अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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रचना-वैशिष्ट्य —वागभट की रचना में स्थल-विशेष पर उनके काव्यगत प्रसाद, सुकुमार, माधुर्य आदि जो विशिष्ट गुण देखे गये हैं, उनमें से कतिपय स्थलों के संक्षिप्त संकेत सूत्र यहीं दिये जा रहे हैं, तदनुसार आप साहित्यसुधा का रसास्वादन करें। मद्यपान विधि का वर्णन देखें—अ.हू.चि. ७।७५ से ९० तक तथा अ.हू.उ. ४०।४९-४७।
पुत्रसुख का माहात्म्य —वागभट ने आलंकारिक शब्दशय्या द्वारा पुत्र का वर्णन इस प्रकार किया है—
‘स्वलद् गमनमव्यक्तवचनं धूलिधुरारम्। अपि लालाविलमूखं हृदयाह्लादकारकम्।
अपत्यं तुल्यतां केन दर्शनस्पशनादिषु। किं पुनर्वद यशोधर्मानश्रीकुलवर्धनम्॥
(अ.हू.उ. ४०।१०-११)
ऐसा लगता है कि पुत्र का वर्णन करते समय वागभट कालिदासीय निम्न पद्य से प्रभावित थे—
‘आलक्ष्य दन्तमुकुलाननिमित्तहासै-
रव्यक्तवर्णरमणीयवचःप्रवृत्तीन् ।
अङ्गाश्रयप्रणयिनस्तनयान् वहन्तो
धन्यास्तदङ्करजसा मलिनीभवन्ति’॥
(अ.शा. ७।१७)
वागभट की विशेषता —इन्होंने ‘इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षयः’ इस प्रतिज्ञा का परिपालन करते हुए आत्रेय आदि के विचारों, सिद्धान्तों, चिकित्साविधियों तथा अपने सभी पूर्ववर्ती आचार्यों (ब्रह्मा, अश्विनीकुमार, वसिष्ठ, मार्गव, अगस्त्य, भेड(ल), हारीत, वृद्धकाश्यप, काश्यप, अश्विवेश, आत्रेय पुनर्वसु, धन्वन्तरि, शौनक, निर्मि, विदेहाधिपति, जिन, माणभद्र आदि) द्वारा कहे गये औषध योगों का अपने तन्त्र में संग्रह किया है। इनके इस रचनाकौशल को देखकर यह निःसंकोच कहा जा सकता है कि ऐसी विषय-सम्पदा इसके पूर्ववर्ती किसी दूसरे ग्रन्थ में दुर्लभ है। अतएव सूक्तिकारों ने ‘सूत्रस्थाने तु वागभटः’ कहकर इसकी प्रशंसा की है। दूसरे आचार्यों ने ‘कलौ वागभटनामा च’ कहकर आयुर्वेद जगत् में इसी का एकमात्र साम्राज्य स्वीकार किया है। सुना जाता है कि इसके अतिरिक्त इन्होंने ‘अष्टाङ्गनिघण्टु’ तथा ‘अष्टाङ्गवतार’ नामक दो अन्य ग्रन्थों की भी रचना की थी। इस विषय में अन्य विद्वान् सहमत नहीं हैं। ‘अष्टांगनिघण्टु’ की हस्तलिखित पाण्डुलिपियाँ ओरियण्टल लायब्रेरी मद्रास में तथा तज्ञौर ग्रन्थ संग्रहालय में हैं जो आज तक प्रकाशित नहीं हो सकीं।
वागभट सम्बन्धी किंवदन्ती —प्राचीनकाल से प्रचलित किंवदन्तियों का ऐतिहासिक क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण स्थान होता है। तदनुसार सुना जाता है कि एक बार भगवान् धन्वन्तरि ‘कलियुग के कुप्रभाव से पीड़ित मनुष्य किस प्रकार नौरोग हो’—इस शुभकामना से वे अत्यन्त मनोहर पक्षी का रूप धारण कर उस समय में सुप्रसिद्ध वैद्यों के प्रत्येक घर के पास जाकर ‘कोऽरुक्, कोऽरुक्, कोऽरुक्’ इन तीन प्रश्नों को पूछते थे। उत्तर न मिलने पर वे एक घर से दूसरे घर में चले जाते थे। इस प्रकार एक दिन सिन्धुप्रदेश में स्थित वैद्यराज वागभट के आँगन के समीप स्थित खिले हुए वृक्ष की शाखा पर बैठकर फिर इन्होंने वे ही तीन प्रश्न पूछे। उस समय श्री वागभट रोगियों की चिकित्सा करने में व्यस्त थे, फिर भी उनका ध्यान उस पक्षी की स्पष्ट, श्रुतिमधुर तथा परोपकार प्रेरित गम्भीर अर्थ वाली वाणी को सुनकर और उस पक्षी के अत्यन्त सुन्दर रूप से प्रभावित होकर साथ ही उसे अलौकिक पक्षी समझकर इन्होंने सादर पके हुए फल एवं जल उसे समर्पित किये, किन्तु ग्रहण किये बिना उस पक्षी ने पुनः उन्हीं प्रश्नों को दुहराया। तब वागभट ने सोचा—यह पक्षी जब तक अपने प्रश्नों का उत्तर नहीं पायेगा, तब तक यह खायेगा-पीयेगा नहीं। यह निश्चय करके वागभट ने उसके उन प्रश्नों का उसी शैली में शास्त्रसम्मत उत्तर इस प्रकार दिया—‘हितभूक् मितभूक् अशाकभूक्’। वागभट के इन उत्तरों को सुनकर इनके द्वारा समर्पित फल-जल का सेवनकर प्रसन्न होकर उस पक्षी ने कहा—‘मैं सुयोग्य वैद्य की परीक्षा के लिए पक्षी का रूप धारण कर
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भारतवर्ष में घूमता हुआ यहाँ आया है। मैं तुम्हारे इस आयुर्वेदीय ज्ञान से अत्यन्त प्रसन्न हूँ। तुम अष्टांग आयुर्वेद की रचना करो। ऐसा कहकर वह पृथ्वी अन्तर्धान हो गया। उसके पश्चात् ही इन्होंने अपने इन ग्रन्थरत्नों की रचना की। यह किंवदन्ती निरकाल से 'वाग्भट' के साथ अनुस्यूत है।
परवर्ती कतिपय ग्रन्थकार एवं ग्रन्थ— 'कल्याणकारक'—इसकी रचना आचार्य उग्रादित्य ने की। ये जैन धर्मानुयायी थे, अतएव इन्होंने अपनी धर्मपरम्परा के अनुस्यू चरकोक्त 'माधुतैलिकबस्ति' के स्थान पर 'गौडतैलिकबस्ति' का विधान किया, क्योंकि जैन सम्प्रदाय के आचार्य प्राणिज द्रव्य (मधु) का प्रयोग नहीं करते।
