अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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अष्टाङ्गहृदये
बक्तव्य—'नानौषधिभृतं जगति किञ्चिद् विद्यते'। चरक के इस वचन के अनुसार सभी पदार्थ चिकित्सोपयोगी हैं, अतएव उन सबका अपने-अपने स्थान पर महत्त्व होता ही है। यहाँ तो गाय और भेड़ के दूध, दही, घी की परस्पर तुलना की चर्चा मात्र है।
अथेशुवर्गः
इक्षो रसो गुरुः स्निग्धो बृंहणः कफमूत्रकृत् ॥४२॥
वृष्यः शीतोऽघ्नपित्तजः स्वादुपाकरसः सरः।
ईख के रस का वर्णन—ईख का रस सामान्य रूप से गुरु, स्निग्ध, बृंहण (पुष्टिकारक), कफ तथा मूत्र को बढ़ाने वाला होता है। यह वृष्य (वीर्यवर्धक), शीतल, रक्तपित्तनाशक, रस एवं पाक में मधुर तथा सर (मलभेदक) होता है ॥४२॥
बक्तव्य—शास्त्रान्तरों में ईख के भेद—आज चल रही विकास की आँधी में इनकी कुछ ही जातियों के नाम सुनायी देते हैं, हो सकता है कि आगे ये बचे-खुचे नाम भी उड़ जायेंगे; तथापि इनका उल्लेख यहाँ कर दिया जा रहा है! १. पौडूक (पौड़ा), २. भीरूक, ३. वंशक, ४. शतपोरक (सौ गाँठों वाला), ५. कान्त्तर, ६. तापसेधु (जंगलों में होने वाली ईख), ७. कण्डेशु, ८. सूचिपत्रक (जिसके पत्ते सुई की भाँति चुभते हों या नाम-विशेष), ९. नेपाल (नेपाल देश में होने वाला), १०. दीर्घपत्र (नाम-विशेष, जैसे तो सभी ईखों के पत्ते लम्बे होते हैं), ११. नीलपोर (जिसकी गाँठों में नीली आभा हो), १२. कोशकृत् तथा १३. मनोगुप्ता—ये तेरह जातियाँ ईख की कही गयी हैं, इसी को 'ऊख' भी कहा जाता है। अंग्रेजी में इसे 'सुगर केन' कहते हैं। संस्कृत में इसका एक नाम 'गुडमूल' है अर्थात् ईख सभी प्रकार की मिठाइयों की जड़ है। आगे चलकर बाल, तरण, वृद्ध भेद से भी इसके गुणों का वर्णन किया गया है।
ईख के रस से निर्मित पदार्थ—१. फाणित (राब), २. मत्स्यण्डी (मछली के अण्डों के सदृश) या खण्डराब, ३. गुड, ४. खण्ड (खाँड़), ५. शर्करा (चीनी), ६. पुष्पसिता या सितोपला (फूलमिश्री)। इनके गुण चरक, सुश्रुत आदि में देखें।
सोऽग्रे सलवणो, दन्तपीडितः शर्करासमः ॥४३॥
अगले भाग का रस—ईख के प्रारम्भिक एक-दो पोरों का रस कुछ नमकीन जैसा होता है। मध्य भाग का दौतों से चूसा हुआ रस चीनी के समान मधुर एवं गुणकारक होता है ॥४३॥
मूलाग्रजन्तुजगधादिपीडनात्मलसङ्घ्रातु। किञ्चित्कालं विधृत्या च विकृतिं याति यान्निकः ॥
विदाही गुरुविष्टम्भी तेनासौ—
यान्निक रस के भेद—यन्त्र-विशेष में दबाकर निकाला हुआ ईख का रस—जड़ का भाग, अगला भाग तथा कीड़े आदि द्वारा खाया गया भाग सब एक साथ निचोड़ा जाता है। उसमें मैल का भी मिश्रण हो जाता है और वह कुछ समय तक उसी प्रकार पड़ा रह जाता है, तो वह रस विकृत (विकारयुक्त) हो जाता है। अतः वह विदाहक, गुरुपाकी तथा विष्टम्भी हो जाता है ॥४४॥
—तत्र पौण्ड्रकः। शैत्यप्रसादमाधुर्यैर्वस्तमनु वांशिकः ॥४५॥
ईख के भेद तथा गुण—ईख की अनेक जातियाँ होती हैं, उनमें पौण्ड्रक नामक ईख जो देखने में मोटी, चबाने में कोमल होती है, उसका रस शीतल, स्वच्छ एवं मधुर होने के कारण सबमें श्रेष्ठ होता है। इससे गुणों में कुछ कम 'वांशिक' नामक ईख होती है ॥४५॥
बक्तव्य—श्रीहेमाद्रि ने 'वांशिक' नामक ईख का पर्याय 'नीलेषु' दिया है। यह पौण्ड्रक जैसी मोटी तो होती है, किन्तु उससे कठोर होती है।
शतपर्वकान्तरनैपालाद्यास्ततः क्रमात्। सक्षाराः सकषायान्श्च सोष्णाः किञ्चिद्विदाहितः ॥