अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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अष्टाङ्गहृदय
क्रकर तथा उपचक्रक के मांस—ये मेधा (धारणाशक्ति) को बढ़ाने वाले, जठराग्नि को तेज करने वाले तथा हृदय के लिए हितकारक होते हैं ॥ ५९ ॥
गुरुः सलवणः काणकपोतः सर्वदोषकृत् ।
काणकपोतक का मांस—जंगली कबूतर का मांस पाचन में गुरु, कुछ नमकीन रस वाला तथा वात आदि तीनों दोषों को उभाड़ने वाला होता है।
चटकाः श्लेष्मलाः स्निग्धा वातघ्नाः शुक्रलाः परम् ॥ ६० ॥
चटक का मांस—यह मांस कफकारक, चिकना, वातदोषनाशक तथा शुक्र को अत्यन्त बढ़ाने वाला होता है ॥ ६० ॥
गुरुष्णस्निग्धमधुरा वर्गाश्चातो थ्योत्तरम् । मूत्रशुक्रकृतो बल्या वातघ्नाः कफपित्तलाः ॥ ६१ ॥
आठों मांसों का वर्णन—उक्त आठों मांस अपने क्रम से उत्तरोत्तर गुरु, उष्ण, चिकने तथा मधुर होते हैं। ये मूत्रवर्धक, शुक्रवर्धक, बलवर्धक, वातनाशक एवं कफ-पित्तकारक होते हैं ॥ ६१ ॥
शीता महामृगास्तेषु क्रव्यादप्रसहाः पुनः । लवणानुरसाः पाके कटुका मांसवर्धनाः ॥ ६२ ॥
जीर्णार्शोग्रहणीदोषशोषार्तानां परं हिताः ।
महामृगों के मांस—उनमें भी महामृगों के मांस शीतवीर्य होते हैं। क्रव्यादों (कच्चा मांस बनने वाले प्राणियों) के तथा प्रसहों (जो दूसरे से लूटकर खा जाते हैं, उन) के मांस कुछ नमकीन स्वाद वाले, विपाक में कटु तथा मांस को बढ़ाने वाले होते हैं। ये पुराने अशरिरों, ग्रहणीरोग तथा शोष (राजयक्ष्मा) रोग से पीड़ितों के लिए अत्यन्त हितकारक होते हैं ॥ ६२ ॥
नातिशीतगुरुस्निग्धं मांसमाजमदोषलम् ॥ ६३ ॥
शरीरधातुसामान्यादनभिष्यन्दि बृंहणम् ।
बकरा का मांस—यह मांस समशीतोष्ण होता है, अतएव कहा गया है कि यह अतिशीत नहीं होता, अतिगुरु एवं अतिसनिग्ध भी नहीं होता; इसीलिए यह किसी दोष-विशेष को नहीं बढ़ाता। यह मनुष्य के शरीर की रस आदि धातुओं के समान होने के कारण अभिष्यन्दी भी नहीं है। यह सभी धातुओं को बढ़ाता है ॥ ६३ ॥
विपरीतमतो ज्ञेयमाविकं बृंहणं तु तत् ॥ ६४ ॥
भेड़ का मांस—भेड़ का मांस बकरे के मांस के गुणों से विपरीत गुणों वाला होता है, किन्तु इस भी शरीर की धातुओं को बढ़ाता है ॥ ६४ ॥
शुष्ककासश्रमाल्यप्रिविषमज्वरपीनसान् । काश्यं केवलवातांश्च गोमांसं सत्रियच्छति ॥ ६५ ॥
गाय का मांस—गाय के मांस का सेवन करने से सूखी खांसी, श्रम (थकावट), अत्यग्नि (भस्मरोग), विषमज्वर, पीनस, कृशता तथा केवल (शुद्ध) वातरोगों का विनाशक होता है ॥ ६५ ॥
वक्तव्यं—सुश्रुत ने गोमांस के गुणों में एक गुण 'पवित्र' भी दिया है, जो विचारणीय है। देखें—सू. न. ४६।८९। चरक ने भी प्रायः उक्त गुणों का ही वर्णन किया है। देखें—च.सू. २।७।७९। किन्तु इन्होंने 'गोमांसं मृगमांसानाम्' (च.सू. २।५।३९) कहकर सभी मृगमांसों में इसे अधिक अप्यर्थ कहा है और वाग्भट ने भी 'निन्दितो गोः' (अ.सं.सू. ७।१०८) कहकर अपना अभिप्राय प्रकट किया है।
उष्णो गरीयान्महिषः स्वप्नदाडर्घबृहत्स्वकृत् ।
भैंसा का मांस—यह अत्यन्त उष्ण, अत्यन्त गुरु, पर्याप्त नींद लाने वाला, शरीर को दृढ़ करने वाला तथा पुष्टिकारक होता है।