योगशतक —इस ग्रन्थ के रचयिता श्री नागार्जुन हैं। अलबहूनी ने अपनी यात्रा के प्रसंग में जिस नागार्जुन का उल्लेख किया है, वे ८वीं अथवा ९वीं शती के आचार्य थे, न कि ये सुश्रुतसंहिता के प्रतिसंस्कर्ता थे। इन्होंने अपने ग्रन्थ में अनेक पद्य 'अष्टांगहृदय' से लिये हैं। अतः निश्चित रूप से यह वाग्भट से परवर्ती रचना है। इसमें आयुर्वेद के ८ अंगों के विवरण के अतिरिक्त उत्तररत्न भी दिया है। वरश्चि द्वारा लिखित 'योगशतक' इससे भिन्न है।
सिद्धसारसंहिता —इसके कृतिकार दुर्गुप्तात्माज 'रविगुप्त' हैं। ये बौद्धधर्मावलम्बी थे। १०वीं शती में वर्तमान चन्द्र ने अपनी रचनाओं में 'सिद्धसारसंहिता' के अनेक स्थलों को उद्धृत किया है। उक्त संहिता के रचयिता ९वीं शती में विद्यमान थे। यह ग्रन्थ अद्यावधि अप्रकाशित है। इसकी तीन पाण्डुलिपियाँ नेपाल सरकार के पुस्तकागार काठमाण्डू में सुरक्षित हैं।
हृदय के टीकाकार —अकोला निवासी हरिशास्त्री पराडकर वैद्य ने अष्टांगहृदय के 'वाग्भटविमर्श' में ३४ व्याख्याओं तथा २३ व्याख्याकारों के नाम दिये हैं। जिनमें श्री अरुणदत्त द्वारा रचित सर्वांगसुन्दरा व्याख्या सम्पूर्ण तथा श्री हेमाद्रि द्वारा रचित आयुर्वेदरसायना व्याख्या अपूर्ण है, जिसके शेष अंश अद्यावधि प्राप्त नहीं हुए हैं। वाग्भट संहिता अपने गुणों से सर्वत्र सम्मानित है, अतएव प्रायः सभी भाषाओं में इसके अनुवाद सुलभ हैं।
वाग्भट के व्याख्याकार अरुणदत्त —श्रीमुगांकदत्त पुत्र के श्री अरुणदत्त ने अष्टांगहृदय की 'सर्वांगसुन्दरा' नामक व्याख्या लिखी है। अन्य टीकाओं की तुलना में यह महत्त्वपूर्ण है। इन्होंने इसमें यथासम्भव पदों के अर्थ दिये हैं। शंकायुक्त स्थलों का समाधान किया है। प्रायः छन्दों के नाम-निर्देश तथा उनके लक्षण दिये हैं। विषय का समर्थन करने के लिए प्राचीन आयुर्वेदीय शास्त्रों के उद्धरण उद्धृत किये हैं, साथ में उनके ठीक-ठीक सन्दर्भ-संकेत भी दिये हैं। आवश्यकतानुसार यत्र-तत्र छन्द, व्याकरण आदि का परिचय भी दिया है। यद्यपि अरुणदत्त नामक अनेक विद्वान् हुए हैं तथापि अष्टांगहृदय के व्याख्याकार मुगांकदत्त के पुत्र अरुणदत्त ही हैं, जैसा कि इन्होंने ग्रन्थारम्भ की व्याख्या के तृतीय पद्य में कहा है—
श्रीमन्मुगाङ्कृतनयष्टीकामष्टाङ्गहृदयस्य । श्रीमानरुणः कुर्वते सम्यग्दृष्टः पदार्थबोधाय ॥ १ ॥
वाग्भट के व्याख्याकार हेमाद्रि —देवगिरि निवासी महाराजाधिराज महादेव के पुत्र श्रीरामदेव के शासन काल में हेमाद्रि ने 'चतुर्वर्गीचिन्तामणि' नामक ग्रन्थ की रचना की। इन्होंने ही इसके बाद 'अष्टांगहृदय' पर टीका की। प्राचीनकाल में पण्डितों की प्रतिभा बहुमुखी देखी जाती थी। आज 'हृदय' में जो इनकी टीका देखी जाती है, वह केवल अष्टांगहृदय के सूत्रस्थान तथा कल्पसिद्धि स्थानों पर ही है, अन्यत्र नहीं। इनकी टीका का नाम 'आयुर्वेदरसायना' है।
विशेष —हेमाद्रि ने अपनी व्याख्या द्वारा अष्टांगहृदय में निर्दिष्ट विषयों का अपनी योग्यतानुसार अत्यन्त सूक्ष्म विवेचन प्रस्तुत किया है। अनेक स्थानों पर इन्होंने अरुणदत्त की व्याख्या का खण्डन करके अपने मत की बुद्धिपूर्वक स्थापना की है और कहीं-कहीं तो इन्होंने अरुणदत्त की व्याख्या से भी विरुत्त
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विवरण उपस्थापित किया है। ऐसे अवसरों को चरक ने 'बुद्धेविशेषपस्तत्रासीत्' कहा है। सच तो यह है— 'विद्या गुरुणां गुरुः'।
पाठभेद तथा प्रक्षिप्त पद्य—वैदिक वाङ्मय को छोड़कर परवर्ती सभी प्रकार के साहित्य में पाठभेदों तथा प्रक्षिप्त गद्यों तथा पद्यों की भरमार देखी जाती है। तद्विद्य विद्वान् भी प्रसंगोचित पाठभेद को देखकर उसके समर्थक हो जाते हैं। 'इदम् इत्थम्' ( यह ऐसा ही है ) की कोई कसीटी उनके पास भी नहीं होती। प्रस्तुत 'हृदय' की व्याख्या करते समय मैंने निर्णयसागरीय प्रति को अपने ग्रन्थ का मूल आधार माना है। उसमें भी जहाँ-जहाँ स्वल्म थे, उनको 'यथाबुद्धिबलोदय' ठीक करने का प्रयास किया है। फिर भी अनेक स्थानों पर ऐसा अनुभव हुआ है कि जो पाठ मूल में ( ऊपर ) होना चाहिए था वह पाठ नीचे टिप्पणी में दिया गया है। ऐसे पाठनिर्णयकों को मेषदूत के व्याख्याकार पूर्णसरस्वती ने इस प्रकार आड़े हाथों लिया है। देखें—
'सुकविवचसि पाठानन्यथाकृत्य मोहाद् रसगतिमवधूय प्रौढमर्थं विहाय। विबुधवरसमाजे व्याक्रियाकामुकानां गुरुकुलविमुखानां धृष्टताये नमोऽस्तु'॥
