भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

पृष्ठ 135, कुल 387 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 135

ब्रह्मरूपविज्ञानीयाध्यायः ६ ]

सूत्रस्थानम्

१९

का वर्णन करके ने इस प्रकार दिया है—'स पुनः शकली लोहितनयनः सर्वतो लोहितराजी रोहिताकारः उग्रो भूमौ चरति' । ( च.सू. २६।८३ ) यह इसकी आकृति का परिचय है और यह प्रायः भूमि में चरती है अर्थात् पानी से हटकर भी जीवित रहती है, यह इसकी विलक्षणता है।

योनिष्वजावी व्यामिश्रगोचरत्वादनिश्चिते ॥५४॥

बकरी-भेड़ का वर्णन—बकरी तथा भेड़ की योनि ( उत्पत्तिस्थान ) के सम्बन्ध में निश्चित रूप में यह नहीं कहा जा सकता, क्योंकि ये दोनों जांगल तथा आनूप देश में विचरण करती रहती हैं ॥५४॥

आद्यान्या जाङ्गलानूपा मध्ये साधारणो स्मृतौ ।

शेष प्राणियों का निर्णय—शेष मांसयोनियों का निश्चय इस प्रकार है—प्रारम्भ के तीन वर्ग ( १. मृग, २. विष्किर, ३. प्रतुद ) जांगल देश के और अन्तिम तीन वर्ग ( १. महामृग, २. जलचर पक्षी तथा मत्स्य ) आनूप देश के कहे जाते हैं तथा मध्यम दो वर्ग ( १. बिलेशय तथा २. प्रसह ) वाले दोनों लक्षणों से युक्त साधारण देश के माने जाते हैं।

तत्र बद्धमलाः शीता लघवो जाङ्गला हिताः ॥५५॥

पित्तोत्तरे वातमध्ये सन्निपाते कफानुगे ।

मांसों का वर्णन—उक्त मांसों में जांगल देश के प्राणियों के मांस मल को बांधते हैं, शीतवीर्य, पित्त में लघु तथा हितकर होते हैं। ये पित्त-प्रधान, मध्यम वात एवं हीन कफ वाले सन्निपात में हितकारक होते हैं ॥५५॥

दीपनः कटुकः पाके ग्राही रूक्षो हिमः शशः ॥५६॥

शशकमांस के गुण—खरोंश का मांस जठराग्नि को प्रदीप्त करने वाला, विपाक में कटु, ग्राही मल को बांधने वाला ), रूक्ष तथा शीतवीर्य होता है ॥५६॥

ईषदुष्णगुरुस्निग्धा बृहणा वर्तकादयः । तितिरिस्तेष्वपि वरो मेधाग्निबलशुक्रकृत् ॥५७॥

ग्राही वष्योंऽनिलोद्भिरुत्सन्निपातहरः परम् ।

वर्तक आदि के मांस—ये कुछ उष्णवीर्य, पाचन में गुरु, स्निग्ध तथा पुष्टिकारक होते हैं। इन मांसों में तीतर का मांस उत्तम होता है, क्योंकि यह घ्राण करने की शक्ति वाली बुद्धि, बल तथा शुक्र ( वीर्य ) को बढ़ाता है एवं मल को बांधता है, मुखमण्डल की कान्ति को बढ़ाता है और वातदोष-प्रधान सन्निपात का विनाशक है ॥५७॥

नातिपथ्यः शिखी पथ्यः श्रोत्रस्वरवयोदृशम् ॥५८॥

मोर का मांस—मोर का मांस अधिक पथ्यकारक नहीं होता, तथापि कर्णन्द्रिय, स्वरवाही प्रोत्स, वृत्त तथा दृष्टि को स्थिरता प्रदान करता है ॥५८॥

तद्वच्च कुक्कुटो वृष्यः—

कुक्कुट का मांस—कुक्कुट का मांस भी मोर के मांस के समान गुण वाला होता है और यह वृष्य ( वीर्यवर्धक ) भी होता है।

—ग्राम्यस्तु श्लेष्मलो गुरुः ।

पालतू मूर्गा का मांस—ग्राम्य ( पालतू ) मूर्गा का मांस वन में होने वाले मूर्गा के मांस से कफकारक तथा गुरु होता है।

मेधाऽनलकरा हृद्याः क्रकराः सोपचक्रकाः ॥५९॥

अष्टाङ्गहृदयम् · पृष्ठ 135, कुल 387 में से · BharatKosha