुरुदोषलम्।
आरुक-फल का वर्णन —आडुफल रचिकाकारक तथा रस में मधुर होता है। यह पका हुआ शीघ्र पच जाता है। यह अधिक गरम नहीं होता किन्तु गुरु तथा दोषकारक होता है ॥ १३५ ॥
वक्तव्य —यह पर्वतीय क्षेत्रों का फल है। इसके अनेक भेद-उपभेद होते हैं। तदनुसार ये वैशाख से पकने प्रारम्भ होते हैं और जातिभेद से आश्विन तक पकते रहते हैं। अब इसकी कुछ जातियों मैदानी भागों में भी पायी जाने लगी है, फिर भी पर्वतीय जल-वायु का स्वाद कुछ और ही होता है।
द्राक्षापरुषकं चार्द्रमम्लं पित्तकफप्रदम् ॥ १३६ ॥
गुरुष्णवीर्यं वातघ्नं सरं सकरमर्दकम्।
कच्चे दाख आदि का फल —द्राक्षा ( मुनक्का ) एवं परुषक ( फालसा ) के कच्चे फल स्वाद में बट्टे होते हैं। ये पित्त तथा कफ वर्धक होते हैं।
करमर्द ( करौदा ) के कच्चे फल —यह पाचन में गुरु, उष्णवीर्य, वातनाशक तथा सर होते हैं ॥ १३६ ॥
तथाऽम्लं कोलकर्कन्धुलकुचाग्नातकारकम् ॥ १३७ ॥
ऐरावतं दन्तशठं सतूदं मृगलिण्डिकम्। नातिपित्तकरं पक्वं शुष्कं च करमर्दकम् ॥ १३८ ॥
कोल-कर्कन्धु-वर्णन —कोल ( बड़ा बेर ) तथा कर्कन्धु ( छोटे बेर ), लकुच ( बड़हल ), आग्नातक ( आमड़ा ), ऐरावत ( नारंगी—वै० नि० ), दन्तशठ ( जम्बीरीनीबू ), तूद ( शहतूत ), मृगलिण्डिक ( बड़े शहतूत )—ये सभी फल कच्ची दाख के समान गुण-धर्म वाले होते हैं। इनमें सूखा तथा पका हुआ करौदा अधिक पित्तकारक नहीं होता है ॥ १३७-१३८ ॥
दीपनं भेदनं शुष्कमम्लीकाकोलयोः फलम्। तृष्णाश्रमकलमच्छेदि लच्चिष्टं कफवातयोः ॥
इमली तथा बेर के सूखे फल —ये अग्नि को प्रदीप्त करने वाले तथा मलमेदक ( दस्तावर ) होते हैं। ये दोनों प्यास, शारीरिक एवं मानसिक थकावट को दूर करते हैं, कफ तथा वातविकार में लाभदायक होते हैं एवं पाचन में लघु होते हैं ॥ १३९ ॥
फलानामबरं तत्र लकुचं सर्वदोषकृतम्।
बड़हर के फल —फलों में बड़हर का फल अधम गुणों वाला होता है तथा यह वात आदि सभी दोषों को उभाड़ने वाला होता है।
११६
अष्टाङ्गहृदये
हिमानलोष्णदुर्वातव्यालालाविद्दूषितम् ॥ १४० ॥
जन्तुजुष्टं जले मयमभूमिजमनार्तवम्। अन्यधान्ययुतं हीनवीर्यं जीर्णतयाऽति च ॥ १४१ ॥
धान्यं त्यजेतथा शाकं रूक्षसिद्धमकोमलम्। असञ्जातरसं तद्रुच्छुष्कं चान्यत्र मूलकात् ॥ १४२ ॥
प्रायेण फलमयेवं तथाऽऽमं बिल्ववर्जितम्।
इति फलवर्गः।
त्याज्य धान्य, शाक एवं फल—हिम (बरफ) गिरने से, ओले पड़ने से, कड़ी धूप लगने से आग से झुलस जाने से, दूषित वायु के स्पर्श से, सौप या अन्य जहरीले प्राणियों की लार के लग जाने से, कीड़े पड़ जाने से, जल में डूब जाने से, विपरीत-(अपने प्रतिकूल) गुणों वाली भूमि में उत्पन्न होने से, विपरीत ऋतु में उत्पन्न होने से, विपरीत गुणवाले धान्य (अनाज) के साथ मिला देने से, शक्तिहीन हो जाने से अथवा अधिक पुराने हो जाने से धान्य अपने गुणों से रहित हो जाते हैं। ऐसे धान्यों का सेवन न करें। इसी प्रकार के शाक भी त्याज्य होते हैं तथा जो शाक घी-तेल स्नेहों से बिना छोड़े ही बनाये गये हों और जो कोमल न हों वे भी अखाद्य होते हैं। जिन शाकों में स्वाभाविक रस, गुण आदि की उत्पत्ति न हुई हो अथवा जो शाक सूख गये हों वे भी खाने योग्य नहीं होते।
