भारतकोश
संग्रह पर लौटें

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

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अष्टाङ्गहृदये

द्रव्य है। उक्त यज्ञ का संक्षिप्त परिचय—सौत्रामणि यज्ञ का ऋषि प्रजापति, देवता सुरा तथा इसका छन्द अनुष्टुप् है। इस यज्ञ में जिस समय सुरा-सन्धान किया जाता है, उस समय इस मन्त्र का उच्चारण किया जाता है—‘ॐ स्वाद्वीन्त्वा स्वादुना तीव्रा तीब्रेणामृतामृतेन। मधुमतीं मधुमता सुजामि। स सोमेन सोमोऽस्यश्विभ्यो पञ्चस्य सरस्वत्यै पञ्चस्वेन्द्राय सुवाम्णे पञ्चस्य’। इसका विस्तृत विवरण यजुर्वेद-काण्वाशाखा अध्याय २१-२३ में देखें।

गुरु तद्दोषजननं नवं, जीर्णमतोऽन्त्यम् ॥६५॥

नया तथा पुराना मद्य—नया मद्य गुरु (देर में पचने वाला) तथा विदोषकारक होता है और इसके विपरीत पुराना मद्य लघु (शीघ्र पचने वाला) एवं विदोषशामक होता है ॥६५॥

वक्तव्य—तात्पर्य यह है कि नये मद्यों का सेवन नहीं करना चाहिए, केवल पुराने मद्य, आसव, अरिष्ट आदि का सेवन करना चाहिए। अतएव कहा गया है—‘पुराणाः स्युर्गुणैर्मुक्ता आसवा धातवो रसाः’। अर्थ स्पष्ट है।

पेयं नोष्णोपचारेण न विरिक्तभुधातुरैः। नात्यर्थतीक्ष्णमृद्वत्पसम्भारं कलुषं न च ॥६६॥

मद्य का निषेध—उष्ण गुणयुक्त आहार-विहार के साथ, विरिचन करने के बाद एवं भूखे पेट में मद्य का सेवन न करे। अत्यन्त तीक्ष्ण, अत्यन्त मृदु (जिसमें मादकता बहुत कम हो), जो समुचित सामग्री से न बनाया गया हो और जो मलिन अर्थात् स्वच्छ न किया गया हो, ऐसे मद्य को नहीं पीना चाहिए ॥६६॥

गुल्मोदराशौग्रहणीशोषहृत्य स्नेहनी गुरुः। सुराऽनिलम्नी मेदोऽमुक्तत्प्यमृत्रकफावहा ॥६७॥

विभिन्न सुराओं का वर्णन—‘सुरा’—यह गुल्मरोग, उदररोग, अशरिग, ग्रहणीरोग तथा शोष (राजयक्ष्मा) रोग का विनाश करती है। यह स्नेहनकारक, गुरु (देर में पचने वाली) तथा वातनाशक होती है। यह मेदोधातु, रक्तधातु, दूध, मूत्र एवं कफदीष को बढ़ाती है ॥६७॥

वक्तव्य—सुरा-परिचय—‘शालिपिष्टकृतं मद्यं सुरा’। (श्रीहेमाद्रि) मद्य के अनेक भेदों में सुरा का भी एक महत्त्वपूर्ण स्थान है। सुरा-निर्माण के लिए शास्त्रोचित सामग्री का सन्धान हो जाने पर जब यन्त्र द्वारा मद्य निकाला जाता है, तो उसमें से पहले जो अर्क निकलता है, वह बहुत साफ होता है, अतएव उसे ‘प्रसन्ना’ कहते हैं। इसे पीते समय इसमें जल मिलाकर पिया जाता है, अतः इसे उत्तम श्रेणी की ‘सुरा’ कहते हैं। इसके बाद कादम्बरी, जगल और मेदक क्रमशः निम्न स्तर की होती हैं। प्राचीन काल में सुर, असुर, यक्ष, राक्षस, गन्धर्व एवं मनुष्य भले ही इस उपद्रवकारिणी सुरा का आदर के साथ सेवन करते रहे हों; जैसा वर्णन च.चि. २४ में मिलता है और आज भी मद्य पीने वालों की कमी नहीं है। सरकार को भी इससे पर्याप्त लाभ है, भले ही सरकार मद्यविक्रय के साथ मद्यपान-निषेध की भी घोषणा करती रहती है, अस्तु। महर्षि वाग्भट ने स्पष्ट शब्दों में कहा है—‘मद्यविक्रयसन्धानदानादानानि नाचरेत्’। (अ.हृ.सू. २।४०) अर्थात् मद्य का बनाना, बेचना, देना तथा लेना नहीं करना चाहिए। शास्त्र के इन उपदेशों को जब भले लोग नहीं सुनते हैं, तो भला ये शराबी कब सुनेंगे? और क्यों सुनेंगे?

सभी प्रकार के मादक पेय पदार्थों का नाम ‘मद्य’ है। प्राचीन उपलब्ध आयुर्वेदिक ग्रन्थों में ‘अर्क’ निकालने की विधि का उल्लेख नहीं मिलता। परवर्ती ‘वैष्णव्यरत्नावली’ नामक संग्रह-ग्रन्थ में ‘मृतसंजीवनी सुरा’ के निर्माण की विधि ‘मृन्मये मोचिकायन्त्रे मयूराल्येऽपि यन्त्रके’ (ज्वराधिकार-प्रकरण) में अर्क निकालने का विधान किया गया है। अर्क जिनसे निकाला जाता है, उनके मोचिकायन्त्र तथा मयूरयन्त्र ये प्राचीन नाम हैं। मद्य के लिए सन्धान किये गये द्रव्यों का जो अर्क रूप द्रव होता है, उसी को मद्य (शराब) कहते हैं। सन्धानकाल की निश्चित अवधि नहीं है, फिर भी जिन द्रव्यों का सन्धान शीत-प्रधान स्थानों में एक मास में हो जाता है, वही कार्य उष्ण-प्रधान स्थानों में १५ दिनों में होते देखा जाता है।

द्वन्द्वविज्ञानीयाध्यायः ५ ]

सूत्रस्थानम्

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एलोपैथी तथा होमियोपैथी पद्धति के अनुसार मद्यसार ( सिद्र ) में औषधियाँ डालकर कुछ समय तक उसी में पड़ी रहने पर उस-उस औषध को टिंवर के रूप में तैयार कर लिया जाता है। आयुर्वेदीय पद्धति के अनुसार औषधि तथा द्रव के संयोग से सन्धान करके आसव, अरिष्ट आदि तैयार कर लिये जाते हैं। औषध-द्रव्यों के ब्वाथ आदि से आसव-अरिष्ट अपना प्रभाव इसलिए शीघ्र दिखलाते हैं, क्योंकि मद्य का एक गुण 'आशुकारी' भी है। अतएव सुश्रुत ने कहा है—'आशुत्वाच्चाशुक्रमकृत' । ( मु.उ. ४७५ )

तदुगुण वाशुणी हृद्या लघुस्तीक्ष्णा निहन्ति च । शूलकासवमिश्वासविबन्धाभ्मानपीनसान् ॥ ६८ ॥

वाशुणी-परिचय—वाशुणी नामक मद्य के गुण भी उक्त सुरा के समान होते हैं। शेष गुण इस प्रकार हैं—यह हृदय को बल देती हैं, लघु ( शीघ्र पचने वाली ) तथा तीक्ष्ण है। यह शूल, कास, वमन, श्वास, विबन्ध ( प्रोटों की रक्तावट, मल-मूत्र की रक्तावट ), अफरा तथा पीनस रोगों को नष्ट करती है ॥ ६८ ॥

वक्तव्य—वरुणदेव ( जल तथा पश्चिम दिशा के स्वामी ) को यह मद्य प्रिय थी, अतः इसे 'वाशुणी' कहते हैं। शाङ्कधराचार्य का कथन है कि इसका निर्माण ताल या ताड़ तथा खजूर के रस का सन्धान करके किया जाता है। वैसे भी ताड़ एवं खजूर की ताड़ी प्रसिद्ध है। यह सूर्योदय से पहले पीने पर मधुर स्वाद वाली होती है, सूर्य निकलने के बाद क्रमशः खट्टी होती जाती है।

नातितीव्रमदा लघ्वी पथ्या बेभीतकी सुरा । ब्रणे पाण्डुवामये कुष्ठे न चाल्यर्थ विरध्यते ॥ ६९ ॥ विष्टम्भिनी यवसुरा गुर्वी रूक्षा त्रिदोषला ।

बहेड़ा की सुरा—बिभीतक ( बहेड़ा ) की सुरा अधिक नशीली नहीं होती, हलकी होती है, हितकर होती है। और सुराओं की भाँति यह ब्रण, पाण्डुरोग तथा कुष्ठरोग में अधिक हानिकारक नहीं होती ॥ ६९ ॥

यव ( जो से निर्मित ) सुरा—यह विष्टम्भकारक ( कन्वियत करने वाली ), गुरु, रूक्षा तथा त्रिदोषकारक होती है। कोहली सुरा—यह शरीर को स्थूल करने वाली तथा गुरु ( देर में पचने वाली ) होती है। मधूलक सुरा—यह कफकारक होती है।

वक्तव्य—वास्तव में 'विष्टम्भिनी'... 'मधूलकः' ॥ यह पद्य अ.सं.सू. ६१२४ क्रमसंख्या में सुलभ है। इसे कुछ विद्वान् यहाँ भी जोड़ना चाहते हैं और कुछ इसकी प्रथम पंक्ति को यहाँ उद्धृत करना चाहते हैं, किन्तु श्रीहेमाद्रि कोहली सुरा का वर्णन करने वाली पहली पंक्ति को भी 'हृदयकार' की सम्पत्ति नहीं मानते, अस्तु।

कोहली सुरा—प्रथम मत—वैद्यकशब्दसिन्धु में इसे 'कृष्णाण्डसुरा' कहा है अर्थात् कृष्णाण्ड = पेटा, जिसकी मिठाई ( कोहड़ापाक ) बनती है, उससे बनायी गयी सुरा। द्वितीय मत—'कोहलो यवमक्तुकुत-मद्याविशेषः' अर्थात् जो के सत्तुओं के द्वारा बनायी गयी सुरा। तीसरा मत—'कोहलः शक्तुभिर्देहै बाह्नीके क्रियते यवैः' । ( वाचस्पतिः ) बाह्नीक ( बल्लव—अरब ) देश में जो के सत्तुओं द्वारा निर्मित सुरा। इस प्रकार दूसरा-तीसरा मत प्रायः समान है, केवल तीसरे मत में देश-विशेष की चर्चा है।

'मधूलक' का परिचय देते हुए श्रीहन्तु कहते हैं—'सर्वं मद्यमसञ्जातं मधूलकमिति स्मृतम्'। इति हन्तुः। उन सभी मद्यों को 'मधूलक' कह सकते हैं, जिनका सन्धान भलीभाँति न किया गया हो।

यथाद्रव्यगुणोडरिष्टः सर्वमद्यगुणाधिकः ॥ ७० ॥

ग्रहणीपाण्डुकुष्ठाशैः शोफशोपोदरज्वरान् । हन्ति गुल्मकृमिष्पीहः कषायकटुवातलः ॥ ७१ ॥

अरिष्ट-परिचय—जिन द्रव्यों के संयोग द्वारा जिम अरिष्ट का निर्माण किया जाता है, वह अरिष्ट उन द्रव्यों के गुण-धर्म के समान होता है, किन्तु यह आसव सभी मद्यों से अधिक गुणवान् होता है। यह ग्रहणी, पाण्डु, कुष्ठ, अर्श, शोफ ( सूजन ), शोष ( क्षय ), उदररोग, ज्वर, गुल्म, क्रिमिरोग तथा प्लीहाविकारों को नष्ट करता है। यह स्वाद में कसैला तथा कटु होता है और वातवर्धक होता है ॥ ७०-७१ ॥

६ अ० ह०

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अष्टाङ्गहृदये

वक्तव्य —आचार्य शाङ्कधर ने आसव-अरिष्ट के विवेदक लक्षणों का वर्णन इस प्रकार किया है—‘यद-पक्षीषधाम्बुभ्यां सिद्धं मद्यं स आसवः । अरिष्टः क्वाथसाध्यः स्यात् तयोर्मनि पलोन्मिप्तम्’ ॥ (शा.सं.म. १०।२) अर्थात् कच्ची औषधियाँ तथा जल के योग से सन्धान द्वारा जो मद्य तैयार किया जाता है, उसे ‘आसव’ कहते हैं। औषध-द्रव्यों को जल में डालकर क्वाथ करने के बाद जो मद्य तैयार किया जाता है, उसे ‘अरिष्ट’ कहते हैं। इन दोनों की साधारण मात्रा १ पल (४ तोला) है।

