भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

पृष्ठ 111, कुल 387 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 111

ब्रह्मवैज्ञानीयाध्यायः ५ ]

सूत्रस्थानम्

७५

शतपर्वक आदि ईखों के गुण—शतपर्वक ईख ( अनेक पोरों वाला ) कान्त्तर, नैपाल, आदि शब्द से दीर्घपत्र आदि भेदों को समझना चाहिए। उक्त ईखों के रस वंशिक नामक ईख के रस से उत्तरोत्तर हीन गुण वाले होते हैं। यथा—क्रमशः कुछ खारे, कुछ कसैले, कुछ उष्ण और कुछ विदाहकारक होते हैं ॥ ४६ ॥

बक्तव्य—आज जहाँ ईख की प्राचीन जातियों का ह्रास हो रहा है, वहीं कृषि सम्बन्धी वैज्ञानिक अनुसन्धानों द्वारा नयी-नयी ईख की जातियों का आविष्कार भी हो रहा है। आज के नये उर्वरकों द्वारा उनकी उपज में बढ़ोत्तरी देखी जाती है, किन्तु स्वाद-गुण में प्राचीन जातियों की तुलना में ये कहीं स्थिर नहीं हैं, ऐसा बुद्धिजीवियों का मानना है। ये सब गुणानुरूप कार्य हैं।

फाणितं गुर्वभिष्यन्दि चयकृन्मूत्रशोधनम्।

फाणित के गुण—फाणित गुरु, अभिष्यन्दी, दोषों का संचय करने वाला किन्तु मूत्र का शोधन करने वाला होता है अर्थात् इसका सेवन करने से मूत्र खुलकर निकल आता है।

नातिस्त्वेष्वकरो धीतः सूष्ट्यमूत्रशकदुगुडः ॥ ४७ ॥

प्रभूतकृमिमज्जासुइमेदोमांसकफोऽपरः ।

गुड के गुण—१. ईख के रस को स्वच्छ करके बनाया गया प्रथम श्रेणी का गुड अधिक कफकारक नहीं होता तथा यह मूत्र एवं पुरीष का प्रवर्तक होता है। २. ईख के रस को पकाते समय उसकी मील को निकाले बिना जो गुड बनाया जाता है, वह उक्त प्रथम गुड से दूसरी श्रेणी का होता है। उसके गुण—इसके सेवन से पेट में पर्याप्त क्रिमियों की उत्पत्ति होती है, यह मज्जा, मेदस्, मांस तथा कफदोष को बढ़ाता है ॥ ४७ ॥

हृद्यः पुराणः पथ्यश्च, नवः स्त्वेष्मायिसादकृत ॥ ४८ ॥

पुराने-नये गुड के गुण—पुराना गुड हृदय के लिए हितकारक तथा पथ्य होता है और नया गुड कफदोष को बढ़ाने वाला एवं जठराग्नि को मन्द कर देता है ॥ ४८ ॥

वृष्याः क्षीणक्षतहिता रक्तपितानिलापहाः। मत्स्यण्डिकाखण्डसिताः क्रमेण गुणवत्तमाः ॥ ४९ ॥

मत्स्यण्डिका आदि के गुण—मत्स्यण्डिका ( राब ), खण्ड ( खाँड़ ) तथा सिता या सितोपला ( मिश्री ) ये उत्तरोत्तर गुणवान् होते हैं अर्थात् मत्स्यण्डिका से खण्ड, इससे सिता अधिक गुणवाली होती है। इनके गुण—ये सभी वृष्य, क्षत ( उःक्षत ) तथा क्षीण पुरुषों के लिए हितकर होते हैं और रक्तपित्त एवं वातदोष नाशक हैं ॥ ४९ ॥

बक्तव्य—ईख के रस को भलीभाँति पकाते-पकाते जब वह पत्थर की भाँति कड़ा हो जाता है, तो उसे 'गुड' कहते हैं, किन्तु उसी गुड को गौड ( बंगाल का पुराना नाम ) देशवासी मत्स्यण्डी कहते हैं। यथा—'इक्षो रसो यः सम्पन्नो जायते लोछवद् घनः। स गुडो, गौडदेशे तु मत्स्यण्डयेव गुडो मतः' ॥

तद्वृणा तित्तमधुरा कषाया यासशर्करा।

यासशर्करा या यवासशर्करा—इसे 'जवासा' की खाँड़ या चीनी कहते हैं। यह भी ईख की चीनी के समान गुणों वाली होती है। यह कुछ तित्त, मधुर तथा कषाय रस वाली होती है।

दाहतुदच्छर्दिमूर्च्छासूकपित्तज्यः सर्वशर्कराः ॥ ५० ॥

सभी प्रकार की शर्कराओं के गुण—दाह ( जलन ), प्यास, वमन, मूर्च्छा ( बेहोशी ) तथा रक्तपित्त का शमन करती हैं, अतः इन्हें उत्तम कहा गया है ॥ ५० ॥

बक्तव्य—ईख के अतिरिक्त अन्य पदार्थों से भी शर्करा का निर्माण किया जाता है। जैसे—ताड़ का गुड, ताड़ की चीनी, खजूर की चीनी, दाख ( मुनबका ) की चीनी तथा अन्य मधुर फलरसों से बनायी गयी चीनी, मधुशर्करा आदि।