सुखाये गये कन्दशाक (मूली आदि) खाये जा सकते हैं। जैसा कि इसी अध्याय के १०५वें पद के पूर्वार्ध में कहा गया है। इसी प्रकार के फल भी खाने योग्य नहीं होते, किन्तु सुखाया गया कच्चा बेग का फल खाया जा सकता है, अन्य कच्चे फलों को नहीं खाना चाहिए ॥ १४०-१४२ ॥
अथौषधवर्गः
विष्यन्दि लवणं सर्वं सूक्ष्मं सूक्ष्ममलं मृदु ॥ १४३ ॥
वातघ्नं पाकिं तीक्ष्णोष्णं रोचनं कफपित्तकृतं।
फलों का वर्णन करने के बाद अब यहाँ से विविध प्रकार के लवणों का वर्णन प्रारम्भ होता है।
लवण-सामान्य के गुण—ये विष्यन्तकारक अर्थात् अभिष्यन्दी, सूक्ष्म, मल को सरकाने वाले, मृदु, वातविकारनाशक, भोजन को पचाने वाले, तीक्ष्ण, उष्ण, रुचि को बढ़ाने वाले और कफ तथा पित्तकारक होते हैं ॥ १४३ ॥
वक्तव्य—सूक्ष्म लवण (नमक) छोटे से भी छोटे घ्रोतों में प्रवेश कर जाते हैं, यही कारण है कि नाडीव्रणविनाशक मलहमों में घृत, मधु तथा लवण आदि द्रव्यों का प्रमुख रूप से प्रयोग होता है। पाकि—बनने हुए भोजन (दाल आदि) को शीघ्र गला देता है, पकने के बाद आहार को पचाता है और व्रणशोथ (फोड़े) को भी पका देता है।
सैन्धवं तत्र सस्वादु वृष्यं हृद्यं त्रिदोषनृतं ॥ १४४ ॥
लघ्वनुष्णं वृशः पथ्यमविदाहृश्रिदीपनम्।
सैंधानमक के गुण—सभी नमकों में सैंधानमक तीक्ष्णता की कमी के कारण कुछ मधुर, वीर्यवर्धक हृदय के लिए हितकर, त्रिदोषशामक, लघु, कुछ उष्णवीर्य वाला, नेत्रों के लिए हितकारी, अविदाही (पथ्य विदाहकारक नहीं होता) होने पर भी जठराग्नि को प्रदीप्त करता है ॥ १४४ ॥
लघु सौवर्चलं हृद्यं सुगन्धयुत्तारशोधनम् ॥ १४५ ॥
कटुपाकं विबन्धनं दीपनीयं रुचिप्रदम्।
सौवर्चलनमक के गुण—इसी को 'सञ्जीवार' कहते हैं। यह लघु, हृदय के लिए हितकर, सुगन्धित, उद्गार (डकार) को शुद्ध करने वाला, विपाक में कटु, मल-मूत्र की रकावट को हटाने वाला, जठराग्नि को प्रदीप्त करने वाला तथा रुचिकारक होता है ॥ १४५ ॥
अन्तरूपविज्ञानीयाध्यायः ६ ]
सूत्रस्थानम्
११७
ऊर्ध्वधःकफवातानुलोमं दीपनं विडम् ॥ १४६ ॥
विवध्नातहविष्टम्भशूलगौरवनाशनम् ।
विड ( बिरिया ) नमक के गुण—इसका सेवन करने से कफ ऊपर की ओर से निकलने लगता है और अपानवायु नीचे की ओर से निकलता है अर्थात् यह कफ एवं वायु की गति का अनुलोमन करता है, अग्नि को प्रदीप्त करता है, मल-मूत्र की रूकावट, आनाह, विष्टम्भ ( आंतों की गति की रूकावट को ), शूल तथा भारीपन का नाश करता है ॥ १४६ ॥
वक्तव्य—सुश्रुत ने इसे कफ का अनुलोमक नहीं कहा है, केवल वातानुलोमक ही कहा है। देखें—सू. सू. ४६।३१६। आचार्य डल्हन कहते हैं—यह नमक घ्रोतों की शुद्धि करता है, अतएव रूका हुआ वातदोष अनुलोम हो जाता है। कुछ टीकाकारों ने सौवर्चल लवण को कालानमक स्वीकार किया है। जो विडलवण को 'कालानमक' कहते हैं, यह कुत्रिम नमक है।
