अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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अष्टाङ्गहृदय
शाण्डाकी-वर्णन—शाण्डाकी, आसुत तथा दूसरे वे द्रव जो कुछ (३ या ४) दिन तक रख देने से खट्टे हो जाते हैं, वे रुचिकारक तथा लघु (सुपान्य) होते हैं ॥७८॥
बक्तब्य—शाण्डाकी, आसुत, सौवीर, तुषोदक आदि नाम अलग-अलग पदार्थों से बनायी गयी कॉजियों के हैं। यह गर्मी के दिनों में २-३ दिनों में सेवन करने योग्य हो जाती है और शीतकाल में ५-६ दिनों में तैयार हो पाती है। फिर जितने दिन इसे रखेंगे खट्टी होती जाती है। यह खट्टी तथा मीठी भेद से दो प्रकार की होती है।
खट्टी कॉजी के घटक द्रव्य—१. जल, २. तमक, ३. राई, ४. हल्दी तथा ५. कालीमिर्च।
मीठी कॉजी के घटक द्रव्य—ईख का रस आदि मीठे द्रव-द्रव्यों द्वारा जल के योग से बनाई जाती है। कॉजी का एक नाम 'अवन्तीसोम' भी है। वास्तव में यह मालव देश (मारवाड़) या जांगल देश का अमृत है, वही इसे विविध प्रकार से बनाया जाता है, अन्यत्र यह अच्छी बनती भी नहीं।
धान्याम्ल भेदि तीक्ष्णोष्णं पित्तकृत्स्पर्शशीतलम्। श्रमकलमहरं रुच्यं दीपनं बस्तिशूलनुत् ॥७९॥
शस्तमात्स्यापने हृद्यं लघु वातकफापहम्। एभिरेव गुणैर्युक्ते सौवीरकतुषोदके ॥८०॥
कृमिहृद्वोगुल्माश्वः पाण्डुरोगनिबर्हणे। ते क्रमाद्वितुषैर्विद्यात्सतुपैश्च यवैः कृते ॥८१॥
इति मद्यवर्गः।
धान्याम्ल आदि का वर्णन—धान्याम्ल नामक कॉजी मल (पुरीष) का भेदन कर उसे निकालती है। यह तीक्ष्ण, उष्ण, पित्तवर्धक तथा स्पर्श में शीतल होती है। यह श्रम (शारीरिक थकावट) एवं क्लम (मानसिक थकावट) को दूर करती है। रुचिवर्धक, दीपन (जठराग्नि को बढ़ाने वाली), बस्तिशूलनाशक, निरुह्णबस्ति में उपयोगी, हृदय के लिए हितकर, पाचन में लघु और वात तथा कफ दोष को नष्ट करती है।
सौवीरक तथा तुषोदक—उक्त धान्याम्ल के समान ही गुण इनके भी होते हैं। विशेष रूप से इनका प्रयोग इन रोगों के विनाश के लिए किया जाता है—क्रिमिरोग, हृदयरोग, गुल्मरोग, अशौरीग तथा पाण्डुरोग। दोनों में भेद—सौवीरक कॉजी तुषरहित यवसमूह से बनायी जाती है और तुषोदक कॉजी तुष सहित यवसमूह से बनायी जाती है ॥७९-८१॥
बक्तब्य—भात या भात के माँड में जो कॉजी बनायी जाती है, उसे 'धान्याम्ल' कहते हैं। 'सौवीरक' तथा 'तुषोदक' के भेदक लक्षण ऊपर कह दिये गये हैं।
ऊपर 'एभिरेव' से 'यवैः कृते' तक के श्लोकों की तीन पंक्तियाँ श्री अरुणदत्तसम्मत होने से इस संस्करण में अधिक हैं। ये पंक्तियाँ अ.सं.सू. ६।३९-१४० से ली गयी हैं।
कॉजी का स्पर्श शीतल होता है, अतः दाहशान्ति तथा ज्वरशान्ति के लिए इसमें साफ वस्त्र का रई के फाहा को भिगाकर दाहस्थान पर माथा या नाभि पर रखा जाता है। ध्यान रहे, इसकी वृंदें ओंछों में न पड़ने पायें।
अथ मूत्रवर्गः
मूत्रं गोडजाविमहिषीगजाश्वोष्ट्रवरोद्रवम्। पित्तलं रुक्षतीक्ष्णोष्णं लवणानुरसं कटु ॥८२॥
कृमिशोफोदरानाहशूलपाण्डुकफानिलान्। गुल्मास्त्रचिपिष्वित्रकृच्छ्राशींस जयेरलघु ॥८३॥
इति मूत्रवर्गः।
आठ प्रकार के मूत्र—१. गाय, २. बकरी, ३. मेढी, ४. महिषी, ५. हाथी, ६. घोड़ा, ७. ऊँट तथा ८. गधा का मूत्र चिकित्सा में उपयोगी होता है। सामान्य दृष्टि से सभी मूत्र पित्तकारक, रुक्ष, तीक्ष्ण