भारतकोश
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अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

५२

अष्टाङ्गहृदय

वातादि दोषों की वय-प्रकोप-प्रशम तालिका

दोषवातपित्तकफ
संचयग्रीष्म ऋतु
मेष, वृष
वैशाख, ज्येष्ठ
मध्याह्नकालवर्षा ऋतु
सिंह, कन्या
भाद्रपद, आश्विन
दिन का चौथा पहरहेमन्त ऋतु
धनु, मकर
पौष, माघ
उषःकाल
प्रकोपप्रावृद् ऋतु
मिथुन, कर्क
आषाढ़, श्रावण
अपराह्नकालशरद् ऋतु
तुला, वृश्चिक
कार्तिक, मार्गशीर्ष
अर्धरात्रिकालवसन्त ऋतु
कुम्भ, मीन
फाल्गुन, चैत्र
पूर्वाह्नकाल
प्रशमशरद् ऋतु
तुला, वृश्चिक
कार्तिक, मार्गशीर्ष
अर्धरात्रिकालवसन्त ऋतु
कुम्भ, मीन
फाल्गुन, चैत्र
पूर्वाह्नकालप्रावृद् ऋतु
मिथुन, कर्क
आषाढ़, श्रावण
अपराह्नकाल

नित्यं सर्वसाभ्यासः स्वसाधिक्यमृतावृती ॥ ५७ ॥

रससेवन-निर्देश—सभी ऋतुओं में प्रतिदिन सभी (छहों) रसों का सेवन करना चाहिए तथा जिस-जिस ऋतु में जिन-जिन रसों के सेवन का विशेष निर्देश दिया गया है, उस-उस ऋतु में उस-उस रस का अधिक सेवन करना चाहिए ॥ ५७ ॥

वक्तव्य—ऊपर जो वाग्भट ने ‘नित्यं सर्वसाभ्यासः’ कहा है, इसका समर्थन महर्षि चरक इस प्रकार कर रहे हैं—‘सर्वसाभ्यासो बलकराणाम्’ तथा ‘एकरसाभ्यासो दीर्बल्यकराणाम्’ ( च.सू. २/५४० ) अर्थात् मधुर आदि छहों रसों का प्रतिदिन सेवन करने से देह तथा इन्द्रियों का बल बढ़ता है, इसके विपरीत आचरण करने से बलहानि होती है। आज की भाषा में ये सभी रस विटामिनों से भरपूर हैं और इनसे शरीर के उन आवश्यक तत्त्वों की पूर्ति होती है, जिनकी प्रतिदिन शरीर को आवश्यकता पड़ती रहती है।

क्रत्वोरन्यवादिसप्ताहवृत्तुसन्धिरिति स्मृतः । तत्र पूर्वो विधिस्त्याज्यः सेवनीयोऽपरः क्रमात् ॥

असात्म्यजा हि रोगाः स्युः सहसा त्यागशीलनात् ।

इति श्रीवैद्यपतिसिंहगुप्तसूतृश्रीमद्वाग्भटविरचितायामष्टाङ्गहृदयसंहितायां

प्रथमे सूत्रस्थाने ऋतुचर्या नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥

— ✻ ✻ ✻ —

ऋतुसन्धि में कर्तव्य—दो ऋतु के जोड़ को ऋतुसन्धि कहते हैं। प्रथम ऋतु का अन्तिम सप्ताह और आने वाली ऋतु का प्रथम सप्ताह अर्थात् यह पन्द्रह दिन का समय ऋतुसन्धि है। इसमें क्रमशः पहले ऋतु की चर्या को छोड़ते हुए अगले ऋतु की चर्या का अभ्यास करना प्रारम्भ कर देना चाहिए। यदि आप पहली ऋतुचर्या को सहसा छोड़कर दूसरी ऋतुचर्या को सहसा प्रारम्भ कर देंगे तो इस व्यतिक्रम से असात्म्यजनित रोग हो सकते हैं ॥ ५८ ॥

ऋतुचर्याध्यायः ३ ]

सूत्रस्थानम्

५३

वक्तव्य —शारीरिक सन्धियों की भाँति ऋतुसन्धियों का भी ध्यान रखना पड़ता है। महाकवि भारवि ने भी कहा है—‘सहसा विदधीत न क्रियाम्’ (किरात) आप नियमानुसार दो महीनों से जिस ऋतु के अनुसार जिन खान-पानों का सेवन करते आ रहे हैं, यदि एकाएक उसे छोड़कर आप दूसरे खान-पानों का सेवन कर देंगे तो वे खान-पान आपको सात्त्व्य (अनुकूल) नहीं होंगे। अतः प्रथम ऋतु के अन्तिम सप्ताह में पहले क्रम को छोड़ना हुआ आने वाली ऋतु के प्रथम सप्ताह तक अगली खान-पानविधि को व्यवस्थित कर लेना चाहिए। इसी प्रकार वक्तों के परिवर्तन पर भी ऋतुसन्धियों में ध्यान दें।

सात्त्व्य —‘उपशय’ अथवा ‘सात्त्व्य’ ये परस्पर पर्यायवाची शब्द हैं। जो आहार-विहार, वेश-भूषा, देश जिस पुरुष को अनुकूल हो, वह उसके लिए सात्त्व्य कहा जाता है। महर्षि चरक ने सात्त्व्य का परिचय इस प्रकार दिया है—‘सात्त्व्यं नाम’...‘सात्त्व्यम्’। (च.वि. १।२०) अर्थात् सात्त्व्य वह है जो अपने सर्वथा अनुकूल हो, इसी को ‘उपशय’ कहते हैं। वह प्रवर, अवर, मध्य भेद से तीन प्रकार का होता है। वह पुनः विधि-भेद से सात प्रकार का होता है। जैसे—मधुर आदि रसों के भेद से छः प्रकार का और सभी रसों के योग से एक प्रकार का। इनमें सब रसों का सेवन ‘प्रवरसात्त्व्य’ है। केवल किसी एक रस का सेवन ‘अवरसात्त्व्य’ है। प्रवर तथा अवर के बीच वाले रस को ‘मध्यसात्त्व्य’ कहते हैं। इन अवर तथा मध्य सात्त्व्य को छोड़कर क्रमशः प्रवरसात्त्व्य का सेवन करे।

अन्ध्र चरक ने ‘सात्त्व्य’ की परिभाषा इस प्रकार दी है—‘सात्त्व्यं नाम’...‘भवन्ति’। (च.वि. ८।१८) अर्थात् ‘सात्त्व्य’ वह तत्त्व है जिसका लगातार सेवन करने से लाभ प्राप्त होता है। उसमें जो घी, दूध, तैल, मांस तथा मांसरस का सेवन करते हैं और सभी रसों के सेवन करने का जिन्हें अभ्यास है वे बलवान्, कष्टों को सहन करने की शक्ति वाले तथा दीर्घायु होते हैं और जो किसी एक रस का सेवन करते हैं, वे प्रायः थोड़े बलवाले, कष्टों को न सहने वाले, अल्पायु एवं निर्धन होते हैं। चरक ने एक ‘ओकसात्त्व्य’ की भी चर्चा की है। देखें—च.सू. ६।४५ में। यहाँ ‘ओक’ शब्द का अर्थ ‘गंगाधर’ के अनुसार औचित्य है, शेष इसका अर्थ ‘घर रूपी शरीर’ करते हैं।

ऊपर जो मास-ऋतु-अयन के रूप में कालविभाजन किया गया है, उस परिधि के अनुसार शीत, उष्ण तथा वर्षाकाल के स्वरूप में अन्तर आ सकता है। अतः चिकित्सा के क्षेत्र में यह अन्तर घातक हो सकता है। इसलिए जब शीत प्रारम्भ हो जाय तब हेमन्त-शिशिर की चर्या करनी चाहिए। इसी प्रकार गर्मी-बरसात के मौसमों के सम्बन्ध में भी समझें। जब सौरमास के अनुसार किसी ऋतु के लक्षण सम्पूर्ण रूप से परिलक्षित नहीं होते अथवा कम-ज्यादा दिखलाई दें, तो ये अशुभ लक्षण कहे जाते हैं। इससे जल, देश एवं काल में विकृति उत्पन्न हो जाती है; जिससे कोई-न-कोई रोग फैलने लगता है, जिसे सुश्रुत के शब्दों में ‘मरक’ कहते हैं। देखें—सु.सू. ६।१७ तथा च.वि. ३।१-२३ तक में जनपदोद्भवस का वर्णन।

इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी द्वारा विरचित निर्मला हिन्दी व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से विभूषित अष्टाङ्गहृदय-सूत्रस्थान में ऋतुचर्या नामक तीसरा अध्याय समाप्त ॥ ३॥


चतुर्थोऽध्यायः

अथातो रोगानुत्पादनीयाध्यायं व्याख्यास्यामः ।

इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षयः ।

अब यहाँ से रोगानुत्पादनीय नामक अध्याय की व्याख्या करेंगे। इस विषय में आत्रेय आदि महर्षियों ने इस प्रकार कहा था।

उपक्रम —जिस प्रकार का आचरण (आहार-विहार आदि) करने से रोगों की उत्पत्ति न हो अथवा जिस अध्याय में कहे जाने वाला विषय रोगों की उत्पत्ति को रोकने के लिए हितकारक हो, उसका नाम है—‘रोगानुत्पादनीय’ अध्याय। चरक में उक्त आशय से कहे गये अध्याय का नाम है—‘नवेगान्धारणीय’। (च.सू. ७) इस विषय को श्रीवाग्भट ने इस प्रकार कहा है—‘न वेगितोऽन्यकार्यः स्यात्प्राजित्वा साध्यमामयम्’। (अ.हू.सू. २।१९) अर्थात् मल-मूत्र आदि के वेग के उत्पन्न हो जाने पर दूसरा कोई कार्य न करे, सबसे पहले उस उत्पन्न वेग का परित्याग करे आदि। सुश्रुत ने अपानवायु, मल-मूत्र, जुम्भा, अश्व, छींक, उद्वार (डकार), वमन, इन्द्रिय (शुक्र) के तथा भूख, प्यास, श्वास एवं निद्रा के वेगों को रोकने से उदावर्त (गैस्ट्रिक/Gastric) रोग हो जाता है, ऐसा कहा है। देखें—सू.उ. ५।४-५।

संक्षिप्त सन्दर्भ-संकेत —च.सू. ७; च.वि. २६; सू.उ. ५५ तथा अ.सं.सू. ५ में देखें।

वेगान्न धारयेद्वातविष्मूत्रक्षवतूदक्षुधाम्। निद्राकासश्रमश्वासजुम्भाश्रुच्छदिरितसाम्॥ १॥

वेगों को न रोकने का निर्देश —अपानवायु, मल-मूत्र, छींक, प्यास, भूख, निद्रा, कास, श्रमजनित श्वास, जुम्भा (जैभाई), आँसू, छर्दि (वमन) तथा शुक्र के वेगों को नहीं रोकना चाहिए॥ १॥

वक्तव्य —इसी विषय को सुश्रुत ने भी उत्तरतन्त्र ५५।४-५ में कहा है। वास्तव में तेजी से जिसका प्रवाह हो उसे वेग कहते हैं। जैसे नदी के वेग को रोकने पर पानी उछल कर ऊपर की ओर को जाने लगता है, ठीक उसी प्रकार इन वेगों की भी स्थिति होती है; फलतः ‘उदावर्त’ रोग की उत्पत्ति हो जाती है। उदावर्त का अर्थ होता है—उल्टा घुमाव। जो वेग जिधर से निकलना चाहता है अथवा जो वेग जिस मार्ग से निकलता है, उधर रूकावट कर देने से वह उसके विपरीत किसी अन्य मार्ग से निकल जाता ही है। यदि किसी कारण नहीं निकल सका तो उससे अनेक प्रकार की हानियाँ हो सकती हैं, अतएव कहा गया है—‘वेगान्न न धारयेत्’।

अधोवातस्य रोधेन गुल्मोदावर्तरुक्कलमाः। वातमूत्रशकृतस्त्रङ्गदुष्टग्रिष्वधहृद्भवाः॥ २॥

अपानवायु के रोकने से हानि —इसके वेग को रोकने से गुल्म, उदावर्त, उदरशूल तथा क्लम (मुस्ती)—ये रोग हो सकते हैं। अपानवायु, मूत्र तथा पुरीष की प्रवृत्ति में रूकावट आ सकती है। नेत्ररोग, अप्रिषद (मन्दाग्नि) एवं हृद्वरोग (हृदय का जकड़ जाना) हो सकता है॥ २॥

