अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंरोगानुत्पादनीयाध्यायः ४ ]
सूत्रस्थानम्
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वक्तव्य —ऊपर के पद्य में 'सर्वपावक' शब्द का प्रयोग है, अतः सुश्रुत-सूत्रस्थान २१।९ में पित्त को ही अग्नि माना है। यथा 'आगमाच्च पश्यामो न खलु पित्तव्यतिरेकादन्योऽस्तिरिति'। अर्थात् पित्त के अतिरिक्त शरीर में दूसरा पदार्थ ऐसा नहीं है, जिसे अग्नि कहा जाय। यह पित्त कार्यभेद से पाँच प्रकार का होता है, अतएव इसके नामों की गणना ऊपर व्याख्या में कर दी है। इसके विशेष विवेचन को आप सु.सू. २१।१० में देख सकते हैं।
ये भूतविषवाव्यभिषिक्तभज्जदिसम्भवाः। रागद्वेषभयाद्याश्च ते सूर्यरागन्तवो गवाः॥ ३१॥
आगन्तुज रोग —भूतावेश, विष ( रथवर, जंगम, गर ) प्रयोग, वायु ( ब्राह्मी अतिशीत अथवा अतिउष्ण ) के स्पर्श, अग्नि द्वारा जलने, क्षत ( घाव लगने ), भंग ( अभिघात, चोट ), श्रम आदि कारणों से अथवा काम, क्रोध, भय, शोक आदि के कारण से जो रोग हो जाते हैं, उन्हें आगन्तुज रोग कहते हैं॥ ३१॥
वक्तव्य —यदि इन आगन्तुज कारणों से ज्वर आदि रोगों की भी उत्पत्ति होगी तो उस ज्वर को भी आगन्तुज ही कहा जायेगा। अन्यथा बात आदि दोषों से उत्पन्न ज्वर आदि रोग निज या शरीर कहे जाते हैं। इस पद्य को च.सू. ७।५१ में भी देख लें।
त्यागः प्रज्ञापराधानामिन्द्रियोपशमः स्मृतिः। देशकालात्मविज्ञानं सदवुत्तस्यानुवर्तनम्॥ ३२॥
अथर्वविहिता शान्तिः प्रतिकूलग्रहार्चनम्। भूताद्यस्पर्शनोपायो निर्दिष्टश्च पृथक् पृथक्॥ ३३॥
अनुत्पत्त्यै समासेन विधिरेषः प्रदर्शितः। निजागन्तुविकाराणाभ्युत्पन्नानां च शान्त्यै॥ ३४॥
निज , आगन्तुज रोगों का निरोध एवं शमन—ऊपर कहे गये निज तथा आगन्तुज रोग उत्पन्न हो न हों और यदि उत्पन्न ( पैदा ) हो गये हों तो उनकी शान्ति के लिए संक्षेप में ये चिकित्सा सम्बन्धी निर्देश दिये गये हैं—प्रज्ञापराधों के परित्याग, श्रोत्र आदि ज्ञानेन्द्रियों को अपने वश में रखना, मेरे रात-दिन कैसे बीत रहे हैं—इस बात का ध्यान रखना; देश, काल, शरीर एवं मन का ठीक-ठीक ज्ञान रखना तथा सदाचार के अनुसार व्यवहार करना। अथर्ववेद में जो शान्ति कही गयी है, उसका प्रयोग करें। वर्तमान में जो प्रतिकूल ग्रह हैं, उनका जप, पूजा-पाठ, होम, बलिदान आदि करें या कराये तथा भूत आदि का स्पर्श न करने का प्रयत्न करें। ये उपाय अलग-अलग कह दिये गये हैं॥ ३२-३४॥
वक्तव्य —'त्यागः'... 'नुवर्तनम्'॥ ( च.सू. ७।५३ ) अविकल संगृहीत है। यहाँ 'स्मृतिः' की व्याख्या चक्रपाणि ने इस प्रकार की है—'पुत्रादीनां विनश्यरत्वस्वभावाद्यनुसारणम्'। इसका समर्थन आगे च.शा. १।१४७ में इस प्रकार दिया है—'स्मृत्वा स्वभावं भावानां स्मरन् दुःखात् प्रमुच्यते'। किन्तु इसके विपरीत शौहमद्रि ने 'नर्तकदिनानि मे यान्तीति'। 'उक्ता स्मृतिः' दोनों ही अर्थ प्रकरणीचित हैं। प्रज्ञापराध—इसकी विस्तृत चर्चा चरकोक्त निम्न स्थलों में देखें—च.सू. ७।५३-५४ तथा च.शा. १।१०२-१०९।
देशकालात्मविज्ञान —त्रिविध देशों में यह कैसा देश है? त्रिविध या षड्विध कालों में से यह कौन-सा काल है? और आत्मविज्ञान—अपनी शारीरिक तथा मानसिक शक्ति कैसी है या किस परिस्थिति में हैं? इन सब विषयों का पूर्णरूप से ज्ञान करना चाहिए। इस विषय की अ.हृ.सू. के दूसरे अध्याय में विस्तार से चर्चा हो चुकी है। इस प्रकार जो मानव अपना जीवन-यापन करता है, उसे किसी प्रकार का रोग होता ही नहीं, यदि उत्पन्न हो भी जाय तो उक्त नियमों का पालन करने से वह रोग शान्त हो जाता है।
आचार्य हेमद्रि अपनी व्याख्या में कहते हैं कि 'अथर्वविहिता शान्तिः' इत्यादि इस एक श्लोक को कुछ विद्वान् यहाँ पढ़ना स्वीकार नहीं करते, तथापि यहाँ दिया गया है। अतः हम यहाँ अथर्ववेद में कही गयी शान्तिविधि का संकेत कर रहे हैं, उसका आप प्रयोग करें। देखें—अथर्ववेद का १९ प्र० ३५ अनु० २५, १०, ११।
शीतोद्भव दोषचयं वसन्ते विशेषोद्यन् ग्रीष्मजमप्रकाले।
घनात्यये वार्षिकमाशु सम्यक् प्रानोति रोगानुतुजात्र जातु॥ ३५॥