कालानमक-निर्माणविधि—४०, सेर संधानमक, हरड के छिलके, आंवला का सूखा गुदा और सज्जीबार—ये द्रव्य प्रत्येक आधा-आधा सेर लेकर किसी लोहे या मिट्टी के पात्र में मिलाकर पकाते हैं। जब हरड तथा आंवला गलकर मिल जाता है, तो शीतल होने पर नमक निकाल लिया जाता है। इसी को मराठी में 'पादेलोण' कालानमक कहते हैं।
सौवर्चल लवण—कुछ विद्वानों ने इसे 'कालालवण' माना है। फारसी में सोंचरनमक को ही 'नमकस्याह' कहते हैं। कुछ लोगों का मत है कि जो सौवर्चलनमक गन्धरहित होता है। वह 'कालालवण' है। डॉ० देसाई कहते हैं कि रसग्रन्थों में सौवर्चल 'शोरे' को कहते हैं। श्री द.अ. कुलकर्णी जी कहते हैं—जिस मिट्टी से शोरा प्राप्त होता है, उसे लुनिया मिट्टी कहते हैं, इसमें कुछ मात्रा नमक की भी रहती है। शोरा के साथ प्राप्त होने के कारण इसे सोंचर या सौवर्चल कहते हैं। अस्तु।
विपाके स्वादु सामुद्रं गुरु श्लेष्मविवर्धनम् ॥ १४७ ॥
सामुद्र लवण के गुण—समुद्रलवण ( समुद्र के जल को सुखाकर बनाया गया नमक ) रस में नमकीन किन्तु विपाक में मधुर, गुरु तथा कफदोष को बढ़ाता है ॥ १४७ ॥
सत्तिकटुकक्षारं तीक्ष्णमुक्लेदि चौद्धिदम्।
औद्धिदलवण के गुण—औद्धिदलवण ( रेह या ऊषर नमक ) कुछ तित्त एवं कटु रस वाला, क्षार गुण युक्त, तीक्ष्ण तथा क्लेदकारक होता है।
वक्तव्य—रेह मिट्टी को जल में घोलकर उस पानी को सुखाकर जो नमक तैयार किया जाता है, उसे औद्धिद लवण कहते हैं। जिससे घोबी कपड़े धोते हैं, वही रेह मिट्टी है।
कृष्णे सौवर्चलगुणा लवणे गन्धवर्जिताः ॥ १४८ ॥
कृष्णलवण के गुण—इसमें सोंचर नमक के समान गुण होते हैं, किन्तु उसकी जैसी गन्ध इसमें नहीं होती है ॥ १४८ ॥
रोमकं लघु, पांसुत्थं सक्षारं श्लेष्मलं गुरु।
रोमकलवण के गुण—इसकी उत्पत्ति धूलि से होती है। यह लघु, कुछ खारा, कफकारक तथा गुरु होता है।
वक्तव्य—इसी वर्ग में सज्जीबार तथा सोराखार भी आते हैं। इसी को संस्कृत में सुवर्चिकाक्षार ( कलमीसोरा ) भी कहते हैं।
लवणानां प्रयोगे तु सैन्धवादि प्रयोजयेत् ॥ १४९ ॥
११८
अष्टाङ्गहृदये
सामान्य निर्देश —जहाँ केवल इस प्रकार का शास्त्रनिर्देश हो कि इस योग में लवण का प्रयोग करें, वहीं निश्चित होकर सैन्धवलवण का प्रयोग करना चाहिए॥ १४९॥
बक्तव्य —जहाँ एक लवण का प्रयोग करना हो वहाँ सैन्धवलवण का, जहाँ दो नमकों का प्रयोग करना हो; जैसे—हिम्बष्टकचूर्ण में 'द्विपटु', यहाँ १. सैन्धव तथा २. सौवर्चल का. जहाँ तीन लवणों का प्रयोग करना हो वहाँ—१. सैन्धव, २. सौवर्चल, ३. विड का प्रयोग करना चाहिए। इसी प्रकार चतुर्लवण तथा पञ्चलवण का भी प्रयोग करना चाहिए। चरक ने 'सैन्धव लवणानां हिततमम्' ( च.सू. २५।३८ ) तथा 'ऊपर लवणानामहिततमम्' ( च.सू. २५।३९ ) अर्थात् सभी नमकों में सैन्धानमक उत्तम होता है और ऊपर नमक अहित होता है।
गुल्महृदयग्रहीपाण्डुप्लीहानाहगुलामयान्। श्वासार्शःकफकासांश्च शमयेद्यश्चकूजः॥ १५०॥
यवक्षार के गुण —यवक्षार ( जीवार ) गुल्मरोग, हृदयरोग, ग्रहणीरोग, पाण्डुरोग, प्लीहारोग, आनाह ( अफरा रोग ), स्वरयन्त्र के रोग, श्वासरोग, अशरिग, कफरोग तथा कासरोग को नष्ट करता है॥ १५०॥
