अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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अष्टाङ्गहृदये
आसं स्वादु हिमं केश्यं गुरु पित्तानिलापहम्।
बहेड़े की गिरी का तेल—बहेड़ा का तेल स्वादु (मधुर), शीतल, बालों के लिए हितकर, पचने में भारी, पित्त तथा वात विकारों का शमन करता है।
नात्युष्णं निम्बजं तित्तं कृमिकुष्ठकफप्रणुत् ॥ ६० ॥
नीम की गिरी का तेल—निंबोलियों से निकाला गया तेल अधिक उष्णवीर्य वाला नहीं होता, स्वाद में तित्त होता है। यह क्रिमियों, कुष्ठरोगों तथा कफज रोगों का नाश करता है ॥ ६० ॥
उमाकुसुम्भजं चोष्णं त्वदोषकफपित्तकृत।
अतसी एवं कुसुम्भ तेल—अतसी (अलसी या तीसी) तथा कुसुम्भ (बर्) के तेल उष्णवीर्य होते हैं; त्वका के विकारों, कफदोष तथा पित्तदोष को बढ़ाते हैं।
बक्तव्य—स्थावर तेलों की संख्या अनन्त हो सकती है। फिर भी कुछ तेल ऐसे हैं जो मिलते हैं, जिनकी आवश्यकता पड़ती रहती है; उनका परिगणन मात्र हम यहाँ कर रहे हैं—१. मूलक (मूली के बीजों का) तेल, २. दन्ती (जमालगोटा) का तेल, ३. इंगुदी (हिंगत) के बीजों का तेल, ४. सरसों का तेल, ५. राई का तेल, ६. करञ्ज (डिठेरी) का तेल, ७. नीम का तेल, ८. सहजन के बीजों का तेल, ९. सुवर्चला (हुलहुल) के बीजों का तेल, १०. पीलू के बीजों का तेल, ११. नीप (कदम्ब) के बीजों का तेल, १२. शक्तिनी वृक्ष के बीजों का तेल (च.क. १११२० में देखें), १३. तुवरक (चालमोगरा) का तेल (देखें—सु.चि. १३१२०-२६), १४. बारुक्कर (भिलावा) का तेल, १५. बिभीतक (बहेड़ा की गिरी) का तेल, १६. अतिमुक्तक (माधवीलता के बीजों) का तेल, १७. अशोट (अखरोट की गिरी) का तेल, १८. नारिकेल की गिरी का तेल, १९. मधुकबीजों का तेल, २०. त्रपुष (खीरा) के बीजों का तेल, २१. कूष्माण्ड-बीजतेल, २२. श्लेष्मातक (लिमोड़ा) के बीजों का तेल, २३. राजादन (चिरौजी) का तेल, २४. अगुलसारतेल, २५. सरल (चीड़) सार का तेल (गन्धविरोजा), २६. देवदास्सार (तारपीन) का तेल, २७. शिशिपा (सार) का तेल, २८. श्रीपर्णी (गम्भारी) के बीजों का तेल, २९. किशुक (पलाश) के बीजों का तेल, ३०. खर्बूजा के बीजों का तेल, ३१. बादाम का तेल तथा अन्य अनेक तेल।
वसा मज्जा च वातन्ती बलपित्तकफप्रदी ॥ ६१ ॥
मांसानुगस्वरूपी च, विद्यान्मोदोऽपि ताविव।
इति तैलवर्गः।
प्राणिज स्नेह—स्थावर-स्नेहों का वर्णन करने के बाद अब यहाँ से जंगम-स्नेहों का वर्णन किया जा रहा है। वसा तथा मज्जा नामक स्नेहों की प्राप्ति प्राणियों से की जाती है। ये दोनों स्नेह वातनाशक, बल, पित्त, कफ को बढ़ाते हैं। ये मांस के समान गुण वाले हैं। भेदोद्घातु के गुण भी वसा-मज्जा के समान होते हैं ॥ ६१ ॥
बक्तव्य—द्विन्चर्या-प्रकरण में उद्घर्तन का महत्त्व निर्दिष्ट है, उसी से सम्बन्धित विषय यहाँ भी दिया गया है—‘तैलप्रयोगादजरा निर्विकारा जितश्चमाः। आसन्नतिबला युद्धे दैत्याधिपतयः पुरा’ ॥ (अ.सं.सू. ६।१०१) स्थावर-जंगम स्नेहों के सम्बन्ध में विशेष देखें—च.सू. १३; सु.सू. ४५ तथा सु.चि. ३१।
अथ मन्त्रावर्गः
दीपनं रोचनं मद्यं तीक्ष्णोष्णं तुष्टिपुष्टिदम् ॥ ६२ ॥
सस्वादुतिकटुककमलपाकरसं सरम्। सकपायं स्वरारोग्यप्रतिभावर्णकूललघु ॥ ६३ ॥
नष्टनिद्राऽतिनिद्रेभ्यो हितं पितामहदूषणम्। कृशस्थूलह्रितं हृषं सूक्ष्मं द्रोतोविशोधनम् ॥ ६४ ॥
वातन्म्लेष्महरं युक्त्या पीतं विषवदयथा।