आसव-अरिष्ट का यह विवेदक लक्षण प्राचीन संहिताओं में नहीं मिलता है। हाँ, सुश्रुत ने आसवों से अरिष्टों को अधिक गुणवाला स्वीकार किया है—‘अरिष्टो द्रव्यमयोगसंस्कारादधिको गुणैः’ । (सु.सू. ४।१९४) अर्थात् अरिष्ट में आसव से अधिक औषधद्रव्यों का संयोग होने से तथा संस्कार-विशेष होने से यह (अरिष्ट) अधिक गुणवान् होता है।

माद्रीकं लेखनं हृद्यं नात्युष्णं मधुरं सरम् । अल्पपित्तानिलं पाण्डुमेहार्शःकृमिनाशनम् ॥ ७२ ॥

मूनक्का का मद्य —मुद्रीका को हिन्दी में मूनक्का या दाख कहते हैं। इसके द्वारा बनाया हुआ मद्य लेखन होता है, हृदय के लिए हितकर होता है। यह अधिक उष्ण नहीं होता, स्वाद में मधुर एवं इसका गुण सर है। यह थोड़ा पित्तदोष तथा वातदोष को बढ़ाता है। पाण्डुरोग, प्रमेह, अर्श (बवासीर) तथा क्रिमिरोग नाशक होता है ॥ ७२ ॥

वक्तव्य —ऊपर मूनक्का के मद्य (द्राक्षासव) को ‘लेखन’ कहा गया है। यह आयुर्वेद में प्रयुक्त होने वाला एक पारिभाषिक शब्द है। लिखने की क्रिया को जो ‘लेखन’ कहा जाता है, वह वास्तविक रूप में लेपन है, क्योंकि हम स्याही द्वारा लेपन कार्य करते हैं। हाँ, उत्कीर्ण-लेखन कार्य में इस शब्द का समुचित प्रयोग हुआ है, क्योंकि ‘लिख’ धातु का अर्थ है—अक्षरविन्यास। इसी अर्थ में आयुर्वेद का लेखन शब्द भी है, जरा इसकी परिभाषा देखें—‘धातून् मलान् वा देहस्य विशोष्योल्लेखयेच्च यत् । लेखनं तद्यथा क्षीरं नीरमुष्णं वचा यवाः’ ॥ (शा.पू. ४।१०) अर्थात् जो द्रव्य सम्पूर्ण शरीर की धातुओं और मलों को सुखाकर तथा छीलकर निकाल देता है, वह ‘लेखन’ कहा जाता है। यथा—शहद, गरम जल, बालवच तथा जी। वास्तव में छेदन एवं लेखन दोनों द्रव्य भीतर के जमे हुए दोषों को निकाल कर बाहर कर देते हैं।

अस्मादल्पान्तरगुणं खार्जूरं वातलं गुरु । शार्करः सुरभिः स्वादुहृद्यो नातिमदो लघुः ॥ ७३ ॥

खार्जूर-शार्कर आसव —खजूर का मद्य—ऊपर मूनक्का के मद्य के जो गुण कहे गये हैं, उनसे खजूर के मद्य में कुछ कम गुण होते हैं। यह वातकारक तथा गुरु (देर में पचने वाला) होता है।

शार्कर (चीनी से निर्मित) मद्य —यह सुगन्धित, स्वाद में मधुर, हृदय के लिए हितकारक, अधिक नशा न करने लायक तथा लघु (शीघ्र पचने वाला) होता है ॥ ७३ ॥

सूष्ठमूत्रशकुह्रातो

गौडस्तर्पणदीपनः ।

गुड निर्मित आसव —यह मल, मूत्र तथा अपानवायु को बाहर निकलने के लिए प्रेरित करता है। यह मद्य तुष्टिकारक तथा अग्निदीपक होता है।

वक्तव्य —मद्य, आसव, मुरा, शराब, दारू आदि जिस-जिस द्रव्य से बनाये जाते हैं, उस-उस नाम से ये पुकारे जाते हैं। इस विषय में चरक ने कहा है—‘योनिसंस्कारनामाद्यैविशेषैर्बहुधा च या । भूत्वा भवत्येकविधा सामान्यान्मदलक्षणान्’ ॥ (च.चि. २।४६) अर्थात् जो योनि (उत्पत्तिस्थान—धान्य, फल, मूल, सार, पुष्प, काण्ड, पत्र, त्वचा, शर्करा), संस्कार (पिप्ली आदि द्रव्यों से) तथा नाम आदि विशेषताओं से बहुत प्रकार की होती हुई भी मदलक्षण के सब में समान होने के कारण शराब एक ही प्रकार की होती है। देखें—च.सू. २।४४९। चरक के उक्त सन्दर्भ में इसके यथासम्भव भेदों का वर्णन कर दिया गया है।

द्वद्वयविज्ञानीयाध्यायः ५ ]

सूत्रस्थानम्

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वातपित्तकरः सीधुः स्नेहस्नेहोन्मविकारहा ॥ ७४ ॥

मेदः शोफोदराशीर्णस्तत्र पक्वरसो वरः ।

सीधु का वर्णन—यह वात-पित्तकारक होता है, स्नेह के कारण उत्पन्न हुए विकारों तथा कफ-विकारों को नष्ट करता है। यह मेदोरोग, ब्रणशोथ, उदरविकार तथा अशौरोग को नष्ट करता है। दो प्रकार के सीधुओं में शीत रस की तुलना में पक्वरस से बना हुआ सीधु गुणों में उत्तम होता है ॥ ७४ ॥

वक्तव्य—सीधु दो प्रकार का होता है—१. शीतरस तथा २. पक्वरस। इसका निर्माण-प्रकार इस प्रकार है—ईख तथा अंगूर आदि के मधुर रस को पात्र में डालकर धूप में रख दें। इसे दो-तीन सप्ताह के बाद छानकर दूसरे पात्र में रख दिया जाता है। जब-जब इसमें जाला पड़े तब-तब इसे छानकर दूसरे पात्र में रख दें। जब जाला पड़ना बन्द हो जाय और वह रस अत्यन्त निर्मल हो जाय तो समझना चाहिए कि सीधु (सिरका) तैयार है। इसे बनाने के पारिवारिक अन्य अनेक प्रकार भी देखे जाते हैं। प्रायः इसके निर्माण में ४-५ मास का समय लग जाता है। इसका स्वाद अम्ल (खट्टा) होता है। यह पाचन होता है। इसका प्रयोग चटनी आदि के लिए किया जाता है।

छेदी मध्वासवस्तीक्ष्णो मेहपीनसकासजित् ॥ ७५ ॥

मध्वासव का वर्णन—मधु के संयोग से बनाये गये आसव को मध्वासव कहते हैं। यह मल आदि का छेदन करता है और गुणों में तीक्ष्ण होता है। प्रमेह, पीनस एवं कास रोग को नष्ट करता है ॥ ७५ ॥

रक्तपित्तकफोत्कलेदि शुक्तं वातानुलोमनम्। श्रुशोष्णतीक्ष्णरूक्षास्मत् हृदयं रुचिकरं सरम् ॥ ७६ ॥

दीपनं शिशिरस्यर्षं पाण्डुवृक्कुमिनाशनम्।

शुक्त का वर्णन—यह रक्त, पित्त तथा कफ दोष को उभारता है, वातदोष का अनुलोमन करता है। यह गुण में अत्यन्त उष्ण, तीक्ष्ण, रूक्ष तथा अम्लरस-प्रधान होता है। हृदय के लिए हितकर, रुचिकर, सर (मल को निकालने वाला), अग्निदीपन तथा स्पर्श में शीतल होता है। यह पाण्डुरोग, नेत्ररोग तथा क्रिमिरोग का नाश करता है ॥ ७६ ॥

गुडेक्षुमद्यमार्द्रिकशुक्तं लघु यथोत्तरम् ॥ ७७ ॥

गुड आदि शुक्त—गुड का शुक्त, ईख का शुक्त, मद्यनिर्माण-विधि से बनाया गया शुक्त तथा मुनक्का से बनाया गया शुक्त उत्तरोत्तर गुणों में हल्के होते हैं ॥ ७७ ॥

कन्दमूलफलार्धं च तद्वद्विद्यात्तदासुतम्।

कन्द आदि शुक्त—सूरण, जिमीकन्द आदि कन्दों, गाजर-मूली आदि मूलों तथा लौकी, सेम, केवौच आदि फलों से बनाया गया आसुत (आसव की भाँति चुवाया गया) द्रव भी उसी प्रकार लघु होता है।

वक्तव्य—यह शुक्त दो-तीन दिन में तैयार हो जाता है। मारवाड़, पंजाब आदि प्रदेशों में इसे 'काँजी' कहते हैं। इसमें राई पीसकर डाली जाती है; हींग, जीरा, कालानमक, हल्दी, तेल में पकाये पकोड़े भी डाले जाते हैं। खट्टापन आते ही इसमें डाले गये पदार्थों के साथ वह पानी भी पिया जाता है, जो पाचक तथा भूख को बढ़ाता है।

शुक्त-चुक्रनिर्माण-विधि—'मुण्मयादिशुचो भाण्डे सगुडे क्षौद्रकाञ्जिकम्। धान्यराशो विरात्रिरस्य शुक्रं चुक्रं तदुच्यते' ॥ अर्थात् मिट्टी आदि (तीवा-पीतल का नहीं) के साफ पात्र में गुड तथा शहद को जल में घोलकर डाल दें। इस पात्र को तीन दिन तक धान्यराशि में दबाकर रख दें। इसी को शुक्त या चुक्र कहते हैं।

शाण्डाकी चासुतं चान्यत् कालाम्लं रोचनं लघु ॥ ७८ ॥

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अष्टाङ्गहृदय

शाण्डाकी-वर्णन—शाण्डाकी, आसुत तथा दूसरे वे द्रव जो कुछ (३ या ४) दिन तक रख देने से खट्टे हो जाते हैं, वे रुचिकारक तथा लघु (सुपान्य) होते हैं ॥७८॥

बक्तब्य—शाण्डाकी, आसुत, सौवीर, तुषोदक आदि नाम अलग-अलग पदार्थों से बनायी गयी कॉजियों के हैं। यह गर्मी के दिनों में २-३ दिनों में सेवन करने योग्य हो जाती है और शीतकाल में ५-६ दिनों में तैयार हो पाती है। फिर जितने दिन इसे रखेंगे खट्टी होती जाती है। यह खट्टी तथा मीठी भेद से दो प्रकार की होती है।

खट्टी कॉजी के घटक द्रव्य—१. जल, २. तमक, ३. राई, ४. हल्दी तथा ५. कालीमिर्च।

मीठी कॉजी के घटक द्रव्य—ईख का रस आदि मीठे द्रव-द्रव्यों द्वारा जल के योग से बनाई जाती है। कॉजी का एक नाम 'अवन्तीसोम' भी है। वास्तव में यह मालव देश (मारवाड़) या जांगल देश का अमृत है, वही इसे विविध प्रकार से बनाया जाता है, अन्यत्र यह अच्छी बनती भी नहीं।

धान्याम्ल भेदि तीक्ष्णोष्णं पित्तकृत्स्पर्शशीतलम्। श्रमकलमहरं रुच्यं दीपनं बस्तिशूलनुत् ॥७९॥

शस्तमात्स्यापने हृद्यं लघु वातकफापहम्। एभिरेव गुणैर्युक्ते सौवीरकतुषोदके ॥८०॥

कृमिहृद्वोगुल्माश्वः पाण्डुरोगनिबर्हणे। ते क्रमाद्वितुषैर्विद्यात्सतुपैश्च यवैः कृते ॥८१॥

इति मद्यवर्गः।

धान्याम्ल आदि का वर्णन—धान्याम्ल नामक कॉजी मल (पुरीष) का भेदन कर उसे निकालती है। यह तीक्ष्ण, उष्ण, पित्तवर्धक तथा स्पर्श में शीतल होती है। यह श्रम (शारीरिक थकावट) एवं क्लम (मानसिक थकावट) को दूर करती है। रुचिवर्धक, दीपन (जठराग्नि को बढ़ाने वाली), बस्तिशूलनाशक, निरुह्णबस्ति में उपयोगी, हृदय के लिए हितकर, पाचन में लघु और वात तथा कफ दोष को नष्ट करती है।

सौवीरक तथा तुषोदक—उक्त धान्याम्ल के समान ही गुण इनके भी होते हैं। विशेष रूप से इनका प्रयोग इन रोगों के विनाश के लिए किया जाता है—क्रिमिरोग, हृदयरोग, गुल्मरोग, अशौरीग तथा पाण्डुरोग। दोनों में भेद—सौवीरक कॉजी तुषरहित यवसमूह से बनायी जाती है और तुषोदक कॉजी तुष सहित यवसमूह से बनायी जाती है ॥७९-८१॥