वक्तव्य —कुछ संस्करणों में उक्त श्लोक के बाद एक पद्य और इस प्रकार का देखा जाता है—‘स्नेहस्वेदविधितस्तत्र वर्तयो भोजनानि च। पानानि बस्तयश्चैव शस्तं वातानुलोमनम्’॥ अर्थ स्पष्ट है। यही चिकित्सा-विषय अगले पद्यों में भी प्राप्त है। अतएव ऐसा लगता है कि निर्णयसागरीय इस प्रति में उक्त श्लोक को स्थान नहीं दिया होगा। आगे देखें इसी प्रकरण के श्लोक ६-७।

शकृतः पिण्डिकोद्वेषप्रतिशयायशिरोरुजः। ऊर्ध्ववायुः परीकतौ हृदयस्योपरोधनम्॥ ३॥

मुखेन विदुप्रवृत्तिश्च पूर्वोक्तश्चामयाः स्मृताः।

वैद्यानुसादनीयाध्यायः ४ ]

सूत्रस्थानम्

५५

मलवैगरोधज रोग—पुरीष के वेग को रोकने से पिण्डलियों में ऐंठन, प्रतिश्याय, सिर में पीड़ा का होना, उद्वार ( डकारों का आना), परिकर्त्तिका ( गुदबलियों में कैंची से काटने की-सी पीड़ा ), हृदय की गति में रुकावट का आना तथा मुख से मल का निकलना आदि लक्षण होते हैं और ऊपर श्लोक दो में कहे गये रोग भी हो जाते हैं॥३॥

अङ्गभङ्गाश्वमरीबस्तिमेद्वृद्ध्युणवेदनाः ॥४॥

मूत्रस्य रोधात्पूर्व च प्रायो रोगः—

मूत्रवैगरोधज रोग—मूत्र के वेग को रोकने से अंग-अंग में टूटने की-सी पीड़ा, अश्वमरी ( पथरी ) रोग का होना, मूत्राशय में, मूत्रमार्ग में, वंशणों ( कूल्हों ) में, मूत्रवह घ्रोतस् में, गवीनियों एवं वृक्कों ( गुर्दों ) में पीड़ा का होना तथा अपानवायु एवं पुरीष के वेग को रोकने से पैदा होने वाले रोगों की भी उत्पत्ति हो सकती है॥४॥

—तदौषधम् । वर्त्यभ्यङ्गावगाहश्व स्वेदनं बस्तिकर्म च ॥५॥

उक्त रोगों की चिकित्सा—पुरीष के वेग को रोकने के कारण पैदा हुए रोगों में उनकी चिकित्सा का निर्देश किया जा रहा है—गुदमार्ग में मलप्रवर्तिनी वर्त्ति का प्रयोग करें, उदर के ऊपर अश्व्यंग ( उबटन ) कराये, द्रोणी अवगाहन करें या कराये और स्वेदन तथा बस्तिकर्म कराये॥५॥

अन्नपानं च विङ्गभेदि विङ्गरोधोत्थेषु यक्षमसु ।

चिकित्सा-भेद—मल के वेग को रोकने से उत्पन्न रोगों में जिनसे मल स्वयं निकले, ऐसे भक्ष्य तथा पेय पदार्थ दें।

मूत्रजेषु तु पाने च प्राग्भक्तं शस्यते घृतम् ॥६॥

जीर्णास्तिक्तं चोत्तमया मात्रया योजनाद्वयम् । अवपीडकमेतच्च संज्ञितं—

मूत्रवैगरोधज रोग-चिकित्सा—मूत्र के वेग को रोकने से उत्पन्न रोगों में 'अवपीडक घृत' का सेवन करें अर्थात् भोजन करने के पहले और भोजन के पच जाने पर उत्तम मात्रा में घृतपान करें। इस प्रकार दो बार सेवन किये गये घृतपान को 'अवपीडक' कहते हैं॥६॥

—धारणात्पुनः ॥७॥

उद्गारस्यारुचिः कम्पो विबन्धो हृदयरसोः । आध्मानकासहिध्म्याश्च हिध्मावत्तत्र भेषजम् ॥८॥

उद्वारवैगरोधज रोग-चिकित्सा—उद्वार ( डकार ) के वेग को रोकने के कारण अरुचि ( भोजन के प्रति इच्छा का न होना ), शरीर में कैषकपी का होना, हृदय एवं फुफ्फुस की गति में रुकावट, अफरा, कास तथा हिनका ( हिनकी ) की उत्पत्ति हो सकती है। इस स्थिति में हिनकारोग के समान इनकी चिकित्सा करनी चाहिए॥७-८॥

वक्तव्य—पाठक ध्यान दें, इस अध्याय के प्रथम श्लोक में 'किन-किन वेगों को नहीं रोकना चाहिए' का जो निर्देश किया है, उसमें 'उद्वार वेग' की चर्चा नहीं की गयी है, किन्तु चिकित्सा में उसका उल्लेख किया है। इसके विपरीत महर्षि पुनर्वसु ने अपनी संहिता में उद्वार के वेग को न रोकने की भी चर्चा की है और आगे चलकर चिकित्सा-निर्देश भी किया है। देखें—च.सु. ७।४ और च.सु. ७।१८। महर्षि वामभट ने चिकित्सासूत्र की तो प्रायः भाषा भी वैसी ही प्रयुक्त की है। उपर्युक्त अन्य रोगों की जो चिकित्सा ऊपर कही गयी है, उसके अतिरिक्त भी शास्त्रोक्त तथा समयोचित चिकित्सा पर भी चिकित्सक को ध्यान देना चाहिए।

शिरोऽतीन्द्रियदीर्बल्यमन्यास्तम्भादितं क्षुतेः ।

५६

अष्टाङ्गहृदय

छींक के वेग को रोकने से हानि—छींक के वेग को रोकने के कारण सिर में पीड़ा, कान आदि ज्ञानेन्द्रियों में दुर्बलता, मन्थास्तम्भ, अर्दित (मुखप्रदेश का लकवा)—ये विकार उत्पन्न हो जाते हैं।

तीक्ष्णधूमाज्जनाघ्राणनावर्नाकविलोकनैः ॥ ९ ॥

प्रवर्तयेत्सुर्ति सक्तां स्नेहस्वेदी च शीलयेत्।

छिक्कावेगनिरोधज् रोग-चिकित्सा—छींक के वेग को रोकने से उत्पन्न हुए रोगों की चिकित्सा तीक्ष्ण द्रव्यों के धूम्रपान से, तीक्ष्ण द्रव्यों द्वारा बनाये गये अंजन से, तीक्ष्ण द्रव्यों की नस्य से, सूर्य की ओर देखने से पुनः छींक के आ जाने से, स्नेहन तथा स्वेदन से करें ॥ १० ॥

शोषाङ्गसादबाधिर्यसम्मोहभ्रमहृदवाः ॥ १० ॥

तृष्णायाम् निग्रहात्तत्र शीतः सर्वो विधिर्हितः।

तृषावेगनिरोधज् रोग-चिकित्सा—तृष्णा (प्यास) के वेग को रोकने से अर्थात् जब प्यास लगे उस समय पानी न पीने से या पानी न मिल पाने से, मुखशोष (मुख का सूखना), शरीर में शिथिलता, बधिरता, मोह (बेहोशी), भ्रम (चक्करों का आना) तथा हृदयरोग की उत्पत्ति हो सकती है।

चिकित्सा—इस स्थिति में सभी प्रकार के आहार-विहार तथा औषध में शीतचिकित्सा करनी चाहिए ॥ १० ॥

वक्तव्य—‘शीतः सर्वो विधिः हितः’—यहाँ यह चिकित्सासूत्र हमारा ध्यान इस ओर आकृष्ट कर रहा है—‘स्वयोनिवर्धन’ (सु.सू. १५।२१-३०) अर्थात् तृष्णानिरोध से जलधातु की शरीर में कमी हुई और शीतल उपचार करने से उसकी पूर्ति होगी। अतः शीतल जल की कमी से होने वाले रोगों की चिकित्सा ‘स्वयोनिवर्धन’ ही होगी।

अङ्गभङ्गारुचिग्लानिकाशर्यशूलभ्रमाः क्षुधः ॥ ११ ॥

तत्र योज्यं लघु स्निग्धमुष्णमल्पं च भोजनम्।

क्षुधावेगनिरोधज् रोग-चिकित्सा—भूख के वेग को रोकने अर्थात् भूख लगने पर भोजन करने अथवा न मिल पाने से शरीर में टूटने की-सी पीड़ा, अरुचि (फिर खाने की इच्छा का न होना अथवा स्वाद न लगना), ग्लानि (हर्षक्षय), कुशाता का अनुभव होना, शूल तथा चक्कर-सा आना—ये लक्षण होते हैं।

चिकित्सा—इस स्थिति में हल्का स्निग्ध (घृतयुक्त या छाँका हुआ आदि), गरम थोड़ा रुचिकर भोजन देना चाहिए ॥ ११ ॥

निद्राया मोहमूर्धाक्षिगौरवालस्यजुम्भिकाः ॥ १२ ॥

अङ्गमर्दश्च, तत्रेष्टः स्वप्नः संवाहनानि च।

निद्रावेगनिरोधज् रोग—निद्रा के वेग को रोकने के कारण मोह (बेहोशी), सिर तथा आँखों में भारीपन, आलस्य, जुम्भा (जँभाई) तथा अंगों में मसल देने की-सी पीड़ा होती है।

चिकित्सा—इस प्रकार के रोगों को भरपूर सोने दे और नींद आने के पहले तक उसके हाथ-पैर तथा सिर को दबाना चाहिए, जिसे ‘चम्पी’ कहते हैं ॥ १२ ॥

वक्तव्य—नींद के वेग को रोकना या भरपूर निद्रा में किसी को जगाना—दोनों ही कार्य अनुचित हैं। इसके पूर्वपक्ष को आयुर्वेदीय दृष्टि से कह दिया है, अब उत्तरपक्ष के बारे में नीतिज् बाणक्य का दृष्टिकोण प्रस्तुत है। यह भी स्वस्थ रहने की दृष्टि से अनुकरणीय है। ये सात यदि सोये भी हों तो इन्हें समय पर अवश्य जगा देना चाहिए—

योगानुत्पादनीयाध्यायः ४ ]

सूत्रस्थानम्

५७

‘विद्यार्थी सेवकः पात्न्यः क्षुधातीर्तो भयकातरः । भाण्डारी प्रतिहारो च सप्त सुप्तान् प्रबोधयेत्’ ॥ (चा.नीति. १।६)

इन सातों को सोये में कभी नहीं जगाना चाहिए—

‘अहिं नृपञ्च शार्दूलं किटिञ्च बालकं तथा । परश्वानञ्च मूर्खञ्च सप्त सुप्तान् न बोधयेत्’ ॥ (चा.नीति. १।७)

कासस्य रोधातद्वृद्धिः श्वासारुचिहृदयमायाः ॥ १३ ॥

शोषो हिध्मा च, कार्याञ्च कासहा सुतरां विधिः ।

कासवेगनिरोधज रोग-चिकित्सा—कास के वेग को रोकने से कासरोग की वृद्धि, श्वासरोग, अरुचि, हृद्वरोग, शोष (राजयध्मा), हिध्मा (हिक) आदि रोगों की उत्पत्ति हो सकती है।

चिकित्सा—इसमें कासरोगनाशक चिकित्सा-विधि का प्रयोग करना चाहिए ॥ १३ ॥

गुल्महृद्वोगसम्मोहाः श्रमश्वासाद्विधरितात् ॥ १४ ॥

हितं विश्रमणं तत्र वातघ्नश्च क्रियाक्रमः ।

श्रमश्वासवेगनिरोधज रोग-चिकित्सा—श्रम के कारण उत्पन्न बढ़ी हुई श्वास की गति के वेग को रोकने से गुल्मरोग, हृदय सम्बन्धी रोग तथा मूच्छारोग हो जाते हैं।

चिकित्सा—इस कारण से उत्पन्न उक्त रोगों में विश्राम करना चाहिए तथा वातनाशक अभ्यंग आदि उपचार करने चाहिए ॥ १४ ॥

वक्तव्य—श्वास शब्द का प्रयोग श्वास प्रश्वास नामक साधारण दैनिक क्रम वाले श्वासरोग में तथा श्रमज श्वास में प्रयुक्त होता है। श्रमजनित श्वास के वेग को रोकने का यहाँ निषेध किया है। योग के आठ अंगों में से एक ‘प्राणायाम’ है। इस विधि द्वारा श्वास-प्रश्वास की गति का नियमन करना तो उत्तम कार्य है।