क्षारः सर्वश्व परमं तीक्ष्णोष्णः कृमिजिल्लघुः। पितासुन्दृषणः पाकी छेद्यहृद्यो विदारणः॥
अपथ्यः कटुलावण्याच्छूक्रीजःकेशचक्षुषाम्।
सभी प्रकार के क्षार —सभी क्षार अत्यन्त तीक्ष्ण, उष्णवीर्य, कृमिनाशक तथा लघु होते हैं। वे पित्त तथा रक्त को दूषित करते हैं; आहार तथा व्रणशोथ ( फोड़ा ) को पका देते हैं। छेदक ( अर्ध के मसों एवं बालों की जड़ों को काट देते ) हैं, हृदय के लिए अहितकर हैं, पके हुए व्रणशोथ को पका देते हैं, कटु तथा लवण रस-प्रधान होने के कारण ये शुक्र, ओजस, केश तथा नेत्रों के लिए अहितकर होते हैं॥ १५१॥
बक्तव्य —पलाश ( ढाक ) अथवा अर्क ( मदार ) की सूखी लकड़ियों को आग से जला दें। उक्त भस्म को लेकर चौगुना जल डालकर मिट्टी के पात्र में रातभर रहने दें। इस प्रकार राख नीचे जम जायेगी और क्षारयुक्त जल ऊपर रहेगा, इसे सावधानी के साथ दूसरे पात्र में ले लें। इस जल को अग्नि पर रखकर सुखायें। सूखने पर सफेद रंग का क्षार मिलेगा, उसे खुरच कर रख लें। क्षार तैयार है। यह दो प्रकार का होता है—१. प्रतिसारणीय क्षार चूर्णरूप में और २. पानीय क्षार क्वाथ के रूप में। विशेष देखें—सू.नू. ११ सम्पूर्ण। क्षारों का अधिक उपयोग नहीं करना चाहिए। देखें—च.वि. १।१५। और भी देखें—'क्षारपुस्तकोपधातिनां श्रेष्ठः' ( च.सू. २५।४० ) इनका अधिक सेवन करने से पुरुष नपुंसक हो जाता है।
हिङ्गु वातकफानाहशूलज्घ्नं पित्तकोपनम्॥ १५२॥
कटुपाकरसं रुच्यं दीपनं पाचनं लघु।
हींग का वर्णन —वातज रोगों, कफज रोगों, आनाह ( अफरा ) तथा शूलरोगों को यह नष्ट करती है, पित्त को प्रकृपित करती है तथा विपाक एवं रस में कटु होती है। हींग रुचिकारक, अग्निप्रदीपक, पाचक तथा लघु है॥ १५२॥
बक्तव्य —हींग अनेक प्रकार की पायी जाती है, उन सबमें १. हीरा हींग और २. तलाव हींग अच्छी होती है। आजकल नकली हींग की प्राप्ति अच्छी हींग की तुलना में अधिक है। हींग के वृक्ष काबुन फारस, अफगानिस्तान आदि प्रदेशों में अधिक पाये जाते हैं। इन वृक्षों की गोंद को ही हींग कहते हैं। देशी हींग की तुलना में काबुली हींग उत्तम होती है। अच्छी हींग को पानी में घिसने से दुधिया घोल बनता है, दूसरों का नहीं, यही इसकी पहचान है।
कषाया मधुरा पाके रूक्षा विलवणा लघुः॥ १५३॥
दीपनी पाचनी मेध्या वयसः स्थापनी परम्। उष्णवीर्या सराऽऽयुष्या बुद्धीन्द्रियबलप्रदा
कृच्छ्रवैवर्ण्यवैस्वर्यपुराणविषमज्वरान्। शिरोऽक्षिपाण्डुहृद्वोगकामलाग्रहणीगदान्॥ १५४॥
अवस्वरूपविज्ञानीयाध्यायः ६ ]
सूत्रस्थानम्
११९
सशोषशोफातीसारमेदमोहवमिक्रिमीन् । श्वासकासप्रसेकाशः प्रीहानाहगरोदरम् ॥ १५६ ॥
विबन्धद्वोत्तरां गुल्ममूरुस्तम्भमरोचकम् । हरीतकी जयेद्व्याघीर्स्तांताश्च कफवातजान् ॥ १५७ ॥
हरीतकी का वर्णन—यह रस में कसैली, विपाक में मधुर, गुण में रुक्ष, केवल लवण रस से रहित अर्थात् लवण के अतिरिक्त इसमें शेष सभी रस रहते हैं। यह लघु, अग्नि को दीप्त करती है, भोजन को पचाती है, बुद्धिवर्धक है, दीर्घायु प्रदान करने वाले द्रव्यों में सर्वश्रेष्ठ है, उष्णवीर्य है, सर (रेचक), आयु के लिए हितकर, बुद्धि तथा ज्ञानेन्द्रियों को बल देने वाली है।
