अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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अष्टाङ्गहृदये
वक्तव्य —आचार्य शाङ्कधर ने आसव-अरिष्ट के विवेदक लक्षणों का वर्णन इस प्रकार किया है—‘यद-पक्षीषधाम्बुभ्यां सिद्धं मद्यं स आसवः । अरिष्टः क्वाथसाध्यः स्यात् तयोर्मनि पलोन्मिप्तम्’ ॥ (शा.सं.म. १०।२) अर्थात् कच्ची औषधियाँ तथा जल के योग से सन्धान द्वारा जो मद्य तैयार किया जाता है, उसे ‘आसव’ कहते हैं। औषध-द्रव्यों को जल में डालकर क्वाथ करने के बाद जो मद्य तैयार किया जाता है, उसे ‘अरिष्ट’ कहते हैं। इन दोनों की साधारण मात्रा १ पल (४ तोला) है।
आसव-अरिष्ट का यह विवेदक लक्षण प्राचीन संहिताओं में नहीं मिलता है। हाँ, सुश्रुत ने आसवों से अरिष्टों को अधिक गुणवाला स्वीकार किया है—‘अरिष्टो द्रव्यमयोगसंस्कारादधिको गुणैः’ । (सु.सू. ४।१९४) अर्थात् अरिष्ट में आसव से अधिक औषधद्रव्यों का संयोग होने से तथा संस्कार-विशेष होने से यह (अरिष्ट) अधिक गुणवान् होता है।
माद्रीकं लेखनं हृद्यं नात्युष्णं मधुरं सरम् । अल्पपित्तानिलं पाण्डुमेहार्शःकृमिनाशनम् ॥ ७२ ॥
मूनक्का का मद्य —मुद्रीका को हिन्दी में मूनक्का या दाख कहते हैं। इसके द्वारा बनाया हुआ मद्य लेखन होता है, हृदय के लिए हितकर होता है। यह अधिक उष्ण नहीं होता, स्वाद में मधुर एवं इसका गुण सर है। यह थोड़ा पित्तदोष तथा वातदोष को बढ़ाता है। पाण्डुरोग, प्रमेह, अर्श (बवासीर) तथा क्रिमिरोग नाशक होता है ॥ ७२ ॥
वक्तव्य —ऊपर मूनक्का के मद्य (द्राक्षासव) को ‘लेखन’ कहा गया है। यह आयुर्वेद में प्रयुक्त होने वाला एक पारिभाषिक शब्द है। लिखने की क्रिया को जो ‘लेखन’ कहा जाता है, वह वास्तविक रूप में लेपन है, क्योंकि हम स्याही द्वारा लेपन कार्य करते हैं। हाँ, उत्कीर्ण-लेखन कार्य में इस शब्द का समुचित प्रयोग हुआ है, क्योंकि ‘लिख’ धातु का अर्थ है—अक्षरविन्यास। इसी अर्थ में आयुर्वेद का लेखन शब्द भी है, जरा इसकी परिभाषा देखें—‘धातून् मलान् वा देहस्य विशोष्योल्लेखयेच्च यत् । लेखनं तद्यथा क्षीरं नीरमुष्णं वचा यवाः’ ॥ (शा.पू. ४।१०) अर्थात् जो द्रव्य सम्पूर्ण शरीर की धातुओं और मलों को सुखाकर तथा छीलकर निकाल देता है, वह ‘लेखन’ कहा जाता है। यथा—शहद, गरम जल, बालवच तथा जी। वास्तव में छेदन एवं लेखन दोनों द्रव्य भीतर के जमे हुए दोषों को निकाल कर बाहर कर देते हैं।
अस्मादल्पान्तरगुणं खार्जूरं वातलं गुरु । शार्करः सुरभिः स्वादुहृद्यो नातिमदो लघुः ॥ ७३ ॥
खार्जूर-शार्कर आसव —खजूर का मद्य—ऊपर मूनक्का के मद्य के जो गुण कहे गये हैं, उनसे खजूर के मद्य में कुछ कम गुण होते हैं। यह वातकारक तथा गुरु (देर में पचने वाला) होता है।
शार्कर (चीनी से निर्मित) मद्य —यह सुगन्धित, स्वाद में मधुर, हृदय के लिए हितकारक, अधिक नशा न करने लायक तथा लघु (शीघ्र पचने वाला) होता है ॥ ७३ ॥
सूष्ठमूत्रशकुह्रातो
गौडस्तर्पणदीपनः ।
गुड निर्मित आसव —यह मल, मूत्र तथा अपानवायु को बाहर निकलने के लिए प्रेरित करता है। यह मद्य तुष्टिकारक तथा अग्निदीपक होता है।
वक्तव्य —मद्य, आसव, मुरा, शराब, दारू आदि जिस-जिस द्रव्य से बनाये जाते हैं, उस-उस नाम से ये पुकारे जाते हैं। इस विषय में चरक ने कहा है—‘योनिसंस्कारनामाद्यैविशेषैर्बहुधा च या । भूत्वा भवत्येकविधा सामान्यान्मदलक्षणान्’ ॥ (च.चि. २।४६) अर्थात् जो योनि (उत्पत्तिस्थान—धान्य, फल, मूल, सार, पुष्प, काण्ड, पत्र, त्वचा, शर्करा), संस्कार (पिप्ली आदि द्रव्यों से) तथा नाम आदि विशेषताओं से बहुत प्रकार की होती हुई भी मदलक्षण के सब में समान होने के कारण शराब एक ही प्रकार की होती है। देखें—च.सू. २।४४९। चरक के उक्त सन्दर्भ में इसके यथासम्भव भेदों का वर्णन कर दिया गया है।