जुम्भायाः क्षववद्रोगाः, सर्वश्वानिलजिह्विभिः ॥ १५ ॥

जुम्भा वेगनिरोधज रोग-चिकित्सा—जैभाई के वेग को रोकने के कारण वे सब रोग हो सकते हैं, जिनका वर्णन इसी अध्याय के नौवें श्लोक के पूर्वार्द्ध में किया गया है। (यथा—सिर में पीड़ा, कान आदि ज्ञानेन्द्रियों में कमजोरी, मन्यास्तम्भ, अर्दित रोग।)

चिकित्सा—इन सभी रोगों की वातनाशक चिकित्सा करनी चाहिए ॥ १५ ॥

पीनसाक्षिशिरोहृद्दृहमन्यास्तम्भारुचिश्चमाः। सगुल्मा बाष्पतस्तत्र स्वप्नो मद्यं प्रियाः कथाः ॥

अश्ववेगनिरोधज रोग-चिकित्सा—औसुओं के वेग को रोकने के कारण पीनस (प्रतिशय), नेत्ररोग, शिरोरोग, हृदयरोग, मन्यास्तम्भ, अरुचि, चक्करों का आना तथा गुल्मरोग की उत्पत्ति हो जाती है।

चिकित्सा—उक्त रोग या रोगों के हो जाने पर शयन करना, मद्य (आसव, अरिष्ट, सीधु या ब्राणडी) आदि का सेवन, मनोहर कथाएँ सुनाना तथा समझाने-बुझाने वाली बातें हितकर होती हैं ॥ १६ ॥

वक्तव्य—औसुओं का वेग मित्र से मिलन या बिछोहे के समय अथवा पति-पत्नी, पुत्र आदि की मृत्यु हो जाने पर होता है। ऐसे अवसरों पर अश्वप्रवाह हो जाना अच्छा होता है, इससे अश्वनिरोधज रोग नहीं होते। ऐसी स्थिति में मित्रमण्डली के आश्रवासनपूर्ण कथा-वार्ता तथा पौराणिक कथाएँ भी सान्त्वना देती हैं।

विसर्पकोठकुष्ठाशिकण्डूपाण्डुवामयज्वराः। सकासश्वासहृत्लासच्चन्द्रश्चययवो वमेः ॥ १७ ॥

५८

अष्टाङ्गहृदये

छर्दिवेगनिरोधज रोग—छर्दि के वेग को रोकने के कारण विसर्परोग, कोठ ( चकते पड़ जाना ), कुष्ठरोग, नेत्ररोग, कण्डू ( खुजली ), पाण्डुरोग, ज्वर, काम, श्वास, जो मिचलाना, व्यंग तथा शोथरोग हो जाते हैं ॥ १७ ॥

गण्डूषधूमानाहारा रूक्षं भुक्त्वा तदुदमः । व्यायामः सूतिरसस्य शस्तं चात्र विरेचनम् ॥ १८ ॥ सकारलवणं तैलमभ्यङ्गार्थं च स्यस्ते ।

छर्दिवेगनिरोधज रोग-चिकित्सा—छर्दि के वेग को रोकने के कारण उत्पन्न रोगों की चिकित्सा—गण्डूषधारण, धूमपान, उपवास, रूक्ष अन्नों का सेवन, भोजन करके तत्काल वमन करा देना, व्यायाम करना, विसर्प आदि में रक्तप्रावण कराये, विरेचन कराये तथा क्षार एवं नमक युक्त तेल की मालिश कराये ॥ १८ ॥

शुक्रातत्त्ववर्णं गुह्यवेदान्श्रययुज्वराः ॥ १९ ॥

हृदयथामृत्रसङ्गाङ्गभङ्गवृद्धश्मषण्डताः ।

शुक्र के वेग को रोकने के कारण उत्पन्न रोग—मूत्र के साथ शुक्र का निकलना, गुह्य अंग ( लिंग, भग आदि ) में पीड़ा, शोथ ( सूजन हो जाना ), ज्वर, हृदय में पीड़ा, मूत्र की प्रवृत्ति में रुकावट, अंगों में टूटने की-सी पीड़ा का होना अथवा अंगइड़यों का आना, अण्डवृद्धि, अश्मरी तथा नपुंसकता—ये रोग हो जाते हैं ॥ १९ ॥

वक्तव्य—शुक्रनिरोधज रोगों में 'ज्वर' का भी उल्लेख किया है। आप ध्यान दें—कामज्वर के लक्षणों पर और इस बात को भी न भूलें कि शुक्र नर-नारी दोनों में होता है। देखें—'यदा नायवृषेयातां वृषस्यन्त्यौ कथञ्चन । मूत्रचतः शुक्रमन्त्योऽयमनस्यिस्तत्र जायते' ॥ ( मु.शा. २।४७ ) अतः शुक्रनिरोधज रोग नर-नारी दोनों में होते हैं।

ताम्रचूडसुराशालिबस्त्यभ्यङ्गावगाहनम् ॥ २० ॥

बस्तिशुद्धिकरैः सिद्धं भजेत्सौरं प्रियाः स्त्रियः ।

शुक्र के वेग को रोकने के कारण उत्पन्न रोगों की चिकित्सा—मूर्गा का मांस, सुरा ( उत्तम कोटि का मद्य ), शालिधान्य, उत्तरबस्ति, अभ्यंग ( मालिश ), अवगाहन ( द्रोणीअवगाहन ), बस्तिशोधक अर्थात् मूत्रप्रवर्तक गोखरू आदि से पकाये गये दूध का तथा प्रिय स्त्रियों का सेवन करें ॥ २० ॥

वक्तव्य—'प्रियाः स्त्रियः' शब्द के प्रयोग से ऐसा लगता है कि शुक्र धातु केवल पुरुषों में होता है, स्त्रियों में नहीं। यदि ऐसा स्वीकार कर लेंगे तो ऊपर के वक्तव्य में कहा गया सुश्रुत का वाक्य अमान्य हो जायेगा। अतः वारम्भट के वाक्य को समर्थन देने हुए कहा जा रहा है—'प्राधान्येन व्यपदेशा भवन्ति' । इस दृष्टि से पुरुष को स्त्री की और स्त्री को पुरुष की आवश्यकता होती ही है। क्योंकि 'कामकौतुक' युगल ( मिथुन ) का धर्म है। अथवा कहिए—मिथुन ( जोड़े ) का धर्म ही मैथुन है। अतएव महर्षि चरक ने 'प्रियाः स्त्रियः' वाक्य का प्रयोग न करके कहा है—'शस्तं मैथुनमेव च' । ( च.सू. ७।११० )

तुदशूलात् त्यजेत् क्षीणं विड्वमं वेगरोधिनम् ॥ २१ ॥

वेगरोधी के असाध्य लक्षण—जो वेगों को रोकने से रोगी हो गया हो, यदि वह प्यास एवं शूल से पीड़ित हो, क्षीण ( कुश ) हो गया हो तथा पुरीष का वमन कर रहा हो तो उसकी चिकित्सा न करे, वह असाध्य होता है ॥ २१ ॥

रोगाः सर्वेऽपि जायन्ते वेगोदीरणधारणेः ।

ब्रायु ( अपानवायु ), मल-मूत्र आदि के उत्पन्न न हुए वेगों को प्रयत्नपूर्वक उभाड़ देने से और स्वभावतः उत्पन्न इनके वेगों के धारण करने ( रोक देने ) से ( इनसे सम्बन्धित रोग जो इस प्रकरण में श्रीवाग्भट ने कहे हैं तथा इससे पहले के तन्त्रकारों ने कहे हैं ) वे सभी रोग हो जाते हैं।

जैगानुत्पादनीयाध्यायः ४ ]

सूत्रस्थानम्

५९

निर्दिष्टं साधनं तत्र भूयिष्ठं ये तु तान् प्रति ॥ २२ ॥

तत्श्रानेकधा प्रायः पवनो यत्प्रकृष्यति। अन्नपानीयधं तस्य युज्जीतातोऽनुलोमनम् ॥ २३ ॥

सामान्य चिकित्सा—वैगों को रोकने के कारण जो रोग होते हैं, उनकी चिकित्सा का वर्णन इसी प्रकार में ऊपर कर दिया गया है। ऊपर कहे गये कारणों से जो वातदोष का अनेक प्रकार से प्रकोप हो जाता है, उसकी शान्ति के लिए सामान्य रूप से उन-उन वैगों के जो अनुलोमक अन्न (आहार), पान (पेयपदार्थ) तथा औषध हैं, उन-उन का प्रयोग करना चाहिए ॥ २२-२३ ॥

वक्तव्य—इस प्रकार में वैगों को रोकने के कारण उत्पन्न होने वाले रोगों की चिकित्सा ही प्रधान रूप से कही गयी है, किन्तु २२वें श्लोक के पूर्वार्ध में 'वैगोदीरण' शब्द का भी प्रयोग हुआ है, जो वैगधारण से भिन्न क्रिया है। इस उदीरण क्रिया में वायु की प्रधानता रहती है, अतः इसमें वायु का अनुलोमन करना ही प्रधान चिकित्सा है, जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है।

धारयेतु सदा वैगान् हितैषी प्रेत्य चेह च। लोभेभ्यश्चिद्विषमात्सर्परागादीनां जितेन्द्रियः ॥ २४ ॥

धारणीय वैग—इस लोक में तथा परलोक में अपना भला चाहने वाला पुरुष (नर-नारी) लोभ, ईर्ष्या, द्वेष, मत्सरता तथा राग-द्वेष आदि के वैगों को रोकने का सदा प्रयत्न करता रहे और सदा अपनी इन्द्रियों पर विजय प्राप्त करता रहे ॥ २४ ॥

वक्तव्य—'लोभ'—इसका मिथ्यायोग हानिकारक होता है, क्योंकि 'लाभात् लोभः प्रवर्तते' अर्थात् जब लाभ होने लगता है तो लोभ की प्रवृत्ति बढ़ती जाती है। ईर्ष्या—डाह, जलन, दूसरे की सफलता को देखकर होने वाली एक मनःप्रवृत्ति, इसीलिए कहा गया है—'हेती ईर्षुः फले अनौर्षुः'। 'मत्सरता'—दूसरों को दुःखी देखकर प्रसन्न होना। राग—विषयों में मन की आसक्ति। द्वेष—दूसरों को हानि पहुँचाने का प्रयत्न करना।

भगवान् पुनर्वसु ने चरक-सूत्रस्थान ७।२६ से ३० तक कुछ धारणीय वैगों की परम उपयोगी चर्चा की है, इस प्रसंग में उनका भी अवलोकन अपेक्षित है। चरकोक्त कतिपय धारणीय वैग—मन के वैग—लोभ, शोक, भय, क्रोध, अभिमान, निर्लज्जता, ईर्ष्या, राग, अभिध्या (मन से दूसरे के साथ द्रोह करने की इच्छा करना)। वाणी के वैग—कठोर वचन, आवश्यकता से अधिक बोलना, चुगुलखोरी करना, झूठ बोलना, असामयिक बातें कहना। शरीर के वैग—दूसरों को मारना-पीटना, लूटना, किसी प्रकार का बलात्कार करना, चोरी करना, डाका डालना, लाठी-सोटा चलाना तथा लड़ाई करना। मनुष्य यदि विवेक-बुद्धि से काम ले तो इन कुकर्मों से वह बच सकता है, फलतः समाज में आदर पा सकता है। यही लक्ष्य है धारणीय वैगों को रोकने का। ऐसा करने से मनुष्य धर्म, अर्थ, काम इस त्रिवर्ग का संचय और भोग भी कर सकता है।

यतेत च यथाकालं मलानां शोधनं प्रति। अत्यर्थसञ्चिततास्ते हि क्रूढाः स्युर्जीवितच्छिदवः ॥ २५ ॥

शोधन की आवश्यकता—वात, पित्त, कफ इन तीनों दोषों तथा पुरोष आदि शारीरिक मलों का उचित समय पर संशोधन करने का प्रयत्न करना चाहिए, क्योंकि जब दोष अत्यधिक संचित हो जाते हैं तो वे कुपित होकर जीवन का विनाश कर सकते हैं ॥ २५ ॥

दोषाः कदाचित्कृष्यन्ति जिता लङ्घनपाचनैः। ये तु संशोधनैः शुद्धा न तेषां पुनरुद्भवः ॥ २६ ॥

