अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअक्षररूपविज्ञानीयाध्यायः ६ ]
सूत्रस्थानम्
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वक्तव्य—अष्टांगसंग्रह सू. ७।६७-६८ में मुर्गों की गणना इस प्रकार की गयी है—हरिण, एण, कुरंग, कृष्ण, गोकर्ण ( नीलगाय ), मुग्गामातुका, कालपुच्छक, चारुक्क, वरपोत, शशक, उरण, श्वदंष्ट्र, राम, शरभ ( यह मुग काश्मीर में पाया जाता है, इसके आठ पैर होते हैं ), लोहकारक, शम्बर ( सींभर ), कंगल ( कस्तूरीमृग ), कृतमाल तथा पुषत ( बिन्दुओं से युक्त त्वचा वाला )। चरक ने 'मृग जाङ्गल्लचारिणः' ( ज.सू. २७।५५ ) कहा है अर्थात् ये जंगल में विचरण करते रहते हैं। शिकारी इन्हे दूदते हैं, अतएव इन्हे मृग कहा जाता है।
लाववार्तीकवर्तीरक्तवर्त्मककुक्कुभाः । कपिञ्जलोपचक्राश्वचकोरकुशवाहवः ॥ ४४ ॥
वर्तको वर्तिका चैव तित्तिरः क्रकरः शिखी । ताम्रचूडाश्वबकरगोनर्दगिरिवर्तिकाः ॥ ४५ ॥
तथा शारपदेन्द्राभवरटाद्याश्व विष्किराः ।
विष्किर-परिचय—लाव ( लवा ), वर्तक ( बटेर ), रक्तवर्त्मक, कुक्कुभ, कपिञ्जल, उपचक्र ( चक्का ), चकोर, कुरुबाह, वर्तक ( बत्तख ), वर्तिका, तीतर, क्रकर, मोर, ताम्रचूड ( मुर्गा ), बकर, गोनर्द, गिरिवर्तिका, शारपद, इन्द्राभ तथा वरट नामक पक्षी विष्किर कहे जाते हैं ॥ ४४-४५ ॥
वक्तव्य—अष्टांगसंग्रह ( सू. ७।६९-७१ ) में विष्किर पक्षियों की गणना इस प्रकार की गयी है—लाव, वर्तक, वातीर, रक्तवर्त्मक ( गौरिया—गुहचटक ), कुक्कुभ ( जंगली मुर्गा ), कपिञ्जल ( जंगली गौरिया ), उपचक्र ( चक्का ), चकोर, कुरुबाह, वर्तक ( बत्तख ), वर्तिका, तित्तिर, क्रकर ( बया ), मोर, मुर्गा, वरक ( बगुला ), गोनर्द, गिरिवर्तिका, शारपद, इन्द्राभ तथा वरटा ( हंस की स्त्री )—ये सभी पक्षी विष्किर कहे जाते हैं।
विष्किर शब्द का अर्थ—पहले दानों के ढेर को पंजों से बिखेर कर बाद में एक-एक दाना चुनकर खाने वाले पक्षियों को 'विष्किर' कहते हैं।
जीवजीवकदात्युहभृङ्गाहशुकसारिकाः ॥ ४६ ॥
लङ्काकोकिलहारीतकपोतचटकादयः । प्रतुदाः—
प्रतुद-परिचय—जीवजीवक, दात्युह, भृंग या भुंगराज, शुक्, सारिका ( मैना ), लङ्का, कोकिल ( कोयल ), हारीत, कपोत ( कबूतर ) तथा चटक ( गौरिया ) आदि पक्षी प्रतुद कहे जाते हैं ॥ ४६ ॥
वक्तव्य—अष्टांगसंग्रह सू. ७।७२-७५ में प्रतुद पक्षियों की गणना इस प्रकार है—शतपत्र ( कठफोड़वा ), भुंगराज, कोयण्डि ( जलमुर्गा ), जीवजीवक, खंजरीट ( खंजन पक्षी ); हारीत ( हरियल ), दुर्गामारि ( उल्लू ), कुशगुह, लङ्का, लङ्घक, वटहा, गोक्षवेड, डिण्डिमाणक, जटी ( जटायु ), दुन्दुभि, पार्कार, लोहपुष्क, कलिंगक, सारिका, शुक्, शाङ्ग ( सारंग ), चिरीटीक, कुयण्टिक, मञ्जरीयक, दात्युह, गोपापुत्र, प्रियात्मज, कलविक, कोयल, कबूतर, अंगारचूड़क, पारावत ( पेरवा वा जंगली कबूतर ) तथा पाणविक—ये पक्षी 'प्रतुद' कहे जाते हैं। चाँच मारकर दाना चुगने वाले पक्षियों की 'प्रतुद' संज्ञा है।
विष्किर तथा प्रतुद वर्ग के पक्षी यद्यपि ऊपर अलग-अलग गिनाये गये हैं तथापि दोनों में प्रतुद धर्म समान ही होता है। सम्प्रति ये पक्षी उक्त नामों से अपरिचित से हो चले हैं, इनका परिचय बहेलियों ( चिड़ीमारों ) से प्राप्त कर लेना चाहिए।
—भेकगोधाहिष्भाविदाद्या बिलेशयाः ॥ ४७ ॥
बिलेशय-परिचय—भेक ( मेढक ), गोह, सर्प तथा साही आदि प्राणी 'बिलेशय' कहे जाते हैं ॥ ४७ ॥
वक्तव्य—बिलेशय अर्थात् बिल में रहने वाले। मेढक मिट्टी के भीतर, गोह तथा सर्प का बिल होता ही है, साही के पूरे शरीर पर काँटे रहते हैं, यह बिल बना लेता है अथवा किसी गुफा को अपने लिए दूँड लेता है। इसके काँटे धार्मिक कृत्य तथा कृत्या प्रयोग में लिए जाते हैं।
७ अ० ह०