भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

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द्रवद्रव्यविज्ञानीयाध्यायः ५ ]

सूत्रस्थानम्

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उष्ण, लवणरसयुक्त तथा कटुरसयुक्त होते हैं। ये क्रिमि, शोथ, उदररोग, आनाह ( अफरा ), शूल, पाण्डुरोग, कफविकार, वातविकार, गुल्म, अरुचि, विषविकार ( विशेषकर सर्पविष ), श्वित्र ( सफेद दाग वाला कुष्ठ ), कुष्ठ तथा अर्श ( बवासीर ) रोगों को शीघ्र शान्त करते हैं ॥ ८२-८३ ॥

वक्तव्य —श्रीचक्रपाणि च.सू. १।९३ की व्याख्या करते हुए कहते हैं—‘अविमूत्रमित्यादौ स्त्रीमूत्रमेव प्रशस्तमिति लिङ्गपरिग्रहाद् दशयति; यतः स्त्रीणां लघ्वङ्कृत्वान्मूत्रमपि लघु; वचनं हि—‘लाघवं जातिसामान्ये स्त्रीणां पुंसां च गौरवम्’ ॥ ( च.सू. २।४३३८ ) वास्तव में उक्त पाठ इस प्रकार है—‘गौरवं लिङ्गसामान्ये पुंसां स्त्रीणां च लाघवम्’। हारीत का कथन है कि चौपायों में स्त्री को लघु और पक्षियों में पुरुष को लघु माना है, अस्तु।

सुश्रुत का मत —इनके अनुसार गाय, भैंस, बकरी, भेड़ ( स्त्री जाति का ) और घोड़ा, हाथी, गधा, ऊँट ( पुरुष जाति ) का ग्रहण करना चाहिए। इन्होंने नरमूत्र का भी ग्रहण करते हुए कहा है—यह विषनाशक होता है। इस प्रकार मूत्रों की संख्या = ८ + १ = ९ हो जाती है।

मूत्रप्रयोग का क्षेत्र —विरचन के लिए इसका प्रयोग निरुहणबस्ति द्वारा किया जाता है। ये मूत्र विविध प्रकार के लेपों में तथा स्वेदन कार्य के लिए उपयोगी होते हैं। ये दीपन, पाचन तथा मलभेदक ( दस्तावर ) होते हैं। उक्त सभी मूत्रों में गोमूत्र उत्तम होता है। अ.सं.सू. ६।१४५-१४७ में वाग्भट ने इनके शक्तु ( मलों ) का भी वर्णन किया है।

आहार को पचाने के लिए पिताशय से आकर जितना पित्त द्रव खाये हुए आहार में मिलता है, इसका कुछ अंश मूत्र के साथ और कुछ मल के साथ शरीर से बाहर निकल जाता है, अतः मल एवं मूत्र में पित्तवर्धक गुण पाये जाते हैं, अतएव इनका प्रयोग चिकित्सा में किया जाता है। मरे हुए प्राणियों के पिताशय से पित्तद्रव का संग्रह कर लिया जाता है, जिसका बाद में औषध रूप में प्रयोग किया जाता है। गाय के पित्त को ‘गोरोचन’ कहते हैं। इसका प्रयोग चिकित्सा तथा तान्त्रिक प्रयोगों में भी किया जाता है।

तोयक्षीरेभुतेलानां वर्गमैद्यस्य च क्रमात्। इति द्रवैकदेशेऽयं यथास्थूलमुदाहृतः ॥ ८४ ॥

इति श्रीवैद्यपतिसिंहगुप्तसूनुश्रीमद्वाग्भटविरचितायामष्टाङ्गहृदयसंहितायां

प्रथमे सूत्रस्थाने द्रवद्रव्यविज्ञानीयो नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥


उपसंहार —जल, धीर, दधु, तैल तथा मद्य वर्गों का इस अध्याय में क्रमशः वर्णन कर दिया गया है। इस प्रकार स्थूल रूप से द्रव-द्रव्यों के एक विशेष अंग को कह दिया है ॥ ८४ ॥

वक्तव्य —यद्यपि उक्त पद्य अष्टांगसंग्रह ( ६।१४९ ) से लिया गया है, तथापि इसमें ‘मूत्रवर्ग’ का उल्लेख नहीं किया गया है। इसके अतिरिक्त इन्होंने इक्षुवर्ग के अन्तर्गत ‘मधुवर्ग’ को दे दिया था, उसे हमने स्वतन्त्र वर्ग के रूप में दे दिया है।

इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी द्वारा विरचित

निर्मला हिन्दी व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से विभूषित अष्टाङ्गहृदय-सूत्रस्थान में

द्रवद्रव्यविज्ञानीय नामक पाँचवीं अध्याय समाप्त ॥ ५ ॥