टीकाकारों की आलोचना—धारानगरी के सुप्रसिद्ध भोजराज ऐसे अधिकांश टीकाकारों की आलोचना करते हुए कहते हैं—जो पाठ उनकी समझ में नहीं आता, उसे 'इति स्पष्टम्' लिखकर छोड़ देते हैं और जो पाठ स्वयं स्पष्ट है, उसकी निरर्थक समास, विग्रह आदि द्वारा विस्तार से व्याख्या कर दिया करते हैं। इनके अतिरिक्त जहाँ आवश्यकता नहीं है, वहाँ अनुपयोगी विषयों को डालकर पढ़ने तथा सुनने वालों के मन में प्रायः सभी टीकाकार भ्रम उत्पन्न कर देते हैं। यथा—
'दुर्बोधं यदतीव तद्विजहति स्पष्टार्थमित्युक्तिभिः स्पष्टार्थेष्विति विस्तृति विदधति व्यर्थः समासादिभिः। अस्थानेऽनुपयोगिभिश्च बहुभिर्जल्पैर्भ्रमं तन्वते श्रोतृणांमितिवाक्यविप्लवकृतः सर्वेऽपि टीकाकृतः॥ ( भोजराजकृत राजमार्तण्ड )
यद्यपि प्रस्तुत ग्रन्थ के श्रीअरुणदत्त एवं श्रीहेमाद्रि आयुर्वेद जगत् में स्वनाम धन्य प्राचीन व्याख्याकार हैं, तथापि 'दुर्बोधं यदतीव तद्विजहति' के अनेक उदाहरण इनकी टीकाओं में देखने को मिलते हैं, फिर भी उनकी योग्यता के सामने हम नतमस्तक हैं।
अष्टांगहृदय का कलेवर—निर्णयसागरीय अरुणदत्त तथा हेमाद्रि व्याख्या समूलस्तित अष्टांगहृदय की भूमिका की नवीं सूची में इसका उल्लेख विस्तार के साथ किया गया है। तदनुसार इसकी कुल स्थान संख्या ६, अध्याय संख्या १२० तथा श्लोक संख्या प्रायः ७४७ है।
'कीर्तिरक्षरसम्बद्धा स्थिरा भवति भूतले' इस सूक्ति के अनुसार विद्वान् लेखकों की कृतियों ही उन्हें सुदीर्घ काल तक जीवित रखने तथा यशस्वी बनाने में सहायक होती हैं। अतएव विद्वज्जन इस कार्य की ओर प्रवृत्त होते हैं। इसमें भी प्रकाशकों का महत्त्वपूर्ण योगदान होता है। वे न केवल ग्रन्थ के प्रकाशक होते हैं, अपितु ग्रन्थकार के भी प्रकाशक होते हैं। अन्यथा इनके अभाव में उत्तमोत्तम ग्रन्थों को दीमक चाट जाती है अथवा उन्हें प्राचीन ग्रन्थागारों की कारावास में शरण लेनी पड़ती है।
प्रस्तुत व्याख्या की विशेषता—अष्टांगसंग्रह की विस्तार से रचना करने के बाद जब वाग्भट ने साररूप 'हृदय' की रचना की तो विषयों को संक्षेप में उपस्थित करना आवश्यक हो गया था। व्यास-संक्षेप रचनाचतुर वाग्भट ने इस ग्रन्थ से सम्बन्धित विषयों की पूर्ति कैसे और कहाँ से की होगी, इसका ध्यान रखते हुए सम्पूर्ण ग्रन्थ में जहाँ-जहाँ जो संकेत दिये हैं, उन्हें व्याख्याकाल में सन्दर्भ-संकेत देकर अधिक स्पष्ट कर दिया गया है। इनकी सहायता से विज्ञ पाठक उन विषयों को यथास्थान सरलता से हूँद लेगा। साथ ही स्थान-स्थान पर 'अष्टांगहृदय' के दुरुह विषयों को स्पष्ट करने की दृष्टि से जिन-जिन विषयों को ग्रन्थान्तरों से लिया गया है, उनके भी सन्दर्भ-संकेत यथास्थान दे दिये हैं। मूल ग्रन्थ की टीका के
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अन्त में वक्तव्य तथा विशेष वचन दिये गये हैं, जो ग्रन्थ के आशय को स्पष्ट करने में सहायक होंगे। यद्यपि 'अष्टांगहृदय' में ग्रन्थकार ने तन्त्रयुक्तियों का उल्लेख नहीं किया है जिसका अष्टांगसंग्रह में उल्लेख हुआ है। अतः उनका परिगणन मात्र हमने यथाश्रम अपने वक्तव्य में कर दिया है। औषधनिर्माण प्रसंग में जहाँ-जहाँ आवश्यक समझा गया वहाँ-वहाँ औषध द्रव्य परिमाण तथा उसके निर्माण-विधि का भी उल्लेख कर दिया गया है। प्रस्तुत 'निर्मला' व्याख्या की ये विशेषताएँ हैं।
अष्टांगहृदय एक संग्रह-ग्रन्थ है। इसमें चरक, सुश्रुत, अष्टांगसंग्रह के तथा अन्य अनेक प्राचीन आयुर्वेदीय ग्रन्थों से उद्धरण लिये गये हैं। वाग्भट ने अपने विवेक से अनेक प्रसंगोचित विषयों का प्रस्तुत ग्रन्थ में समावेश किया है, यही कारण है कि इस ग्रन्थ का रूप अद्यतन बन पड़ा है। चरक आदि प्राचीन तन्त्रकारों ने जिन विषयों का सामान्य रूप से वर्णन किया था, उन्हें वाग्भट ने प्रमुख रूप देकर पाठकों का इस और विशेष ध्यानकर्षण किया है; जैसे—रक्तविकारों में रक्तनिर्हरण (सिरावेध, फस्द खोलना) एक महत्त्वपूर्ण चिकित्सा है। वातविकारों में आयुर्वेदीय विधि से बस्तित-प्रयोग करना अपने में एक दायित्वपूर्ण चिकित्सा है। जिसकी आज का चिकित्सक समाज प्रायः उपेक्षा कर बैठता है। शिलाजतु प्रयोग—शास्त्रीय विधि से इसका दीर्घकाल तक सेवन करना तथा कराना चाहिए। पथ्य-अपथ्य का विचार करके किया गया इसका प्रयोग रोग को नष्ट करके दीर्घायु प्रदान करता है। अग्रद्वयसंग्रह—यह (अ.हू.उ. ४०।४८-५८) प्रमुख रोगों में हितकर है। भूल किसी से भी हो सकती है, क्योंकि कहा गया है—'प्रमादो धीमतामपि'। अतः प्रामादिक अंशों को छोड़कर महत्त्वपूर्ण विषयों का ग्रहण करना विद्वानों का कर्तव्य है।
