भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

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ऋतुचर्याध्यायः ३ ]

सूत्रस्थानम्

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वक्तव्य —शारीरिक सन्धियों की भाँति ऋतुसन्धियों का भी ध्यान रखना पड़ता है। महाकवि भारवि ने भी कहा है—‘सहसा विदधीत न क्रियाम्’ (किरात) आप नियमानुसार दो महीनों से जिस ऋतु के अनुसार जिन खान-पानों का सेवन करते आ रहे हैं, यदि एकाएक उसे छोड़कर आप दूसरे खान-पानों का सेवन कर देंगे तो वे खान-पान आपको सात्त्व्य (अनुकूल) नहीं होंगे। अतः प्रथम ऋतु के अन्तिम सप्ताह में पहले क्रम को छोड़ना हुआ आने वाली ऋतु के प्रथम सप्ताह तक अगली खान-पानविधि को व्यवस्थित कर लेना चाहिए। इसी प्रकार वक्तों के परिवर्तन पर भी ऋतुसन्धियों में ध्यान दें।

सात्त्व्य —‘उपशय’ अथवा ‘सात्त्व्य’ ये परस्पर पर्यायवाची शब्द हैं। जो आहार-विहार, वेश-भूषा, देश जिस पुरुष को अनुकूल हो, वह उसके लिए सात्त्व्य कहा जाता है। महर्षि चरक ने सात्त्व्य का परिचय इस प्रकार दिया है—‘सात्त्व्यं नाम’...‘सात्त्व्यम्’। (च.वि. १।२०) अर्थात् सात्त्व्य वह है जो अपने सर्वथा अनुकूल हो, इसी को ‘उपशय’ कहते हैं। वह प्रवर, अवर, मध्य भेद से तीन प्रकार का होता है। वह पुनः विधि-भेद से सात प्रकार का होता है। जैसे—मधुर आदि रसों के भेद से छः प्रकार का और सभी रसों के योग से एक प्रकार का। इनमें सब रसों का सेवन ‘प्रवरसात्त्व्य’ है। केवल किसी एक रस का सेवन ‘अवरसात्त्व्य’ है। प्रवर तथा अवर के बीच वाले रस को ‘मध्यसात्त्व्य’ कहते हैं। इन अवर तथा मध्य सात्त्व्य को छोड़कर क्रमशः प्रवरसात्त्व्य का सेवन करे।

अन्ध्र चरक ने ‘सात्त्व्य’ की परिभाषा इस प्रकार दी है—‘सात्त्व्यं नाम’...‘भवन्ति’। (च.वि. ८।१८) अर्थात् ‘सात्त्व्य’ वह तत्त्व है जिसका लगातार सेवन करने से लाभ प्राप्त होता है। उसमें जो घी, दूध, तैल, मांस तथा मांसरस का सेवन करते हैं और सभी रसों के सेवन करने का जिन्हें अभ्यास है वे बलवान्, कष्टों को सहन करने की शक्ति वाले तथा दीर्घायु होते हैं और जो किसी एक रस का सेवन करते हैं, वे प्रायः थोड़े बलवाले, कष्टों को न सहने वाले, अल्पायु एवं निर्धन होते हैं। चरक ने एक ‘ओकसात्त्व्य’ की भी चर्चा की है। देखें—च.सू. ६।४५ में। यहाँ ‘ओक’ शब्द का अर्थ ‘गंगाधर’ के अनुसार औचित्य है, शेष इसका अर्थ ‘घर रूपी शरीर’ करते हैं।

ऊपर जो मास-ऋतु-अयन के रूप में कालविभाजन किया गया है, उस परिधि के अनुसार शीत, उष्ण तथा वर्षाकाल के स्वरूप में अन्तर आ सकता है। अतः चिकित्सा के क्षेत्र में यह अन्तर घातक हो सकता है। इसलिए जब शीत प्रारम्भ हो जाय तब हेमन्त-शिशिर की चर्या करनी चाहिए। इसी प्रकार गर्मी-बरसात के मौसमों के सम्बन्ध में भी समझें। जब सौरमास के अनुसार किसी ऋतु के लक्षण सम्पूर्ण रूप से परिलक्षित नहीं होते अथवा कम-ज्यादा दिखलाई दें, तो ये अशुभ लक्षण कहे जाते हैं। इससे जल, देश एवं काल में विकृति उत्पन्न हो जाती है; जिससे कोई-न-कोई रोग फैलने लगता है, जिसे सुश्रुत के शब्दों में ‘मरक’ कहते हैं। देखें—सु.सू. ६।१७ तथा च.वि. ३।१-२३ तक में जनपदोद्भवस का वर्णन।

इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी द्वारा विरचित निर्मला हिन्दी व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से विभूषित अष्टाङ्गहृदय-सूत्रस्थान में ऋतुचर्या नामक तीसरा अध्याय समाप्त ॥ ३॥