बक्तब्य—भात या भात के माँड में जो कॉजी बनायी जाती है, उसे 'धान्याम्ल' कहते हैं। 'सौवीरक' तथा 'तुषोदक' के भेदक लक्षण ऊपर कह दिये गये हैं।

ऊपर 'एभिरेव' से 'यवैः कृते' तक के श्लोकों की तीन पंक्तियाँ श्री अरुणदत्तसम्मत होने से इस संस्करण में अधिक हैं। ये पंक्तियाँ अ.सं.सू. ६।३९-१४० से ली गयी हैं।

कॉजी का स्पर्श शीतल होता है, अतः दाहशान्ति तथा ज्वरशान्ति के लिए इसमें साफ वस्त्र का रई के फाहा को भिगाकर दाहस्थान पर माथा या नाभि पर रखा जाता है। ध्यान रहे, इसकी वृंदें ओंछों में न पड़ने पायें।

अथ मूत्रवर्गः

मूत्रं गोडजाविमहिषीगजाश्वोष्ट्रवरोद्रवम्। पित्तलं रुक्षतीक्ष्णोष्णं लवणानुरसं कटु ॥८२॥

कृमिशोफोदरानाहशूलपाण्डुकफानिलान्। गुल्मास्त्रचिपिष्वित्रकृच्छ्राशींस जयेरलघु ॥८३॥

इति मूत्रवर्गः।

आठ प्रकार के मूत्र—१. गाय, २. बकरी, ३. मेढी, ४. महिषी, ५. हाथी, ६. घोड़ा, ७. ऊँट तथा ८. गधा का मूत्र चिकित्सा में उपयोगी होता है। सामान्य दृष्टि से सभी मूत्र पित्तकारक, रुक्ष, तीक्ष्ण

द्रवद्रव्यविज्ञानीयाध्यायः ५ ]

सूत्रस्थानम्

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उष्ण, लवणरसयुक्त तथा कटुरसयुक्त होते हैं। ये क्रिमि, शोथ, उदररोग, आनाह ( अफरा ), शूल, पाण्डुरोग, कफविकार, वातविकार, गुल्म, अरुचि, विषविकार ( विशेषकर सर्पविष ), श्वित्र ( सफेद दाग वाला कुष्ठ ), कुष्ठ तथा अर्श ( बवासीर ) रोगों को शीघ्र शान्त करते हैं ॥ ८२-८३ ॥

वक्तव्य —श्रीचक्रपाणि च.सू. १।९३ की व्याख्या करते हुए कहते हैं—‘अविमूत्रमित्यादौ स्त्रीमूत्रमेव प्रशस्तमिति लिङ्गपरिग्रहाद् दशयति; यतः स्त्रीणां लघ्वङ्कृत्वान्मूत्रमपि लघु; वचनं हि—‘लाघवं जातिसामान्ये स्त्रीणां पुंसां च गौरवम्’ ॥ ( च.सू. २।४३३८ ) वास्तव में उक्त पाठ इस प्रकार है—‘गौरवं लिङ्गसामान्ये पुंसां स्त्रीणां च लाघवम्’। हारीत का कथन है कि चौपायों में स्त्री को लघु और पक्षियों में पुरुष को लघु माना है, अस्तु।

सुश्रुत का मत —इनके अनुसार गाय, भैंस, बकरी, भेड़ ( स्त्री जाति का ) और घोड़ा, हाथी, गधा, ऊँट ( पुरुष जाति ) का ग्रहण करना चाहिए। इन्होंने नरमूत्र का भी ग्रहण करते हुए कहा है—यह विषनाशक होता है। इस प्रकार मूत्रों की संख्या = ८ + १ = ९ हो जाती है।

मूत्रप्रयोग का क्षेत्र —विरचन के लिए इसका प्रयोग निरुहणबस्ति द्वारा किया जाता है। ये मूत्र विविध प्रकार के लेपों में तथा स्वेदन कार्य के लिए उपयोगी होते हैं। ये दीपन, पाचन तथा मलभेदक ( दस्तावर ) होते हैं। उक्त सभी मूत्रों में गोमूत्र उत्तम होता है। अ.सं.सू. ६।१४५-१४७ में वाग्भट ने इनके शक्तु ( मलों ) का भी वर्णन किया है।

आहार को पचाने के लिए पिताशय से आकर जितना पित्त द्रव खाये हुए आहार में मिलता है, इसका कुछ अंश मूत्र के साथ और कुछ मल के साथ शरीर से बाहर निकल जाता है, अतः मल एवं मूत्र में पित्तवर्धक गुण पाये जाते हैं, अतएव इनका प्रयोग चिकित्सा में किया जाता है। मरे हुए प्राणियों के पिताशय से पित्तद्रव का संग्रह कर लिया जाता है, जिसका बाद में औषध रूप में प्रयोग किया जाता है। गाय के पित्त को ‘गोरोचन’ कहते हैं। इसका प्रयोग चिकित्सा तथा तान्त्रिक प्रयोगों में भी किया जाता है।

तोयक्षीरेभुतेलानां वर्गमैद्यस्य च क्रमात्। इति द्रवैकदेशेऽयं यथास्थूलमुदाहृतः ॥ ८४ ॥

इति श्रीवैद्यपतिसिंहगुप्तसूनुश्रीमद्वाग्भटविरचितायामष्टाङ्गहृदयसंहितायां

प्रथमे सूत्रस्थाने द्रवद्रव्यविज्ञानीयो नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥


उपसंहार —जल, धीर, दधु, तैल तथा मद्य वर्गों का इस अध्याय में क्रमशः वर्णन कर दिया गया है। इस प्रकार स्थूल रूप से द्रव-द्रव्यों के एक विशेष अंग को कह दिया है ॥ ८४ ॥

वक्तव्य —यद्यपि उक्त पद्य अष्टांगसंग्रह ( ६।१४९ ) से लिया गया है, तथापि इसमें ‘मूत्रवर्ग’ का उल्लेख नहीं किया गया है। इसके अतिरिक्त इन्होंने इक्षुवर्ग के अन्तर्गत ‘मधुवर्ग’ को दे दिया था, उसे हमने स्वतन्त्र वर्ग के रूप में दे दिया है।

इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी द्वारा विरचित

निर्मला हिन्दी व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से विभूषित अष्टाङ्गहृदय-सूत्रस्थान में

द्रवद्रव्यविज्ञानीय नामक पाँचवीं अध्याय समाप्त ॥ ५ ॥


षष्ठोऽध्यायः

अथातोऽत्रस्वरूपविज्ञानीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ।

इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षयः ।

अब हम द्रवद्रव्यों का वर्णन करने के बाद यहाँ से अन्नद्रव्यों के स्वरूप के विज्ञान के लिए प्रस्तुत अध्याय की व्याख्या करेंगे। इस विषय में आत्रेय आदि महर्षियों ने इस प्रकार कहा था।

निरुक्ति—‘अन्नम्’—‘अद्यते’ इति ऋः । ‘अन्नं भक्ते च भुक्ते स्यात्’ । इति मेदिनी। अन्न का अर्थ है— भ्रात या खाया हुआ पदार्थ, इसका अर्थ यदि हम ‘भ्रात’ करते हैं तो विषय-निर्देश में संकीर्णता आ जाती है, क्योंकि ‘भुक्त’ शब्द का क्षेत्र विस्तृत है, वहाँ यहाँ अपेक्षित है, अस्तु । ‘अन्नस्वरूप’—आहार के उपयोग में आने वाले रोटी, चावल, दाल, सब्जी आदि। स्वरूप—उन-उन के नाम, रस, गुण, वीर्य, विपাক, प्रभाव, लक्षण आदि। यह अन्न (खाये जाने वाला पदार्थ) स्थावर तथा जांगम भेद से दो प्रकार का होता है। यथा—गेहूँ, चावल आदि स्थावर और मांस आदि जांगम (जंगम प्राणियों से प्राप्त होने वाला) ।

स्थावर धान्य भी रबी और खरीफ भेद से दो प्रकार के होते हैं। इनका वर्गीकरण आयुर्वेदीय दृष्टिकोण से पुनः दो प्रकार का होता है। यथा—१. शूकधान्य—शूक का अर्थ है नुकीले अग्रभाग वाले धान्य। जैसे—गेहूँ, जौ, धान आदि। २. शिम्बी या शमी धान्य—छीमी में उत्पन्न होने वाला दो दल युक्त अन्न। जैसे—चना, उड़द, कुलथी, सेम आदि।

संक्षिप्त सन्दर्भ-संकेत—च.सू. २७, सु.सू. ४६ तथा अ.सं.सू.७ तथा १२ में देखें।

अथ शूकधान्यवर्गः

रक्तो महान् सकलमस्तूर्णकः शकुनाहृतः । सारामुखो दीर्घशूको रोद्रशूकः सुगन्धिकः ॥ १ ॥ पुण्ड्रः पाण्ड्रः पुण्डरीकः प्रमोदो गौरसारिबौ । काञ्चनो महिषः शूको दूषकः कुसुमाण्डकः ॥ लाङ्गला लोहवालाख्याः कर्दमाः शीतभीरुकाः । पतङ्गास्तपनीयाश्च ये चान्ये शालयः शुभाः ॥ स्वादुपाकरसाः स्निग्धाः वृष्या बद्धाल्यवर्चसः । कषायानुरसाः पथ्या लघवो मूलला हिमाः ॥

शूकधान्यों का वर्णन—रक्तशालि, महाशालि, कलमशालि, तूर्णकशालि, शकुनाहृतशालि, सारामुख, दीर्घशूक, रोद्रशूक (लोह के फूल के सदृश शूक वाला), सुगन्धिक (बासमती), पुण्ड्रशालि, पाण्डुशालि, पुण्डरीकशालि, प्रमोद, गौर, शारिब, काञ्चन, महिष, शूकशालि, दूषकशालि, कुसुमाण्डकशालि, लांगलशालि, लोहबाल नामक शालि, कर्दमशालि, शीतभीरुकशालि, पतंग तथा तपनीय शालि; इनके अतिरिक्त और भी जो अनेक शालियों की जातियाँ होती हैं, वे सब शालि उत्तम कोटि के होते हैं। वे सभी रस एवं विपक में मधुर, स्निग्ध, वीर्यवर्धक होते हैं। इनको खाने से वँधा हुआ थोड़ा-सा मल बनता है। वे सब कुछ कषाय रसवाले होते हैं। ये सभी के लिए पथ्य, लघु (हल्के), मूत्रकारक तथा हिम (शीतवीर्य) होते हैं ॥ १-४ ॥

बक्तव्य—शकुनाहृत नामक शालिधान्य के सम्बन्ध में कहा गया है कि इसे शकुनि (गरुड) पक्षी द्रौपान्तर से ले आया था, अतएव इसे शकुनाहृत या गरुडशालि भी कहते हैं। आजकल तो व्यापारीवर्ग भी बासमती को ‘गरुडब्राण्ड’ कहने लगे हैं। किसी संस्करण में ‘पुण्ड्र’...‘शीतभीरुका’ ये पंक्तियाँ नहीं मिलतीं। यह पाठ सम्पूर्ण अष्टांगसंग्रह ७ से लिया गया है।

ब्रह्मविज्ञानीयाध्यायः ६ ]

सूत्रस्थानम्

८७

शूकजेषु वरस्तन रक्तसृष्णात्रिदोषहा ।

रक्तशालि का वर्णन—ऊपर कहे गये सब शूकधान्य हैं, इनमें रक्तशालि उत्तम होता है। यह प्यास को कम करता है और त्रिदोषनाशक (शामक) होता है।

महास्तमनु कलमस्त चाप्यनु ततः परे ॥५॥

क्रमशः गुणहीनता—रक्तशालि की तुलना में महाशालि, उससे कलमशालि, उससे भी तूर्णकशालि हीन गुणवाले होते हैं ॥५॥

वरक्य—वाग्भट के टीकाकार श्री अरुणदत्त कहते हैं—‘रक्तशालेः पश्चात् महान् शालिर्वः’। और ब्रह्मादि कहते हैं—‘तमनु रक्तशालेहीनो महान्’। उक्त दोनों टीकाकारों का स्पष्ट मतभेद है। इस मतभेद के समाधान के लिए हम महर्षि सृश्रुत की शरण में जाते हैं—‘तेषां लोहितकः श्रेष्ठः’...‘तस्मादल्पान्तरगुणाः क्रमशः शालयोऽवराः’ ॥ (सू. सृ. ४६।६-७) अर्थ स्पष्ट है।