आभार—प्रस्तुत व्याख्या लिखते समय मेरे सामने श्रीअरुणदत्त, श्रीहेमद्रि कृत व्याख्याएँ तथा श्रीहरि शास्त्री द्वारा संगृहीत पाठभेद एवं टिप्पणियों से युक्त निर्णयसागरीय अष्टांगहृदय तथा पूज्य गुरुवर्य स्व० लालचन्द्रजी वैद्य की व्याख्यायुक्त अष्टांगहृदय था। इन सबसे मुझे प्रेरणा मिली, तदर्थ उन सबके प्रति मैं नतमस्तक हूँ।
आत्रेयकल्प सम्प्रति दिवंगत पीयूषपाणि गुरुवर्य पण्डितप्रवर लालचन्द्रजी वैद्य, प्रधानाचार्य श्रीअर्जुन आयुर्वेद महाविद्यालय, वाराणसी का आभार मैं किन शब्दों द्वारा प्रकट करूँ, जिनकी स्नेह-सुधा से छात्रावस्था में सिंचित मेरा शरीर, ज्ञानामृत से आप्लावित मेरा उत्तमांग तथा अमोघ आशीर्वादों से मेरा भूत, वर्तमान एवं भविष्यत् संवर्धित एवं परिरक्षित है, उनके प्रति सदैव नतमस्तक रहना ही मेरी शोभा है।
व्याकरण में पतञ्जलि, न्याय में गौतम, वैशेषिकदर्शन में कण्ठा, सांख्य में कपिल, मीमांसा में जैमिनि, छन्दःशास्त्र में पिंगलमुनि, साहित्य में भास एवं कालिदास के प्रतिस्पर्धी, पाश्चात्य साहित्य के विशेषज्ञ महाकवि पण्डितप्रवर बसन्त च्यम्बक शेबडे का भी मैं अधर्मण हूँ। जिन्होंने विविध शास्त्रों के उद्भट विद्वान् वाग्भट की प्रस्तुत कृति में स्थान-स्थान पर आये हुए व्याकरण सम्बन्धी पदों को स्पष्ट कर मेरा पथ प्रशस्त किया।
इस अवसर पर कुशकाय किन्तु अदम्य उत्साह-सम्पन्न अपनी सहधर्मिणी के स्वास्थ्थ सम्पन्न दीर्घायुष्य की कामना करता हूँ। जिनके सहयोग से मैं आज तक का साहित्य सृजन कर सका और भविष्य में भी कुछ कर सकूँ, यही साम्बसादाशिव से मेरी करबद्ध प्रार्थना है।
अन्त में प्रस्तुत अष्टांगहृदय के साज-सज्जा पूर्ण प्रकाशन में होने वाले व्ययभार आदि की चिन्ता न करके इसे यथासम्भव शुद्ध छापने में दत्तावधान चौखम्बा सुरभारती परिवार, वाराणसी ने जो तत्परता दिखायी है, तदर्थ उन्हें अनेकानेक साधुवाद देते हुए उनकी श्रीवृद्धि एवं यशोवृद्धि की कामना करता हूँ। इस ग्रन्थ के प्रूक-संशोधन में श्री योगेशकुमार पण्ड्या ने मनोयोगपूर्वक कार्य किया है, एतदर्थ वे धन्यवादार्ह हैं।
विदुषां विधेयः
डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी
विषयानुक्रमणिका
सूत्रस्थानम्
| विषय | पृष्ठांक | विषय | पृष्ठांक |
|---|---|---|---|
| ( १ ) आयुष्कामीयाध्यायः | रोग की परीक्षा | १८ | |
| मंगलाचरण | १ | देश-भेदों का वर्णन | १८ |
| आयुर्वेद का प्रयोजन | ३ | भूमिदेश का वर्णन | १९ |
| आयुर्वेदावतरण | ४ | काल के भेद | १९ |
| अष्टांगहृदय का स्वरूप | ५ | औषध के भेद | २० |
| आयुर्वेद के आठ अंग | ५ | शारीरिक दोषों की चिकित्सा | २० |
| दोषों का वर्णन | ८ | मानसिक दोषों की चिकित्सा | २० |
| विकृत-अविकृत दोष | ८ | चिकित्सा के चार पाद | २० |
| दोषों के स्थान एवं प्रकोपकाल | ९ | वैद्य के चार लक्षण | २१ |
| वय आदि के अनुसार काल | ९ | औषध-द्रव्य के चार लक्षण | २१ |
| दोषों का अग्नि पर प्रभाव | ९ | परिचारक ( उपस्थाता ) के चार लक्षण | २१ |
| दोषों का कोष्ठ पर प्रभाव | ९ | रोगी के चार लक्षण | २१ |
| दोषों से गर्भप्रकृति का वर्णन | १० | साध्य-असाध्य के अनुसार व्याधि के भेद | २२ |
| वातदोष के गुण | १० | सुखसाध्य रोग के लक्षण | २२ |
| पित्तदोष के गुण | १० | कष्टसाध्य रोग के लक्षण | २३ |
| कफदोष के गुण | ११ | याप्य रोग के लक्षण | २३ |
| संसर्ग-सन्निपात परिभाषा | ११ | प्रत्याख्येय रोग के लक्षण | २३ |
| धातुओं का वर्णन | ११ | त्याज्य रोगी | २३ |
| मलों का वर्णन | ११ | अध्याय-संग्रह वर्णन | २४ |
| दोष, धातु, मलों की वृद्धि एवं क्षय | १२ | सूत्रस्थान के अध्याय | २४ |
| रसों का वर्णन | १२ | शारीरस्थान के अध्याय | २४ |
| रसों का वात आदि पर प्रभाव | १३ | निदानस्थान के अध्याय | २४ |
| द्रव्य का वर्णन | १३ | चिकित्सास्थान के अध्याय | २५ |
| वीर्य का वर्णन | १४ | कल्प-सिद्धिस्थान के अध्याय | २५ |
| विपाक का वर्णन | १४ | उत्तरस्थान के अध्याय | २५ |
| द्रव्य के गुणों का वर्णन | १५ | अष्टांगहृदय के छः स्थान | २५ |
| रोग एवं आरोग्य के कारण | १५ | ( २ ) दिनचर्याध्यायः | |
| रोग-आरोग्य में भेद | १६ | ब्राह्ममुहूर्त में जागना | २६ |
| रोगों के दो भेद | १६ | दत्तवन का विधान | २६ |
| दो प्रकार के रोगाधिष्ठान | १७ | दत्तवन करने की विधि | २७ |
| मानसिक दोषों का परिचय | १७ | दत्तवन का निषेध | २७ |
| रोगी की परीक्षा | १७ | अञ्जन-प्रयोग | २८ |
२ अ० भू०
( १८ )
विषय
