भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

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ब्रह्मविविज्ञानाध्यायः ५ ]

सूत्रस्थानम्

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अथ तैलवर्गः

तैलं स्वयोनितवत्स मुख्यं तीक्ष्णं व्यवयति च । त्वदोषकुदचक्षुष्यं सूक्ष्मोष्णं कफकुत्र च ॥ ५५ ॥ कुशानां बृहणायालं स्थूलानां कर्शनाय च । बद्धविट्कं कुमिर्णं च संस्कारात्सर्वरोगजित् ॥ ५६ ॥ सामान्य तैल का वर्णन—सभी तेल अपने-अपने उत्पत्तिकारणों के समान गुण-धर्म वाले होते हैं। मन्त्र तेलों में 'तिलतैल' मुख्य होता है, क्योंकि तैल शब्द की निष्पत्ति ही तिल शब्द से होती है। यथा 'तिलोदश्च तैलम्' । तिलतैल—तीक्ष्ण ( मन्त्र से विपरीत ), व्यवयी ( शीघ्र फैलने वाला ), त्वदोषनाशक ( दोषं कुन्तीति दोषकृत ), नेत्रों के लिए हानिकारक, सूक्ष्म तथा उष्ण होता है। यह स्निग्ध होने पर भी कफकारक नहीं होता, कुश पुरुषों को पुष्ट करने में समर्थ है, अतएव वह बृहण-कार्य भी करता है। स्थूलों को कुश करता है, पुरीष को बांधता है, कुमिनाशक है और संस्कार करने से वात आदि दोषों को नष्ट करता है ॥ ५५-५६ ॥

वक्तव्य—'कुशानां बृहणायाऽलम्'—यह तिलतैल जो दुबले हैं, उन्हें पुष्ट करने में समर्थ है और 'स्थूलानां कर्शनाय च'—स्थूल पुरुषों को कुश भी करता है। ये गुण इसके परस्पर विरुद्ध हैं ? इसका समाधान—यह तैल कुश पुरुष के संकुचित हुए श्रोतों में जाकर व्यवयि गुण के कारण उनमें प्रवेश कर उन श्रोतों को रस आदि धातुओं को वहन करने की शक्ति देकर उनका बृहण करता है और यह वातदोष तथा कफदोष का क्षय करके स्थूल पुरुषों को कुश करता है। यथा—'तैलं वातश्लेष्मप्रशमनानाम्' । ( च.सू. २५।४० )

सतिक्तोषणमैरण्डं तैलं स्वादुं सरं गृह । वर्धमगुल्मानिलकफातुरं विषमज्वरम् ॥ ५७ ॥ एकशोफौ च कटीगृह्यकोष्ठपुष्ठाश्रयो जयेत् । तीक्ष्णोष्णं पिच्छिलं विस्त्रं, रक्तैरण्डोद्भवं त्वति ॥ एरण्डतैल के गुण—यह कुछ तिक्त एवं कुछ कटु तथा मधुर रस वाला, विरेचक और पचने में भारी होता है। यह अण्डवृद्धि, गुल्मरोग, वातरोग, कफरोग, उदररोग एवं विषमज्वर का विनाश करता है। कमर, गृह्यप्रदेश, समस्त कोष्ठ के अवयवों, पीठ की पीड़ा तथा सूजन को जीत लेता है।

लाल एरण्ड का तैल—यह तीक्ष्ण, उष्ण, पिच्छिल एवं अप्रिय गन्ध वाला होता है ॥ ५७-५८ ॥ वक्तव्य—कटिशूल में इसकी शीघ्र गुणकारिता को देखकर कहा गया है—'आमवातगजेन्द्रस्य कटीविपिनचारिणः । एक एव निहन्ताऽसौ एरण्डतैलकेशरी' ॥ अर्थात् आमवातरोग रूपी कमररूपी वन में घूमने वाले हाथी को मारने वाला यह एरण्डतैल रूपी सिंह अकेला काफी है और इसका प्रयोग विरेचन के लिए किया जाता है। इसका प्रयोग करने के लिए ऋतु एवं देश-काल का विचार कर लेना चाहिए। पूर्ण अवस्था वालों को २ या ४ तोले की मात्रा में इसे दूध में मिलाकर देना चाहिए। बच्चों की नाभि के चारों ओर इसे गुनगुना कर मालिश कर देने से भी वही लाभ होता है।

कटूष्णं सार्षपं तीक्ष्णं कफशुक्रानिलापहम् । लघुं पिप्ताम्रकृतं कोठकुष्ठाशोत्रिणजन्तुजित् ॥ ५९ ॥ सरसों का तैल—सरसों का तैल कटु, उष्ण, तीक्ष्ण होता है। यह कफ, शुक्र तथा वात दोषनाशक है, लघु है, पिप्त एवं रक्तवर्धक है, कोठ ( जुलपिती या पिप्त उभड़ना ), कुष्ठरोग, अशोरोग, ब्रण तथा क्रिमियों को नष्ट करता है ॥ ५९ ॥

वक्तव्य—सरसों वर्ण से दो प्रकार की होती है—१. लाल तथा २. पीली। इनमें लाल सामान्य है। इसका तैल निकाला जाता है। पीली सरसों पूजा-पाठ आदि शुभकृत्यों में सर्वत्र प्रयोग में लायी जाती है। पीली सरसों का प्रयोग कृत्या ( मारण, मोहन, वशीकरण, उन्चाटन ) आदि में भी होता है। पुनः यह दो प्रकार की होती है—१. मीठी तथा २. कड़वी। मीठी सरसों का शाक पर्वतीय क्षेत्रों तथा पञ्जाब आदि में बड़े चाव से खाया जाता है। कड़वी सरसों को राई या लाई भी कहा जाता है। अलमोड़ा, नैनीताल आदि क्षेत्रों में इसे बादशाहलाई भी कहते हैं। इसके पत्ते दो-चार इंच चौड़े होते हैं, इनका शाक भी अत्यन्त रुचिकर होता है। इसका तैल झालदार होता है, नासिका तथा त्वचा पर लगाने से चुनचुनाता है। साहित्य-दर्पणकार ने 'तरुणं सर्पपशकं' को ग्रामीणों का भोजन कहा है। यह नागरिकों को मिलता भी कहाँ है ?