यवका हायनाः पांसुबाष्पनैषधकादयः। स्वादूष्णा गुरवः स्निग्धाः पाकेऽम्लाः श्लेष्मपित्तलाः ॥ सृष्टमृत्रपुरीषाश्च पूर्व पूर्व च निन्दिताः।

यवक आदि शालिधान्य—यवक (जई), हायनक, पांसु, बाष्प, नैषधक आदि अन्य अनेक प्रकार के शालिधान्य होते हैं। इनके गुण—ये स्वाद में मधुर, उष्ण, गुरु, स्निग्ध, पाक में अम्ल, कफकारक तथा पित्तकारक होते हैं। इनके सेवन से मल-मूत्र की प्रवृत्ति सरलता से हो जाती है। ये क्रमशः अपने पूर्व निन्दित होते हैं, इस क्रम से सबसे अधिक निन्दित यवक होता है ॥६॥

वरक्य—वरक ने सूत्रस्थान के २९वें अध्याय में ‘अहिततमानुपदेश्यामः—यवकाः शूकधान्यानामपथ्यतमलेन प्रकृष्टतमा भवन्ति’। (३९) कहा है और ‘लोहितशालयः शूकधान्यानां पथ्यतमत्वे क्रममा भवन्ति’। (वर्ह ३८) वरक के इस वचन से इनकी गुणहीनता तथा गुणवत्ता का स्पष्ट संकेत मिल जाता है।

स्निग्धो ग्राही लघुः स्वादुस्त्रिदोषज्जः स्थिरो हिमः ॥७॥ षष्ठिको ब्रीहिषु श्रेष्ठो गौरश्चासितगौरतः।

ब्रीहिधान्य का वर्णन—ब्रीहिधान्यों में षष्ठिक (साठीधान्य) स्निग्ध, ग्राही (मल को बाँधने वाला), लघु (शीघ्र पचने वाला), स्वादु (मधुर), वात आदि तीनों दोषों का शामक, स्थिर (शरीर को स्थिर रखने वाला), हिम (शीतल) गुणवाला होता है। ब्रीहिधान्यों से साठीधान्य उत्तम होता है। यह दो प्रकार का होता है—१. गौर (सफेद रंग वाला) तथा २. हलका काला। इनमें गौर साठी उत्तम होता है ॥७॥

वरक्य—षष्ठिक धान्य ग्रीष्म ऋतु में पकता है। षष्ठिक (सफेद सांठी), कंगु, मुकुन्दक, पीतक, काकलक, असन, पुष्पक, महाषष्ठिक, चूर्णक, कुरबक, केदार आदि ये साठी धान्य की जातियाँ हैं। देखें—सू. सृ. ४६।८ से ११ तक।

ततः क्रमान्महाब्रीहिकृष्णब्रीहिजतुमुखलाः ॥८॥ कुक्कुट्टाण्डकलावास्थपारावतकशूकराः। वरकोहालकोज्ज्वालचीनशारददर्दुराः ॥९॥ गन्धनाः कुरुविन्दाश्च गुणरल्पान्तराः स्मृताः।

सामान्य गुणवाले षष्ठिक—उक्त षष्ठिक धान्यों से ये सामान्य (कुछ कम) गुण वाले होते हैं—महाब्रीहि, कृष्णब्रीहि, जतुमुख, कुक्कुट्टाण्ड, कपाल, पारावतक, शूकर, वरक, उद्दालक, उज्ज्वाल (ज्वार, मक्का, जुहरी), चीन (कौणी), शारद, दर्दुर, गन्धन तथा कुरुविन्द ॥८-९॥

८८

अष्टाङ्गहृदये

स्वादुरम्लविपाकोऽच्यो ब्रीहिः पित्तकरो गुरुः ॥ १० ॥

बहुमूत्रपुरीपोष्मा, त्रिदोषस्त्वेव पाटलः।

अन्य ब्रीहिधान्य-वर्णन—ये रस में मधुर, विपाक में अम्ल, पित्तकारक, पाचन में गुरु तथा उष्ण होते हैं। इनका अधिक भाग मल-मूत्र के रूप में परिणत हो जाता है अर्थात् ये पौष्टिक नहीं होते। इनमें 'पाटल' नामक ब्रीहि त्रिदोषकारक होता है ॥ १० ॥

बक्तव्य—शालि-षष्टिक ब्रीहिधान्यों का संक्षिप्त परिचय—१. शालिधान्य—इनकी फसल उगाने से पकने तक इन्हें जल से भरे खेतों की जहरत होती है, फिर भी ये शरद् ऋतु के बाद में पकते हैं। ये अधिक सफेद होते हैं। २. षष्टिक धान्य—ये प्रायः साठ दिन में पककर तैयार हो जाते हैं। ३. ब्रीहिधान्य—चरक के टीकाकार शौचक्रपाणि के अनुसार ये शरत् काल में पकने वाले आशुधान्य हैं।

कङ्गुकोद्रवनीवारश्यामाकादि हिमं लघु॥ ११ ॥

तुणधान्यं पवनकृल्लेखनं कफपित्तहृतं।

तुणधान्यों का वर्णन—कंगु (कंगुनी या कौणी), कोद्रव (जंगली कोदों), नीवार (तीनी—मुनि अन्न), श्यामाक (साँवा) आदि ये तुण (निःसार) धान्य हैं। ये सभी शीतल, हल्के, वातकारक, लेखन (खुरच कर मल या मैल को निकालने वाले), कफ तथा पित्त नाशक होते हैं ॥ ११ ॥

वक्तव्य—ये तुणधान्य बिना जोते-बोये स्वयं उग जाते हैं और कहीं-कहीं बोये भी जाते हैं। हमारे धर्मशास्त्र के अनुसार अनेक व्रत ऐसे भी हैं, जिनमें 'हलकृष्ट न भुञ्जीत' अर्थात् हल जोतकर जो अन्न पैदा होते हैं, उन्हें व्रत के दिन खाने का निषेध रहता है, तब ये अन्न खाये जाते हैं। यही स्थिति बनवामों मुनियों की भी होती है, अतएव इन्हें मुनिअन्न भी कहते हैं। सुश्रुत ने इन अन्नो का परिगणन 'कुधान्यवर्ग' में किया है। देखें—सु.सू. ४६।२१। वास्तव में ये 'कुत्सितं धान्यं कुधान्यम्' हैं।

भग्प्रसन्धानकृतत्र प्रियङ्गुर्वृहणी गुरुः ॥ १२ ॥

प्रियंगुधान्य का वर्णन—तुणधान्यों में प्रियंगु (कंगुनी) भग् (टूटे हुए शरीरावयव अर्थात् अस्थि) को जोड़ता है। यह शरीर को मोटा बनाता है और पाचन में गुरु है अर्थात् देर में पचता है ॥ १२ ॥

वक्तव्य—सुश्रुत में प्रियंगु का वर्णन इस प्रकार है—प्रियंगु काला-लाल-पीला-सफेद वर्णभेद से चार प्रकार का होता है। ये उत्तरोत्तर रूक्ष तथा कफनाशक होते हैं। देखें—सु.सू. ४६।२४। इस दृष्टि से वामभटोक्त लक्षणों से ये लक्षण विपरीत प्रतीत होते हैं।

कोरदूषः परं ग्राही स्पशं शीतो विषापहः।

कोदोधान्य का वर्णन—कोदोधान्य अत्यन्त ग्राही (मल को बाँधने वाला) होता है। यह स्पशं में शीतल होता है और विषजनित विकारों को नष्ट करता है।

वक्तव्य—दाह की स्थिति में इसे पीसकर माथा में, पैरों में, उदर में, पेडुओं में लेप लगाया जाता है। यह स्पशं में शीत होने के कारण दाहनाशक है। अष्टांगसंग्रह में कोरदूष = कोदों के बाद तुणधान्यों में एक 'उद्वालक' तथा 'मधूलिका' का भी ग्रहण किया है। इसे 'बड़ा कोदों' कहते हैं। यह उष्णवीर्य होता है। मधूलिका—यह शीतवीर्य, स्निग्ध तथा वृष्य होती है।

श्री अरुणदत्त का कथन है कि 'श्यामाकादि' में प्रयुक्त आदि शब्द से तोषश्यामाक, हस्तिश्यामाक, शिविर, प्रशान्तिका, मधूलिका, गवेधु, काण्डलोहित आदि का ग्रहण कर लेना चाहिए। देखें—ऊपर ११वें श्लोक की व्याख्या।

रूक्षः शीतो गुरुः स्वादुः सरो विड्वातकृचवः ॥ १३ ॥

वृष्यः स्वेयंकरो मूत्रमेदःपित्तकफान् जयेत्। पीनसभ्यासकासोरुस्तम्भकण्ठत्वगामयान् ॥ १४ ॥

अन्तरूपविज्ञानीयाध्यायः ६ ]

सूत्रस्थानम्

८९

जो का वर्णन—जो हृक्ष, शीतल, पचने में गुरु ( भारी ), स्वाद में मधुर, सर ( मल को सरकाने वाला ), इसे खाने से मल ( पुरीष ) अधिक मात्रा में बनता है, यह वातदोष को बढ़ाता है। यह वीर्यवर्धक है। शरीर में स्थिरता को उत्पन्न करता है; मूत्रदोष, मेददोष, पित्त तथा कफविकारों को जीतता है। यह कौनस, श्वास, कास, ऊरुस्तम्भ, गले तथा त्वचा के रोगों को नष्ट करता है ॥ १३-१४ ॥

न्यूनो यवादनुयवः—

अनुयव का वर्णन—अनुयव ( छोटा जो ) के उक्त प्रसिद्ध जो से दाने भी छोटे होते हैं और यह उक्त जो से गुणों में भी कम होता है।

—रुक्षोष्णो वंशजो यवः ।

वंशज जो का वर्णन—बीस से उत्पन्न लगभग जो की आकृति वाले होने के कारण इन्हें बीस के जो कहते हैं। ये खाने में रुक्ष तथा उष्णवीर्य होते हैं।

वक्तव्य—अष्टांगसंग्रह में वेणुयों का वर्णन इस प्रकार मिलता है—‘बीस के जो उष्ण, सर, कषाय रस-प्रधान, वात तथा पित्त कारक होते हैं’। देखें—अ.सं.सू. ७।२१।

वृष्यः शीतो गुरुः स्निग्धो जीवनो वातपिराहा ॥ १५ ॥

सन्धानकारी मधुरो गोधूमः स्थैर्यकृत्सरः ।

गोधूम का वर्णन—गेहूँ के गुण-धर्म—यह वृष्य ( वीर्यवर्धक ), शीतवीर्य, पाचन में गुरु, स्निग्ध, जीवनीय शक्ति प्रदान करने वाला, वात तथा पित्त का नाशक, टूटी हुई अस्थि को जोड़ने वाला, स्वाद में मधुर, स्थिरता को देने वाला तथा सर होता है ॥ १५ ॥

पथ्या नन्दीमुखी शीता कषायमधुरा लघुः ॥ १६ ॥

इति शूकधान्यवर्गः ।

नन्दीमुखी का वर्णन—नन्दीमुखी ( मुँडा गेहूँ ) पथ्य ( हितकर ), शीतवीर्य, कषैला, मधुर तथा पाचन में लघु ( हलका ) होता है ॥ १६ ॥

वक्तव्य—‘नन्दीमुखी’ यह नाम छोटे शूक वाले मुँडा गेहूँ का है, अतः व्याकरण की दृष्टि से इसका नाम ‘नन्दीमुख’ होना चाहिए ‘गौरमुख’ की भाँति। देखें—‘नखमुखात् संज्ञायाम्’ ( ४।१।५८ )—डोष न स्यात्।

अथ शिम्बीधान्यवर्गः

मुद्गाढकीमसूरादि शिम्बीधान्यं विबन्धकृत् । कषायं स्वादु सङ्ग्राहि कटुपाकं हिर्म लघु ॥ १७ ॥

मेदःश्लेष्माव्रपितेयु हितं लेपोपसेकयोः ।

शिम्बीधान्य-परिचय—मूंग, अरहर, मसूर आदि शिम्बीधान्य कहे जाते हैं। ये शिम्बीधान्य स्वाद में कषैले तथा मधुर होते हैं। मल को बांधते हैं, इनका कटु विपाक होता है। ये शीतवीर्य तथा लघुपाकी होते हैं। इनका प्रयोग मेदविकार, कफविकार, रक्तविकार तथा पित्तविकारों में लेप तथा उपसेक अर्थात् दाल, कढ़ी आदि के रूप में भी किया जाता है ॥ १७ ॥

