भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

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अष्टाङ्गहृदय

वातादि दोषों की वय-प्रकोप-प्रशम तालिका

दोषवातपित्तकफ
संचयग्रीष्म ऋतु
मेष, वृष
वैशाख, ज्येष्ठ
मध्याह्नकालवर्षा ऋतु
सिंह, कन्या
भाद्रपद, आश्विन
दिन का चौथा पहरहेमन्त ऋतु
धनु, मकर
पौष, माघ
उषःकाल
प्रकोपप्रावृद् ऋतु
मिथुन, कर्क
आषाढ़, श्रावण
अपराह्नकालशरद् ऋतु
तुला, वृश्चिक
कार्तिक, मार्गशीर्ष
अर्धरात्रिकालवसन्त ऋतु
कुम्भ, मीन
फाल्गुन, चैत्र
पूर्वाह्नकाल
प्रशमशरद् ऋतु
तुला, वृश्चिक
कार्तिक, मार्गशीर्ष
अर्धरात्रिकालवसन्त ऋतु
कुम्भ, मीन
फाल्गुन, चैत्र
पूर्वाह्नकालप्रावृद् ऋतु
मिथुन, कर्क
आषाढ़, श्रावण
अपराह्नकाल

नित्यं सर्वसाभ्यासः स्वसाधिक्यमृतावृती ॥ ५७ ॥

रससेवन-निर्देश—सभी ऋतुओं में प्रतिदिन सभी (छहों) रसों का सेवन करना चाहिए तथा जिस-जिस ऋतु में जिन-जिन रसों के सेवन का विशेष निर्देश दिया गया है, उस-उस ऋतु में उस-उस रस का अधिक सेवन करना चाहिए ॥ ५७ ॥

वक्तव्य—ऊपर जो वाग्भट ने ‘नित्यं सर्वसाभ्यासः’ कहा है, इसका समर्थन महर्षि चरक इस प्रकार कर रहे हैं—‘सर्वसाभ्यासो बलकराणाम्’ तथा ‘एकरसाभ्यासो दीर्बल्यकराणाम्’ ( च.सू. २/५४० ) अर्थात् मधुर आदि छहों रसों का प्रतिदिन सेवन करने से देह तथा इन्द्रियों का बल बढ़ता है, इसके विपरीत आचरण करने से बलहानि होती है। आज की भाषा में ये सभी रस विटामिनों से भरपूर हैं और इनसे शरीर के उन आवश्यक तत्त्वों की पूर्ति होती है, जिनकी प्रतिदिन शरीर को आवश्यकता पड़ती रहती है।

क्रत्वोरन्यवादिसप्ताहवृत्तुसन्धिरिति स्मृतः । तत्र पूर्वो विधिस्त्याज्यः सेवनीयोऽपरः क्रमात् ॥

असात्म्यजा हि रोगाः स्युः सहसा त्यागशीलनात् ।

इति श्रीवैद्यपतिसिंहगुप्तसूतृश्रीमद्वाग्भटविरचितायामष्टाङ्गहृदयसंहितायां

प्रथमे सूत्रस्थाने ऋतुचर्या नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥

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ऋतुसन्धि में कर्तव्य—दो ऋतु के जोड़ को ऋतुसन्धि कहते हैं। प्रथम ऋतु का अन्तिम सप्ताह और आने वाली ऋतु का प्रथम सप्ताह अर्थात् यह पन्द्रह दिन का समय ऋतुसन्धि है। इसमें क्रमशः पहले ऋतु की चर्या को छोड़ते हुए अगले ऋतु की चर्या का अभ्यास करना प्रारम्भ कर देना चाहिए। यदि आप पहली ऋतुचर्या को सहसा छोड़कर दूसरी ऋतुचर्या को सहसा प्रारम्भ कर देंगे तो इस व्यतिक्रम से असात्म्यजनित रोग हो सकते हैं ॥ ५८ ॥