भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

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द्वन्द्वविज्ञानीयाध्यायः ५ ]

सूत्रस्थानम्

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एलोपैथी तथा होमियोपैथी पद्धति के अनुसार मद्यसार ( सिद्र ) में औषधियाँ डालकर कुछ समय तक उसी में पड़ी रहने पर उस-उस औषध को टिंवर के रूप में तैयार कर लिया जाता है। आयुर्वेदीय पद्धति के अनुसार औषधि तथा द्रव के संयोग से सन्धान करके आसव, अरिष्ट आदि तैयार कर लिये जाते हैं। औषध-द्रव्यों के ब्वाथ आदि से आसव-अरिष्ट अपना प्रभाव इसलिए शीघ्र दिखलाते हैं, क्योंकि मद्य का एक गुण 'आशुकारी' भी है। अतएव सुश्रुत ने कहा है—'आशुत्वाच्चाशुक्रमकृत' । ( मु.उ. ४७५ )

तदुगुण वाशुणी हृद्या लघुस्तीक्ष्णा निहन्ति च । शूलकासवमिश्वासविबन्धाभ्मानपीनसान् ॥ ६८ ॥

वाशुणी-परिचय—वाशुणी नामक मद्य के गुण भी उक्त सुरा के समान होते हैं। शेष गुण इस प्रकार हैं—यह हृदय को बल देती हैं, लघु ( शीघ्र पचने वाली ) तथा तीक्ष्ण है। यह शूल, कास, वमन, श्वास, विबन्ध ( प्रोटों की रक्तावट, मल-मूत्र की रक्तावट ), अफरा तथा पीनस रोगों को नष्ट करती है ॥ ६८ ॥

वक्तव्य—वरुणदेव ( जल तथा पश्चिम दिशा के स्वामी ) को यह मद्य प्रिय थी, अतः इसे 'वाशुणी' कहते हैं। शाङ्कधराचार्य का कथन है कि इसका निर्माण ताल या ताड़ तथा खजूर के रस का सन्धान करके किया जाता है। वैसे भी ताड़ एवं खजूर की ताड़ी प्रसिद्ध है। यह सूर्योदय से पहले पीने पर मधुर स्वाद वाली होती है, सूर्य निकलने के बाद क्रमशः खट्टी होती जाती है।

नातितीव्रमदा लघ्वी पथ्या बेभीतकी सुरा । ब्रणे पाण्डुवामये कुष्ठे न चाल्यर्थ विरध्यते ॥ ६९ ॥ विष्टम्भिनी यवसुरा गुर्वी रूक्षा त्रिदोषला ।

बहेड़ा की सुरा—बिभीतक ( बहेड़ा ) की सुरा अधिक नशीली नहीं होती, हलकी होती है, हितकर होती है। और सुराओं की भाँति यह ब्रण, पाण्डुरोग तथा कुष्ठरोग में अधिक हानिकारक नहीं होती ॥ ६९ ॥

यव ( जो से निर्मित ) सुरा—यह विष्टम्भकारक ( कन्वियत करने वाली ), गुरु, रूक्षा तथा त्रिदोषकारक होती है। कोहली सुरा—यह शरीर को स्थूल करने वाली तथा गुरु ( देर में पचने वाली ) होती है। मधूलक सुरा—यह कफकारक होती है।

वक्तव्य—वास्तव में 'विष्टम्भिनी'... 'मधूलकः' ॥ यह पद्य अ.सं.सू. ६१२४ क्रमसंख्या में सुलभ है। इसे कुछ विद्वान् यहाँ भी जोड़ना चाहते हैं और कुछ इसकी प्रथम पंक्ति को यहाँ उद्धृत करना चाहते हैं, किन्तु श्रीहेमाद्रि कोहली सुरा का वर्णन करने वाली पहली पंक्ति को भी 'हृदयकार' की सम्पत्ति नहीं मानते, अस्तु।

कोहली सुरा—प्रथम मत—वैद्यकशब्दसिन्धु में इसे 'कृष्णाण्डसुरा' कहा है अर्थात् कृष्णाण्ड = पेटा, जिसकी मिठाई ( कोहड़ापाक ) बनती है, उससे बनायी गयी सुरा। द्वितीय मत—'कोहलो यवमक्तुकुत-मद्याविशेषः' अर्थात् जो के सत्तुओं के द्वारा बनायी गयी सुरा। तीसरा मत—'कोहलः शक्तुभिर्देहै बाह्नीके क्रियते यवैः' । ( वाचस्पतिः ) बाह्नीक ( बल्लव—अरब ) देश में जो के सत्तुओं द्वारा निर्मित सुरा। इस प्रकार दूसरा-तीसरा मत प्रायः समान है, केवल तीसरे मत में देश-विशेष की चर्चा है।

'मधूलक' का परिचय देते हुए श्रीहन्तु कहते हैं—'सर्वं मद्यमसञ्जातं मधूलकमिति स्मृतम्'। इति हन्तुः। उन सभी मद्यों को 'मधूलक' कह सकते हैं, जिनका सन्धान भलीभाँति न किया गया हो।

यथाद्रव्यगुणोडरिष्टः सर्वमद्यगुणाधिकः ॥ ७० ॥

ग्रहणीपाण्डुकुष्ठाशैः शोफशोपोदरज्वरान् । हन्ति गुल्मकृमिष्पीहः कषायकटुवातलः ॥ ७१ ॥

अरिष्ट-परिचय—जिन द्रव्यों के संयोग द्वारा जिम अरिष्ट का निर्माण किया जाता है, वह अरिष्ट उन द्रव्यों के गुण-धर्म के समान होता है, किन्तु यह आसव सभी मद्यों से अधिक गुणवान् होता है। यह ग्रहणी, पाण्डु, कुष्ठ, अर्श, शोफ ( सूजन ), शोष ( क्षय ), उदररोग, ज्वर, गुल्म, क्रिमिरोग तथा प्लीहाविकारों को नष्ट करता है। यह स्वाद में कसैला तथा कटु होता है और वातवर्धक होता है ॥ ७०-७१ ॥

६ अ० ह०