वक्तव्य—इसके आगे कुछ संस्करणों में ‘चना’ नामक शिम्बीधान्य का इस प्रकार वर्णन मिलता है—‘अमुकपित्तहरो रूक्षो वातलक्षचवणकः स्मृतः’। इसका अर्थ है—चना। यह रक्तपित्तनाशक, रूक्ष तथा वातकारक होता है। अष्टांगसंग्रह ७।२६-२७ में इनके बारे में कुछ विशेष कहा गया है—दालों में मूंग की दाल श्रेष्ठ होती है, छोटे मूंग वातकारक होते हैं, हरे मूंग सबमें उत्तम होते हैं। मोठ—ये कुमिकारक

१०

अष्टाङ्गहृदये

होते हैं। मसूर—लेप, उबटन आदि के रूप में प्रयुक्त मसूर मुखमण्डल की कान्ति को बढ़ाते हैं। ये मल को बाँधते हैं। राजमाष ( लौबिया ) गुरु होता है। यह मलकारक, रुक्ष तथा वातकारक होता है।

बरोडत्र मुद्रोऽल्पचलः, कलायस्त्वतिवातलः ॥ १८ ॥

राजमाषोऽनिलकरो रुक्षो बहुशुक्रदुर्गुरुः।

मूँग, मटर, राजमाष—मूँग, अरहर, मसूर नामक दालों में मूँग थोड़ है, यह थोड़ा वातकारक होता है। कलाय ( मटर ) अत्यधिक वातकारक होता है। राजमाष ( लौबिया ) वातकारक, रुक्ष तथा गुरु ( पचने में ढेर लगाने वाला ) होता है। इसका अधिकांश भाग मल ( पुरीष ) बन जाता है ॥ १८ ॥

उष्णाः कुलत्याः पाकेऽम्लाः शुक्राश्मश्वासपीनसान् ॥ १९ ॥

कासाशः कफवातांश्च ज्वलति पिताम्रदाः परम्।

कुलथी का वर्णन—यह उष्ण, पाक में अम्ल, शुक्राश्मरी, श्वास, पीनस, कास, अर्श ( बवासीर ), कफविकार तथा वातविकारों को नष्ट करती है; पित्त और रक्त को बढ़ाती है ॥ १९ ॥

निष्पावो वातपिताम्रस्तन्यमूत्रकरो गुरुः ॥ २० ॥

सरो विदाही दूक्शुक्रकफशोफविषापहः।

सेम का वर्णन—निष्पाव ( सेम ) वात-पित्तकारक, स्तन्य ( दूध ) तथा मूत्र को बढ़ाता है। यह गुरुपाकी होता है, सर, विदाही ( पाचनकाल में द्राहकारक होता है ), नेत्रविकार, शुक्रदोष, कफविकार शोथ एवं विषविकारों को नष्ट करता है ॥ २० ॥

बक्तव्य—निष्पाव—निस् + पू + धज्। इसका अर्थ होता है—फटकना या अनाज को साफ करना। इस अर्थ की इस प्रसंग में कोई उपयोगिता नहीं है। आयुर्वेदीय दृष्टिकोण से यह एक शिम्बीधान्य है। निष्पाव ( Phaseolus radiatus or a sort of pulse ), सफेद सेम, राजशिम्बीबीज, भट्वांस ( यह काला तथा सफेद रंग का होता है ), कुष्णात्रेय ने—'निष्पावा मधुरा रुक्षाः सकधाया विदाहिनः' कहकर इनकी अनेक जातियाँ होती हैं, कहा है, अतएव बहुवचन का प्रयोग किया है।

माषः स्निग्धो बलश्लेष्ममलपित्तकरः सरः ॥ २१ ॥

गुरुष्णोऽनिलह्वा स्वादुः शुक्रवृद्धिविरेककृत्।

माष का वर्णन—माष ( उड़द ) स्निग्ध, बलवर्धक, कफकारक, मलवर्धक, पित्तकारक, सर, पाचन में गुरु, उष्ण, वातनाशक, स्वाद में मधुर, शुक्रवर्धक एवं विरेचक है ॥ २१ ॥

बक्तव्य—माष ( उड़द )—पाकविधि—उड़दों को खोलते हुए पानी में डालकर पकाया जाता है, जब उसके दाने फूटने लगते हैं, तो उसमें तेल डालकर ढक दिया जाता है। इस स्थिति में वे फिर मन्द आँच पर पकाये जाते हैं। इसमें नमक, मिर्च-मसाले इच्छानुसार डालकर हाँग का छौंक भी लगाया जाता है। इस प्रकार पकायी गयी उड़द की दाल के गुणों का ही उक्त श्लोक में वर्णन है। पंजाब प्रान्त में इसी प्रकार उड़द की दाल बनायी जाती है। यह सूखी सब्जी की भाँति रोटियों तथा चावलों के साथ खायी जाती है। माष के अनेक वृष्य-प्रयोगों का वर्णन आयुर्वेद में प्राप्त होता है। माष का दाल के रूप में प्रयोग पश्चिम में अधिक होता है।

फलानि माषबद्धिद्यात्काकाण्डोलात्मगुप्तयोः ॥ २२ ॥

काकाण्डोला तथा केर्वाच—काकाण्डोला ( शूकर सेम ) तथा केर्वाच के बीज भी माष ( उड़द ) के समान गुण-धर्मवाले होते हैं ॥ २२ ॥

मन्त्ररूपविज्ञानाधिधायः ६ ]

सूत्रस्थानम्

११

वक्तव्य —केवाँच की सेम जब पक जाती है, तो उसके रोम झड़ने लगते हैं। बन्दर उस सेम को बने के लिए जाते हैं तो वे रोम उनके शरीर पर गिरते हैं, वे दिनभर खुजलाते रहते हैं। इस दृष्टि से केवाँच को संस्कृत में 'कपिकन्धु' कहते हैं। इसके बीज अत्यन्त पौष्टिक होते हैं। इन्हें घिसकर गोंद का बी काम लिया जाता है। उष्णकटिबन्ध में इसकी लताएँ होती हैं, यह शारदीय फल है। सुकोमल केवाँच की फलियों की सन्नी सेम की भाँति बनायी जाती है। केवाँच के बीजों की खीर अत्यन्त पौष्टिक एवं बौद्धवर्धक होती है।

उष्णत्वच्यो हिमः स्पर्शे केशयो बल्यस्तिलो गुरुः। अल्पमूत्रः कटुः पाके मेधाऽग्रिकफपित्तकृत ॥

तिल का वर्णन —तिल उष्णवीर्य, त्वचा के लिए हितकर, स्पर्श में शीत, बालों के लिए हितकर, कल्मषवर्धक, गुरुपाकी, मूत्र को घटाने वाला, विपाक में कटु, बुद्धिवर्धक, अग्निवर्धक, कफकारक तथा पित्तकारक होते हैं ॥ २३ ॥

वक्तव्य —'त्वच्यः' तथा 'केशयः' तिलों के ये दो विशेषण प्रायः इनके तेल के हैं। तिलों को पीसकर इनका उबटन भी लगाया जाता है, तेल की मालिश भी की जाती है, अतः इन दोनों प्रकारों से यह त्वच्य है। 'केशयः' केवल तेल के कारण है। अल्पमूत्रः —जाड़ों में बुड़जनों को बार-बार पेशाब करने जाना पड़ता है, अतएव इन दिनों तिलकूट, तिलवट, तिलवा, गजक आदि भक्ष्यपदार्थ तिल को भूँजकर कूटकर सूध या चीनी मिलाकर बनाये जाते हैं। इनका सेवन करने से मूत्र की मात्रा कम हो जाती है। यही वाग्भट का सन्देश है।

स्निग्धोमा स्वादुतिक्तोष्णा कफपित्तकरी गुरुः। दूकशुक्रहृदहृदः पाके, तद्रूदबीजं कुसुम्भजम् ॥

अतसी एवं कुसुम्भबीज —उमा (अलसी, तीसी या अतसी) स्निग्ध (तेल से युक्त), स्वाद में नमुर, कुछ तिक्त, उष्णवीर्य, कफकारक, पित्तकारक, गुरुपाकी, दृष्टिनाशक, शुक्रनाशक और विपाक में बूढ़ होती है। कुसुम्भ (बेर) के बीज भी अतसी के समान गुण-कर्म वाले होते हैं ॥ २४ ॥

वक्तव्य —तिल, अतसी तथा कुसुम्भबीज ये तीनों द्रव्य तिलहन में गिने जाते हैं, यहाँ इनका परिगणन शिम्बीधान्य के रूप में किया गया है। यह भी तो है कि एक द्रव्य अपने गुण-धर्मों से अनेक से सम्बन्धित रहता है।

मापोऽत्र सर्वैष्ववरो, यवकः शूकजेषु च।

माष एवं यवक वर्णन —शिम्बीधान्यों में माष (उड़द) उक्त सभी धान्यों में अवर (निकुष्ट) होता है और शूकधान्यों में यवक (जई) अधम होता है।

वक्तव्य —'माषाः शमीधान्यानाम् अपथ्यतमत्वेन प्रकृष्टतमा भवन्ति'। (च.सू. २५।३९) शमीधान्यों में माष अपथ्यतम होते हैं। यहाँ शूकधान्यों में यवक को जो पुनः अपथ्य कहा है, इससे ऐसा लगता है कि शास्त्रकार का यह वचन 'द्विबद्धं सुबद्धं भवति' वाली सूक्ति है अर्थात् दो बार बौधी हुई गाँठ जल्दी कुटती नहीं। इसके पहले शूकधान्यवर्ग में 'पूर्वं पूर्वं च निन्दिताः' पदार्थ द्वारा यवक के गुणों की निन्दा की जा चुकी है, अस्तु। 'माषाः श्लेष्मपित्तजननानां श्रेष्ठाः'। (च.सू. २५।४०) इस वचन से अब आप किसी द्रव्य को महत्ता उत्तम, मध्यम, अधम नहीं कह सकते, उसके लिए पूर्वोपर की संगति अपेक्षित होती है। यही स्थिति 'यवक' की भी है।

वक्तव्य —चरक, सुश्रुत, वाग्भट आदि ने जिन द्रव्यों के जो नाम दिये हैं, देशभेद के कारण वे नाम बदल भी जाते हैं। इसलिए शूक, शमी, कुधान्य आदि को वहाँ-वहाँ के किसानों से, पशु-पक्षियों के नामों को व्याधों या शिकारियों से, कन्द-मूल-फलों के नामों को वनवासियों से, पकाये व्यञ्जनों के नामों को रसोइयों से, औषधद्रव्यों के नामों को औषधसंग्रह करके बाजारों में बेचने वालों (अतारों) से पूर्व और प्रयोग करके उन-उन के गुण-धर्मों से मिलाकर प्रयोग में लाये।

१२

अष्टाङ्गहृदय

नवं धान्यमभिष्यन्दि, लघु संवत्सरोपितम् ॥ २५ ॥

शीघ्रजन्म तथा सूर्यं निस्तुषं युक्तिभर्जितम्।

इति शिम्बोधान्यवर्गः।

धान्य-विवेचन —उक्त दोनों प्रकार के ( शुक्र तथा शिम्बो ) धान्य नयी अवस्था में अभिष्यन्दी ( कफकारक ) होते हैं और वे ही सालभर पुराने होने पर लघु ( शीघ्र पचने वाले ) हो जाते हैं, जो धान्य शीघ्र पक जाते हैं। जैसे साठी आदि तथा छिलका उतारी हुई घी-तेल आदि में भूँजी हुई दालें भी लघु होती हैं ॥ २५ ॥

वक्तव्य —खारणादि ने कहा है—एक साल पुराना हो जाने पर सभी प्रकार के धान्य अपनी गूहता छोड़ देते हैं, किन्तु वे अपना वीर्य नहीं छोड़ते अर्थात् वे शक्तिहीन नहीं होते। शीघ्रजन्म —साठी आदि जो धान्य जितने शीघ्र पकते हैं वे उतने ही लघु होते हैं, इसके विपरीत देर में पकने वाले गेहूँ आदि धान्य स्वभावतः गुरु होते हैं। सूर्य —दाल के उपयोग में आने वाले मूँग, माष आदि। निस्तुष —छिलका उतारी हुई दालें, इन्हीं को वितुष भी कहते हैं। युक्तिभर्जितम् —ये दालें भइभूँजे से भी भूँजवायी जाती हैं या घरों में घी-तेल में भूँजकर खायी जाती हैं, बिना घी-तेल के भूँजी हुई लघु होती है, शेष गुरु।

अथ कृतान्नवर्गः

मण्डपेया विलेपीनामोदनस्य च लाघवम् ॥ २६ ॥

यथापूर्वं शिवस्तत्र मण्डो वातानुलोमनः। तृङ्गलानिदोषपेशेष्वनः पाचनो धातुसाम्यकृतम् ॥ २७ ॥