रसाजन-प्रयोगविधि नय्य आदि सेवन-निर्देश ताम्बूलसेवन-विधि ताम्बूलसेवन-निषेध अभ्यंगसेवन-विधान अभ्यंग के प्रमुख स्थान अभ्यंग का निषेध व्यायाम का विधान व्यायाम का निषेध अर्धशक्ति एवं काल-निर्देश शरीरमर्दन-निर्देश अतिव्यायाम से हानि व्यायाम आदि का निषेध उबटन के गुण स्नान के गुण उष्ण-शीत जलप्रयोग स्नान का निषेध भोजन आदि कर्तव्य सुख का साधन धर्म मित्र-अमित्र सेवन-विचार पापकर्मों का त्याग अनुकूल व्यवहार-निर्देश समदृष्टिता का निर्देश सम्मान करने का निर्देश याचकों की सम्मान-विधि उपकार का निर्देश समभाव का निर्देश मधुरभाषण-निर्देश भाषण-विधि विचारों को गुप्त रखें परच्छन्दानुवर्तन इन्द्रियव्यवहार-विधि विवर्ग-विरोध का निषेध सभी धर्मों का आचरण शरीरशुद्धि के प्रकार रत्न आदि का धारण छाता आदि धारण दण्ड आदि धारण गमन-निर्देश
पृष्ठांक
२८ २८ २८ २९ २९ ३० ३० ३० ३१ ३१ ३१ ३१ ३२ ३२ ३२ ३३ ३३ ३३ ३४ ३४ ३४ ३४ ३५ ३५ ३५ ३५ ३५ ३५ ३६ ३६ ३६ ३६ ३६ ३६ ३६
विषय
निषिद्ध कार्य छौंक आदि करने की विधि आंगिक चेष्टाओं का निषेध शारीरिक आदि चेष्टाओं की मात्रा १. अन्य सदाचार २. अन्य सदाचार मद्यविक्रय आदि का निषेध अन्य निषिद्ध कर्म अन्य सदुपदेश सदाचारसूत्र विचार-पद्धति सदवृत्त का उपसंहार
( ३ ) ऋतुचर्याध्यायः
छः ऋतुएँ उत्तरायण तथा आदानकाल अग्निगुण-प्रधान आदानकाल विसर्गकाल-दक्षिणायन विसर्गकाल-परिचय बल का चयापचय हेमन्त ऋतुचर्या प्रातःकाल के कर्तव्य स्नान आदि की विधि शीतनाशक उपाय निवास-विधि शिशिर ऋतुचर्या वसन्त ऋतुचर्या मध्याह्नचर्या वसन्त ऋतु में अपथ्य ग्रीष्म ऋतुचर्या सेवनीय पदार्थ सत्सेवन-विधि मद्यसेवन-विधि मद्यपान का निषेध भोजन-विधान पेय-विधान रात्रि में दुग्धपान-विधि मध्याह्नचर्या १. शयन-विधान २. शयन-विधान
पृष्ठांक
३७ ३७ ३७ ३७ ३७ ३८ ३८ ३८ ३९ ३९ ३९ ४० ४० ४१ ४२ ४२ ४२ ४३ ४३ ४४ ४४ ४४ ४५ ४५ ४६ ४६ ४६ ४६ ४७ ४७ ४७
( १९ )
| विषय | पृष्ठांक | विषय | पृष्ठांक |
|---|---|---|---|
| रात्रिचर्या | ४८ | शोधन की आवश्यकता | ५९ |
| मनोहर वातावरण | ४८ | संशोधन कर्म की प्रशंसा | ५९ |
| वर्षा ऋतुचर्या | ४८ | रसायन, वाजीकरण योगों का प्रयोग | ६० |
| शरीर-शुद्धि | ४८ | शोधनोत्तर चिकित्सा | ६० |
| सैकनीय विहार | ४९ | चिकित्सा का फल | ६० |
| त्याज्य विहार | ४९ | आगन्तुज रोग | ६१ |
| शरद् ऋतुचर्या | ४९ | निजागन्तुज रोगों का निरोध एवं शमन | ६१ |
| आहार-विधि | ५० | शोधन योग्य ऋतुएँ | ६२ |
| हंसोदकसेवन-निर्देश | ५० | स्वस्थ रहने के उपाय | ६२ |
| विहार-विधि | ५० | ( ५ ) द्रवद्रव्यविज्ञानीयाध्यायः | |
| अपथ्य-निषेध | ५० | अथ तोयवर्गः | |
| संक्षिप्त ऋतुचर्या | ५० | गंगा का जल | ६४ |
| रससेवन-निर्देश | ५२ | गंगाजल का परिचय | ६४ |
| ऋतुसन्धि में कर्तव्य | ५२ | सामुद्र जल | ६५ |
| ( ४ ) रोगानुत्पादनीयाध्यायः | पानीय जल | ६५ | |
| वेगों को न रोकने का निर्देश | ५४ | न पीने योग्य जल | ६५ |
| अपानवायु को रोकने से हानि | ५४ | १. नदीजल का वर्णन | ६६ |
| मलवैगरोधज रोग | ५५ | २. नदीजल का वर्णन | ६६ |
| मूत्रवैगरोधज रोग | ५५ | ३. नदीजल का वर्णन | ६६ |
| उक्त रोगों की चिकित्सा | ५५ | कूप आदि का जल | ६७ |
| मूत्रवैगरोधज रोग-चिकित्सा | ५५ | जलपान-विधि | ६७ |
| उदगारवैगरोधज रोग-चिकित्सा | ५५ | जलपान का प्रभाव | ६७ |
| छाँक के वेग को रोकने से हानि | ५६ | शीतल जलपान के लाभ | ६७ |
| छिन्कावेगनिरोधज रोग-चिकित्सा | ५६ | उष्ण जलसेवन के लाभ | ६८ |
| तृषावेगनिरोधज रोग-चिकित्सा | ५६ | श्रुतशीत एवं बासी जल | ६८ |
| क्षुधावेगनिरोधज रोग-चिकित्सा | ५६ | मारियल का जल | ६८ |
| निद्रावेगनिरोधज रोग-चिकित्सा | ५६ | उत्तम एवं अधम जल | ६८ |
| कासवेगनिरोधज रोग-चिकित्सा | ५७ | अथ क्षीरवर्गः | |
| श्वमशवासवेगनिरोधज रोग-चिकित्सा | ५७ | सामान्य दूध के गुण | ६८ |
| जुम्भावेगनिरोधज रोग-चिकित्सा | ५७ | गाय के दूध के गुण | ६९ |
| अश्ववेगनिरोधज रोग-चिकित्सा | ५७ | भैंस के दूध के गुण | ६९ |
| छर्दिवेगनिरोधज रोग | ५८ | बकरी के दूध के गुण | ६९ |
| छर्दिवेगनिरोधज रोग-चिकित्सा | ५८ | ऊँटनी के दूध के गुण | ७० |
| शुक्र के वेग को रोकने के कारण उत्पन्न रोग | ५८ | मानुषी दूध के गुण | ७० |
| शुक्र के वेग को रोकने के कारण उत्पन्न | भेड़ी के दूध के गुण | ७० | |
| रोगों की चिकित्सा | ५८ | हथिनी के दूध के गुण | ७० |
| वेगरोधी के असाध्य लक्षण | ५८ | एकशफ दूध के गुण | ७० |
| सामान्य चिकित्सा | ५९ | आम-श्रुत दुग्ध-गुण | ७० |
| धारणीय वेग | ५९ | धारोष्ण दूध के गुण | ७० |
( २० )
विषय
दक्षिण-वर्णन तक्र का वर्णन मस्तु का वर्णन नवनीत-वर्णन दूध का नवनीत घृत के गुण पुराने घृत के प्रयोग किलाट आदि का वर्णन उत्तम-अधम विचार
अथ इक्षुवर्गः
