अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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अष्टाङ्गहृदये
में स्त्रियों का मांस अधिक गुरु होता है। इसके विपरीत पक्षियों में स्त्री से पुरुष पक्षी का मांस अधिक गुरु होता है। यहाँ तक स्त्री-पुरुष के शरीर के अवयवों के मांस की गुरु-लाघव चर्चा हो गयी।
अब शरीर के अवयवों की चर्चा प्रस्तुत है। सिर, कन्धे, ऊरुओं, पीठ, कमर, टाँगों, आमाशय तथा पक्वाशय का मांस पूर्व-पूर्व अर्थात् अन्तिम से पहला, फिर उससे पहला—इस क्रम से गुरु होता है और रक्त आदि धातु भी उत्तरोत्तर गुरु होते हैं। यथा रक्त से मांस गुरु होता है। मांस से भी अधिक गुरु वृष (अण्डकोष), मेद (पुरुष की मूत्रेन्द्रिय), वृक्क (गुरदे), यकृत तथा गुदभाग का मांस उत्तरोत्तर गुरु होता है ॥ ६९-७१ ॥
वक्तव्य —इस वर्ग में मांसधातु के गुण-दोषों का विवेचन किया गया है। यह सम्पूर्ण सूष्ठि गुण-दोषमय है। 'मांसात्मांसं प्रबद्धते' अर्थात् मांस खाने से मांस बढ़ता है। ऐसा देखा भी जाता है, यह शास्त्रवचन भी है। ऐसा भी नहीं कि मांस खाने वाले ही हृष्ट-पुष्ट होते हों, शाकाहारी भी स्वस्थ, हृष्ट तथा प्रसन्न रहते ही हैं। मांसभक्षण सिंह आदि प्राणियों का धर्म है। प्राणियों में सद्भावना रखने के क्षेत्र में अहिंसा का प्रमुख स्थान है, अस्तु। मांसभक्षण जिह्वा के स्वाद का 'मिथ्यायोग' है। इन्द्रियों का वशीभूत मानव सत्-असत् सभी कर्मों को करता है। वास्तव में यह आयुर्वेद किसी जाति या सम्प्रदाय विशेष का न होकर मानव मात्र को स्वास्थ्य-सन्देश देने वाला एक प्रमुख शास्त्र है।
अथ शाकवर्गः
शाकं पाठाशठीसूषासुनिषण्णसतीनजम्। त्रिदोषध्नं लघु ग्राहि सराजक्षववास्तुकम् ॥ ७२ ॥
शाकों का वर्णन —अब यहाँ से कतिपय शाकों का वर्णन किया जा रहा है—पाठा, शठी (कचूर), सूषा (कासमर्द या कसौर्दों), सुनिषण्ण (चौपतिया), सतीनज (तीनी), राजक्षव (नकछिकनी) तथा बथुआ—ये सभी शाक त्रिदोषनाशक, लघु एवं ग्राही होते हैं ॥ ७२ ॥
वक्तव्य —ऊपर संक्षेप से कतिपय शाकों का वर्णन किया गया है, इसके आगे प्रायः उन्हीं का स्वतन्त्र रूप में विस्तार से वर्णन किया है। शाकभेद —१. पत्र, २. पुष्प, ३. फल, ४. नाल, ५. कन्द और ६. संखेदज—इस प्रकार शाकों के छः भेद होते हैं। ये उत्तरोत्तर एक-दूसरे से गुरु होते हैं, शास्त्रों में शाकों की निन्दा लिखी है। यथा—'शक्निन रोगा वर्धन्ते' (चा. नीति) और यह भी कहा है—ये त्रिष्टम्भी, गृहपाकी, रूक्ष आदि भी होते हैं। फिर भी ये प्रतिदिन खाये जाते हैं, अतः इन्हें सामान्य वचन समझना चाहिए अर्थात् इनका अधिक सेवन न करें।
सुनिषण्णोऽश्रिकृद्वृष्यस्तेषु—
सुनिषण्णक का वर्णन —सुनिषण्णक (चौपतिया) का शाक उक्त सभी शाकों में अग्रि्वर्धक तथा वीर्यवर्धक होता है।
वक्तव्य —इस शाकवर्ग में कहे गये सभी शाकों के पर्याय निषण्टु-ग्रन्थों में देखें।
—राजक्षवः परम्। ग्रहण्यशौविकारज्ः—
राजक्षव का वर्णन —राजक्षव (नकछिकनी) का शाक ग्रहणीरोग तथा अशौरोग का नाश करने वाले शाकों में उत्तम होता है।
—वर्चोर्भेदि तु वास्तुकम् ॥ ७३ ॥
वास्तुक का वर्णन —वास्तुक (बथुआ) का शाक बंधे हुए मल का भेदन कर निकालने में उत्तम होता है ॥ ७३ ॥
हन्ति दोषत्रयं कुष्ठं वृष्या सोष्णा रसायनी। काकमाची सरा स्वर्षा—