भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

पृष्ठ 112, कुल 387 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 112

७६

अष्टाङ्गहृदये

मधुशर्करा—जैसे राब में बाँड का अंश नीचे बैठ जाता है वैसे ही किसी-किसी मधु में मधुशर्करा का अंश नीचे इकट्ठा हो जाता है। उसमें चीनी के सदृश कण दिखलायी देते हैं। यह स्थिति मधु में दो या तीन मास के बाद देखी जाती है और मधु का तरल भाग ऊपर तैरता रहता है, यह भी शर्कराभेद ही है। यही कारण है कि प्राचीन संहिताकारों ने मधुशर्करा के गुण-धर्मों का वर्णन किया है। देखें—सू. सू. ४५।१६६। कुछ पर्वतीय प्रदेशों में मधु को जमा देने के लिए शुद्ध घी का जामन डाल देते हैं। इससे मधु जम जाता है, उसे बर्फी की भाँति काटकर मेहमानों ( महामान्यों ) का स्वागत किया जाता है।

शर्करेशुविकाराणां फाणितं च वरावरे।

इतीशुवर्गः।

शर्करा की उत्तमता—ईध के रस से बनने वाले सभी पदार्थों में शर्करा तथा मिथी सर्वश्रेष्ठ होती है। फाणित ( राब ) अधम होती है।

वक्तव्य—‘यासशर्करा’—जवासा नामक पौधा से जो गोंद निकलती है, उसी को यासशर्करा अथवा यवासशर्करा कहते हैं। देखें—सू. सू. ४५।१६७। यह औषध व्यवसाइयों की दूकान में माना या मना नाम से मिलती है। यह राजाओं एवं श्रीमानों के योग्य विरचन है, यूनानी वैद्यक में प्रसिद्ध तुरअवनी भी यही है। इसे चासनी बनाकर बर्फी की भाँति जमा लिया जाता है, एक टुकड़ा बर्फी पानी के साथ लें, मुँह भी मीठा और पेट भी साफ।

अथ मधुवर्गः

चक्षुष्यं छेदि तुर्यलेम्विषहिध्माघ्रपितन्तु॥५१॥

मेहकुष्ठकृमिच्छर्दिषासकासतिसारजित्। ब्रणशोधनसन्धानरोपणं वातलं मधु॥५२॥

रूक्षं कषायमधुरं, तत्तुल्या मधुशर्करा।

मधु का वर्णन—मधु ( शहद ) नेत्रों के लिए हितकारक होता है, यह लेखन होने के कारण कफ को निकाल देता है; प्यास, कफदोष, विषविकार, हिवका ( हिवकी ), रक्तपित्त, प्रमेह, कुष्ठ, क्रिमि, छर्दि, श्वास, कास तथा अतिसार रोग को नष्ट करता है। यह ब्रणशोधक, ब्रणसन्धान तथा ब्रणरोपण करता है। यह वातदोषकारक है, रूक्ष, कषाय एवं मधुर गुणवाला है। इसी के समान गुणों वाली ‘मधुशर्करा’ भी होती है॥५१-५२॥

वक्तव्य—सुश्रुत के अनुसार मधु आठ प्रकार का होता है—१. पौस्तिक, २. ग्रामर, ३. शौद्र, ४. माशिक, ५. छात्र, ६. आर्य्य, ७. औद्गालक तथा ८. दाल। हमने मधुशर्करा का वर्णन ऊपर श्लोक ५० के वक्तव्य में कर दिया है, क्योंकि उक्त श्लोक का विषय था ‘सर्वशर्करा’ वर्णन।

उष्णमुष्णार्तमुष्णं च युक्तं चोष्णैर्निहन्ति तत्॥५३॥

उष्णमधुत्वेन का निषेध—उष्ण मधु का सेवन उष्ण ( घूष, घाम या अग्नि ) से सन्तप्त मानव को उष्णकाल ( गर्मी के दिनों ) में उष्ण जल आदि के साथ खाने-पीने या चाटने के लिए नहीं देना चाहिए, क्योंकि ऐसा करने से हानि होती है॥५३॥

प्रच्छदने निरुहे च मधूष्णं न निवार्यते। अलब्धपाकमाश्वेव तयोर्यस्मान्निवर्तते॥५४॥

इति मधुवर्गः।

संशोधन में मधु-प्रयोग—वमन के लिए तथा निरुहणबस्ति में प्रयुक्त उष्ण मधु अथवा द्रव पदार्थ के साथ मिला हुआ मधु हानिकारक नहीं होता, क्योंकि वमन, निरुहण में प्रयुक्त उष्ण मधु शरीर में बिना पचे ही शीघ्र बाहर लौट ( निकल ) जाता है॥५४॥