संशोधन-कर्म की प्रशंसा—लंघन एवं पाचन क्रियाओं (उपचारों) से शान्त किये गये दोष समय पाकर कभी पुनः कुपित हो सकते हैं, किन्तु जो वमन, विरेचन आदि संशोधन-प्रकारों से शुद्ध कर दिये जाते हैं, उनका पुनः प्रकोप नहीं होता ॥ २६ ॥

वक्तव्य—वामट का यह उपर्युक्त छबीसवर्षों पद्य अविकल च.सु. १६।२० से लिया गया है। सचमुच यह पद्य सिद्धान्तों की दृष्टि से छोड़ने योग्य है भी नहीं। आयुर्वेदशास्त्र में शमन तथा संशोधन चिकित्सा की दो विधियाँ हैं। उनमें समय पर किया गया संशोधन-उपचार अधिक उपादेय होता है। अतः संचयकाल

६०

अष्टाङ्गहृदये

में ही बदे हुए दोषों का अपहरण कर देने से पुनः जब उस दोष के प्रकोप का निश्चित समय होता है, उस समय प्रकोप नहीं हो पायेगा। यदि आप उन दोषों का शमन, लघन, पाचन आदि उपायों से किये रहेंगे तो वे दोष अपने समय पर प्रकृपित हो जायेंगे, यही निष्कर्ष उक्त श्लोक का है।

यथाक्रमं यथायोगमत ऊर्ध्वं प्रयोजयेत्। रसायनानि सिद्धानि वृष्ययोगांश्च कालवित् ॥ २७ ॥

रसायन, बाजीकरण योगों का प्रयोग—कालवित् ( ऋतु सम्बन्धी ज्ञान को रखने वाला ) चिकित्सक संशोधन कराने के बाद विधिपूर्वक तथा क्रमशः सिद्ध ( शास्त्रोक्त ) रसायनों एवं वृष्य ( वीर्यवर्धक ) योगों का भी प्रयोग करायें ॥ २७ ॥

वक्तव्य—रसायन एवं बाजीकरण सम्बन्धी सिद्ध प्रयोगों का सेवन शरीर का संशोधन कराने के बाद ही करें। क्योंकि स्वच्छ एवं साफ वस्त्र पर रंग का प्रभाव जितना अच्छा होता है, उतना मैले वस्त्र पर नहीं होता। अतएव रसायन एवं वृष्य योगों के प्रयोग करने से पहले संशोधन अवश्य करा लें। ऊपर 'कालवित्' चिकित्सक का विशेषण दिया गया है, इसके साथ त्रिविध देश, शारीरिक तथा मानसिक बल, प्रकृति, आहार एवं सात्व्य का भी ध्यान देना आवश्यक है।

रसायन—चरक-चिकित्सास्थान अध्याय १ के प्रथम चार पादों में विविध प्रकार के रसायनों का उल्लेख हुआ है, प्रयोग कराने के पूर्व उन्हें देखें। रसायन-परिभाषा—जिसके विधिवत् सेवन करने से उत्तम रस-रक्त आदि धातुओं की प्राप्ति हो, उस विधि का नाम 'रसायन' है। ये बहुमूल्य होते हैं, इनका सेवन सर्वसाधारण पुरुष नहीं कर सकता। हमारे महर्षि अत्यन्त दयालु थे, अतः उन्होंने सर्वसाधारण के लिए 'आचाररसायन' का उपदेश किया है। देखें—च.चि. १।४३०-३४। इसका प्रयोग कोई भी मनस्वी पुरुष कर सकता है। यह व्ययसाध्य नहीं है, इसका प्रयोग शिवसंकल्प के साथ ही करना चाहिए।

वृष्य या बाजीकरण—इसका भी वर्णन चरक-चिकित्सास्थान अध्याय २ के चार पादों में किया गया है। इसका प्रयोग वीर्य को बढ़ाकर उसे सुपुष्ट करने के लिए तथा रतिशक्ति को बढ़ाने के लिए किया जाता है। इसका फल है—उत्तम किंवा सर्वगुणसम्पन्न सन्तान की प्राप्ति। इसका सेवन दुराचार में प्रवृत्त होने की इच्छा से कभी न करें। रसायन तथा बाजीकरण की विशेष जानकारी के लिए आप क्रमशः अ.हृ.उ.अ. ३९ तथा ४० का अवलोकन करें।

भेषजक्षपिते पथ्यमाहारैर्बृहणं क्रमात्। शालिपष्टिकगोधूममृद्वमांसघृतादिभिः ॥ २८ ॥

हृद्यदीपनभेषज्यसंयोगाद्भुचिपत्तिदैः। साभ्यङ्गद्वोतनस्नाननिरुहन्तेहबत्तिभिः ॥ २९ ॥

शोधनोत्तर चिकित्सा—शोधनकारक चिकित्सा ( वमन-विरचन आदि ) से शरीर के कृश तथा दुर्बल हो जाने पर निम्नलिखित आहारों द्वारा क्रमशः उसके शरीर को पुष्ट करने का प्रयत्न करें—शालिधान्यों, साठीधान्यों, गेहूँ, मूँग, मांस, घी आदि द्वारा निर्मित विविध प्रकार के आहार उसे सेवन करने के लिए दें। वे हृदय को प्रिय लगने वाले अर्थात् रुचिकर हों, अग्निवर्धक हों, औषधद्रव्यों ( धनियाँ, जीरा आदि ) के कारण रुचिकर तथा पाचनशक्ति को बढ़ाने वाले हों। इस प्रकार की आहारविधि के साथ-ही-साथ अभ्यंग ( तिल की खली की या तेल की मालिश ), उद्वर्तन ( विलेपन, घर्षण या मर्दन ), स्नान, निरुहण तथा अनुवासन बस्तियों का प्रयोग करें ॥ २८-२९ ॥

तथा स लभते शर्मं सर्वपावकपाटवम्। धीवर्णैन्द्रियवैमत्यं वृषतां दैर्घ्यमायुषः ॥ ३० ॥

चिकित्सा का फल—इस प्रकार का आहार, अभ्यंग, उबटन आदि करने से उस मनुष्य को सुख मिलने लगता है, सर्वपावकपाटव ( १. पाचक, २. प्राजक, ३. रंजक, ४. आलौचक तथा ५. साधक इन सभी ) में कुशलता आ जाती है। बुद्धि, वर्ण, इन्द्रियों की निर्मलता, वृषता ( रतिशक्ति ) तथा दीर्घ आयु की प्राप्ति हो जाती है ॥ ३० ॥

रोगानुत्पादनीयाध्यायः ४ ]

सूत्रस्थानम्

६१

वक्तव्य —ऊपर के पद्य में 'सर्वपावक' शब्द का प्रयोग है, अतः सुश्रुत-सूत्रस्थान २१।९ में पित्त को ही अग्नि माना है। यथा 'आगमाच्च पश्यामो न खलु पित्तव्यतिरेकादन्योऽस्तिरिति'। अर्थात् पित्त के अतिरिक्त शरीर में दूसरा पदार्थ ऐसा नहीं है, जिसे अग्नि कहा जाय। यह पित्त कार्यभेद से पाँच प्रकार का होता है, अतएव इसके नामों की गणना ऊपर व्याख्या में कर दी है। इसके विशेष विवेचन को आप सु.सू. २१।१० में देख सकते हैं।

ये भूतविषवाव्यभिषिक्तभज्जदिसम्भवाः। रागद्वेषभयाद्याश्च ते सूर्यरागन्तवो गवाः॥ ३१॥

आगन्तुज रोग —भूतावेश, विष ( रथवर, जंगम, गर ) प्रयोग, वायु ( ब्राह्मी अतिशीत अथवा अतिउष्ण ) के स्पर्श, अग्नि द्वारा जलने, क्षत ( घाव लगने ), भंग ( अभिघात, चोट ), श्रम आदि कारणों से अथवा काम, क्रोध, भय, शोक आदि के कारण से जो रोग हो जाते हैं, उन्हें आगन्तुज रोग कहते हैं॥ ३१॥

वक्तव्य —यदि इन आगन्तुज कारणों से ज्वर आदि रोगों की भी उत्पत्ति होगी तो उस ज्वर को भी आगन्तुज ही कहा जायेगा। अन्यथा बात आदि दोषों से उत्पन्न ज्वर आदि रोग निज या शरीर कहे जाते हैं। इस पद्य को च.सू. ७।५१ में भी देख लें।

त्यागः प्रज्ञापराधानामिन्द्रियोपशमः स्मृतिः। देशकालात्मविज्ञानं सदवुत्तस्यानुवर्तनम्॥ ३२॥

अथर्वविहिता शान्तिः प्रतिकूलग्रहार्चनम्। भूताद्यस्पर्शनोपायो निर्दिष्टश्च पृथक् पृथक्॥ ३३॥

अनुत्पत्त्यै समासेन विधिरेषः प्रदर्शितः। निजागन्तुविकाराणाभ्युत्पन्नानां च शान्त्यै॥ ३४॥

निज , आगन्तुज रोगों का निरोध एवं शमन—ऊपर कहे गये निज तथा आगन्तुज रोग उत्पन्न हो न हों और यदि उत्पन्न ( पैदा ) हो गये हों तो उनकी शान्ति के लिए संक्षेप में ये चिकित्सा सम्बन्धी निर्देश दिये गये हैं—प्रज्ञापराधों के परित्याग, श्रोत्र आदि ज्ञानेन्द्रियों को अपने वश में रखना, मेरे रात-दिन कैसे बीत रहे हैं—इस बात का ध्यान रखना; देश, काल, शरीर एवं मन का ठीक-ठीक ज्ञान रखना तथा सदाचार के अनुसार व्यवहार करना। अथर्ववेद में जो शान्ति कही गयी है, उसका प्रयोग करें। वर्तमान में जो प्रतिकूल ग्रह हैं, उनका जप, पूजा-पाठ, होम, बलिदान आदि करें या कराये तथा भूत आदि का स्पर्श न करने का प्रयत्न करें। ये उपाय अलग-अलग कह दिये गये हैं॥ ३२-३४॥

वक्तव्य —'त्यागः'... 'नुवर्तनम्'॥ ( च.सू. ७।५३ ) अविकल संगृहीत है। यहाँ 'स्मृतिः' की व्याख्या चक्रपाणि ने इस प्रकार की है—'पुत्रादीनां विनश्यरत्वस्वभावाद्यनुसारणम्'। इसका समर्थन आगे च.शा. १।१४७ में इस प्रकार दिया है—'स्मृत्वा स्वभावं भावानां स्मरन् दुःखात् प्रमुच्यते'। किन्तु इसके विपरीत शौहमद्रि ने 'नर्तकदिनानि मे यान्तीति'। 'उक्ता स्मृतिः' दोनों ही अर्थ प्रकरणीचित हैं। प्रज्ञापराध—इसकी विस्तृत चर्चा चरकोक्त निम्न स्थलों में देखें—च.सू. ७।५३-५४ तथा च.शा. १।१०२-१०९।

देशकालात्मविज्ञान —त्रिविध देशों में यह कैसा देश है? त्रिविध या षड्विध कालों में से यह कौन-सा काल है? और आत्मविज्ञान—अपनी शारीरिक तथा मानसिक शक्ति कैसी है या किस परिस्थिति में हैं? इन सब विषयों का पूर्णरूप से ज्ञान करना चाहिए। इस विषय की अ.हृ.सू. के दूसरे अध्याय में विस्तार से चर्चा हो चुकी है। इस प्रकार जो मानव अपना जीवन-यापन करता है, उसे किसी प्रकार का रोग होता ही नहीं, यदि उत्पन्न हो भी जाय तो उक्त नियमों का पालन करने से वह रोग शान्त हो जाता है।

आचार्य हेमद्रि अपनी व्याख्या में कहते हैं कि 'अथर्वविहिता शान्तिः' इत्यादि इस एक श्लोक को कुछ विद्वान् यहाँ पढ़ना स्वीकार नहीं करते, तथापि यहाँ दिया गया है। अतः हम यहाँ अथर्ववेद में कही गयी शान्तिविधि का संकेत कर रहे हैं, उसका आप प्रयोग करें। देखें—अथर्ववेद का १९ प्र० ३५ अनु० २५, १०, ११।