स्रोतोमार्दवकृत्स्वेदौ सन्धुभ्यति चानलम्।

पकाये गये अन्नों का वर्णन —मण्ड ( माँड ), पेया, विलेपी तथा ओदन ( भात )—ये क्रमशः अपने पूर्ववर्ती पदार्थ से लघुपाकी होते हैं। मण्ड-परिचय —यह शिव ( कल्याणकारक ) होता है, वातदोष का अनुलोमन करता है, तुषा ( प्यास ), ग्लानि ( हर्षक्षय ), वमन, विरेचन आदि से शोधन कराने के बाद बचे हुए दोष का विनाशक है, पाचनकारक एवं धातुसाम्यकारक हैं, स्रोतों को मुलायम बना देता है, पसीना लाता है और यह जठराग्नि को विधिवत् सुलगाता ( तेज करता ) है ॥ २६-२७ ॥

वक्तव्य —मण्ड—चावलों से चौदह गुना अधिक जल डालकर पकाये गये और मित्र्य ( भात ) के अंश को निकाल कर जो पेय द्रवद्रव्य शेष बचता है, उसे 'मण्ड' या 'माँड' कहते हैं। इसमें सोंठ और संधानमक भी मिला लिया जाता है, तो यह दीपन-पाचन हो जाता है। इसके भेद—१. यवमण्ड तथा २. लजमण्ड आदि।

पेया —आहारद्रव्य से चौदह गुना जल में बनायी गयी अत्यन्त पतली तथा थोड़ी-सी सीठी से युक्त वस्तु को पाकविशेषज्ञ 'पातुं योग्या पेया' अर्थात् पीने योग्य कहते हैं।

विलेपी —आहारद्रव्य से चौगुने पानी में डालकर तैयार की हुई, जिसमें सीठी का अंश विशेष हो, उसे विलेपी ( लपसी ) कहते हैं।

ओदन —चार पल ( १६ तोला ) चावलों को चौदह गुना जल में पकायें। चावलों के भलीभाँति गल जाने पर माँड को निकाल दें, इसे ओदन ( भात ) कहते हैं।

क्षुतृष्णागलानिदोर्बल्यकुक्षिरोगज्वरापहा ॥ २८ ॥

मलानुलोमनी पथ्या पेया दीपनपाचनी।

पेया का वर्णन —यह भूख तथा प्यास को शान्त करती है, ग्लानि ( उत्साहहीनता ), दुर्बलता, उदररोगों एवं ज्वर का विनाश करती है। पुरीष आदि मलों का अनुलोमन करती है, रोगी तथा नीरोग दोनों के लिए हितकर है। यह दीपन और पाचन है ॥ २८ ॥

ब्रह्मरूपविज्ञानीयाध्यायः ६ ]

सूत्रस्थानम्

९३

विलेपी ग्राहिणी हृद्या तृष्णाघ्नी दीपनी हित्वा ॥ २९ ॥ ब्रणाक्षिरोगतंशुद्धुर्बलस्नेहापयिनाम् ।

विलेपी का वर्णन—इसमें मल को बाँधने की शक्ति होती है, अतः यह अतिसाररोग को नष्ट करती है, हृदय को बल देती है, प्यास को शांत करती है, मन्द अग्नि को प्रदीप्त करती है, सभी स्थितियों में हितकर है। यह ब्रण ( घाव ), नेत्ररोग, वमन-विरचन आदि द्वारा शुद्ध शरीर वाले दुर्बल व्यक्तियों तथा स्नेहपान करने के इच्छुक व्यक्तियों के लिए लाभदायक होती है ॥ २९ ॥

सुधौतः प्रसृतः स्वित्त्रोऽत्यक्तोष्मा चैदनो लघुः ॥ ३० ॥

यश्चाग्रेयोपधक्वाथसाधितो भृष्टतण्डुलः । विपरीतो गुरुः क्षीरमांसाद्यैर्यश्च साधितः ॥ ३१ ॥

ओदन का वर्णन—जो भात चावलों को भलीभाँति धोकर पकाया जाता है, पकने पर जिसमें से मीठ निकाल लिया गया हो ( स्वाद की दृष्टि से नये चावलों का मीठ प्रायः नहीं निकाला जाता, तभी वह स्वादिष्ट एवं गुरु होता है ), जिसमें अभी तक गर्मी बनी हुई हो, ऐसा भात लघु ( मुपच ) होता है। जो भात चित्रक ( चीता ) के अथवा सोंठ के क्वाथ में बनाया जाता है या चावलों को भूजकर बनाया जाता है, वह भी लघु होता है। इसके विपरीत अर्थात् दूध में पकाये हुए चावलों की क्षीर, मांसरस में पकाये हुए चावलों का भात या बिना मीठ निकाला हुआ भात ये सब गुरु ( देर में पचने वाले ) होते हैं ॥ ३०-३१ ॥

इति द्रव्यक्रियायोगमानाचैः सर्वमादिशेत् ।

संक्षिप्त निर्देश—इस प्रकार द्रव्य ( जिससे जो पदार्थ बनाया गया हो ), कर्म ( निर्माणविधि के भेद-उपभेद ), योग ( सहयोगी द्रव्यों का संयोग ) तथा उनके मान ( नाप-तौल ), आदि शब्द से देश, काल का ग्रहण करके सभी प्रकार के आहारद्रव्यों के लघुत्व, गुरुत्व आदि गुण-दोषों का स्वयं भी विचार कर लेना चाहिए और दूसरों को उसका निर्देश देना चाहिए।

बृंहणः प्रीणनो वृष्यश्चक्षुष्यो ब्रणहा रसः ॥ ३२ ॥

मांसरस के गुण—यह धातुओं को पुष्ट करने वाला, तृप्तिकारक, वीर्यवर्धक, आँखों के लिए हितकर ( नेत्र-ज्योतिर्वर्धक ) तथा ब्रणनाशक ( घाव को शीघ्र भरने वाला ) होता है ॥ ३२ ॥

मौद्रस्तु पथ्यः संशुद्ध्रणकण्ठाक्षिरोगिणाम् ।

मूंग का पूष—यह वमन-विरचन आदि क्रियाओं से शुद्ध शरीर वालों के लिए, ब्रण, कण्ठ तथा नेत्ररोगियों के लिए पथ्य ( हितकर ) होता है।

वातानुलोमी कौलत्यो गुल्मतीप्रतूनजित् ॥ ३३ ॥

कुलथी का पूष—यह वातदोष को अनुलोम ( अनुकूल ) करता है, गुल्मरोग, तूनी तथा प्रतूनी नामक वातरोगों का विनाशक है ॥ ३३ ॥

तिलपिण्याकविकृतिः शुष्कशाकं विरुद्धकम् । शाण्डाकीवटकं दूग्धं दोषलं ग्लपनं गुरु ॥ ३४ ॥

तिल, पिण्याक आदि—तिल की खली से बने हुए भोज्य पदार्थ, चना एवं सरसों के पत्तों को मुखाकर बनाये गये शाक, विरुद्धक ( अंकुर निकले हुए चना, मोठ, मूंग आदि ) तथा काँची में डाले गये बड़े—ये सब पदार्थ दृष्टिनाशक, वात आदि दोषकारक, मलानिकारक तथा गुरु होते हैं ॥ ३४ ॥

रसाला बृंहणी वृष्या स्निग्धा बल्य़ा रुचिप्रदा ।

रसाला के गुण—रसाला ( श्रीखण्ड या शिखरन )—रस-रक्त आदि धातुओं को बढ़ाने वाली, वीर्यवर्धक, स्निग्ध ( स्नेहयुक्त ), बलवर्धक तथा रुचि को बढ़ाने वाली होती है।

९४

अष्टाङ्गहृदये

रसाला, शीखण्ड, शिखरिणी या सिखरन—पाकक्रियाकुशल भीमसेन ने इसका निर्माण करके श्रीकृष्ण को खिलाया था, ऐसी चर्चा महाभारत में आई है। हम यहाँ उसी निर्माण-विधि का निर्देश कर रहे हैं—मलाई सहित उत्तम दही को एक स्वच्छ वस्त्र बाँधकर लटका दें। उसका जलीय तत्त्व निकल जाने पर उस दही को एक पात्र में निकाल लें, फिर किसी चौड़े बर्तन के मुख पर मोटा कपड़ा बाँधकर उस दही में चीनी मिलाकर उस कपड़ा के ऊपर रखकर उसे हाथ से रगड़ें। वह दही उस कपड़े से छनकर जब सब उस पात्र में आ जाये, तब उसमें उचित मात्रा में कालीमिर्च, जावित्रों, केशर, इलायची आदि मिलाकर रख दिया जाता है, यह रसाला है। इसके भेद-उपभेदों का विस्तृत वर्णन देखें—'क्षेमकुतूहल' नामक ग्रन्थ में।

श्रमशुतूट्कलमहरं पानकं प्रीणनं गुरु॥ ३५॥

विष्टस्मि मूत्रलं हृद्यं यथाद्रव्यगुणं च तत्।

पानक ( शीतल पेय ) गुण—यह शारीरिक थकावट, भूल, प्यास तथा मानसिक सुस्ती को हटाता है, तृप्तिकारक तथा गुरु होता है। यह विष्टम्भकारक ( मलावरोधक ), मूत्र को निकाल देने वाला, रुचिकर होता है। विशेष करके यह जिस प्रकार के द्रव्यों से बनाया जाता है, तदनुसार गुणों वाला होता है॥ ३५॥

वक्तव्य—यह एक प्रकार का पेय है, जो पकाये हुए कच्चे आम, पकी हुई इमली आदि के गूदे में पानी, नमक, मिर्च आदि मिलाकर तैयार किया जाता है; इसे 'पना' भी कहते हैं। इसके अन्य अनेक प्रकार हैं—फालमा, आलूबुखारा, काफल ( नैनीताल, अल्मोड़ा में सुलभ जंगली फल )—इनमें से किसी एक का उक्त विधि से पानक बनाया जाता है। बादाम, पोस्तादाना, भाँग के बीज, कददु, खरबूजा आदि के बीजों को एक साथ पानी डालकर पीस लें, फिर इसे कपड़े में डालकर छान लें। इसमें चीनी या उत्तम शहद डालकर पीया जाता है, यह भी एक समृद्ध पानक है। ग्रीष्मऋतु का यह उत्तम पौष्टिक पेय है। कुछ शौकीन लोग इसमें गुलकन्द भी मिलते हैं। यह सोने में सुगन्ध है।

लाजास्तुदृष्ट्यतीसारमेहमेदःकफच्छिदः ॥ ३६॥

कासपित्तोपशमना दीपना लघवो हिमाः।

लाजा ( लावा, खील )—ये तुष्णा ( प्यास ), वमन, अतिसार, प्रमेह, मेदोवृद्धि तथा कफद्रोष का विनाश करते हैं; काम एवं पित्तविकार को शान्त करते हैं, जठराग्नि को प्रदीप्त करते हैं, लघुपाकी, शीतल तथा शीतवीर्य होते हैं॥ ३६॥

वक्तव्य—'भृष्टं सुपुष्यितं धान्यं लाजेति परिकीर्तितम्'। अर्थात् धान्यों को भाड़ में भूँजकर जो फूल जैसा खिल जाता है, उसे 'लावा' कहते हैं। ये लाजा अन्य धान्यों के भी बनाये जाते हैं। लावा शब्द संस्कृत में पुल्लिंग एवं नित्य बहुवचनान्त है।

पृथुका गुरवो बल्याः कफविष्टम्भकारिणः॥ ३७॥

पृथुक ( च्यूड़ा )—ये पाचन में गुरु, बलवर्धक, कफकारक तथा विष्टम्भकारक ( मल को बाँधने वाले ) होते हैं॥ ३७॥

वक्तव्य—श्रीअरुणदत्त का कथन है कि हरे धान्यों को भूँजकर मुशूल से कूटकर चिपटे जो बनाये जाते हैं, उन्हें 'पृथुक' कहते हैं। यही मत श्रीहेमाद्रि तथा उल्लेख का भी है। किन्तु आजकल सूखे धान्यों को भिगाकर भूनकर तब कूटकर च्यूड़ा बनाया जाता है।

उक्त आचार्यों द्वारा कथित विधि से बनाया गया च्यूड़ा शुद्ध एवं उत्तम होता है।

धाना विष्टस्मिन्नी रूक्षा तर्पणी लेखनी गुरुः।

धाना ( भूने हुए जौ या चावल )—यह विष्टम्भकारक, रूक्ष ( स्नेह रहित ), तृप्तिकारक, लेखन करने वाली तथा पचने में गुरु होती है।

कर्मसहस्रविज्ञानीयाध्यायः ६ ]

सूत्रस्थानम्

९५

वक्तव्य —वाग्भट ने उक्त 'धाना' को 'गुरु' कहा है, सुश्रुत का मत इसके विपरीत है—'धानोऽलुम्बास्तु वक्तव्यः कफमेदोविशेषणाः' । (सु.सू. ४६।४१०) अर्थात् धाना तथा उलुम्बा (होलक) ये लघु होते हैं, बल एवं मेदोधातु को सुखाते हैं। ऐसा क्यों ?

