अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंब्रह्मवैवर्तविज्ञानीयाध्यायः ६ ]
सूत्रस्थानम्
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तद्वद्वराहः श्रमहा रुचिशुक्लबलप्रदः ॥ ६६ ॥
सूअर का मांस—सूअर का मांस भी भैंसे के मांस के समान गुण-धर्म वाला होता है। यह शारीरिक बलप्रद का दूर करता है, भोजन के प्रति रुचि को बढ़ाता है, वीर्यवर्धक तथा बलप्रद होता है ॥ ६६ ॥
मत्स्याः परं कफकारः—
मत्स्य का मांस—सभी प्रकार की मछलियों का मांस अत्यन्त कफकारक होता है।
—चिलिचीमस्त्रिदोषकृत ।
चिलिचिममत्स्य का मांस—चिलिचिम नामक मछली का मांस त्रिदोषकारक होता है।
बक्त्य—पक्षियों में चमगादड़ और मछलियों में चिलिचिम जब जिधर मौका लगता है, उधर के गे बाते हैं। चमगादड़ पंख होने के कारण पक्षियों में और दांत होने के कारण मुग आदि पशुओं में सम्मिलित हो जाता है। इसी प्रकार चिलिचिम जलचर तथा थलचरों में सम्मिलित हो जाता है। ऐसे लोगों के चरित्र का गुण-धर्म दूषित होते ही हैं।
लावरोहितगोघैणाः स्वे स्वे वर्गे वराः परम् ॥ ६७ ॥
लाव आदि का वर्णन—अपने-अपने वर्ग में इन प्राणियों के मांस उत्तम माने गये हैं, होते भी हैं। यथा—विष्किर वर्ग में 'लाव' पक्षी का मांस, मत्स्य वर्ग में 'रोहित मछली' का मांस, बिलेशय वर्ग में गोधा (गोह) का मांस और मृगवर्ग में 'एण' (हरिण) का मांस ॥ ६७ ॥
बक्त्य—अनूप देशवासी अथवा नदियों के तटवर्ती वे लोग जो सदा अन्न के स्थान पर मछलियों का ही आहार करते हैं। वे अपने को मांसाहारी स्वीकार नहीं करते। वे इन्हें फल या शाक के रूप में नकार करते हैं और मछलियों को वे 'जलतोरेई' संज्ञा देते हैं।
मांसं सद्योहृतं शुद्धं वयःस्थं च भजेत्—
भक्ष्य मांस-वर्णन—तत्काल मारे गये, जवान प्राणी के शुद्ध (साफ किये गये) मांस का सेवन करना चाहिए।
—त्यजेत् । मृतं कृशं भूशं मेघं व्याधिवारिविर्घैर्हतम् ॥ ६८ ॥
अभक्ष्य मांस-वर्णन—स्वयं मरे हुए, अत्यन्त कृश हो, जो मृत प्राणी अधिक मेदस्वी हो या रोग-विशेष के कारण मरा हुआ हो, जल में डूबने से मरे प्राणी के अथवा विष के कारण जो मरा हो, ऐसे प्राणियों का मांस न मांसने का सेवन नहीं करना चाहिए ॥ ६८ ॥
बक्त्य—गाय के मांस को बेचने वाला बूचड़ तथा अन्य सभी प्रकार के मांसों को बेचने वाला कहा जाता है। अथवा ये दोनों ही कसाई हैं। ये भक्ष्य (हितकर), अभक्ष्य (अहितकर) दोनों प्रकार के मांसों को बेचते हैं। अतः मांसभक्षण करने वाले सावधान रहें। रोगी प्राणियों का मांस खा लेने से बचने वाले व्यक्ति को वे सभी रोग हो जाते हैं जिनके कारण उस प्राणी की मृत्यु हुई थी। प्रायः ये अन्विष्टता बीमार पशुओं को सस्ते दामों में खरीद कर उन्हें मारकर उनका मांस बेच दिया करते हैं।
पुंस्त्रियोः पूर्वपश्चाद् गुरुणी, गर्भिणी गुरुः । लघुयोरपिचतुष्पात्सु, विहङ्गेषु पुनः पुमान् ॥ ६९ ॥
शिरःस्कन्धोरूपुष्टस्य कटघाः सक्श्नोश्च गौरवम् । तथाऽऽमपक्वाशययोर्यापूर्व विनिर्दिशेत् ॥
शोणितप्रभृतीनां च धातूनामृतरोत्तरम् । मांसाद्वरीयो वृषणमेद्वृक्कयकुदुदम् ॥ ७१ ॥
इति मांसवर्गः ।
विशिष्ट अवयवों के मांस—पुरुषों के शरीर के पूर्वाधं भाग का और स्त्रियों के शरीर के उत्तरार्ध का मांस गुरु होता है। गर्भिणी स्त्री का मांस भी गुरु होता है। चौपायों में पुरुष प्राणी की तुलना