भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

पृष्ठ 13, कुल 387 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 13

( १३ )

रचना-वैशिष्ट्य —वागभट की रचना में स्थल-विशेष पर उनके काव्यगत प्रसाद, सुकुमार, माधुर्य आदि जो विशिष्ट गुण देखे गये हैं, उनमें से कतिपय स्थलों के संक्षिप्त संकेत सूत्र यहीं दिये जा रहे हैं, तदनुसार आप साहित्यसुधा का रसास्वादन करें। मद्यपान विधि का वर्णन देखें—अ.हू.चि. ७।७५ से ९० तक तथा अ.हू.उ. ४०।४९-४७।

पुत्रसुख का माहात्म्य —वागभट ने आलंकारिक शब्दशय्या द्वारा पुत्र का वर्णन इस प्रकार किया है—

‘स्वलद् गमनमव्यक्तवचनं धूलिधुरारम्। अपि लालाविलमूखं हृदयाह्लादकारकम्।

अपत्यं तुल्यतां केन दर्शनस्पशनादिषु। किं पुनर्वद यशोधर्मानश्रीकुलवर्धनम्॥

(अ.हू.उ. ४०।१०-११)

ऐसा लगता है कि पुत्र का वर्णन करते समय वागभट कालिदासीय निम्न पद्य से प्रभावित थे—

‘आलक्ष्य दन्तमुकुलाननिमित्तहासै-

रव्यक्तवर्णरमणीयवचःप्रवृत्तीन् ।

अङ्गाश्रयप्रणयिनस्तनयान् वहन्तो

धन्यास्तदङ्करजसा मलिनीभवन्ति’॥

(अ.शा. ७।१७)

वागभट की विशेषता —इन्होंने ‘इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षयः’ इस प्रतिज्ञा का परिपालन करते हुए आत्रेय आदि के विचारों, सिद्धान्तों, चिकित्साविधियों तथा अपने सभी पूर्ववर्ती आचार्यों (ब्रह्मा, अश्विनीकुमार, वसिष्ठ, मार्गव, अगस्त्य, भेड(ल), हारीत, वृद्धकाश्यप, काश्यप, अश्विवेश, आत्रेय पुनर्वसु, धन्वन्तरि, शौनक, निर्मि, विदेहाधिपति, जिन, माणभद्र आदि) द्वारा कहे गये औषध योगों का अपने तन्त्र में संग्रह किया है। इनके इस रचनाकौशल को देखकर यह निःसंकोच कहा जा सकता है कि ऐसी विषय-सम्पदा इसके पूर्ववर्ती किसी दूसरे ग्रन्थ में दुर्लभ है। अतएव सूक्तिकारों ने ‘सूत्रस्थाने तु वागभटः’ कहकर इसकी प्रशंसा की है। दूसरे आचार्यों ने ‘कलौ वागभटनामा च’ कहकर आयुर्वेद जगत् में इसी का एकमात्र साम्राज्य स्वीकार किया है। सुना जाता है कि इसके अतिरिक्त इन्होंने ‘अष्टाङ्गनिघण्टु’ तथा ‘अष्टाङ्गवतार’ नामक दो अन्य ग्रन्थों की भी रचना की थी। इस विषय में अन्य विद्वान् सहमत नहीं हैं। ‘अष्टांगनिघण्टु’ की हस्तलिखित पाण्डुलिपियाँ ओरियण्टल लायब्रेरी मद्रास में तथा तज्ञौर ग्रन्थ संग्रहालय में हैं जो आज तक प्रकाशित नहीं हो सकीं।

वागभट सम्बन्धी किंवदन्ती —प्राचीनकाल से प्रचलित किंवदन्तियों का ऐतिहासिक क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण स्थान होता है। तदनुसार सुना जाता है कि एक बार भगवान् धन्वन्तरि ‘कलियुग के कुप्रभाव से पीड़ित मनुष्य किस प्रकार नौरोग हो’—इस शुभकामना से वे अत्यन्त मनोहर पक्षी का रूप धारण कर उस समय में सुप्रसिद्ध वैद्यों के प्रत्येक घर के पास जाकर ‘कोऽरुक्, कोऽरुक्, कोऽरुक्’ इन तीन प्रश्नों को पूछते थे। उत्तर न मिलने पर वे एक घर से दूसरे घर में चले जाते थे। इस प्रकार एक दिन सिन्धुप्रदेश में स्थित वैद्यराज वागभट के आँगन के समीप स्थित खिले हुए वृक्ष की शाखा पर बैठकर फिर इन्होंने वे ही तीन प्रश्न पूछे। उस समय श्री वागभट रोगियों की चिकित्सा करने में व्यस्त थे, फिर भी उनका ध्यान उस पक्षी की स्पष्ट, श्रुतिमधुर तथा परोपकार प्रेरित गम्भीर अर्थ वाली वाणी को सुनकर और उस पक्षी के अत्यन्त सुन्दर रूप से प्रभावित होकर साथ ही उसे अलौकिक पक्षी समझकर इन्होंने सादर पके हुए फल एवं जल उसे समर्पित किये, किन्तु ग्रहण किये बिना उस पक्षी ने पुनः उन्हीं प्रश्नों को दुहराया। तब वागभट ने सोचा—यह पक्षी जब तक अपने प्रश्नों का उत्तर नहीं पायेगा, तब तक यह खायेगा-पीयेगा नहीं। यह निश्चय करके वागभट ने उसके उन प्रश्नों का उसी शैली में शास्त्रसम्मत उत्तर इस प्रकार दिया—‘हितभूक् मितभूक् अशाकभूक्’। वागभट के इन उत्तरों को सुनकर इनके द्वारा समर्पित फल-जल का सेवनकर प्रसन्न होकर उस पक्षी ने कहा—‘मैं सुयोग्य वैद्य की परीक्षा के लिए पक्षी का रूप धारण कर