ईख के रस का वर्णन अगले भाग का रस यान्त्रिक रस के भेद ईख के भेद एवं गुण शतपर्वक आदि ईखों के गुण फाणित के गुण गुड़ के गुण पुराने-नये गुड़ के गुण मत्स्यण्डिका आदि के गुण यासशर्करा के गुण सभी शर्कराओं के गुण शर्करा की उत्तमता
अथ मधुवर्गः
मधु का वर्णन उष्ण मधुसेवन का निषेध संशोधन में मधु-प्रयोग
अथ तैलवर्गः
सानान्य तैल का वर्णन एण्डतेल के गुण सरसों का तेल बहेड़े की गिरी का तेल नीम की गिरी का तेल अतसी-कुसुम्भ तेल प्राणिज स्नेह
अथ मद्यवर्गः
मद्य का वर्णन नया एवं पुराना मद्य मद्य का निषेध विभिन्न सुराओं का वर्णन
पृष्ठांक
विषय
७१ वाहणी-परिचय ७१ यव ( जो से निर्मित ) सुरा ७२ बहेड़ा की सुरा ७२ कौहली सुरा ७२ मधूलक सुरा ७३ अरिष्ट-परिचय ७३ मुनक्का ( मार्ट्रिक ) आसव ७३ खाजूँ, शार्कर आसव ७३ गुड़-निर्मित आसव सीधु का वर्णन
७४ मध्वासव का वर्णन ७४ शुक्त का वर्णन ७४ गुड़ आदि शुक्त ७४ कन्द आदि शुक्त ७५ शाण्डाकी-वर्णन ७५ धान्याम्ल आदि का वर्णन ७५ सौवीरक तथा तुषोदक
अथ मूत्रवर्गः
मूत्रों का वर्णन
( ६ ) अत्रस्वरूपविज्ञानीयाध्यायः
अथ शूकधान्यवर्गः
७६ शूकधान्यों का वर्णन ८७ रक्तशालि का वर्णन ८७ क्रमशः गुणहीनता ८७ यवक आदि शालिधान्य ८७ व्रीहिधान्य का वर्णन ८७ सामान्य गुण वाले षष्ठिक ८८ अन्य व्रीहिधान्य-वर्णन ८८ तुणधान्यों का वर्णन ८८ प्रियंगुधान्य का वर्णन ८८ कोटोधान्य का वर्णन ८८ जौ का वर्णन ८९ अनुयव का वर्णन ८९ वंशज जौ का वर्णन ८९ गोधूम का वर्णन ८९ नन्दीमुखी का वर्णन
अथ शिम्बोधान्यवर्गः
८९ शिम्बोधान्य-परिचय ९० मूँग, मटर, राजमाष
पृष्ठांक
८१ ८१ ८१ ८१ ८१ ८१ ८२ ८२ ८२ ८३ ८३ ८३ ८३ ८४ ८४ ८४ ८४
( २१ )
विषय
कुलथी का वर्णन १० सेम का वर्णन १० माष ( उड़द ) का वर्णन १० काकाण्डोला एवं केवाँच १० तिल का वर्णन ११ अतसी एवं कुसुम्भ बीज ११ माष, यवक-वर्णन ११ धान्य-विवेचन ११
अथ कृतान्नवर्गः
पकाये गये अन्नों का वर्णन १२ पेया का वर्णन १२ विलेपी का वर्णन १२ औदन ( भात ) का वर्णन १३ संक्षिप्त निर्देश १३ मांसरस के गुण १३ मूँग का यूप १३ कुलथी का यूप १३ तिल, पिण्याक आदि १३ रसाला के गुण १३ पानक ( शीतल पेय ) के गुण १४ लाजा का वर्णन १४ पृथुक ( च्यूड़ा ) का वर्णन १४ धाना का वर्णन १४ सतुओं का वर्णन १५ पिण्याक-वर्णन १५ वेसवार-वर्णन १५ मूँग आदि के वेसवार १५ अपूपों का वर्णन १६
अथ मांसवर्गः
मुग-परिचय १६ विष्किर-परिचय १६ प्रतुद-परिचय १७ बिलेशय-परिचय १७ प्रसहमुग-पक्षी १७ महामुग-परिचय १८ जलचर पक्षी १८ मत्स्य-परिचय १८ आठ प्रकार के मांस १८ बकरी-भेड़ का वर्णन १८
पृष्ठांक
१० शेष प्राणियों का निर्णय १८ मांसों का वर्णन १९ शशकमांस के गुण १९ वर्तक आदि के मांस १९ मोर का मांस १९ कुक्कुट का मांस १९ पालतू मुर्गा का मांस १९ क्रकर एवं उपचक्रक के मांस १९
काणकपोतक का मांस १९ चटक का मांस १९ आठों मांसों का वर्णन १९ महामुर्गों के मांस १०० बकरा का मांस १०० भेड़ का मांस १०० गाय का मांस १०० भैंसा का मांस १०० सूअर का मांस १०० मत्स्य का मांस १०० चिलिचिम मत्स्य का मांस १०० लाव आदि का वर्णन १०१ भक्ष्यमांस-वर्णन १०१ अभक्ष्यमांस-वर्णन १०१ विशिष्ट अवयवों के मांस १०१
अथ शाकवर्गः
शाकों का वर्णन १०२ सुनिष्पणक का वर्णन १०२ राजक्षव का वर्णन १०२ वास्तुक का वर्णन १०२ काकमाची का वर्णन १०२ चांगेरी का वर्णन १०२ पटोल आदि शाक १०३ परबल का शाक १०३ बृहतीद्रव्य का वर्णन १०३ अडूसा का वर्णन १०३ करेला का वर्णन १०३ बैगन का वर्णन १०३ करीर का वर्णन १०३ तोरई ( कोशातकी ) तथा बाकुची १०४ ( भवल्युज ) का शाक १०४
( २२ )
| विषय | पृष्ठांक | विषय | पृष्ठांक |
|---|---|---|---|
| तण्डुलीय का वर्णन | १०४ | उत्तम-अधम निर्णय | ११० |
| मुआतक का वर्णन | १०४ | अथ फलवर्गः | |
| पालंकी का वर्णन | १०४ | द्राक्षा-परिचय | १११ |
| उपीदिका का वर्णन | १०४ | दाडिमफल का वर्णन | १११ |
| चक्षु का वर्णन | १०४ | केला आदि फलों का वर्णन | १११ |
| विदारीकन्द का वर्णन | १०४ | ताल आदि फलों का वर्णन | ११२ |
| जीवन्ती का वर्णन | १०४ | बिल्वफल का वर्णन | ११२ |
| कूम्भाण्ड आदि का वर्णन | १०५ | कपित्थफल का वर्णन | ११२ |
| त्रपुस का वर्णन | १०५ | जामुनफल का वर्णन | ११२ |
| तुम्ब का वर्णन | १०५ | आम का वर्णन | ११३ |
| शीर्णवृन्त-फल-शाक | १०५ | वृक्षाम्ल का वर्णन | ११३ |
| मुणाल आदि का वर्णन | १०५ | शमीफल का वर्णन | ११३ |
| कलम्ब आदि का वर्णन | १०६ | पीलुफल का वर्णन | ११३ |
| चिल्ली शाक का वर्णन | १०६ | मातुलुंग ( बिजौरानीबू ) का वर्णन | ११३ |
| तकारी आदि शाक का वर्णन | १०६ | भिलावा का वर्णन | ११४ |
| पुनर्नवा एवं कालशाक | १०६ | पारेवत का वर्णन | ११४ |
| करञ्ज का शाक | १०६ | आरुक्फल का वर्णन | ११४ |