शीतोद्भव दोषचयं वसन्ते विशेषोद्यन् ग्रीष्मजमप्रकाले।

घनात्यये वार्षिकमाशु सम्यक् प्रानोति रोगानुतुजात्र जातु॥ ३५॥

६२

अष्टाङ्गहृदय

शोधन-योग्य ऋतुएँ—शीत हेमन्त ऋतु में जिस ( कफ ) दोष का संचय होता है, उसका शोधन वसन्त ऋतु में करना चाहिए। ग्रीष्म में जिस ( वात ) दोष का संचय होता है, उसका शोधन प्रावृट् ऋतु में करना चाहिए और वर्षा ऋतु में जिस ( पित्त ) दोष का संचय होता है, उसका संशोधन शरद् ऋतु में करना चाहिए। ऐसा करता हुआ मानव ( नर-नारी ) कभी भी ऋतुओं के कुप्रभाव से होने वाले रोगों से रोगी नहीं हो पाता ॥ ३५ ॥

बक्तव्य—महर्षि वाग्भट ने दोषप्रकोप तथा उसके संशोधन का जो निर्देश ऊपर दिया है, वह केवल स्वस्थ पुरुष के लिए है अस्वस्थ के लिए नहीं है। संशोधन-विधि का प्रयोग जब भी करना या कराना हो तो वह समशोतोष्ण काल में ही उचित है, उसमें भी चैत्र, श्रावण तथा कार्तिक मासों में अधिक समीचीन होता है। इन विषयों का विस्तृत वर्णन अ.हृ.सू.अ. १३ से २३ तक में किया गया है, जिनकी व्याख्या यथास्थान की जायेगी।

नित्यं हिताहारविहारसेवी समीक्ष्यकारी विषयेष्वसक्तः ।

दाता समः सत्यपरः क्षमावानाप्तोपसेवी च भवत्यरोगः ॥ ३६ ॥

इति श्रीवैद्यपतिसिंहगुप्तसूनुश्रीमद्वाग्भटविरचितायामष्टाङ्गहृदयसंहितायां

प्रथमे सूत्रस्थाने रोगानुत्पादनीयो नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥

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स्वस्थ रहने के उपाय—सदा हितकर आहार-विहार का सेवन करने वाला मानव ( नर-नारी ) किसी भी कार्य को भलीभाँति देखकर करने वाला, नेत्र आदि ज्ञानेन्द्रियों के विषयों में आसक्त न रहने वाला, सदा सत्याओं को दान देने वाला, सभी प्राणियों को अपने समान समझनेवाला, सत्यभाषणशील, क्षमा ( सहन ) करने वाला तथा आपत्तजनों की सेवा करने वाला सदा नीरोग रहता है ॥ ३६ ॥

बक्तव्य—उक्त ३५ तथा ३६ दोनों पद्य चरक से लिये गये हैं। देखें—च.शा. २।४५-४६। 'आप्तोपसेवी'—ये आपत्त क्यों कहे जाते हैं और इनकी सेवा करने से क्या लाभ होते हैं, इन विषयों को जानने के लिए आप प्रस्तुत सन्दर्भों को देखें—च.सू. ११।१८-१९ तथा च.वि. ४।४-१३ तक। इस प्रसंग में एक और पद्य संग्रहणीय, मननीय एवं पठनीय है। उसे हम यहाँ उद्धृत कर रहे हैं—'मतिर्वचः कर्ममुखानुबन्धं सत्त्वं विधेयं विशदा च बुद्धिः। ज्ञानं तपस्तत्परता च योगे यस्यास्ति तं नानुत्पन्ति रोगाः' ॥ ( च.शा. २।४७ ) अर्थात् जिसकी बुद्धि, वाणी तथा कर्म ऐसे हों जिनका फल ( परिणाम ) सुखद हो, जिसका मन अपने वश में हो, जिसके विचार स्वच्छ हों, जो ज्ञानी हो, तपस्वी हो और जिसकी तत्परता योग ( कर्मवीशल ) में हो उसे शारीरिक, मानसिक एवं आगन्तुज रोग कभी पीड़ित नहीं करते। ऐसा मानव सदा सुखी रहता है।

इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी द्वारा विरचित 'निर्मला' हिन्दी व्याख्या, विशेष बक्तव्य आदि से विभूषित अष्टाङ्गहृदय-सूत्रस्थान में रोगानुत्पादनीय नामक चौथा अध्याय समाप्त ॥ ४ ॥

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पञ्चमोऽध्यायः

अथातो द्रवद्रव्यविज्ञानौयमध्यायं व्याख्यास्यामः ।

इति ह स्माहरात्रेयादयो महर्षयः ॥

अब हम इस अध्याय में द्रव ( जलीय ) द्रव्यों का व्याख्यान करेंगे। इस विषय में आत्रेय आदि महर्षियों ने इस प्रकार कहा था।

निरुक्ति— ‘द्रवः’ शब्द की निष्पत्ति ‘द्रू गतौ’ भ्वादिगणीय धातु से ‘करोरप्’ ( अ० ३।३।५७ ) सूत्र से अप्र प्रत्यय जोड़कर हुई है। ‘द्रवणम्’ शब्द की निष्पत्ति उक्त धातु से ‘प्रद्वस्तुसुवः’ सूत्र से ‘घञ्’ प्रत्यय जोड़कर हुई है। इसके प्रद्रवणम्, उद्रवणम्, सद्रवणम्, विद्रवणम् रूप उपसर्ग विशेष के कारण बनते हैं। ‘द्रवः’ प्रदावनर्मणोः। विद्वरे रसगत्योश्च’ इति हैमः। ये सभी प्रयोग प्रसंगोचित हैं। ‘द्रव’ शब्द अनेक अर्थों का वाचक है। जैसे—घोड़े की भाँति दौड़ना, चूना, रिसना, गीला, टपकना आदि।

आधुनिक दृष्टिकोण— आज के विज्ञानविद् जल को तत्त्व न मानकर उसे दो तत्त्वों का मिश्रण मानते हैं। जैसे—‘ऑक्सीजन’ नामक गैस जो एक निश्चित अनुपात में ‘हाइड्रोजन’ से मिलकर पानी बनाती है या पानी के रूप में परिणत हो जाती है। हिन्दी में ‘ऑक्सीजन’ को ‘ओषजन’ और ‘हाइड्रोजन’ को ‘उदजन’ कहते हैं।

इसके विपरीत प्राचीन भारतीय विद्वान् जलतत्त्व के समान सभी पदार्थों को पाश्चभौतिक मानते हैं और उनका सिद्धान्त है कि अग्नितत्त्व से जलतत्त्व की उत्पत्ति हुई है। इतना ही नहीं, वे जल को ‘आप्’ कहते हैं, जिसका अर्थ होता है—सर्वत्र व्याप्त। और भी देखें—भारतीय त्रिकालदर्शी विद्वान् समुद्र में वडवानल नामक अग्नि की सत्ता को स्वीकार करते हैं, जो अग्नि समुद्र को नियमित किये रहती है। देखें—‘समुद्रे बाडवो ज्ञेयः’। उनकी उक्त कल्पनाएँ निराधार नहीं होती थीं। वे देखा करते थे कि जल तथा बर्फ से भी सदा भाप ( वाष्प ) निकलती रहती है, जो यह प्रमाणित करती है कि उस जल या बर्फ में अग्नि की सत्ता विद्यमान है। आज का वैज्ञानिक उसे ‘ओषजन’ तो कह लेता है, पर अग्नितत्त्व नहीं कहता; कहे भी कैसे, उसे भारतीयता से मानसिक द्वेष है।

एक और उदाहरण—आज का वैज्ञानिक अमीबा की खोज को अपनी सम्पत्ति समझता है, किन्तु यह सत्य नहीं है। इसके लिए आप वाजसेनेयि माध्यन्दिनशुक्लयजुर्वेदसंहिता प्रथम अध्याय के प्रथम मन्त्र को देखें—‘इषे त्वोर्जे त्वा’ ‘‘‘पशुर्माहि’। इसमें उस जल की इच्छा की गयी है, जो ‘अनमीबा’ अर्थात् अमीबा नामक कीटाणु से रहित हो या कर दिया गया हो।

जल की अनिवार्यता— पीने योग्य जल प्राणिमात्र का प्राण है, अतएव जल का एक पर्याय ‘जीवन’ भी है। इस समस्त संसार को इसीलिए भगवान् ने जलमय बनाया है। जिस परिस्थिति में जल पीने का अत्यन्त निषेध भी किया गया हो वहाँ पूर्णरूप से जल रोका नहीं जाता। जल को न देने से अथवा इसका सेवन न करने से मुब सूखने लगता है, शरीर ढीला पड़ जाता है अथवा मृत्यु भी हो सकती है। अतएव स्वस्थ अथवा रोगी प्राणी का जीवन-निर्वाह जल के बिना नहीं हो सकता है। ये वृद्धवाग्भट के उद्गार हैं। देखें—अ.सं.सू. ६।३०-३१।

संक्षिप्त सन्दर्भ-संकेत—च.सू. २७।१९६-२१६; सु.सू. ४५।३-४६; अ.सं.सू. ६।३-५१ में देखें।

६४

अष्टाङ्गहृदये

अथ तोयवर्गः

जीवनं तर्पणं हृद्यं द्वादि बुद्धिप्रबोधनम्। तत्त्वव्यक्तृरसं मुष्टं शीतं लघ्वमृतोपसमम् ॥ १ ॥ गङ्गास्नू नभसो भ्रष्टं स्पृष्टं त्वर्कन्दुमारुतैः। हिताहितत्वे तदभूयो देशकालापेक्षते ॥ २ ॥

गंगा का जल—आकाश से गिरा हुआ गंगा का जल जीवन (जीवित रखने वाला), तर्पण (तुष्टिकारक), हृदय के लिए हितकर, आनन्ददायक, बुद्धि को बढ़ाने वाला, तनु (पतला-गन्दगी रहित), अव्यक्त रस (मधुर आदि किसी रस-विशेष की जिसमें अभिव्यक्ति न हो), मुष्ट, शीतल, हलका और अमृत के समान हितकर होता है। यह जल आकाश से गिरने के बाद सूर्य, चन्द्र तथा वायु के स्पर्श से देश एवं काल के प्रभाव से हितकर भी हो सकता है और अहितकर भी हो सकता है। अर्थात् जैसे देश-काल का उसमें प्रभाव पड़ेगा तदनुरूप भला या बुरा हो जाता है ॥ १-२ ॥

बक्तव्य—चरक में इसी के अनुरूप एक पद्य इस प्रकार है—‘शीतं शुचिं शिवं मुष्टं विमलं लघु षड्गुणम्। प्रकृत्या दिव्यमुदकम्’। (च.सू. २७।१९८) यहाँ ‘मुष्टं’ तथा ‘विमलं’ ये दो विशेषण समानार्थक आये थे, अतः ‘मुष्टं’ का अर्थ स्वादु किया गया था, किन्तु यहाँ ऐसी स्थिति नहीं है। ‘मुष्ट’ शब्द ‘मृजु शुद्धो’ धातु से ‘क्त’ प्रत्यय के योग से निष्पन्न हुआ है। अतः यहाँ इसका अर्थ ‘शुद्ध’ या ‘स्वच्छ’ होगा।

येनाभिवृष्टममलं शाल्यत्रं राजते स्थितम्। अक्लिन्नमविवर्णं च तत्पेयं गाङ्गम्—

गंगाजल का परिचय—जिस जल के बरसते समय घर के भीतर चाँदी के पात्र में परोसा हुआ शालिचाबलों का भात निर्मल बना रहे, वह क्लेदयुक्त न हो अर्थात् पसीजने न लगे और उसका वर्ण विकारयुक्त न हो जाय, वह गंगा का जल होता है, इसे पीना चाहिए।

—अन्यथा ॥ ३ ॥

सामुद्रं, तन्न पातव्यं मासादाश्वयुजाहिना।

सामुद्र जल—उक्त गंगाजल के विपरीत जो जल होता है, उसे समुद्र का जल कहते हैं। वह पीने के योग्य नहीं होता है। यह जल आश्विन मास में पीने योग्य हो जाता है ॥ ३ ॥

बक्तव्य—चरक के अनुसार आकाश से मेघ की सहायता से बरसने वाले सभी जल एक समान होते हैं। परन्तु जब वे गिरते हैं और गिरकर जिस प्रकार के देश में तथा जिस काल में गिरकर स्थित होते हैं, तदनुसार उन जलों के गुण हो जाते हैं। (च.सू. २७।१९६) प्रधान जल—जो जल इन्द्र (मेघ) द्वारा उत्पन्न हुआ आकाश से गिरता है और स्वच्छ पात्रों में संग्रह कर लिया जाता है, उसे ही विवेकशील विद्वान् ‘ऐन्द्र’ जल कहते हैं। वहाँ जल राजाओं अथवा श्रीमानों के पीने योग्य होता है। यह जल प्रायः आश्विन मास में ग्रहण किया जाता है। (च.सू. २७।२०२)

