भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

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ब्रह्मवैवर्तमानीयाध्यायः ५ ]

सूत्रस्थानम्

७३

शस्तं धीस्मृतिमेधाग्रिबलायुःशुक्रचक्षुषाम् । बालवृद्धप्रजाकान्तिसीकुमार्यस्वराथिनाम् ॥ ३७ ॥ क्षतक्षीणपरीसर्पशस्त्राग्रिलपितात्मनाम् । वातपित्तविषोन्मादशोषालक्ष्मीज्वरापहम् ॥ ३८ ॥ स्नेहानामृतत्वं शीतं वयसः स्थापनं परम् । सहस्रवीर्यं विधिभिर्घृतं कर्मसहस्रकृतम् ॥ ३९ ॥

घृत के गुण—बुद्धि, स्मृति (स्मरणशक्ति), मेधा (धारणाशक्ति वाली बुद्धि), जठराग्नि, शारीरिक बल, दीर्घायु (आयुर्वे घृतम्), शुक्र तथा दृष्टि के लिए उत्तम है; बालकों तथा वृद्धों के लिए श्रेष्ठ है। प्रजा (सन्तान), कान्ति, सुकुमारता तथा सुरीला या तेज स्वर चाहने वालों के लिए उत्तम है। क्षत, क्षीण (क्षयपीडित), विसर्परीगो, शस्त्रहत, अग्रिदाह से पीड़ित रोगियों के लिए हितकर है। वातविकार, पित्तविकार, विषविकार, उन्माद, शोष (राजयक्ष्मा), अलक्ष्मी (निर्धनता या कुरूपता) तथा ज्वर का नाश करता है। यह समस्त स्नेहद्रव्यों में श्रेष्ठ है, शीतवीर्य है, जीवन को स्थिर रखने वाले द्रव्यों में भी सर्वश्रेष्ठ है। शास्त्रोक्त विधियों से पकाकर रखा गया घी हजारों शक्तियों से पूर्ण होता है, अतएव युक्तियुक्त इसका प्रयोग करने पर यह हजारों चिकित्सोपयोगी कर्मों को करता है ॥ ३७-३९ ॥

मदापस्मारमूर्च्छाविशिरःकर्णाक्षियोजिनाम् । पुराणं जयति व्याधीन् ब्रणशोघनरोपणम् ॥ ४० ॥

पुराने घी के प्रयोग—मदपानजनित मदात्यय आदि विकारों में, अपस्मार, मूर्च्छा, सिर, कान तथा कनि (गर्भाशय, भ्रग) के रोगों का विनाश करता है। यह ब्रणों का शोधन एवं रोपण करता है ॥ ४० ॥

वक्तव्य—पुराने घी का व्यावहारिक परिचय सु.सू. ४५।१०७-१०९ से प्राप्त होगा। शास्त्रकारों ने काल की अवधि के अनुसार इसके नामभेद किये हैं। यथा—१. पुराणघृत, २. कुम्भसर्पि तथा ३. महाघृत। इनका प्रयोग उक्त सूत्रत-सन्दर्भ के अनुसार करें। इसके भी कुछ अवात्सर भेद किये गये हैं। यथा—१ वर्ष पुराना, १० वर्ष पुराना, १५ वर्ष से अधिक पुराना अथवा १०० वर्ष या १११ वर्ष पुराना घृत 'पुराणघृत' वा 'कुम्भसर्पि' कहा जाता है। इससे भी अधिक पुराने घी को 'महाघृत' कहा जाता है। यह घी केवल औषधोपयोगी रह जाता है। घी जितना पुराना होगा उसका वर्ण मोमियों हो जाता है। तब इसमें विशेष प्रकार की गन्ध आने लगती है। इस घी का प्रयोग—सन्निपातज्वर में सिर के ऊपर ब्रह्मरन्ध के स्थान पर रखते हैं। श्वासरोग में इसे छाती, पसलियों तथा गले में लगाते (मलते) हैं। इसका संग्रह पहले श्रीमानों के घरों में, प्राचीन परम्परा के वैद्यों तथा हकीमों के चिकित्सालयों में होता था। यह चिकित्सा के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण माना जाता था।

बल्याः किलाटपीयूषकूर्चिकामोरणादयः । शुक्रनिद्राकफकरा विष्टम्भिगुरुदोषलाः ॥ ४१ ॥

किलाट आदि का वर्णन—दूध से बनाये गये किलाट, पीयूष, कूर्चिका, मोरण या मोरट आदि ज्वर से क्षीरशाक एवं तर्कपिण्ड का ग्रहण किया जाता है। ये सब बल, शुक्र, निद्रा तथा कफदोष को बढ़ाते हैं। ये विष्टम्भी, गुरु तथा दोषकारक होते हैं ॥ ४१ ॥

वक्तव्य—किलाट आदि का परिचय—इनके सम्बन्ध में हम इसी अध्याय में ३३-३४ श्लोकों के नीचे कह चुके हैं। मोरण या मोरट—पकते हुए दूध को नीबू के रस या फिटिकरी डालकर फाड़ लिया जाता है। जलीय भाग को मोरण या मोरट जेज्जट ने सूक्ष्म के ४५वें अध्याय में यथास्थान कहा है। उसके बाद भाग को छेना कहते हैं। पीयूष—अन्त्य इसका अर्थ 'अमृत' है। नवप्रसूता गाय या भैंस के एक सप्ताह तक के दूध को पकाया जाता है, पकाते ही वह फटकर गाढ़ा हो जाता है, इसे पीयूष कहा जाता है। यह अत्यन्त गरिष्ठ होता है। ५-७ दिन के बाद यह दूध शुद्ध हो जाता है।

गव्ये क्षीरघृते श्रेष्ठे निन्दिते चाविसम्भवे ।

इति क्षीरवर्गः ।

उत्तम-अधम विचार—इस प्रकरण में कहे गये दूध तथा घी में गाय का दूध और गाय का घी का उत्तम होता है और भेड़ का दूध एवं घी निन्दिता होता है।