अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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अष्टाङ्गहृदय
शोधन-योग्य ऋतुएँ—शीत हेमन्त ऋतु में जिस ( कफ ) दोष का संचय होता है, उसका शोधन वसन्त ऋतु में करना चाहिए। ग्रीष्म में जिस ( वात ) दोष का संचय होता है, उसका शोधन प्रावृट् ऋतु में करना चाहिए और वर्षा ऋतु में जिस ( पित्त ) दोष का संचय होता है, उसका संशोधन शरद् ऋतु में करना चाहिए। ऐसा करता हुआ मानव ( नर-नारी ) कभी भी ऋतुओं के कुप्रभाव से होने वाले रोगों से रोगी नहीं हो पाता ॥ ३५ ॥
बक्तव्य—महर्षि वाग्भट ने दोषप्रकोप तथा उसके संशोधन का जो निर्देश ऊपर दिया है, वह केवल स्वस्थ पुरुष के लिए है अस्वस्थ के लिए नहीं है। संशोधन-विधि का प्रयोग जब भी करना या कराना हो तो वह समशोतोष्ण काल में ही उचित है, उसमें भी चैत्र, श्रावण तथा कार्तिक मासों में अधिक समीचीन होता है। इन विषयों का विस्तृत वर्णन अ.हृ.सू.अ. १३ से २३ तक में किया गया है, जिनकी व्याख्या यथास्थान की जायेगी।
नित्यं हिताहारविहारसेवी समीक्ष्यकारी विषयेष्वसक्तः ।
दाता समः सत्यपरः क्षमावानाप्तोपसेवी च भवत्यरोगः ॥ ३६ ॥
इति श्रीवैद्यपतिसिंहगुप्तसूनुश्रीमद्वाग्भटविरचितायामष्टाङ्गहृदयसंहितायां
प्रथमे सूत्रस्थाने रोगानुत्पादनीयो नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥
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स्वस्थ रहने के उपाय—सदा हितकर आहार-विहार का सेवन करने वाला मानव ( नर-नारी ) किसी भी कार्य को भलीभाँति देखकर करने वाला, नेत्र आदि ज्ञानेन्द्रियों के विषयों में आसक्त न रहने वाला, सदा सत्याओं को दान देने वाला, सभी प्राणियों को अपने समान समझनेवाला, सत्यभाषणशील, क्षमा ( सहन ) करने वाला तथा आपत्तजनों की सेवा करने वाला सदा नीरोग रहता है ॥ ३६ ॥
बक्तव्य—उक्त ३५ तथा ३६ दोनों पद्य चरक से लिये गये हैं। देखें—च.शा. २।४५-४६। 'आप्तोपसेवी'—ये आपत्त क्यों कहे जाते हैं और इनकी सेवा करने से क्या लाभ होते हैं, इन विषयों को जानने के लिए आप प्रस्तुत सन्दर्भों को देखें—च.सू. ११।१८-१९ तथा च.वि. ४।४-१३ तक। इस प्रसंग में एक और पद्य संग्रहणीय, मननीय एवं पठनीय है। उसे हम यहाँ उद्धृत कर रहे हैं—'मतिर्वचः कर्ममुखानुबन्धं सत्त्वं विधेयं विशदा च बुद्धिः। ज्ञानं तपस्तत्परता च योगे यस्यास्ति तं नानुत्पन्ति रोगाः' ॥ ( च.शा. २।४७ ) अर्थात् जिसकी बुद्धि, वाणी तथा कर्म ऐसे हों जिनका फल ( परिणाम ) सुखद हो, जिसका मन अपने वश में हो, जिसके विचार स्वच्छ हों, जो ज्ञानी हो, तपस्वी हो और जिसकी तत्परता योग ( कर्मवीशल ) में हो उसे शारीरिक, मानसिक एवं आगन्तुज रोग कभी पीड़ित नहीं करते। ऐसा मानव सदा सुखी रहता है।
इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी द्वारा विरचित 'निर्मला' हिन्दी व्याख्या, विशेष बक्तव्य आदि से विभूषित अष्टाङ्गहृदय-सूत्रस्थान में रोगानुत्पादनीय नामक चौथा अध्याय समाप्त ॥ ४ ॥
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