धन्वन्तरि के अनुसार—जल दो प्रकार का होता है—१. गंगा का जल और २. समुद्र का जल। इनमें गंगा का जल प्रायः आश्विन मास में बरसता है। अतः उक्त दोनों प्रकार के जलों की परीक्षा करनी चाहिए। जिस समय पानी बरस रहा हो, उस समय पकाये हुए चाबलों के न गले हुए अविवर्ण (जिसका स्वाभाविक वर्ण विकृत न हुआ हो) एक पिण्ड को चाँदी की थाली में रख दें। यदि ४-५ घण्टे में भी वह पिण्ड उसी प्रकार अ विकृत रहता है, तो समझे इस समय गंगा का जल बरस रहा है। यदि उस भात के पिण्ड का रंग बदल जाय, उसमें कुछ सड़न के लक्षण दिखायी दें, कुछ गदलापन दिखायी दे तो समझना चाहिए कि इस समय सामुद्र जल बरस रहा है। सामुद्र जल को आश्विन मास में ग्रहण किया जा सकता है। देखें—सु.सू. ४।७।७।

स्पृष्टीकरण—समुद्री जल को ही सामुद्र जल कहते हैं। ‘मानसून’ द्वारा उठे हुए बादलों से जो जल बरसता है, उसे समुद्र का जल कहा जाता है। गंगाजल—जितनी भी तेज बहने वाली नदियाँ हैं, उन सबका नाम गंगा है। क्योंकि गंगा उसे कहते हैं जिसमें निरन्तर प्रवाह (बहाव) हो। देखें—‘गच्छतीति

ब्रह्मवैज्ञानीयाध्यायः ५ ]

सूत्रस्थानम्

६५

नङ्गा'। अतएव वेगवती नदियों का जल शुद्ध होता है। देखें—'नदी वेगेन शुध्यति'। (चा.नी. ६।३) अतः जल की परीक्षा करके उसका संग्रह तथा प्रयोग करें। कभी आश्विन में भी सामुद्र जल बरस सकता है। यदि शरद् ऋतु का जल वर्षा ऋतु के जल से अवश्य स्वच्छ होता है, तथापि परीक्षा कर लेनी चाहिए।

निष्कर्ष— गंगा का जल पीने योग्य (हितकर) होता है और समुद्र का जल पीने योग्य नहीं होता, बने ही वह नमकीन न हो। अतः आश्विन मास से ज्येष्ठ मास तक जो वर्षा का जल होता है, वह पानीय (पीने योग्य) होता है, शेष महिनों में बरसने वाला जल सामान्यतः अपेय होता है।

ऐन्द्रमन्वु सुपात्रस्थमविपन्नं सदा पिबेत्॥४॥

तदभावे च भूमिष्ठाल्तरिक्षानुकारि यत्। शुचिपृथ्वस्तित्त्वे देशेऽर्कपवनाहतम्॥५॥

पानीय जल— ऐन्द्रम् अम्बु (बादलों से बरसा हुआ जल) जो साफ-सुथरे पात्र में रखा हो और जो किसी प्रकार से विकार युक्त न हुआ हो, उसे सदा पीना चाहिए। इसके अभाव में उस प्रकार के जल को पीना चाहिए, जो आकाश से बरसे हुए जल की भाँति स्वच्छ हो तथा पृथिवी के स्वच्छ, पवित्र तथा काने अथवा सफेद स्थान (पात्र) में रखा गया हो, जिसमें सूर्य की किरणों एवं शुद्ध हवा का स्पर्श होता हो; इस दृष्टि से तालाब तथा झील के जल पीने के योग्य होते हैं॥४-५॥

न पिबेत्सङ्गृहीतवृषाणैर्विलाल्स्तुतम्। सूर्यन्तुपवनावृष्टमभिबृष्टं घनं गुरुं॥६॥

फेनिलं जन्तुमस्तप्तं दन्तग्राह्यतिशैत्यतः। अनार्तव च यद्विषमार्तप्तं प्रथमं च यत्॥७॥

लूतादितन्तुविषमूत्रविषसंश्लेषदूषितम् ।

न पीने योग्य जल— कीचड़, सिवार, तिनके तथा पत्तों के फेल जाने के कारण जो जल मलिन हो गया हो, उसे नहीं पीना चाहिए। जिस जल पर सूर्य-चन्द्रमा की किरणों का तथा शुद्ध वायु का स्पर्श न होता हो, जो अभी-अभी बरसा हो अर्थात् जो पहली वर्षा का जल हो, जो जल घन (गदला) होने के कारण गुरु (पचने में भारी) हो, जिसके ऊपर झाग उठी हो, जो क्रिययुक्त हो, स्पर्श में उष्ण हो तथा जो अत्यन्त शीतल होने के कारण दौर्तों में लगकर पीड़ा उत्पन्न करता हो, उस जल को नहीं पीना चाहिए।

वर्षाऋतु के जल को आर्तवजल कहते हैं। इस काल के अतिरिक्त जब भी तत्काल जल बरसे, उसे 'अनार्तव' जल कहते हैं और जो वर्षाकाल में भी आकाश से पहली बार बरसा हुआ जल है, उसे भी न पीयें। लूता आदि प्राणियों की जो लार से, मल-मूत्र तथा विष के सम्पर्क से दूषित जल हो, उसे भी नहीं पीना चाहिए॥६-७॥

वक्तव्य— इस सम्बन्ध में सुश्रुत के विचार द्रष्टव्य हैं—'तत्र...सर्वं चेति'। (सु.सू. ४।१८) इसका भाष्य है—वर्षा ऋतु में आन्तरिक्ष (आकाश से प्राप्त), औदुभिद (घ्रोत से निकलने वाले) जल को पीना चाहिए। भ्राद्रपद में जल को गरम करके ठण्डा कर लें, तब पीयें। क्योंकि ये दोनों प्रकार के जल महागुण वाले होते हैं। शरद् ऋतु में सभी प्रकार के जलों का सेवन किया जा सकता है, क्योंकि इन दिनों अगस्त्य का उदय हो जाता है। (ज्ञानमण्डल से प्रकाशित 'बृहत् हिन्दी कोश' में लिखा है—अगस्त्योदय ऋद्र-शुक्लपक्ष में होता है। इसे एक नक्षत्र कहते हैं, किन्तु इसकी गणना २७ नक्षत्रों में नहीं है। अगस्त्य नक्षत्र एक ऋषि का है, इन्होंने विन्याचल को बढ़ने से रोक दिया था। इनका दूसरा नाम 'कुम्भज' है।) अतः इनके उदय हो जाने पर सभी प्रकार के जल स्वच्छ हो जाते हैं। हेमन्त ऋतु में सरोवर तथा तालाबों का जल पीने योग्य हो जाता है। वसन्त तथा ग्रीष्म ऋतु में कुआँ तथा झरने का जल पीना चाहिए। शरद् ऋतु में सरोवर, तालाब एवं कुआँ का जल नहीं पीना चाहिए। शेष जल पेय होते हैं, निषेध केवल 'अभिबृष्ट' जल का है। ऐसे जल में स्नान भी नहीं करना चाहिए।

महर्षि कश्यप ने कहा है—'बलाहकाद्याः समदाः कीटा लूताश्च खेचराः। तद्विधोत्सर्गसंगद्वाह्यं तत् तदा जलम्'॥ अर्थात् अन्तरिक्ष में भ्रमण करने वाले अनेक प्रकार की लूताएँ तथा कीड़े आदि ऐसे होते

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अष्टाङ्गहृदये

हैं, जो वर्षा के साथ भूमि पर गिरते हैं। यह सत्य है। आप देखें, बरसात के आरम्भ में वर्षा के जल से स्नान करने के कारण बुजली आदि चर्मरोग और उसे पीने से कास, प्रतिशय आदि रोग हो जाते हैं।

आठ प्रकार के जल—१. कौप ( कुएँ का जल ), २. सारस ( सरोवर या झील का जल ), ३. ताडग ( तालाब का जल ), ४. चौण्ड ( इसे चौञ्ज, चौण्ट्य तथा चौण्ड्य भी कहते हैं। इसके लक्षण इस प्रकार हैं—'शिलाकीर्ण स्वयं श्वश्रं नीलाञ्जनसमोदकम्। लतावितासम्पन्नं चौञ्जमित्यभिधीयते' ॥—भा.प्र.जलवर्ग ), ५. प्राग्ध्रवण ( झरना का जल ), ६. औदुभिद ( चश्मा या झोत का जल ), ७. वाय ( बावडी का जल ) तथा ८. नदी का जल। देखें—अ.सं.सू. ६।१२-१५।

पश्चिमोदधिगाः शीघ्रवहा याश्चामलोदकाः ॥८॥

पथ्याः समासात्ता नद्यो विपरीतास्त्वतोऽन्यथा।

( १ ) नदीजल का वर्णन—पश्चिमी समुद्र की ओर बहने वाली, वेग से बहने वाली तथा निर्मल जल वाली जो नदियाँ हैं, वे सभी संक्षेप से हितकारक जल वाली होती हैं। इन गुणों के विपरीत जो नदियाँ हैं, उनका जल अहितकारक होता है ॥८॥

उपलास्फालनाक्षेपविच्छेदैः खेदितोदकाः ॥९॥

हिमवन्मल्योद्भूताः पथ्यास्ता एव च स्थिराः। कृमिश्चलीपदहृत्कण्ठशिरोरोगान् प्रकुर्वते ॥१०॥

( २ ) नदीजल का वर्णन—हिमालय तथा मलय पर्वत से निकल कर बहने वाली वे नदियाँ जिनका जल पत्थरों तथा चट्टानों से टकराकर गिरने से छिन्न-भिन्न होने के कारण खिन्न ( दुःखी, आलोड़ित ) हो जाता है, उनका जल पथ्य ( हितकर ) होता है। जब उक्त नदियों का जल जिस प्रदेश में आकर स्थिर हो जाता है अर्थात् वेग से बहता हुआ नहीं दिखलायी देता, उन-उन स्थानों में उन-उन नदियों का जल क्रिमिरोग, श्लीपद ( फीलपाँव ), हृदयरोग, कण्ठरोग ( गलमण्ड ) तथा शिरोरोग कारक हो जाता है ॥९-१०॥

प्राच्यावन्त्यपरान्तोत्या दुर्नमानि, महेन्द्रजाः। उदरश्चलीपदातङ्गान्, सह्यविन्ध्योद्भवाः पुनः ॥

कुष्ठपाण्डुशिरोरोगान्, दोषध्व्यः पारियात्रजाः। बलपौरुषकारिण्यः, सागराभ्यस्त्रिदोषकृत ॥

( ३ ) नदीजल का वर्णन—प्राच्यदेश ( आसाम तथा बंगाल ) की, आवन्त्य देश ( मालव ) की तथा अपरान्त ( सहाद्रि का पश्चिमी प्रदेश—कोकण ) प्रदेश की नदियाँ अर्श ( बवासीर ), उदररोग तथा श्लीपद ( फीलपाँव ) रोगों को पैदा कर देती हैं। सह्याचल तथा विन्ध्यचल की नदियाँ कुष्ठरोग, पाण्डुरोग एवं शिरोरोगों को उत्पन्न कर देती हैं। पारियात्र ( सात कुलपर्वतों में से एक ) पर्वत से उत्पन्न नदियों का जल दोषनाशक होता है। इसका सेवन करने से बल एवं पौरुष ( उत्साहशक्ति ) की वृद्धि होती है तथा समुद्र का जल तीनों दोषों को उभाड़ने वाला होता है ॥११-१२॥

वक्तव्य—ऊपर विभिन्न प्रकार की नदियों के जलों के गुण-धर्मों का विवेचन किया गया है, इसी विषय को संक्षेप में सूत्रुत ने इस प्रकार कहा है—'तत्र नद्यः पश्चिमाभिमुखाः पथ्याः लघुदक्त्वात्; पूर्वाभिमुखास्तु न प्रशयन्ते, गुरुदक्त्वात्; दक्षिणाभिमुखा नातिदोषलाः, साधारणत्वात्' । ( सु.सू. ४।२१ ) अर्थात् पश्चिम समुद्र की ओर बहने वाली नदियों का जल हितकर होता है, क्योंकि उनका जल हल्का होता है। पूर्वी समुद्र की ओर बहने वाली नदियों का जल हितकर नहीं होता, क्योंकि इनका जल भारी होता है। दक्षिण समुद्र की ओर बहने वाली नदियों का जल अधिक दोषकारक नहीं होता, क्योंकि यह जल साधारण होता है। वास्तव में उक्त तीन प्रकार की नदियाँ क्रमशः जांगल प्रदेश, आनूप प्रदेश तथा साधारण देश से सम्बन्धित हैं, अतएव उनके गुण-धर्मों में इस प्रकार का अन्तर है।

