भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

पृष्ठ 131, कुल 387 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 131

कर्मसहस्रविज्ञानीयाध्यायः ६ ]

सूत्रस्थानम्

९५

वक्तव्य —वाग्भट ने उक्त 'धाना' को 'गुरु' कहा है, सुश्रुत का मत इसके विपरीत है—'धानोऽलुम्बास्तु वक्तव्यः कफमेदोविशेषणाः' । (सु.सू. ४६।४१०) अर्थात् धाना तथा उलुम्बा (होलक) ये लघु होते हैं, बल एवं मेदोधातु को सुखाते हैं। ऐसा क्यों ?

समाधान —'सुश्रुत' के मत में ये द्रव्य पाक में लघु हैं और गुणों में गुरु होते हैं। 'उलुम्बा' को हिन्दी में 'होरहा' भी कहते हैं।

सक्तवो लघवः क्षुतृश्रमनेत्रामयव्रणान् ॥ ३८ ॥

धन्ति सन्तर्पणाः पानात्सद्य एव बलप्रवाः । नोदकान्तरितान् द्विन्न निशायान् न केवलान् ॥ ३९ ॥

न भुक्त्वा न द्विजैशिल्वत्वा सक्तूनद्यान्न वा बहून् ।

सत्तुओं का वर्णन —प्रायः सभी प्रकार के सत्तु लघु होते हैं। ये भूख, प्यास, थकावट, नेत्ररोग आदि त्रणों को नष्ट करते हैं। ये पीने से तत्काल तृप्तिकारक तथा बल (शक्ति) कारक होते हैं। सत्तु वाले समय बीच-बीच में पानी नहीं पीना चाहिए। दिनभर में दो बार सत्तु का सेवन न करें, इसे रात में नहीं खाना चाहिए। केवल (बिना नमक या गुड़ मिलाये) सत्तु नहीं खाने चाहिए। भोजन कर लेने के बाद भी सत्तु का सेवन न करें। आटा की भाँति सानकर दंतों से काट-काट या चबा-चबा कर इनका सेवन न करें और अधिक मात्रा में भी सत्तु न खाये ॥ ३८-३९ ॥

वक्तव्य —अन्य प्रकार के भोजनों के बीच-बीच में जिस प्रकार लोग पानी पीते हैं, वैसा सत्तुओं के साथ न करें। 'न केवलान्' का अर्थ श्री अरुणदत्त तथा हेमाद्रि ने किया है—'उदकादिरहितात्' । इसमें यदि पद से नमक या गुड़ या मिश्री समझना चाहिए। कुछ लोग इसकी रुक्षता कम करने के लिए इसमें मिला लेते हैं। घी मिलाने की सलाह संग्रहकार की भी है। सत्तुओं को घोलकर पीना यही उचित है। आटा जैसा सानकर खाना उचित नहीं है।

सत्तु-निर्माण —जौ, जना, मसूर, बेर आदि को भूँजकर पीस लिया जाता है, इस प्रकार जो आटा बनाया जाता है, उसे 'सत्तु' कहते हैं। इसका प्रचार पूर्वी उत्तरप्रदेश में अधिक है। इधर इसके 'होरल' भी देखे जाते हैं, उनका नाम होता है—'तुरन्ता भोजनालय' ।

पिण्याको रल्पनो रुक्षो विष्टम्भो दृष्टिदूषणः ॥ ४० ॥

पिण्याक-वर्णन —पिण्याक (तिल या सरसों की खली) ग्लानिकारक, रुक्षताकारक, विष्टम्भ (मल जो रोकने वाला), दृष्टि को दूषित करने वाला होता है ॥ ४० ॥

वक्तव्य —पिण्याक का सेवन रात्रि में नहीं करना चाहिए, क्योंकि यह रुक्ष होने के कारण विष्टम्भ करता है। उसके बाद यह विदाह करता है, फिर मन में ग्लानि को करता है।

वेसवारो गुरुः स्निग्धो बलोपचयवर्धनः ।

वेसवार-वर्णन —यह गुरु, स्निग्ध (चिकना), बलवर्धक तथा शरीर को स्थूल बनाता है ।

वक्तव्य —वेसवार का परिचय श्रीचक्रपाणि ने च.सू. २७।२६९ की टीका में इस प्रकार दिया है—'मांसं निरस्य सुस्निग्धं पुनर्दृषादि पेषितम् । पिप्पलीशुण्डिमरिचगुडमर्पिः समन्वितम् । ऐकध्वं विपचेत् सम्यग्वेशवार इति स्मृतः' । (सुदशास्त्र) अर्थात् अस्थिरहित मांस के छोटे-छोटे टुकड़ों को पकाकर उन्हें फिर सिल पर पीसकर नीमल, मोठ, मरिच, गुड़, घी मिलाकर फिर से एक साथ पकायें, इसे वेसवार कहते हैं। इसी का अविकल पाद सुश्रुत में देखें—सु.सू. ४६।३६४-३६५। यह मांसाहारियों का 'वेसवार' है। शाकाहारियों का 'वेसवार' आगे कहा जायेगा।

मुद्गादिजास्तु गुरवो यथाद्रव्यगुणानुगाः ॥ ४१ ॥

अष्टाङ्गहृदयम् · पृष्ठ 131, कुल 387 में से · BharatKosha