यह कुष्ठरोग, विवर्णता, स्वरभेद, जीर्णज्वर, विषमज्वर, शिरोरोग, नेत्ररोग, पाण्डुरोग, हृदयरोग, कामलारोग, ग्रहणीरोग, शोष (राजयश्मा), सूजन, अतिसार, मेदोरोग, मोह (मूच्छी), वमन, क्रिमिरोग, श्वास, कास, प्रसेक (लालाप्ताव तथा योनिप्ताव), अशौरोग, प्लीहारोग, आनाह (अफरा), गरविव, उदररोग, घ्रोतों की रूकावट, गुल्मरोग, ऊहस्तम्भ तथा अरोचक आदि कफज एवं वातज रोगों का विनाश करती है ॥ १५३-१५७ ॥
वक्तव्य—आयुर्वेदशास्त्र में हरीतकी (हरड), लहसुन तथा शिलाजीत इन तीन द्रव्यों का विशेष महत्त्व है। हरीतकी की तो यहाँ तक प्रशंसा की गयी है—‘कदाचित् कृष्यति माता नोदरस्या हरीतकी’। अर्थात् माता तो अपने बालक पर कभी रुष्ट हो भी सकती है, परन्तु पेट के भीतर गयी हुई हरीतकी कभी कुपित नहीं होती। सम्भव यह इसके गुणों की वास्तविकता है, न कि अतिशयोक्ति।
तद्वदामलकं शीतमम्लं पित्तकफापहम्।
आमलक का वर्णन—आँवला के गुण भी हरीतकी (हरड) के समान ही होते हैं, परन्तु आँवला शीतवीर्य होता है तथा रस में अम्ल (खट्टा) होता है। यह पित्त तथा कफ का विनाशक होता है।
कटु पाके हिमं केश्यमक्षमीषच्च तदगुणम् ॥ १५८ ॥
बिभीतक का वर्णन—यह भी हरीतकी के समान गुण-धर्मों वाला होता है, किन्तु यह विपाक में कटु, केशों के लिए हितकर होता है, फिर भी हरीतकी तथा आँवला से कुछ कम गुण वाला होता है ॥ १५८ ॥
वक्तव्य—हरड, बहेड़ा, आँवला का सम्मिलित नाम त्रिफला है। तत्वान्तर में कहा है—‘अभयैका प्रदातव्या द्वावेव तु बिभीतकौ। धात्रीफलानि चत्वारि त्रिफलेयं प्रकीर्तिता’ ॥ अर्थात् एक हरीतकी, दो बहेड़ा और तीन आँवला—इनको इस अनुपात में मिलाकर त्रिफला का निर्माण होता है।
इयं रसायनवरा त्रिफलाऽक्षयामयापहा। रोपणी त्वगदक्लेदमेदोमेहकफाघ्नजित् ॥ १५९ ॥
त्रिफला का वर्णन—उक्त तीनों फलों के विधिवत् मिश्रण का नाम ‘त्रिफला’ है। यह उत्तम कोटि का रसायन है। यह नेत्ररोगों का विनाश करती है, ब्रणरोपण, त्वचा में होने वाली सड़न, मेदोदोष, प्रमेह, कफज रोग एवं रक्तज रोगों का विनाश करती है ॥ १५९ ॥
सकेसरं चतुर्जातं त्वकत्रैलं त्रिजातकम्। पित्तप्रकोपि तीक्ष्णोष्णं रुक्षं रोचनदीपनम् ॥ १६० ॥
त्रिजात का वर्णन—दालचीनी, तेजपत्ता और बड़ी इलायची इन तीन द्रव्यों के संयोग का नाम ‘त्रिजात’ या ‘त्रिजातक’ है। ये दोनों शब्द शास्त्रीय प्रयोगों में पाये जाते हैं।
चतुर्जात का वर्णन—उक्त त्रिजात में नागकेसर द्रव्य को मिला देने से इसे ‘चतुर्जात’ या ‘चतुर्जातक’ कहा जाता है। उक्त योगों के गुण-धर्म—ये पित्तवर्धक, तीक्ष्ण, उष्णवीर्य, रुक्ष, अग्नि को प्रदीप्त कर भोजन के प्रति रुचि को बढ़ाते हैं ॥ १६० ॥
रसे पाके च कटुकं कफघ्नं मरिचं लघु।
मरिच (कालीमरिच) के गुण—यह रस एवं विपाक में कटु, कफनाशक तथा लघु होती है।
श्लेष्मला स्वादुशीताऽऽर्द्रा गुर्वी स्निग्धा च पिप्पली ॥ १६१ ॥