| शतावरी का शाक | १०६ | कच्चे दाख आदि फल | ११४ |
| वंशकरीर का शाक | १०७ | करमर्द ( करौदा ) के कच्चे फल | ११५ |
| पत्तूर का शाक | १०७ | कोल, कर्कन्धु-वर्णन | ११५ |
| कासमर्द का शाक | १०७ | इमली एवं बैर के सूखे फल | ११५ |
| कुसुम्भ का शाक | १०७ | बड़हर के फल | ११५ |
| सरसों ( सर्षप ) के पत्तों का शाक | १०७ | त्याज्य धान्य, शाक एवं फल | ११५ |
| बालमूली का शाक | १०७ | अथोषधवर्गः | |
| वृद्धमूली का शाक | १०७ | लवण सामान्य के गुण | ११५ |
| स्नेहसिद्ध मूली का शाक | १०७ | संधानमक के गुण | ११६ |
| सूखी मूली का शाक | १०८ | सौवर्चलनमक के गुण | ११६ |
| कच्ची मूली का शाक | १०८ | विड़नमक के गुण | ११६ |
| पिण्डालु का शाक | १०८ | सामुद्र नमक के गुण | ११६ |
| कुटेरक आदि शाक | १०८ | औदुभिद् नमक के गुण | ११७ |
| सुरस का शाक | १०९ | कृष्णलवण के गुण | ११७ |
| सुमुख का शाक | १०९ | रोमकलवण के गुण | ११७ |
| धानिया ( आर्दिवा ) का शाक | १०९ | सामान्य निर्देश | ११७ |
| लशुनकन्द का शाक | १०९ | यवक्षार के गुण | ११७ |
| पलाण्डु का शाक | १०९ | सभी प्रकार के क्षार | ११७ |
| गूञ्जनक का शाक | १०९ | हींग का वर्णन | ११८ |
| सूरण का शाक | ११० | हरीतकी का वर्णन | ११८ |
| भूकन्द का शाक | ११० | आमलक का वर्णन | ११८ |
| शाकों में उत्तरोत्तर गुहता | ११० | बिभीतक का वर्णन | ११८ |
( २३ )
| विषय | पृष्ठांक | विषय | पृष्ठांक |
|---|---|---|---|
| त्रिफल का वर्णन | ११९ | दोषों को दूषित न करें | १२९ |
| त्रिजात एवं चतुर्जात | ११९ | तीन उपस्तम्भ | १२९ |
| मरिच के गुण | ११९ | आहार नामक उपस्तम्भ | १२९ |
| पिप्ली के गुण | ११९ | निद्रा नामक उपस्तम्भ | १३० |
| सोठ के गुण | ११९ | निद्रा का अभाव | १३० |
| आद्रक के गुण | ११९ | निद्रा के गुण-दोष | १३० |
| त्रिकटु के गुण | ११९ | निद्रा सम्बन्धी विचार | १३० |
| चव्य तथा पीपलमूल | १२० | दिन में न सोने का निर्देश | १३० |
| चित्रक के गुण | १२० | अकालशयन से हानि | १३१ |
| पञ्चकोल के गुण | १२० | चिकित्सा-निर्देश | १३१ |
| बृहत्पञ्चमूल के गुण | १२० | निद्रानाश के लक्षण | १३१ |
| लघुपञ्चमूल के गुण | १२० | निद्रासेवन-निर्देश | १३१ |
| मध्यमपञ्चमूल के गुण | १२० | पूर्ण निद्राप्राप्ति-विधि | १३१ |
| जीवनपञ्चमूल के गुण | १२० | ब्रह्मचर्य नामक उपस्तम्भ | १३१ |
| तुणपञ्चमूल के गुण | १२१ | स्त्रीसहवास का वर्णन | १३२ |
| ( ७ ) अन्नरक्षाध्यायः | |||
| प्राणाचार्य की नियुक्ति | १२२ | मैथुन के अयोग्य स्थिति | १३३ |
| चिकित्सक का कर्तव्य | १२२ | मैथुन सम्बन्धी अन्य निर्देश | १३३ |
| विषैले भात के लक्षण | १२२ | विपरीत व्यवहार का फल | १३३ |
| विषैले व्यञ्जनों के लक्षण | १२३ | संयम का महत्त्व | १३३ |
| विषैले मांस आदि के लक्षण | १२३ | मैथुनोत्तर कर्तव्य | १३४ |
| विषदाता के लक्षण | १२३ | राजा आदि का कर्तव्य | १३४ |
| विषैले अन्न की परीक्षा | १२४ | ( ८ ) मात्रादशितियाध्यायः | |
| विषैले अन्न का प्रभाव | १२४ | आहारमात्रा का वर्णन | १३५ |
| स्पर्शज विषचिकित्सा | १२४ | मात्रा में गुरु-लघु विचार | १३५ |
| मुख में विष का प्रभाव | १२५ | हीनमात्रा वाले आहार से हानि | १३६ |
| आमाशयगत विष के लक्षण | १२५ | अधिक मात्रा वाले आहार से हानि | १३६ |
| पक्वाशयगत विष के लक्षण | १२५ | विमूचिका के लक्षण | १३६ |
| उक्त दोनों की चिकित्सा | १२५ | अलसक की परिभाषा | १३६ |
| ताम्र एवं स्वर्ण भस्म-प्रयोग | १२५ | विमूचिका की परिभाषा | १३६ |
| स्वर्णभस्म का प्रभाव | १२५ | विमूचिका के लक्षण | १३६ |
| विरोधी आहार | १२६ | अलसक का वर्णन | १३७ |
| आनुपदेशीय मांस | १२६ | दण्डालसक का वर्णन | १३७ |
| दुग्धपान-विचार | १२६ | आमविष का वर्णन | १३७ |
| विरुद्ध द्रव्यों के लक्षण | १२६ | आमदोष की चिकित्सा | १३७ |
| विरोधी आहारों का सेवन | १२८ | पाण्डिदाह-प्रयोग | १३८ |
| अपथ्य का त्याग एवं पथ्य का सेवन | १२९ | अन्य उपचार | १३८ |
| सहसा त्याग का निषेध | १२९ | अपतर्पण-प्रयोग | १३९ |
| दोषों का ह्रास, गुणों की वृद्धि | १२९ | हेतुविपरीत आदि चिकित्सा | १३९ |
| विपरीतार्थकारी चिकित्सा | १३९ |
( २४ )
| विषय | पृष्ठांक | विषय | पृष्ठांक |
|---|---|---|---|
| आमाजीर्ण के लक्षण | १३९ | द्रव्य-वर्णन की समाप्ति | १४८ |
| विष्टद्र्धाजीर्ण के लक्षण | १३९ | रसवर्णन-प्रस्ताव | १४८ |
| विद्र्धाजीर्ण के लक्षण | १३९ | द्रव्यगत वीर्य-वर्णन | १४८ |
| चिकित्सासूत्र | १३९ | चरकसम्मत वीर्य | १४८ |
| विलम्बिका के लक्षण | १३९ | वाग्भट का मत | १४८ |