समाधान —'सुश्रुत' के मत में ये द्रव्य पाक में लघु हैं और गुणों में गुरु होते हैं। 'उलुम्बा' को हिन्दी में 'होरहा' भी कहते हैं।

सक्तवो लघवः क्षुतृश्रमनेत्रामयव्रणान् ॥ ३८ ॥

धन्ति सन्तर्पणाः पानात्सद्य एव बलप्रवाः । नोदकान्तरितान् द्विन्न निशायान् न केवलान् ॥ ३९ ॥

न भुक्त्वा न द्विजैशिल्वत्वा सक्तूनद्यान्न वा बहून् ।

सत्तुओं का वर्णन —प्रायः सभी प्रकार के सत्तु लघु होते हैं। ये भूख, प्यास, थकावट, नेत्ररोग आदि त्रणों को नष्ट करते हैं। ये पीने से तत्काल तृप्तिकारक तथा बल (शक्ति) कारक होते हैं। सत्तु वाले समय बीच-बीच में पानी नहीं पीना चाहिए। दिनभर में दो बार सत्तु का सेवन न करें, इसे रात में नहीं खाना चाहिए। केवल (बिना नमक या गुड़ मिलाये) सत्तु नहीं खाने चाहिए। भोजन कर लेने के बाद भी सत्तु का सेवन न करें। आटा की भाँति सानकर दंतों से काट-काट या चबा-चबा कर इनका सेवन न करें और अधिक मात्रा में भी सत्तु न खाये ॥ ३८-३९ ॥

वक्तव्य —अन्य प्रकार के भोजनों के बीच-बीच में जिस प्रकार लोग पानी पीते हैं, वैसा सत्तुओं के साथ न करें। 'न केवलान्' का अर्थ श्री अरुणदत्त तथा हेमाद्रि ने किया है—'उदकादिरहितात्' । इसमें यदि पद से नमक या गुड़ या मिश्री समझना चाहिए। कुछ लोग इसकी रुक्षता कम करने के लिए इसमें मिला लेते हैं। घी मिलाने की सलाह संग्रहकार की भी है। सत्तुओं को घोलकर पीना यही उचित है। आटा जैसा सानकर खाना उचित नहीं है।

सत्तु-निर्माण —जौ, जना, मसूर, बेर आदि को भूँजकर पीस लिया जाता है, इस प्रकार जो आटा बनाया जाता है, उसे 'सत्तु' कहते हैं। इसका प्रचार पूर्वी उत्तरप्रदेश में अधिक है। इधर इसके 'होरल' भी देखे जाते हैं, उनका नाम होता है—'तुरन्ता भोजनालय' ।

पिण्याको रल्पनो रुक्षो विष्टम्भो दृष्टिदूषणः ॥ ४० ॥

पिण्याक-वर्णन —पिण्याक (तिल या सरसों की खली) ग्लानिकारक, रुक्षताकारक, विष्टम्भ (मल जो रोकने वाला), दृष्टि को दूषित करने वाला होता है ॥ ४० ॥

वक्तव्य —पिण्याक का सेवन रात्रि में नहीं करना चाहिए, क्योंकि यह रुक्ष होने के कारण विष्टम्भ करता है। उसके बाद यह विदाह करता है, फिर मन में ग्लानि को करता है।

वेसवारो गुरुः स्निग्धो बलोपचयवर्धनः ।

वेसवार-वर्णन —यह गुरु, स्निग्ध (चिकना), बलवर्धक तथा शरीर को स्थूल बनाता है ।

वक्तव्य —वेसवार का परिचय श्रीचक्रपाणि ने च.सू. २७।२६९ की टीका में इस प्रकार दिया है—'मांसं निरस्य सुस्निग्धं पुनर्दृषादि पेषितम् । पिप्पलीशुण्डिमरिचगुडमर्पिः समन्वितम् । ऐकध्वं विपचेत् सम्यग्वेशवार इति स्मृतः' । (सुदशास्त्र) अर्थात् अस्थिरहित मांस के छोटे-छोटे टुकड़ों को पकाकर उन्हें फिर सिल पर पीसकर नीमल, मोठ, मरिच, गुड़, घी मिलाकर फिर से एक साथ पकायें, इसे वेसवार कहते हैं। इसी का अविकल पाद सुश्रुत में देखें—सु.सू. ४६।३६४-३६५। यह मांसाहारियों का 'वेसवार' है। शाकाहारियों का 'वेसवार' आगे कहा जायेगा।

मुद्गादिजास्तु गुरवो यथाद्रव्यगुणानुगाः ॥ ४१ ॥

९६

अष्टाङ्गहृदये

मूंग आदि के वेसवार—मूंग, उड़द आदि वेसवार भी गुरु होते हैं, जिन घटकों द्वारा वे बनाये जाते हैं, उन्हीं के समान उन वेसवारों के गुण तथा कर्म भी होते हैं ॥४॥

बक्तव्य—‘सिद्धसार’ में कहा गया है—‘अत्युष्ण मण्डकाः पथ्याः शीतला गुरवो मताः’। अर्थात् उक्त मूंग आदि द्वारा निर्मित मण्डक गरमागरम यदि खाये जाते हैं, तो हितकर होते हैं और वे शीतल हो जाने पर गुरु हो जाते हैं अर्थात् ढेर में पचते हैं।

वेशवार—जीरा, मरिच, सोंठ, पीपलामूल, धनियाँ, हल्दी, दारुहल्दी, पिप्पली तथा सफेद मरिच—यह सब वेशवारगण हैं। देखें—राज० मिश्रकर्म २२।६२। इन मसालों को डालकर जो मूंग आदि दालों के मण्डक (पकोड़े, बड़े आदि) बनाये जाते हैं, उनके गुण-धर्मों का ऊपर वर्णन किया गया है। यह शब्द तालव्य अथवा दन्त्य सकार मध्य भी देखा जाता है।

कुकूलकपिरप्राष्ट्रकन्दुङ्गरविपाचितान् । एकयोर्नौलघून्विद्यादपूणानुतरोत्तरम् ॥४२॥

इति कृताश्रवर्गः ।

अपूर्वों का वर्णन—कुकूल (भूसा की आग), कपिर या खपिर अर्थात् फूटे हुए घड़े का टुकड़ा, प्राष्ट्र (भाड़), कन्दुक (गोल आकार वाली कड़ाही) तथा जलते हुए कोयलों को अंगार कहते हैं। इनमें पकाये गये गेहूँ आदि किसी एक ही जाति के आटा के अपूर्व उत्तरोत्तर हलके होते हैं ॥४२॥

बक्तव्य—‘अपूर्’ शब्द सामान्यतया गेहूँ के आटे को घोलकर चीनी डालकर पकाये हुए मालपुआ के लिए प्रयुक्त होता है। यहाँ ‘अपूर्’ की निर्माण-विधि से ‘लिट्टी’ या ‘बाटी’ का बोध हो रहा है, विशेषकर ‘कुकूलपाचितान्’ तथा ‘अङ्गारपाचितान्’ को देखकर। ‘कपिरप्राष्ट्रकन्दुपाचितान्’ को देखकर रोटी का आभास हो रहा है। कपिर या खपिर का अर्थ है फूटे घड़े के खप्पर का तवा; प्राष्ट्र का अर्थ है—भड़भूजे की भाड़ या भड़साँय या भड़साई अथवा तन्दूर; कन्दु का अर्थ है—लोहे का तवा या कड़ाही। अब आप तवा या कड़ाही में जो भी बनायें किन्तु ऊपर के साधनों में अपूर्व का बनना या बनाना सम्भव नहीं है। इस प्रकार यहाँ अपूर्व का अर्थ—लिट्टी, बाटी, रोटी, फुलका, चिलड़ा, पराठा तथा मालपुआ भी हो सकता है। यद्यपि इसमें पकाये जाने वाले पदार्थ के लिए यहाँ घी-चीनी का उल्लेख नहीं किया है, फिर भी अन्न, पकाने वाले पात्र तथा अग्नि का उल्लेख तो किया ही गया है। अतः यहाँ ‘एकदेशविकृत-स्यानन्यत्वात्’ इस नियम से सभी का ग्रहण कर लिया जायेगा।

‘कपिर’ शब्द का अर्थ है—घड़े का ‘ठीकरा’। संस्कृत-साहित्य में एक आचार्य हुए हैं, जिनका नाम था ‘वटकपिर’। ये यमकालेकार की रचना में अपने काल में अद्वितीय थे। इनकी एक गर्वक्ति है—‘जीयेय येन कविना यमकैः परेण, तस्मै वहेयमुदकं घटकपिरेण’। यहाँ भी कपिर या खपिर शब्द का वही अर्थ है।

इस प्रकरण का नाम ‘कृताश्रवर्ग’ है। इसका अर्थ है—किये (पकाये) गये अन्नों (भक्ष्यपदार्थों) का वर्ग। ‘कृत’ का अर्थ संस्कृत भी होता है, इसका तात्पर्य है—मसाले आदि डालकर भलीभाँति पकाये गये और उसके बाद घी-तेल से छौंके गये। इस दृष्टि से सभी प्रकार के भक्ष्य पदार्थ कृत-अकृत भेद से दो प्रकार से बनाये जाते हैं। देखें—‘त्रेयाः कृताऽकृतास्ते तु स्नेहादियुतबर्जिताः’। (अ.सं.सू. ७।५१) अर्थात् कृत (संस्कृत) अथवा अकृत (असंस्कृत)।

अथ मांसवर्गः

हरिगैणकुर्ङ्क्षीर्गोकर्णमृगमातुकाः । शशशम्बरचारुष्कशरभाद्या मृगाः स्मृताः ॥४३॥

मृग-परिचय—हरिण, एण, कुरंग, गोकर्ण, मृगमातुका, शश, शम्बर (सौंभर—बारहसिंगा), चारुष्क तथा शरभ आदि ‘मृग’ कहे जाते हैं ॥४३॥

अक्षररूपविज्ञानीयाध्यायः ६ ]

सूत्रस्थानम्

९७

वक्तव्य—अष्टांगसंग्रह सू. ७।६७-६८ में मुर्गों की गणना इस प्रकार की गयी है—हरिण, एण, कुरंग, कृष्ण, गोकर्ण ( नीलगाय ), मुग्गामातुका, कालपुच्छक, चारुक्क, वरपोत, शशक, उरण, श्वदंष्ट्र, राम, शरभ ( यह मुग काश्मीर में पाया जाता है, इसके आठ पैर होते हैं ), लोहकारक, शम्बर ( सींभर ), कंगल ( कस्तूरीमृग ), कृतमाल तथा पुषत ( बिन्दुओं से युक्त त्वचा वाला )। चरक ने 'मृग जाङ्गल्लचारिणः' ( ज.सू. २७।५५ ) कहा है अर्थात् ये जंगल में विचरण करते रहते हैं। शिकारी इन्हे दूदते हैं, अतएव इन्हे मृग कहा जाता है।

लाववार्तीकवर्तीरक्तवर्त्मककुक्कुभाः । कपिञ्जलोपचक्राश्वचकोरकुशवाहवः ॥ ४४ ॥

वर्तको वर्तिका चैव तित्तिरः क्रकरः शिखी । ताम्रचूडाश्वबकरगोनर्दगिरिवर्तिकाः ॥ ४५ ॥

तथा शारपदेन्द्राभवरटाद्याश्व विष्किराः ।

विष्किर-परिचय—लाव ( लवा ), वर्तक ( बटेर ), रक्तवर्त्मक, कुक्कुभ, कपिञ्जल, उपचक्र ( चक्का ), चकोर, कुरुबाह, वर्तक ( बत्तख ), वर्तिका, तीतर, क्रकर, मोर, ताम्रचूड ( मुर्गा ), बकर, गोनर्द, गिरिवर्तिका, शारपद, इन्द्राभ तथा वरट नामक पक्षी विष्किर कहे जाते हैं ॥ ४४-४५ ॥