सा शुष्का विपरीताऽतः स्निग्धा वृष्या रसे कटुः। स्वादुपाकाऽनिलश्लेष्मश्वासकासापहा सरा ॥
१२०
अष्टाङ्गहृदये
न .तामत्युपयुज्जीत रसायनविधिं विना।
पिप्पली के गुण—हरी पिप्पली कफकारक, स्वाद में मधुर, शीतवीर्य, देर में पचने वाली तथा कुछ स्निग्ध होती है। बही पिप्पली जब सूख जाती है तो उक्त गुणों से विपरीत हो जाती है। तब यह स्निग्ध, वीर्यवर्धक, रस में कटु और विपाक में मधुर होती है। यह वातनाशक, कफनाशक, श्वास तथा कास नाशक एवं सर ( मलभेदक ) है। 'पिप्पलीरसायन' विधि के अतिरिक्त पिप्पली का अधिक सेवन नहीं करना चाहिए॥ १६१-१६२॥
बक्तुध्य—चरक में भी इसके अधिक सेवन का निषेध किया है। देखें—च.वि. १।१५।
नागरं दीपनं वृष्यं ग्राहि हृद्यं विबन्धयत्॥ १६३॥
रुच्यं लघु स्वादुपाकं स्निग्धोष्णं कफवातजित्।
नागर ( सोठ ) के गुण—यह जठराग्नि को प्रदीप्त करता है, वीर्यवर्धक है, मल को बाँधता है, हृदय के लिए हितकर है। सोठों को शुद्ध करता है, रुचिवर्धक, लघु, विपाक में मधुर, स्निग्ध, उष्ण, कफ तथा वात नाशक है॥ १६३॥
तद्वदार्कमेतच्च त्रयं त्रिकटुकं जयेत्॥ १६४॥
स्थौल्याग्निसदनश्वासकासश्चोपदीनसान् ।
आर्द्रक के गुण—सोठ के समान ही इसके भी गुण होते हैं। ये तीनों ( सोठ, मरिच, पीपल ) मिलकर 'त्रिकटु' कहे जाते हैं। इसी को 'कटुत्रय' या 'त्र्युष्ण' भी कहते हैं।
त्रिकटु के गुण—यह स्थूलता ( मोटापा ), मन्दाग्नि, श्वास, कास, श्लोपद ( फीलपाँव ) तथा पीनस रोगों का विनाश करता है॥ १६४॥
चविकापिप्पलीमूलं मरिचाल्पातन्तरं गुणेः॥ १६५॥
चव्य तथा पीपलामूल के गुण—चव्य तथा पीपलामूल ये दोनों द्रव्य गुणों में मरिच के गुणों से कुछ ही कम हैं अर्थात् लगभग वैसे ही गुणों वाले होते हैं॥ १६५॥
चित्रकंऽग्निस्मः पाके शोफार्शःकूमिकुष्ठहा।
चित्रक के गुण—चित्रक के जड़ की छाल पाक में अग्नि के समान है। यह शोफ ( सूजन ), अर्श ( बवासीर ), क्रिमिरोग तथा कुष्ठरोग का विनाश करती है।
पञ्चकोलकमेतच्च मरिचैन विना स्मृतम्॥ १६६॥
गुल्मप्रीहोदरानाहशुलघ्नं दीपनं परम्।
पञ्चकोल के गुण—यह 'पञ्चकोल' के संयोग के बिना ही माना गया है अर्थात् इस योग में—पीपल, सोठ, चव्य, पीपलामूल और चीता की छाल ये ५ द्रव्य हैं। यह गुल्म, प्लीहारोग, उदररोग, आनाह ( अफरा ) तथा शूलरोगों का विनाशक है और उत्तम अग्निदीपक है॥ १६६॥
बक्तुध्य—श्लोक १६१ से १६६ तक में वर्णित द्रव्यों में से मरिच को छोड़कर शेष कहे गये द्रव्यों के योग का नाम 'पञ्चकोल' है, क्योंकि इस योग में इन द्रव्यों की मात्रा १-१ कोल ( आधा-आधा तोला ) होती है। इस 'पञ्चकोल' में यदि मरिच का संयोग कर दिया जाता है, तो इसे 'षडुष्ण' कहते हैं अर्थात् छः उष्ण द्रव्यों का योग।
बिल्वकाशमर्यतकारीपाटलाटिण्टुकैर्महत् ॥ १६७॥
जयेत्कषायतित्कोष्णं पञ्चमूलं कफानिली।
बृहत्पञ्चमूल के योग—बेल की गिरी, गम्भार, अरणी, पाडल तथा सोनापाठा की छाल—इन पाँच द्रव्यों के योग का नाम 'बृहत्पञ्चमूल' है। यह रस में कषाय, तित्तक तथा उष्णवीर्य होता है। यह कफ एवं वात विकारों का विनाशक होता है॥ १६७॥
