भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

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अष्टाङ्गहृदये

द्रव्य है। उक्त यज्ञ का संक्षिप्त परिचय—सौत्रामणि यज्ञ का ऋषि प्रजापति, देवता सुरा तथा इसका छन्द अनुष्टुप् है। इस यज्ञ में जिस समय सुरा-सन्धान किया जाता है, उस समय इस मन्त्र का उच्चारण किया जाता है—‘ॐ स्वाद्वीन्त्वा स्वादुना तीव्रा तीब्रेणामृतामृतेन। मधुमतीं मधुमता सुजामि। स सोमेन सोमोऽस्यश्विभ्यो पञ्चस्य सरस्वत्यै पञ्चस्वेन्द्राय सुवाम्णे पञ्चस्य’। इसका विस्तृत विवरण यजुर्वेद-काण्वाशाखा अध्याय २१-२३ में देखें।

गुरु तद्दोषजननं नवं, जीर्णमतोऽन्त्यम् ॥६५॥

नया तथा पुराना मद्य—नया मद्य गुरु (देर में पचने वाला) तथा विदोषकारक होता है और इसके विपरीत पुराना मद्य लघु (शीघ्र पचने वाला) एवं विदोषशामक होता है ॥६५॥

वक्तव्य—तात्पर्य यह है कि नये मद्यों का सेवन नहीं करना चाहिए, केवल पुराने मद्य, आसव, अरिष्ट आदि का सेवन करना चाहिए। अतएव कहा गया है—‘पुराणाः स्युर्गुणैर्मुक्ता आसवा धातवो रसाः’। अर्थ स्पष्ट है।

पेयं नोष्णोपचारेण न विरिक्तभुधातुरैः। नात्यर्थतीक्ष्णमृद्वत्पसम्भारं कलुषं न च ॥६६॥

मद्य का निषेध—उष्ण गुणयुक्त आहार-विहार के साथ, विरिचन करने के बाद एवं भूखे पेट में मद्य का सेवन न करे। अत्यन्त तीक्ष्ण, अत्यन्त मृदु (जिसमें मादकता बहुत कम हो), जो समुचित सामग्री से न बनाया गया हो और जो मलिन अर्थात् स्वच्छ न किया गया हो, ऐसे मद्य को नहीं पीना चाहिए ॥६६॥

गुल्मोदराशौग्रहणीशोषहृत्य स्नेहनी गुरुः। सुराऽनिलम्नी मेदोऽमुक्तत्प्यमृत्रकफावहा ॥६७॥

विभिन्न सुराओं का वर्णन—‘सुरा’—यह गुल्मरोग, उदररोग, अशरिग, ग्रहणीरोग तथा शोष (राजयक्ष्मा) रोग का विनाश करती है। यह स्नेहनकारक, गुरु (देर में पचने वाली) तथा वातनाशक होती है। यह मेदोधातु, रक्तधातु, दूध, मूत्र एवं कफदीष को बढ़ाती है ॥६७॥

वक्तव्य—सुरा-परिचय—‘शालिपिष्टकृतं मद्यं सुरा’। (श्रीहेमाद्रि) मद्य के अनेक भेदों में सुरा का भी एक महत्त्वपूर्ण स्थान है। सुरा-निर्माण के लिए शास्त्रोचित सामग्री का सन्धान हो जाने पर जब यन्त्र द्वारा मद्य निकाला जाता है, तो उसमें से पहले जो अर्क निकलता है, वह बहुत साफ होता है, अतएव उसे ‘प्रसन्ना’ कहते हैं। इसे पीते समय इसमें जल मिलाकर पिया जाता है, अतः इसे उत्तम श्रेणी की ‘सुरा’ कहते हैं। इसके बाद कादम्बरी, जगल और मेदक क्रमशः निम्न स्तर की होती हैं। प्राचीन काल में सुर, असुर, यक्ष, राक्षस, गन्धर्व एवं मनुष्य भले ही इस उपद्रवकारिणी सुरा का आदर के साथ सेवन करते रहे हों; जैसा वर्णन च.चि. २४ में मिलता है और आज भी मद्य पीने वालों की कमी नहीं है। सरकार को भी इससे पर्याप्त लाभ है, भले ही सरकार मद्यविक्रय के साथ मद्यपान-निषेध की भी घोषणा करती रहती है, अस्तु। महर्षि वाग्भट ने स्पष्ट शब्दों में कहा है—‘मद्यविक्रयसन्धानदानादानानि नाचरेत्’। (अ.हृ.सू. २।४०) अर्थात् मद्य का बनाना, बेचना, देना तथा लेना नहीं करना चाहिए। शास्त्र के इन उपदेशों को जब भले लोग नहीं सुनते हैं, तो भला ये शराबी कब सुनेंगे? और क्यों सुनेंगे?

सभी प्रकार के मादक पेय पदार्थों का नाम ‘मद्य’ है। प्राचीन उपलब्ध आयुर्वेदिक ग्रन्थों में ‘अर्क’ निकालने की विधि का उल्लेख नहीं मिलता। परवर्ती ‘वैष्णव्यरत्नावली’ नामक संग्रह-ग्रन्थ में ‘मृतसंजीवनी सुरा’ के निर्माण की विधि ‘मृन्मये मोचिकायन्त्रे मयूराल्येऽपि यन्त्रके’ (ज्वराधिकार-प्रकरण) में अर्क निकालने का विधान किया गया है। अर्क जिनसे निकाला जाता है, उनके मोचिकायन्त्र तथा मयूरयन्त्र ये प्राचीन नाम हैं। मद्य के लिए सन्धान किये गये द्रव्यों का जो अर्क रूप द्रव होता है, उसी को मद्य (शराब) कहते हैं। सन्धानकाल की निश्चित अवधि नहीं है, फिर भी जिन द्रव्यों का सन्धान शीत-प्रधान स्थानों में एक मास में हो जाता है, वही कार्य उष्ण-प्रधान स्थानों में १५ दिनों में होते देखा जाता है।