भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

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अष्टाङ्गहृदये

मूंग आदि के वेसवार—मूंग, उड़द आदि वेसवार भी गुरु होते हैं, जिन घटकों द्वारा वे बनाये जाते हैं, उन्हीं के समान उन वेसवारों के गुण तथा कर्म भी होते हैं ॥४॥

बक्तव्य—‘सिद्धसार’ में कहा गया है—‘अत्युष्ण मण्डकाः पथ्याः शीतला गुरवो मताः’। अर्थात् उक्त मूंग आदि द्वारा निर्मित मण्डक गरमागरम यदि खाये जाते हैं, तो हितकर होते हैं और वे शीतल हो जाने पर गुरु हो जाते हैं अर्थात् ढेर में पचते हैं।

वेशवार—जीरा, मरिच, सोंठ, पीपलामूल, धनियाँ, हल्दी, दारुहल्दी, पिप्पली तथा सफेद मरिच—यह सब वेशवारगण हैं। देखें—राज० मिश्रकर्म २२।६२। इन मसालों को डालकर जो मूंग आदि दालों के मण्डक (पकोड़े, बड़े आदि) बनाये जाते हैं, उनके गुण-धर्मों का ऊपर वर्णन किया गया है। यह शब्द तालव्य अथवा दन्त्य सकार मध्य भी देखा जाता है।

कुकूलकपिरप्राष्ट्रकन्दुङ्गरविपाचितान् । एकयोर्नौलघून्विद्यादपूणानुतरोत्तरम् ॥४२॥

इति कृताश्रवर्गः ।

अपूर्वों का वर्णन—कुकूल (भूसा की आग), कपिर या खपिर अर्थात् फूटे हुए घड़े का टुकड़ा, प्राष्ट्र (भाड़), कन्दुक (गोल आकार वाली कड़ाही) तथा जलते हुए कोयलों को अंगार कहते हैं। इनमें पकाये गये गेहूँ आदि किसी एक ही जाति के आटा के अपूर्व उत्तरोत्तर हलके होते हैं ॥४२॥

बक्तव्य—‘अपूर्’ शब्द सामान्यतया गेहूँ के आटे को घोलकर चीनी डालकर पकाये हुए मालपुआ के लिए प्रयुक्त होता है। यहाँ ‘अपूर्’ की निर्माण-विधि से ‘लिट्टी’ या ‘बाटी’ का बोध हो रहा है, विशेषकर ‘कुकूलपाचितान्’ तथा ‘अङ्गारपाचितान्’ को देखकर। ‘कपिरप्राष्ट्रकन्दुपाचितान्’ को देखकर रोटी का आभास हो रहा है। कपिर या खपिर का अर्थ है फूटे घड़े के खप्पर का तवा; प्राष्ट्र का अर्थ है—भड़भूजे की भाड़ या भड़साँय या भड़साई अथवा तन्दूर; कन्दु का अर्थ है—लोहे का तवा या कड़ाही। अब आप तवा या कड़ाही में जो भी बनायें किन्तु ऊपर के साधनों में अपूर्व का बनना या बनाना सम्भव नहीं है। इस प्रकार यहाँ अपूर्व का अर्थ—लिट्टी, बाटी, रोटी, फुलका, चिलड़ा, पराठा तथा मालपुआ भी हो सकता है। यद्यपि इसमें पकाये जाने वाले पदार्थ के लिए यहाँ घी-चीनी का उल्लेख नहीं किया है, फिर भी अन्न, पकाने वाले पात्र तथा अग्नि का उल्लेख तो किया ही गया है। अतः यहाँ ‘एकदेशविकृत-स्यानन्यत्वात्’ इस नियम से सभी का ग्रहण कर लिया जायेगा।

‘कपिर’ शब्द का अर्थ है—घड़े का ‘ठीकरा’। संस्कृत-साहित्य में एक आचार्य हुए हैं, जिनका नाम था ‘वटकपिर’। ये यमकालेकार की रचना में अपने काल में अद्वितीय थे। इनकी एक गर्वक्ति है—‘जीयेय येन कविना यमकैः परेण, तस्मै वहेयमुदकं घटकपिरेण’। यहाँ भी कपिर या खपिर शब्द का वही अर्थ है।

इस प्रकरण का नाम ‘कृताश्रवर्ग’ है। इसका अर्थ है—किये (पकाये) गये अन्नों (भक्ष्यपदार्थों) का वर्ग। ‘कृत’ का अर्थ संस्कृत भी होता है, इसका तात्पर्य है—मसाले आदि डालकर भलीभाँति पकाये गये और उसके बाद घी-तेल से छौंके गये। इस दृष्टि से सभी प्रकार के भक्ष्य पदार्थ कृत-अकृत भेद से दो प्रकार से बनाये जाते हैं। देखें—‘त्रेयाः कृताऽकृतास्ते तु स्नेहादियुतबर्जिताः’। (अ.सं.सू. ७।५१) अर्थात् कृत (संस्कृत) अथवा अकृत (असंस्कृत)।

अथ मांसवर्गः

हरिगैणकुर्ङ्क्षीर्गोकर्णमृगमातुकाः । शशशम्बरचारुष्कशरभाद्या मृगाः स्मृताः ॥४३॥

मृग-परिचय—हरिण, एण, कुरंग, गोकर्ण, मृगमातुका, शश, शम्बर (सौंभर—बारहसिंगा), चारुष्क तथा शरभ आदि ‘मृग’ कहे जाते हैं ॥४३॥