अन्नस्वरूपविज्ञानीयाध्यायः ६ ]
सूत्रस्थानम्
१११
हृत्स्वं बृहत्त्वशुमतीद्वयगोक्षुरकैः स्मृतम् ॥ १६८ ॥ स्वादुपाकरसं नातिशीतोष्णं सर्वदोषजित्।
लघुपञ्चमूल के गुण—वनभण्टा, कण्टकारी, शालपर्णी, पुष्पिपर्णी एवं गोखरू—इस योग को लघुपञ्चमूल कहते हैं। यह विपाक एवं रस में मधुर, समशीतोष्ण तथा सभी दोषों का शामक है ॥ १६८ ॥
बलापुनर्नैर्रण्डशूर्पपर्णीद्वयेन तु ॥ १६९ ॥ मध्यमं कफवातघ्नं नातिपित्तकरं सरम्।
मध्यमपञ्चमूल के गुण—बला, पुनर्वा, रेड की जड़, माषपर्णी और मुद्रापर्णी—इन पाँच द्रव्यों के योग का नाम 'मध्यमपञ्चमूल' है। यह कफ तथा वात दोष का नाशक तथा सर होता है। यह अधिक पित्तकारक नहीं होता है ॥ १६९ ॥
अभीरुवीराजीवन्तीजीवकपैभकैः स्मृतम् ॥ १७० ॥ जीवनाख्यं तु चक्षुष्यं वृष्यं पित्तानिलापहम्।
जीवनपञ्चमूल के गुण—शतावरी, मेदा, जीवन्ती, जीवक और ऋषभक—इन पाँच द्रव्यों के योग का नाम 'जीवनपञ्चमूल' है। यह आँखों के लिए हितकर, वीर्यवर्धक, पित्तदोष तथा वातदोष का शमन करता है ॥ १७० ॥
तृणाख्यं पित्तजिह्बर्भकासेक्षुशरशालिभिः ॥ १७१ ॥ इत्यौषधवर्गः ।
तृणपञ्चमूल के गुण—दर्भ (डाभ या कुश), कास (काँस), ईख की जड़, शर (सरपत) और शालिधानों की जड़—इनके योग का नाम 'तृणपञ्चमूल' है। यह पित्तशामक होता है ॥ १७१ ॥
वक्तव्य—अष्टांगसंग्रह में दो पञ्चमूलों का संग्रह और मिलता है। यथा—बल्लीपञ्चमूल—मेदासिंगी, हल्दी, विदारीकन्द, सारिवा तथा गिलोय। दूसरा है कण्टकपञ्चमूल—गोखरू, शतावरी, कटसरैया, अर्हीस तथा करौदा। देखें—अ.सं.सू. ११।६१-६२।
शूकशिम्वीजपक्वान्नमांसशाकफलीषधैः। वर्गितैरन्नलेशेऽयमुक्तो नित्योपयोगिकः ॥ १७२ ॥
इति श्रीवैद्यपतिंसिंहगुप्तसूत्रोपनिषद्भाष्यविरचितायामष्टाङ्गहृदयसंहितायां
प्रथमे सूत्रस्थानेऽन्नस्वरूपविज्ञानीयो नाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥
उपसंहार—१. शूकधान्यवर्ग, २. शिम्वीधान्यवर्ग, ३. पक्वान्नवर्ग, ४. मांसवर्ग, ५. शाकवर्ग, ६. फलवर्ग और ७. औषधवर्ग—इस प्रकार के वर्गीकरण द्वारा आहारद्रव्यों का लेशमात्र (अत्यन्त उपयोगी द्रव्यों का) वर्णन यहाँ कर दिया गया है ॥ १७२ ॥
वक्तव्य—उक्त वर्गों के बीच-बीच में कुछ अन्य वर्गों का भी वर्णन इस अध्याय में हुआ है। यथा—'फलवर्ग' के अन्त में 'लवणवर्ग', इसके बाद ही 'हिंगु' का वर्णन सहिताकार ने किया है। प्राचीन निघण्टु-ग्रन्थों में द्रव्यों का वर्गीकरण स्वतन्त्र रूप से देखा जाता है।
इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी द्वारा विरचित निर्मला हिन्दी व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से बिभूषित अष्टाङ्गहृदय-सूत्रस्थान में अन्नस्वरूपविज्ञानीय नामक छठा अध्याय समाप्त ॥ ६ ॥
सप्तमोऽध्यायः
अथातोऽन्नरक्षाध्यायं व्याख्यास्यामः ।
इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षयः ।