वक्तव्य—अष्टांगसंग्रह ( सू. ७।६९-७१ ) में विष्किर पक्षियों की गणना इस प्रकार की गयी है—लाव, वर्तक, वातीर, रक्तवर्त्मक ( गौरिया—गुहचटक ), कुक्कुभ ( जंगली मुर्गा ), कपिञ्जल ( जंगली गौरिया ), उपचक्र ( चक्का ), चकोर, कुरुबाह, वर्तक ( बत्तख ), वर्तिका, तित्तिर, क्रकर ( बया ), मोर, मुर्गा, वरक ( बगुला ), गोनर्द, गिरिवर्तिका, शारपद, इन्द्राभ तथा वरटा ( हंस की स्त्री )—ये सभी पक्षी विष्किर कहे जाते हैं।

विष्किर शब्द का अर्थ—पहले दानों के ढेर को पंजों से बिखेर कर बाद में एक-एक दाना चुनकर खाने वाले पक्षियों को 'विष्किर' कहते हैं।

जीवजीवकदात्युहभृङ्गाहशुकसारिकाः ॥ ४६ ॥

लङ्काकोकिलहारीतकपोतचटकादयः । प्रतुदाः—

प्रतुद-परिचय—जीवजीवक, दात्युह, भृंग या भुंगराज, शुक्, सारिका ( मैना ), लङ्का, कोकिल ( कोयल ), हारीत, कपोत ( कबूतर ) तथा चटक ( गौरिया ) आदि पक्षी प्रतुद कहे जाते हैं ॥ ४६ ॥

वक्तव्य—अष्टांगसंग्रह सू. ७।७२-७५ में प्रतुद पक्षियों की गणना इस प्रकार है—शतपत्र ( कठफोड़वा ), भुंगराज, कोयण्डि ( जलमुर्गा ), जीवजीवक, खंजरीट ( खंजन पक्षी ); हारीत ( हरियल ), दुर्गामारि ( उल्लू ), कुशगुह, लङ्का, लङ्घक, वटहा, गोक्षवेड, डिण्डिमाणक, जटी ( जटायु ), दुन्दुभि, पार्कार, लोहपुष्क, कलिंगक, सारिका, शुक्, शाङ्ग ( सारंग ), चिरीटीक, कुयण्टिक, मञ्जरीयक, दात्युह, गोपापुत्र, प्रियात्मज, कलविक, कोयल, कबूतर, अंगारचूड़क, पारावत ( पेरवा वा जंगली कबूतर ) तथा पाणविक—ये पक्षी 'प्रतुद' कहे जाते हैं। चाँच मारकर दाना चुगने वाले पक्षियों की 'प्रतुद' संज्ञा है।

विष्किर तथा प्रतुद वर्ग के पक्षी यद्यपि ऊपर अलग-अलग गिनाये गये हैं तथापि दोनों में प्रतुद धर्म समान ही होता है। सम्प्रति ये पक्षी उक्त नामों से अपरिचित से हो चले हैं, इनका परिचय बहेलियों ( चिड़ीमारों ) से प्राप्त कर लेना चाहिए।

—भेकगोधाहिष्भाविदाद्या बिलेशयाः ॥ ४७ ॥

बिलेशय-परिचय—भेक ( मेढक ), गोह, सर्प तथा साही आदि प्राणी 'बिलेशय' कहे जाते हैं ॥ ४७ ॥

वक्तव्य—बिलेशय अर्थात् बिल में रहने वाले। मेढक मिट्टी के भीतर, गोह तथा सर्प का बिल होता ही है, साही के पूरे शरीर पर काँटे रहते हैं, यह बिल बना लेता है अथवा किसी गुफा को अपने लिए दूँड लेता है। इसके काँटे धार्मिक कृत्य तथा कृत्या प्रयोग में लिए जाते हैं।

७ अ० ह०

९८ अष्टाड्रहदये

अष्टांगसंग्रह ( सू. ७।७६ ) में बिलेशय प्राणियों की गणना इस प्रकार है---श्वेत, श्याम, रंग-बिरंगी

पीठ वाला तथा कालक नामक प्राणी मेढक, चिल्लट, कूचीक, गोह, शल्लक, शण्डक ( साँडा ), वृष ( जंगली

बिलाव ), साँप, कदली ( पौण्ड्देश में पाया जाने वाला प्राणी ), श्वाविध ( बड़ा साही ) तथा नेवला---ये

बिलेशय प्राणी हैं।

गोखराश्वतरोष्ट्राश्वद्वीपिसिंहर्क्षवानरा: । मार्जारमूषकव्याप्रवृकबश्चरुतरक्षवः || ४८ ||

लोपाकजम्बुकश्येनचाषवान्तादववायसा:।_ शशघ्नीभासकुररग॒ध्नोलककुलिड्भका:। ।। ४९ ॥

धूमिका मधुहा चेति प्रसहा मृगपक्षिण:।

प्रसह मग---गाय, गधा, खच्चर, ऊँट, घोड़ा, द्वीपि ( चीता ), सिंह, भालू, बिलाव, चूहा, बाघ,

व॒क ( भेड़िया ), नेवला, तरक्षु ( लकड़बग्घा ), लोमड़ी तथा सियार | पक्षी---श्येन ( बाज ), चाष ( नीलकण्ठ ),

वान्ताद ( कुत्ता ), कौआ, चील, भास, कुरर, गिद्ध, उल्लू, कुलिंगक, धूमिक तथा मधुहा नामक पक्षी

प्रसह कहे जाते हैं।। ४८-४९॥

वक्तव्य---ऊपर ४८वें श्लोक का यह उत्तरार्ध चाषवान्तादवायसाः कुछ खटक रहा है, क्योंकि

यहाँ पक्षियों के बीच' में कुत्ता का समावेश कर दिया है। यही स्थिति अ.सं.सू. ७।७८ की भी है। वास्तव

में वान्‍्ताद की गणना अन्वयविधि से कर भी ली जाती तो यहाँ सम्पूर्ण पंक्ति ही समस्त है, अस्तु। भीड़

में मनुष्य भी इधर-उधर भटक जाते हैं, पशु-पक्षियों का तो कहना ही क्‍या है ?

वराहमहिषन्यड्कुरुरुरोहितवारणाः ॥ ५०॥।

सुमरश्चमरः: खड़गो गवयश्व महामृगाः।

महामृग-परिचय---सूअर, भैंसा, न्‍्यंकु (बारहसिंगा का भेद ), रुर, रोहित, हाथी, समर ( हरिण

भेद ), चमर, गैंडा तथा गवय ( जंगली गाय )--ये महामृग कहे जाते हैं।। ५० ॥

हंससारसकादम्बबककारण्डवप्लवाः ॥ ५१॥

बलाकोत्क्रोशचक्राह्मद्ुक़रौड्चादयो 5प्चरा: ।

जलचर पक्षी--हंस, सारस, कादम्ब, बक ( बगुला ), कारण्डव, प्लव, बलाका, उत्क्रोश, चकवा,

मद्गु ( जलकौआ ), क्रौज्च आदि पक्षी 'जलचर' कहे जाते हैं।। ५१ ॥

मत्या. रोहितपाठीनकूर्मकुम्भीरकर्कटा: | ५२॥

शुक्तिशड्डरेद्रशम्बूकशफरीवर्मिचन्द्रिका-। . चुल॒कीनक्रमकरशिशुमारतिमिड्धिला: | ५३॥

राजीचिलिचिमाद्या श्व---

मत्स्य-परिचय---रोहू, पाठीन, कछुआ, कुम्भीर, केकड़ा, शुक्ति ( सीपी ) का क्रिमि, शंख का क्रिमि,

उद्र ( जलबिलाव ), शम्बूक ( घोंघा ), शफरी (छोटी जाति की मछली ), वर्मी, चन्द्रिका, चुलुकी, नक्र

( घड़ियाल ), मकर, शिशुमार, तिमिंगिल ( हल मछली ), राजी तथा चिलचिम आदि मत्स्यवर्ग में परिगणित

हैं। ५२-५३॥

--मांसमित्याहरष्टधा।

( मृग्यं वेष्किरिक किज्च प्रातुद॑ च बिलेशयम्‌।

प्रासह च महामग्यमप्चर मात्स्यमष्टधा | १॥ )

आठ प्रकार के मांस---१. मृग, २. विष्किर, ३. प्रतुद, ४. बिलेशय, ५. प्रसह, ६. महामृग; ७. जलचर

पक्षी तथा ८. मत्स्यवर्ग ॥ १॥

वक्तव्य---यहाँ 'जलचर' नाम से कुछ पक्षियों का वर्णन किया गया है, उसके बाद “मत्स्यमांस'

का उल्लेख है। मछलियाँ जलज, जलेचर तथा जलेशय होती हैं; किन्तु इनमें 'चिलचिम' नामक मछली

ब्रह्मरूपविज्ञानीयाध्यायः ६ ]

सूत्रस्थानम्

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का वर्णन करके ने इस प्रकार दिया है—'स पुनः शकली लोहितनयनः सर्वतो लोहितराजी रोहिताकारः उग्रो भूमौ चरति' । ( च.सू. २६।८३ ) यह इसकी आकृति का परिचय है और यह प्रायः भूमि में चरती है अर्थात् पानी से हटकर भी जीवित रहती है, यह इसकी विलक्षणता है।

योनिष्वजावी व्यामिश्रगोचरत्वादनिश्चिते ॥५४॥

बकरी-भेड़ का वर्णन—बकरी तथा भेड़ की योनि ( उत्पत्तिस्थान ) के सम्बन्ध में निश्चित रूप में यह नहीं कहा जा सकता, क्योंकि ये दोनों जांगल तथा आनूप देश में विचरण करती रहती हैं ॥५४॥

आद्यान्या जाङ्गलानूपा मध्ये साधारणो स्मृतौ ।

शेष प्राणियों का निर्णय—शेष मांसयोनियों का निश्चय इस प्रकार है—प्रारम्भ के तीन वर्ग ( १. मृग, २. विष्किर, ३. प्रतुद ) जांगल देश के और अन्तिम तीन वर्ग ( १. महामृग, २. जलचर पक्षी तथा मत्स्य ) आनूप देश के कहे जाते हैं तथा मध्यम दो वर्ग ( १. बिलेशय तथा २. प्रसह ) वाले दोनों लक्षणों से युक्त साधारण देश के माने जाते हैं।

तत्र बद्धमलाः शीता लघवो जाङ्गला हिताः ॥५५॥

पित्तोत्तरे वातमध्ये सन्निपाते कफानुगे ।

मांसों का वर्णन—उक्त मांसों में जांगल देश के प्राणियों के मांस मल को बांधते हैं, शीतवीर्य, पित्त में लघु तथा हितकर होते हैं। ये पित्त-प्रधान, मध्यम वात एवं हीन कफ वाले सन्निपात में हितकारक होते हैं ॥५५॥

दीपनः कटुकः पाके ग्राही रूक्षो हिमः शशः ॥५६॥

शशकमांस के गुण—खरोंश का मांस जठराग्नि को प्रदीप्त करने वाला, विपाक में कटु, ग्राही मल को बांधने वाला ), रूक्ष तथा शीतवीर्य होता है ॥५६॥

ईषदुष्णगुरुस्निग्धा बृहणा वर्तकादयः । तितिरिस्तेष्वपि वरो मेधाग्निबलशुक्रकृत् ॥५७॥

ग्राही वष्योंऽनिलोद्भिरुत्सन्निपातहरः परम् ।

वर्तक आदि के मांस—ये कुछ उष्णवीर्य, पाचन में गुरु, स्निग्ध तथा पुष्टिकारक होते हैं। इन मांसों में तीतर का मांस उत्तम होता है, क्योंकि यह घ्राण करने की शक्ति वाली बुद्धि, बल तथा शुक्र ( वीर्य ) को बढ़ाता है एवं मल को बांधता है, मुखमण्डल की कान्ति को बढ़ाता है और वातदोष-प्रधान सन्निपात का विनाशक है ॥५७॥

नातिपथ्यः शिखी पथ्यः श्रोत्रस्वरवयोदृशम् ॥५८॥

मोर का मांस—मोर का मांस अधिक पथ्यकारक नहीं होता, तथापि कर्णन्द्रिय, स्वरवाही प्रोत्स, वृत्त तथा दृष्टि को स्थिरता प्रदान करता है ॥५८॥

तद्वच्च कुक्कुटो वृष्यः—

कुक्कुट का मांस—कुक्कुट का मांस भी मोर के मांस के समान गुण वाला होता है और यह वृष्य ( वीर्यवर्धक ) भी होता है।

—ग्राम्यस्तु श्लेष्मलो गुरुः ।

पालतू मूर्गा का मांस—ग्राम्य ( पालतू ) मूर्गा का मांस वन में होने वाले मूर्गा के मांस से कफकारक तथा गुरु होता है।

मेधाऽनलकरा हृद्याः क्रकराः सोपचक्रकाः ॥५९॥