स्पष्टीकरण—१. पश्चिमाभिमुखी नदियाँ—शतद्रु ( सतलज ) तथा विपाशा ( व्यास ) आदि। २. पूर्वाभिमुखी नदियाँ—गंगा ( समतल भाग में बहने वाली ), यमुना, सरयू आदि। ३. दक्षिणाभिमुखी

ब्रह्मव्यवज्ञानाध्यायः ५ ]

सूत्रस्थानम्

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नदियाँ—नर्मदा, ताप्ती, पयोष्णी, गोदावरी, कावेरी आदि। जिन नदियों का जल उत्तम कहा गया है, उनकी उत्तमता का मापदण्ड है—उनकी प्रवाहशीलता; अन्यथा प्रवाह के शिथिल होने पर उत्तमता में भी क्षिण्डिता आ जाती है, फलतः वे भी अपथ्यकारक हो जाती हैं।

विद्याकूपतडागादीन् जाङ्गलानूपशैलतः।

कूप आदि का जल—कुआँ, तालाब, झील आदि के जलों के गुण-दोष का निर्णय जांगल देश, अनुपदेश तथा पर्वतीय देश के अनुसार होता है।

वक्तव्य—जांगल देश के कूपों, तालाब आदि का जल स्वास्थ्य-वृद्धि के लिए उत्तम होता है, अनुपदेश में स्थित इनका जल हानिकारक तथा पर्वतीय प्रदेश का जल ऊपरी भागों में हितकर एवं पर्वत के निचले भाग का जल प्रायः अहितकर होता है।

सुश्रुत के अनुसार अशुद्ध जल को शुद्ध करने की विधि—‘तत्र’...‘मणिश्चेति’। (सु.सू. ४।१७) अर्थात् मलिन जल को शुद्ध करने वाले सात पदार्थ हैं—१. कतक (निर्मली), २. गोमेदक, ३. विसग्रन्थि (कमल की जड़), ४. शैवाल (काई) की जड़, ५. वस्त्र, ६. मोती, ७. मणि (फिटकरी) आदि।

‘पञ्च’...‘चेति’। (सु.सू. ४।१८) अर्थात् पाँच वस्तुएँ ऐसी होती हैं, जिनके ऊपर पानी के पात्र को रख देने से भूमि का प्रभाव जल पर नहीं पड़ता—१. फलक (सेमल आदि लकड़ी का तस्त्ता), २. श्चण्डक (निकटि या तिपायी), ३. मुञ्जवल्ल्य (मूँज आदि का बना गोल आकार का असन), ४. उदकमञ्जिका जिस पर जमीन से ऊँचे जलपात्र रखा जाय तथा ५. शिष्य (छीका)।

‘सप्त’...‘चेति’। (सु.सू. ४।१९) अर्थात् पानी को शीतल करने के सात उपाय हैं—१. हवा में (सुले स्थान में) पानी को रखना, २. पानी से भरे पात्र को बाहर से गीले वस्त्र से लपेट कर उसे तर रक्खना, ३. यन्त्र, लकड़ी आदि को घुमाते रहना, ४. पंखा चलाना, ५. वस्त्र द्वारा छानना, ६. पानी भरे पात्र को बालू के आसन पर रखना तथा ७. जलपात्र को छीके पर लटकाना।

नाम्बु पेयमशक्त्या वा स्वल्पमल्पाग्रिगुल्मिभिः ॥ १३ ॥

पाण्डुररातिसाराशौग्रहणीशोषशोथिभिः। कृते शरत्रिदायाभ्यां पिबेत्त्वस्योऽपि चालपशः ॥

जलपान-विधि—शक्ति से अधिक जल किसी को नहीं पीना चाहिए। मन्दग्रि, गुरुम, पाण्डुरोग, उदरोग, अतिसार, अशौरोग, ग्रहणीरोग, शोष (राजयक्ष्मा) तथा शोथरोग से युक्त पुरुषों को थोड़ा जल पीना चाहिए ॥ १३-१४ ॥

समस्थूलकृशा भुक्तमध्यान्तप्रथमान्बुपाः।

जलपान का प्रभाव—भोजन करते समय बीच-बीच में पानी पीने वालों का शरीर ‘सम’ रहता है, भोजन के अन्त में जल पीने वालों का शरीर स्थूल (मोटा) होता है और भोजन के आरम्भ में जल पीने वालों का शरीर कृश (दुर्बल) हो जाता है।

वक्तव्य—बेचारे वे जब पहले पानी से ही पेट भर लेंगे, तो भोजन कहाँ कर पायेंगे? वे कृश क्यों होंगे तो और क्या होंगे?

शीतं मदात्ययग्लानिमूर्च्छाच्छर्दिश्रमभ्रमान् ॥ १५ ॥

तृष्णोण्णदाहपित्ताग्निविषाण्यम्बु नियच्छति।

शीतल जलपान के लाभ—शीतल जल का सेवन करने से मदात्ययरोग, ग्लानि (हर्षभाय), मूर्च्छा (बेहोशी), छर्दि (वमन), श्रम (थकावट), भ्रम, तृष्णा, उष्ण या ऊष्म (गर्मी या पसीने की अधिकता), ज्वर (जलन), पित्तविकार, रक्तविकार तथा विषविकार नष्ट हो जाते हैं ॥ १५ ॥

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अष्टाङ्गहृदये

दीपनं पाचनं कण्ठं लघुणं बस्तिशोधनम् ॥ १६ ॥

हिध्माधानानिलश्लेष्मसद्यःशुद्धिनवज्वरे । कासामपीनसन्वासपाश्वरक्षु च शस्यते ॥ १७ ॥

उष्ण जलसेवन के लाभ—यह जठराग्नि को प्रदीप्त करता है, आमरस को पचाता है, कण्ठ के लिए हितकर है, लघु ( शीघ्र पचता ) है, बस्ति का शोधक है; हिका, अफरा, वातविकार, कफविकार, तत्काल किये गये वमन, विरेचन, नवज्वर, कास, आमाजीर्ण, पीनस, श्वास तथा पाश्वशूल रोगों में इसका प्रयोग प्रशंसित है ॥ १६-१७ ॥

वक्तव्य—उष्ण जल के प्रयोग सम्बन्धी अनेक स्वरूप देखने को मिलते हैं। यथा—१. अष्टमांश शेष, २. चतुर्थांश शेष, ३. अर्धांश शेष तथा ४. उबाल कर रखा गया। ये जल उत्तरोत्तर सामान्य होते हैं। अष्टमांश शेष जल का प्रयोग प्रायः उच्च तापमान वाले ज्वर में गुनगुना करके दिया जाता है। यह स्वयं भी एक उत्तम औषध का काम करता है, व्यवहार करके देखें। जल को उबाल कर छान लें, उसे ठण्डा करने के लिए रख दें। यह निर्दिष्ट जल सभी के पीने योग्य होता है। उष्णजल की उत्तमता १२ या २४ घण्टों तक ही रहती है, शेष आगे देखें।

अनभिष्यन्दि लघु च तोयं क्वथितशीतलम्। पित्तयुक्ते हितं दोषै, व्युषितं तत्त्विदोषकृतम् ॥ १८ ॥

भूतशीत एवं बासी जल—उक्त विधियों से पकाकर शीतल किया हुआ जल अभिष्यन्दी नहीं होता अपितु वह लघु होता है। यह जल वातपित्त, कफपित्त तथा सन्निपात में भी यदि पित्त की अधिकता हो तो हितकर होता है और यही जल जब बासी हो जाता है, तो त्रिदोषकारक होता है ॥ १८ ॥

वक्तव्य—इस विषय में मुश्रुत की स्पष्टोक्ति देखें—'यत् ब्राह्म्यानं निर्वाणं निष्केनं निर्मलं लघु। चतुर्मागावेशपस्तु ततोयं गुणवत् स्मृतम्' ॥ ( सु.सू. ४।१० ) अर्थात् जो पानी पकाने पर वेगरहित, झगरहित तथा निर्मल हो जाय और चतुर्थांश शेष रह गया हो, वह लघु एवं गुणकारी होता है।

नारिकेलोदकं स्निग्धं स्वादु वृष्यं हिमं लघु। तृष्णापित्तानिलहरं दीपनं बस्तिशोधनम् ॥ १९ ॥

नारियल का जल—नारियल के कच्चे फल के भीतर दूध की आकृति का जो पानी होता है, वह स्निग्ध, स्वादु, वृष्य ( वीर्यवर्धक ), शीतल तथा लघु होता है। यह प्यास, पित्तविकार, वातविकार को नष्ट करता है, अग्नि को प्रदीप्त करता है तथा बस्ति को शुद्ध करता है ॥ १९ ॥

वक्तव्य—कवि कहता है कि ईश्वर की लीला विचित्र है। देखें उदाहरण—'समायाति यदा लक्ष्मीनारि-केलफलाम्बुवत्। विनिर्याति यदा लक्ष्मीर्जम्बुतकपित्यवत्' ॥ अर्थात् जब लक्ष्मी आती है तो नारियल के फल के भीतर पानी की भीति और जब वह जाने लगती है तो हाथी द्वारा खाये ( निगले ) गये कैथ के गूदा की भीति। हाथी कैथ के फल को गूदा सहित निगल जाता है और जब उसके मल में वह कैथ का फल पाया जाता है तो बिना गूदा का। आश्चर्य है, बिना फल के फूटे वह गूदा कहीं गया ?

वर्षासु दिव्यनादेये परं तोये वरावरे।

इति तोयवर्गः।

उत्तम एवं अधम जल—वर्षा ऋतु में दिव्य ( वर्षा का ) जल उत्तम होता है और नदी का जल पीने योग्य नहीं होता है।

अथ क्षीरवर्गः

स्वादुपाकरसं स्निग्धमोजस्यं धातुवर्धनम् ॥ २० ॥

वातपित्तहरं वृष्यं श्लेष्मलं गुरु शीतलम्। प्रायः पयः—

सामान्य दूध के गुण—प्रायः दूध रस एवं पाक में मधुर, स्निग्ध, ओजस् एवं रस आदि धातुओं को बढ़ाने वाला, वात-पित्तशामक, वीर्यवर्धक, कफकारक, गुरु तथा शीतल होता है ॥ २० ॥

विविधानिध्याध्यायः ५ ]

सूत्रस्थानम्

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—अत्र गव्यं तु जीवनीयं रसायनम् ॥ २१ ॥

क्षतक्षीणहितं मेध्यं बल्यं सत्य्यकरं सरम् । श्रमप्रममदालक्ष्मीश्वासकासातिरुदक्षुधः ॥ २२ ॥

जीर्णज्वरं मूत्रकृच्छ्रं रक्तपित्तं च नाशयेत् ।

गाय के दूध के गुण—यह विशेष करके जीवनीय शक्ति को देने वाला तथा रसायन के गुण-धर्मों से युक्त होता है। उरःक्षत एवं क्षयरोगियों के लिए हितकर होता है। यह मेधा (धारणाशक्ति) दायक, बलकारक, मूत्रवर्धक तथा सर है। यह श्रम, श्रम, मद, अलक्ष्मी (कान्तिहीनता), श्वास, कास, प्यास का अधिक ज्वर, अधिक भूख का लगना, जीर्ण (पुराना) ज्वर, मूत्रकृच्छ्र तथा रक्तपित्त रोग का विनाशक है ॥ २१-२२ ॥

हितमत्यन्मन्यनिद्रेभ्यो गरीयो माहिषं हिमम् ॥ २३ ॥

भैंस के दूध का गुण—जिनकी जठराग्नि तीक्ष्ण हो गयी हों, जिन्हें नींद न आती हों उनके लिए हितकर होता है। यह गाय के दूध से अधिक गुरु तथा शीतल होता है ॥ २३ ॥