अब हम यहाँ से अन्नरक्षा नामक अध्याय की व्याख्या करेंगे। जैसा कि इस विषय में आत्रेय आदि महर्षियों ने कहा था।
निरुक्ति —इस प्रकरण में 'अन्न' शब्द पकाकर तैयार किये गये तथा खाये जाने योग्य पदार्थों का वाचक है। यथा—'अन्नं भक्ते च भुक्ते स्यात्'। इति मेदिनी। अन्यत्र इसके और भी अर्थ होते हैं। इसी अन्न की किस प्रकार और किसलिए रक्षा करनी चाहिए, यही इस अध्याय का प्रधान विषय है। यद्यपि आगे कहा जा रहा है कि राजा या महाराजा अपने घर के पास चिकित्सक के रहने की व्यवस्था करे।
संक्षिप्त सन्दर्भ-संकेत —च.सू. ११, २१, २६; च.शा. ८; च.सि. १२; सु.सू. २०, २४; सु.शा. ४; सु.चि. २४; सु.क. १ तथा अ.सं.सू. ८-९ में देखें।
राजा राजगृहासत्रे प्राणाचार्य निवेशयेत्। सर्वदा स भवत्येवं सर्वत्र प्रतिजागृविः ॥१॥
प्राणाचार्य की नियुक्ति —राजा का कर्तव्य है कि वह अपने राजभवन के समीप शास्त्रज्ञ कुशल चिकित्सक को सदा रखे, उसकी नियुक्ति करे अथवा उसके रहने की व्यवस्था करे। ऐसा करने पर वह चिकित्सक राजा के आहार-विहार आदि के प्रति सदैव जागरूक (सचेष्ट) रहेगा ॥१॥
अन्नपानं विषादक्षेत्रिष्टिषेण महीपतेः। योगक्षेमौ तदायतौ धर्माद्या यन्निवन्धनाः ॥२॥
चिकित्सक का कर्तव्य —राजा या श्रीमान् पुरुष जिस अन्न-पान का सेवन करें, उसमें कहीं से किसी प्रकार विष का प्रयोग तो नहीं हुआ है, इसकी परीक्षा कर उनकी रक्षा चिकित्सक करता रहे। क्योंकि राजा की विधिपूर्वक रक्षा होने पर ही उससे योगक्षेम (जीविका एवं कुशलता) तथा धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष का लाभ प्राप्त हो सकता है ॥२॥
बन्धन्य —उक्त श्लोक में 'अन्नपान' एक प्रधान विषय कह दिया है, इसके अतिरिक्त वस्त्र, माला, गुलदस्ता, रूमाल, प्रसाधन-सामग्री आदि पर भी चिकित्सक को ध्यान रखना चाहिए। विषकन्याओं का प्रयोग होता था, आज भी उसके प्रकारान्तर हैं, इनसे सावधान रहें। वैसे शत्रुओं से सभी को सदा सावधान रहना चाहिए। महर्षि चाणक्य ने तो इससे भी एक कदम आगे बढ़कर कहा है—'न विश्वसेत् कुमित्रे च मित्रे चापि न विश्वसेत्। कदाचित् कुपितं मित्रं सर्वं गृहं प्रकाशयेत्' ॥ (चा.नी. २।६)
ओदनो विषवान् सान्द्रो यात्यविद्याव्यतामिव। चिरेण पच्यते पक्वो भवेत्सर्पुषितोपमः ॥३॥
मयूरकण्ठतुल्योष्मा मोहमूर्च्छाप्रसेककृत। हीयते वर्णगन्धाद्यैः क्लिद्यते चन्द्रिकाचितः ॥४॥
विषैले भात के लक्षण —विष मिला हुआ भात कुछ गीला-सा रहता है, ऐसा लगता है, मानो उसमें से मीठ न निकाला गया हो। यदि पकते समय ही विष डाल दिया गया हो तो बावल देर से पकते हैं। यदि पके हुए भात में विष मिला दिया हो तो वह बासी भात जैसा दिखलायी देता है, उसमें से जो भाप निकलती है वह मोर के कण्ठ के समान वर्ण वाली (नीली) होती है। उस भाप के लगने से अथवा उस भात को खोलने से मोह, मूर्च्छा होती है तथा मुख से लार निकलने लगती है। वह विषैला भात अपने स्वाभाविक रूप तथा गन्ध वाला नहीं रह जाता है, उसमें गलन या सड़न-सी पैदा हो जाती है और उसमें चन्द्रिकाएँ जैसी दिखलायी पड़ती हैं ॥३-४॥