भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

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द्वद्वयविज्ञानीयाध्यायः ५ ]

सूत्रस्थानम्

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वातपित्तकरः सीधुः स्नेहस्नेहोन्मविकारहा ॥ ७४ ॥

मेदः शोफोदराशीर्णस्तत्र पक्वरसो वरः ।

सीधु का वर्णन—यह वात-पित्तकारक होता है, स्नेह के कारण उत्पन्न हुए विकारों तथा कफ-विकारों को नष्ट करता है। यह मेदोरोग, ब्रणशोथ, उदरविकार तथा अशौरोग को नष्ट करता है। दो प्रकार के सीधुओं में शीत रस की तुलना में पक्वरस से बना हुआ सीधु गुणों में उत्तम होता है ॥ ७४ ॥

वक्तव्य—सीधु दो प्रकार का होता है—१. शीतरस तथा २. पक्वरस। इसका निर्माण-प्रकार इस प्रकार है—ईख तथा अंगूर आदि के मधुर रस को पात्र में डालकर धूप में रख दें। इसे दो-तीन सप्ताह के बाद छानकर दूसरे पात्र में रख दिया जाता है। जब-जब इसमें जाला पड़े तब-तब इसे छानकर दूसरे पात्र में रख दें। जब जाला पड़ना बन्द हो जाय और वह रस अत्यन्त निर्मल हो जाय तो समझना चाहिए कि सीधु (सिरका) तैयार है। इसे बनाने के पारिवारिक अन्य अनेक प्रकार भी देखे जाते हैं। प्रायः इसके निर्माण में ४-५ मास का समय लग जाता है। इसका स्वाद अम्ल (खट्टा) होता है। यह पाचन होता है। इसका प्रयोग चटनी आदि के लिए किया जाता है।

छेदी मध्वासवस्तीक्ष्णो मेहपीनसकासजित् ॥ ७५ ॥

मध्वासव का वर्णन—मधु के संयोग से बनाये गये आसव को मध्वासव कहते हैं। यह मल आदि का छेदन करता है और गुणों में तीक्ष्ण होता है। प्रमेह, पीनस एवं कास रोग को नष्ट करता है ॥ ७५ ॥

रक्तपित्तकफोत्कलेदि शुक्तं वातानुलोमनम्। श्रुशोष्णतीक्ष्णरूक्षास्मत् हृदयं रुचिकरं सरम् ॥ ७६ ॥

दीपनं शिशिरस्यर्षं पाण्डुवृक्कुमिनाशनम्।

शुक्त का वर्णन—यह रक्त, पित्त तथा कफ दोष को उभारता है, वातदोष का अनुलोमन करता है। यह गुण में अत्यन्त उष्ण, तीक्ष्ण, रूक्ष तथा अम्लरस-प्रधान होता है। हृदय के लिए हितकर, रुचिकर, सर (मल को निकालने वाला), अग्निदीपन तथा स्पर्श में शीतल होता है। यह पाण्डुरोग, नेत्ररोग तथा क्रिमिरोग का नाश करता है ॥ ७६ ॥

गुडेक्षुमद्यमार्द्रिकशुक्तं लघु यथोत्तरम् ॥ ७७ ॥

गुड आदि शुक्त—गुड का शुक्त, ईख का शुक्त, मद्यनिर्माण-विधि से बनाया गया शुक्त तथा मुनक्का से बनाया गया शुक्त उत्तरोत्तर गुणों में हल्के होते हैं ॥ ७७ ॥

कन्दमूलफलार्धं च तद्वद्विद्यात्तदासुतम्।

कन्द आदि शुक्त—सूरण, जिमीकन्द आदि कन्दों, गाजर-मूली आदि मूलों तथा लौकी, सेम, केवौच आदि फलों से बनाया गया आसुत (आसव की भाँति चुवाया गया) द्रव भी उसी प्रकार लघु होता है।

वक्तव्य—यह शुक्त दो-तीन दिन में तैयार हो जाता है। मारवाड़, पंजाब आदि प्रदेशों में इसे 'काँजी' कहते हैं। इसमें राई पीसकर डाली जाती है; हींग, जीरा, कालानमक, हल्दी, तेल में पकाये पकोड़े भी डाले जाते हैं। खट्टापन आते ही इसमें डाले गये पदार्थों के साथ वह पानी भी पिया जाता है, जो पाचक तथा भूख को बढ़ाता है।

शुक्त-चुक्रनिर्माण-विधि—'मुण्मयादिशुचो भाण्डे सगुडे क्षौद्रकाञ्जिकम्। धान्यराशो विरात्रिरस्य शुक्रं चुक्रं तदुच्यते' ॥ अर्थात् मिट्टी आदि (तीवा-पीतल का नहीं) के साफ पात्र में गुड तथा शहद को जल में घोलकर डाल दें। इस पात्र को तीन दिन तक धान्यराशि में दबाकर रख दें। इसी को शुक्त या चुक्र कहते हैं।

शाण्डाकी चासुतं चान्यत् कालाम्लं रोचनं लघु ॥ ७८ ॥

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