भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

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९८ अष्टाड्रहदये

अष्टांगसंग्रह ( सू. ७।७६ ) में बिलेशय प्राणियों की गणना इस प्रकार है---श्वेत, श्याम, रंग-बिरंगी

पीठ वाला तथा कालक नामक प्राणी मेढक, चिल्लट, कूचीक, गोह, शल्लक, शण्डक ( साँडा ), वृष ( जंगली

बिलाव ), साँप, कदली ( पौण्ड्देश में पाया जाने वाला प्राणी ), श्वाविध ( बड़ा साही ) तथा नेवला---ये

बिलेशय प्राणी हैं।

गोखराश्वतरोष्ट्राश्वद्वीपिसिंहर्क्षवानरा: । मार्जारमूषकव्याप्रवृकबश्चरुतरक्षवः || ४८ ||

लोपाकजम्बुकश्येनचाषवान्तादववायसा:।_ शशघ्नीभासकुररग॒ध्नोलककुलिड्भका:। ।। ४९ ॥

धूमिका मधुहा चेति प्रसहा मृगपक्षिण:।

प्रसह मग---गाय, गधा, खच्चर, ऊँट, घोड़ा, द्वीपि ( चीता ), सिंह, भालू, बिलाव, चूहा, बाघ,

व॒क ( भेड़िया ), नेवला, तरक्षु ( लकड़बग्घा ), लोमड़ी तथा सियार | पक्षी---श्येन ( बाज ), चाष ( नीलकण्ठ ),

वान्ताद ( कुत्ता ), कौआ, चील, भास, कुरर, गिद्ध, उल्लू, कुलिंगक, धूमिक तथा मधुहा नामक पक्षी

प्रसह कहे जाते हैं।। ४८-४९॥

वक्तव्य---ऊपर ४८वें श्लोक का यह उत्तरार्ध चाषवान्तादवायसाः कुछ खटक रहा है, क्योंकि

यहाँ पक्षियों के बीच' में कुत्ता का समावेश कर दिया है। यही स्थिति अ.सं.सू. ७।७८ की भी है। वास्तव

में वान्‍्ताद की गणना अन्वयविधि से कर भी ली जाती तो यहाँ सम्पूर्ण पंक्ति ही समस्त है, अस्तु। भीड़

में मनुष्य भी इधर-उधर भटक जाते हैं, पशु-पक्षियों का तो कहना ही क्‍या है ?

वराहमहिषन्यड्कुरुरुरोहितवारणाः ॥ ५०॥।

सुमरश्चमरः: खड़गो गवयश्व महामृगाः।

महामृग-परिचय---सूअर, भैंसा, न्‍्यंकु (बारहसिंगा का भेद ), रुर, रोहित, हाथी, समर ( हरिण

भेद ), चमर, गैंडा तथा गवय ( जंगली गाय )--ये महामृग कहे जाते हैं।। ५० ॥

हंससारसकादम्बबककारण्डवप्लवाः ॥ ५१॥

बलाकोत्क्रोशचक्राह्मद्ुक़रौड्चादयो 5प्चरा: ।

जलचर पक्षी--हंस, सारस, कादम्ब, बक ( बगुला ), कारण्डव, प्लव, बलाका, उत्क्रोश, चकवा,

मद्गु ( जलकौआ ), क्रौज्च आदि पक्षी 'जलचर' कहे जाते हैं।। ५१ ॥

मत्या. रोहितपाठीनकूर्मकुम्भीरकर्कटा: | ५२॥

शुक्तिशड्डरेद्रशम्बूकशफरीवर्मिचन्द्रिका-। . चुल॒कीनक्रमकरशिशुमारतिमिड्धिला: | ५३॥

राजीचिलिचिमाद्या श्व---

मत्स्य-परिचय---रोहू, पाठीन, कछुआ, कुम्भीर, केकड़ा, शुक्ति ( सीपी ) का क्रिमि, शंख का क्रिमि,

उद्र ( जलबिलाव ), शम्बूक ( घोंघा ), शफरी (छोटी जाति की मछली ), वर्मी, चन्द्रिका, चुलुकी, नक्र

( घड़ियाल ), मकर, शिशुमार, तिमिंगिल ( हल मछली ), राजी तथा चिलचिम आदि मत्स्यवर्ग में परिगणित

हैं। ५२-५३॥

--मांसमित्याहरष्टधा।

( मृग्यं वेष्किरिक किज्च प्रातुद॑ च बिलेशयम्‌।

प्रासह च महामग्यमप्चर मात्स्यमष्टधा | १॥ )

आठ प्रकार के मांस---१. मृग, २. विष्किर, ३. प्रतुद, ४. बिलेशय, ५. प्रसह, ६. महामृग; ७. जलचर

पक्षी तथा ८. मत्स्यवर्ग ॥ १॥

वक्तव्य---यहाँ 'जलचर' नाम से कुछ पक्षियों का वर्णन किया गया है, उसके बाद “मत्स्यमांस'

का उल्लेख है। मछलियाँ जलज, जलेचर तथा जलेशय होती हैं; किन्तु इनमें 'चिलचिम' नामक मछली

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