वक्तव्य—चरक तथा सुश्रुत में वर्णित भैंस के दूध के गुणों में परस्पर विरोध प्रतीत होता है—‘महिषीणां मूत्रं गव्याच्छीततरं पयः। स्नेहान्युनमनिद्राय हितमत्यप्रये च तत्’ ॥ (च.सू. २७।२१९) और—‘महाभिष्यन्दिन्यं माहिषं वह्निनाशनम्। निद्राकरं शीतकरं गव्यात् स्निग्धतरं गुरु’ ॥ (सु.सू. ४५।५५) समन्वय—यहाँ चरक द्वारा कहा गया—गाय के दूध से भैंस के दूध में जो स्नेह की कमी कही गयी है, वह हृदय के लिए कम हितकर है, इस दृष्टि से कहा गया है। भैंस के दूध से निकली वाला जो स्नेह (घी) है, उसकी अपेक्षा गाय के दूध से उत्पन्न स्नेह (घी) हृदय के लिए अधिक हितकर होता है, यही अभिप्राय है। इसीलिए ‘खरण्णादि’ ने भी ‘उत्तम’ शब्द का प्रयोग किया है—‘गव्यं स्नेहोत्तमं क्षीरं गव्याच्च पयसः पयः। यथोत्तरं स्नेहहीनमीरभ्रच्छागमाहिषम्’ ।

अल्पाम्बुपानव्यायामकटुतिक्ताशनैर्लघु । आजं शोषज्वरश्वासरक्तपित्तातिसारजित् ॥ २४ ॥

बकरी के दूध के गुण—बकरी जल थोड़ा पीती है, कूदना-फौदना, दौड़ना आदि अनेक प्रकार का व्यायाम अधिक करती है; कटु-तिक्ता रस युक्त पत्तों को प्रायः खाती रहती है, अतः उसका दूध हल्का (मृदु) होता है। यह शोष (राजयश्म), ज्वर, श्वास, रक्तपित्त तथा अतिसार रोगों को नष्ट करता है ॥ २४ ॥

वक्तव्य—बकरी स्वयं में राजयश्म-चिकित्सा की एक प्रयोगशाला है। चरक-टीकाकार चक्रपाणि ने स्वरचित ‘चक्रदत्त’ में एक प्रयोग इस प्रकार दिया है—

‘छागं मांसं पयश्छागं छागं सर्पिः सशर्करम्।

छागोपसेवा शयनं छागमध्ये तु यक्षमनुत् ॥

अर्थात् बकरी का मांस, चीनी मिला हुआ बकरी का दूध, बकरी का घी, बकरियों के बीच में रहना, इन्हीं के बीच में सोना और इनकी मैं-मैं सुनना यक्षमरोगनाशक होता है। बकरी के दूध-घी आदि के अलग-अलग प्रयोग प्राचीन संहिताओं में भी मिलते हैं। इस प्रकार बकरी का सर्वांग उपयोग आचार्य चक्रपाणि का बुद्धिकौशल है।

काशी-निवासी स्वतन्त्रतासेनानी, वयोवृद्ध पण्डित शिवविनायक मिश्र वैद्य अपने जीवन के अन्तिम दिनों में क्षयरोग से पीड़ित हो गये थे। उन्होंने चक्रदत्त के उक्त श्लोक के अनुसार अपनी जीवनचर्चा बना ली थी, जिससे वे रोगमुक्त हो गये थे; तब से समीपस्थ जनता उन्हें ‘बकरिया वैद्य’ कहा करती थी। उनका स्वर्गवास उसके बहुत दिनों के बाद १९७६ में हुआ। ये स्वतन्त्रता-संग्राम के बाद आयुर्वेद के जीवन्त सेनानी एवं प्रहरी थे। ये बकरी का मांस नहीं खाते थे।

ईषदूक्षोण्णलवणमोष्टूकं दीपनं लघु। शस्तं वातकफानाहकृमिशोफोदराशंसाम् ॥ २५ ॥

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अष्टाङ्गहृदय

ऊंटनी के दूध के गुण—ऊंटनी का दूध थोड़ा रुक्षता युक्त, उष्ण तथा लवण रसयुक्त, अपिद्दीपक, लघु ( हल्का ) होता है। यह वातविकार, कफविकार, आनाह ( अफरा ), कुमिरोग, शोथरोग, उदररोग तथा अशरिग में हितकर होता है ॥ २५ ॥

मानुषं वातपित्तासुगभिघाताक्षिरोमजित्। तर्पणाश्चोतनैर्नस्यैः—

मानुषी दूध के गुण—नारी का दूध वात, पित्त, रक्त तथा अभिघात ( चोट आदि लगने ) के कारण उत्पन्न त्रैव सम्बन्धी रोगों में तर्पण, आच्छ्योत्तन एवं नस्य के रूप में प्रयोग करने से हितकर होता है।

वक्तव्य—तर्पण-विधि—रोगों को चित्त लेटाकर दो-चार बूँदें उसकी आँखों में डालकर कुछ देर दूध से आँखों को तुप्त होने दें। आच्छ्योत्तन-विधि—आँखों या आँख में नारी के दूध की दो-चार बूँदें टपकाना, यह विधि अनेक बार की जाती है। वे दूध की बूँदें बहकर नीचे आ जाती हैं। नस्य-विधि—इसमें नारी के दूध को नथुनों में डालकर ऊपर की ओर को खींचा जाता है। इस नस्य से शिरोरोगों में शान्ति मिलती है।

—अहृद्यं तृणमाविकम् ॥ २६ ॥ वातव्याधिहरं हिध्माग्नासपित्तकफप्रदम्।

भेड़ी के दूध का गुण—हृदय को अप्रिय या अहितकर, उष्ण, वातव्याधिनाशक, हिचकी, श्वास, पित्त एवं कफ को उभाड़ता है ॥ २६ ॥

वक्तव्य—वातव्याधि में इसकी मालिश करने तथा इसे पीने से लाभ होता है।

हस्तिन्याः स्यैर्यकृत—

हथिनी के दूध का गुण—यह शरीर की स्थिरता को पर्याप्त मात्रा में बढ़ाता है। वास्तव में इसका यह गुण 'कारणानुरूपं कार्यम्' को चरितार्थ करता है।

—बाढमृणं त्वैकशफं लघु ॥ २७ ॥ शाखावातहरं सास्त्रलवणं जडताकरम्।

एकशफ दूध के गुण—एक खुर वाले प्राणियों ( घोड़ी, गधो आदि ) का दूध उष्ण ( गरम ) एवं लघु ( हल्का ) होता है। शाखाओं ( टाँगों, बाँहों, रक्त आदि धातुओं एवं त्वचा ) के वातदोष का नाशक है। यह कुछ खट्टा एवं लवणरस युक्त होता है और जडता ( आलस्य एवं बुद्धिहीनता ) कारक होता है ॥ २७ ॥

वक्तव्य—ऊपर २७वें पद्य में श्रीहेमाद्रि ने 'बाढम्' इस पद को हथिनी के दूध का विशेषण माना है और दूसरे विद्वानों ने इसे एकशफ दुग्ध का विशेषण स्वीकार किया है। 'एकशफ' शब्द 'जाती एकवचनम्' के अनुसार एक मान लेने पर यहाँ तक आठ प्राणियों के दूधों का वर्णन कर दिया है। एक शफ ( खुर ) वाले प्राणी अन्य अनेक होते हैं।

पयोऽभिष्यन्ति गुर्वामं, युक्त्या भूतमतोऽन्यथा ॥ २८ ॥

आमभूत दुग्ध-गुण—कच्चा ( बिना गरम किया ) दूध अभिष्यन्दी एवं गुरु, पाक में भारी होता है। विधिवत् पकाया गया दूध इस ( कच्चे ) के विपरीत गुण वाला होता है ॥ २८ ॥

भवेदगरीयोऽतिभूतं, धारोष्णममृतोपमम्।

धारोष्ण दूध के गुण—अत्यन्त पकाया गया दूध अधिक गुरु हो जाता है और धारोष्ण दूध अमृत के समान गुणकारक होता है।

ब्रह्मवैज्ञानीयाध्यायः ५ ]

सूत्रस्थानम्

७१

बक्तव्य—मनुष्यों की सन्तानें गाय, भैंस आदि के बच्चे जो माता का स्तनपान करते हैं, उन्हें धारोष्ण दूध सुलभ होता है। नवजात किंवा धीराद शिशुओं के भाग्य में अब धारोष्ण दूध पीना नहीं लिखा है, बल्कि आज के युग की देन है।

अस्त्वपाकरसं ग्राहि गुरुष्णं दधि वातजित् ॥ २९ ॥

मेदःशुक्रबलम्स्नेषपितरत्ताग्निशोफकृत । रोचिष्णु शस्तमरुचौ शीतके विषमज्वरे ॥ ३० ॥

पीनसे मूत्रकृच्छ्रं च, रुक्षं तु ग्रहणीगदे। नैवाद्यान्निशि नैवोष्णं वसन्तोष्णशरत्सु न ॥ ३१ ॥

नामृदसूषं नाक्षौद्रं तत्राघृतसितोपलम् । न चानामलकं नापि नित्यं नो मन्दमन्यथा ॥ ३२ ॥

ज्वरासुकपित्तवीसर्पकुष्ठपाण्डुप्रमप्रदम् ।

दधिगुण-वर्णन—दही पाक एवं रस में अम्ल होता है। ग्राही (मल को बाँधने वाला), गुरु (पचने में देर लगाने वाला), उष्ण तथा वातनाशक होता है। मेदोधातु, शुक्र, कफ, पित्त, रक्त, अश्विधर्क एवं बौधकारक होता है। भोजन के प्रति रुचि को बढ़ाता है। इसका प्रयोग अरुचि में किया जाता है। जाड़ा लमकर आने वाले विषमज्वर में, पीनसरोग में एवं मूत्रकृच्छ्ररोग में इसका प्रयोग हितकर होता है। ग्रहणीरोग में रुक्ष (मक्खन निकाला हुआ) दही हितकर होता है।

रात में दही का सेवन नहीं करना चाहिए, उष्ण (आग में तपाया हुआ) दही न खाये, वसन्त, शोम तथा शरद ऋतु में दही न खाये, मूंग की दाल तथा उसके बड़े के बिना दही न खाये, मधु, घी, मिर्ची से रहित दही न खाये, आँवलों से रहित दही न खाये, प्रतिदिन दही न खाये और मन्दक (जो कनीभीति जमा न हो) ऐसा दही भी नहीं खाना चाहिए। यदि इस प्रकार के निषिद्ध दही का सेवन किया गया तो ज्वर, रक्तपित्त, विसर्प, कुष्ठरोग, पाण्डुरोग, भ्रम (चक्कर आना)—ये विकार उत्पन्न हो जाते हैं ॥ २९-३२ ॥

बक्तव्य—आजकल मक्खन रहित दूध तथा दही भी मिलता है। पुराने क्रम से घी निकालने में देर लगती है। आज भी पञ्जाब प्रदेश में उत्तम दूध, दही, घी सुलभ हैं। यद्यपि दही को बहुत-से लोग सदा खाने हैं, फिर भी इसके निषिद्ध विधि से निषिद्ध कालों में सेवन करने से ऊपर कहे गये ज्वर आदि रोगों के होने की सम्भावना बनी रहती है।

तक्रं लघु कषायाम्लं दीपनं कफवातजित् ॥ ३३ ॥

शोफोदराशौग्रहणीदोषमूत्रग्रहरुचीः । प्लीहगुल्मघृतव्यापदगर्पाण्डुवामयान् जयेत् ॥ ३४ ॥

तक्र (मढ़ा या छाछ)—यह लघु, कषाय, अम्ल, जठराग्निदीपक तथा कफ-वातनाशक होता है। यह शोथरोग, उदररोग, अशौरीग, ग्रहणीरोग, मूत्राघात, अरुचि, प्लीहाविकार, गुल्म, घृत (स्नेह)—व्यापत्, मरविष तथा पाण्डुरोग को जीत लेता है ॥ ३३-३४ ॥

बक्तव्य—'तक्र' के भेदों के सम्बन्ध में सुश्रुत के विचार—'तक्र'—'जिस दही में आधा जल मिलाकर पचने में स्नेह (मक्खन) अलग कर लिया जाता है, फिर जो पतला दही का भाग शेष रहता है, उसे 'तक्र' कहते हैं। यह न तो अधिक गाढ़ा और न अधिक पतला होता है। यह तक्र मधुरविपाकी, रस में अम्ल एवं कषाय होता है।

घोल—बिना पानी मिलाये जो दही मथा जाता है और जिसमें से स्नेह भाग भी अलग नहीं किया जाता, उसे घोल कहते हैं।

तक्रकूर्चिका—यह संग्राही, वातकारक तथा रुक्ष होती है एवं कठिनायी से पचती है।

(दही के साथ दूध को पकाने से 'दधिक्ूर्चिका' और तक्र के साथ दूध को पकाने से 'तक्रकूर्चिका' कन्ती है। तक्र तथा दही के गाढ़े भाग को भी 'कूर्चिका' या 'पनीर' कहते हैं। दूध के गाढ़े भाग