| रसशेषाजीर्ण-चिकित्सा | १४० | रस आदि में वीर्य की श्रेष्ठता | १४८ |
| अजीर्ण का सामान्य लक्षण | १४० | वीर्य सम्बन्धी अन्य मत | १४८ |
| अजीर्ण के विविध कारण | १४० | वाग्भट का समर्थन | १४८ |
| समशन आदि के लक्षण | १४० | वीर्य के लक्षण | १४९ |
| शास्त्रीय भोजन-विधि | १४१ | विपाक का वर्णन | १४९ |
| त्याज्य भोजन-विधि | १४१ | विपाकज रस-क्षेद | १४९ |
| असेवनीय आहार | १४१ | रस, वीर्य, विपाक, प्रभाव | १४९ |
| सेवनीय आहार | १४२ | द्रव्य का स्वाभाविक बल | १५० |
| रात में सेवनीय पदार्थ | १४२ | रस आदि का स्वाभाविक बल | १५० |
| अन्य पदार्थों को खाने की विधि | १४२ | प्रभाव का वर्णन | १५० |
| आमाशय के चार भाग | १४२ | द्रव्य आदि के कर्म | १५० |
| विभिन्न प्रकार के अनुपान | १४२ | भिन्नता के उदाहरण | १५० |
| उत्तम अनुपान | १४३ | ( १० ) रसभेदीयाध्यायः | |
| अनुपान-सेवन का फल | १४३ | मधुर आदि रसों की उत्पत्ति | १५२ |
| १. अनुपान का निषेध | १४३ | मधुररस के लक्षण | १५२ |
| २. अनुपान का निषेध | १४३ | अम्लरस के लक्षण | १५२ |
| ३. अनुपान का निषेध | १४३ | लवणरस के लक्षण | १५३ |
| भोजन-समय का निर्देश | १४४ | तिक्तरस के लक्षण | १५३ |
| ( ९ ) द्रव्यादिविज्ञानीयाध्यायः | कटुरस के लक्षण | १५३ | |
| द्रव्य की प्रधानता | १४५ | कषायरस के लक्षण | १५३ |
| द्रव्य का स्वरूप | १४५ | रसों के स्वरूप | १५३ |
| द्रव्य की उत्पत्ति | १४५ | रसों के कर्म | १५३ |
| उत्पत्ति के कारण | १४५ | मधुररस के कर्म | १५३ |
| नामकरण में कारण | १४५ | अम्लरस के कर्म | १५३ |
| द्रव्य में अनेक रस | १४६ | लवणरस के कर्म | १५४ |
| अनेक दोषज रोग | १४६ | तिक्तरस के कर्म | १५४ |
| द्रव्यगत गुरु आदि गुण | १४६ | कटुरस के कर्म | १५४ |
| पार्थिव द्रव्य का वर्णन | १४६ | कषायरस के कर्म | १५४ |
| आयु द्रव्य का वर्णन | १४६ | मधुरस्कन्ध के द्रव्य | १५५ |
| आग्नेय द्रव्य का वर्णन | १४७ | अम्लस्कन्ध के द्रव्य | १५५ |
| वायव्य द्रव्य का वर्णन | १४७ | लवणस्कन्ध के द्रव्य | १५५ |
| नाभस द्रव्य का वर्णन | १४७ | तिक्तस्कन्ध के द्रव्य | १५५ |
| औषधमय द्रव्य | १४७ | कटुस्कन्ध के द्रव्य | १५५ |
| द्रव्यों की विशेषता | १४७ | कषायस्कन्ध के द्रव्य | १५६ |
( २५ )
| विषय | पृष्ठांक | विषय | पृष्ठांक |
|---|---|---|---|
| मधुररस का विशिष्ट वर्णन | १५६ | स्वेदक्षय के लक्षण | १६४ |
| अम्लरस का विशिष्ट वर्णन | १५६ | अन्य मलों के क्षय-लक्षण | १६४ |
| लवणरस का विशिष्ट वर्णन | १५६ | वृद्धि एवं क्षय-निर्देश | १६५ |
| तिक्त एवं कटु रसों का विशिष्ट वर्णन | १५६ | पुरीष आदि मलों का महत्त्व | १६५ |
| कषायरस का विशिष्ट वर्णन | १५६ | वात आदि के विशिष्ट स्थान | १६५ |
| रसों का वर्णन | १५६ | वातज रोग प्रतीकार | १६५ |
| रसों के ६३ भेद | १५७ | वृद्धरक्तादि की चिकित्सा | १६५ |
| रससंयोगों के असंख्य भेद | १५८ | मलों की वृद्धि एवं क्षय की चिकित्सा | १६६ |
| ( ११ ) दोषादिविज्ञानीयाध्यायः | |||
| शरीर के आधार | १६० | धातुओं की वृद्धि-क्षय | १६६ |
| प्रकृतिस्य दोषों के कर्म | १६० | वृद्धि-क्षय का कारण | १६६ |
| रस आदि धातुओं के कर्म | १६० | वृद्धि-क्षय का अन्य स्वरूप | १६७ |
| मलों के प्रमुख कर्म | १६१ | दोष, धातु, मल एवं स्रोतों की दुष्टि | १६७ |
| वातवृद्धि के लक्षण | १६१ | मलायनों का परिचय | १६७ |
| पित्तवृद्धि के लक्षण | १६१ | ओजस् का वर्णन | १६७ |
| कफवृद्धि के लक्षण | १६१ | ओजःक्षय के कारण, लक्षण एवं चिकित्सा | १६७ |
| रक्तवृद्धि के लक्षण | १६१ | ओजोवृद्धि के लक्षण | १६८ |
| मांसवृद्धि के लक्षण | १६२ | वृद्धि-क्षय का चिकित्सासूत्र | १६८ |
| मेदोवृद्धि के लक्षण | १६२ | द्वेष एवं प्रार्थना का कारण | १६८ |
| अस्थिवृद्धि के लक्षण | १६२ | अवस्थानुसार दोषों के कर्म | १६८ |
| मज्जावृद्धि के लक्षण | १६२ | दोषों को सम रखना | १६९ |
| शुक्रवृद्धि के लक्षण | १६२ | ( १२ ) दोषभेदोपाध्यायः | |
| पुरीषवृद्धि के लक्षण | १६२ | वात के प्रमुख स्थान | १७० |
| मूत्रवृद्धि के लक्षण | १६३ | पित्त के प्रमुख स्थान | १७० |
| स्वेदवृद्धि के लक्षण | १६३ | कफ के प्रमुख स्थान | १७१ |
| अन्य मलवृद्धि के लक्षण | १६३ | वात के पाँच भेद | १७१ |
| वातदोष के क्षय-लक्षण | १६३ | पाँच वातों का वर्णन | १७१ |
| पित्तदोष के क्षय-लक्षण | १६३ | उदानवायु का वर्णन | १७१ |
| कफदोष के क्षय-लक्षण | १६३ | व्यानवायु का वर्णन | १७१ |
| रसधातु के क्षय-लक्षण | १६३ | समानवायु का वर्णन | १७१ |
| रक्तधातु के क्षय-लक्षण | १६४ | अपानवायु का वर्णन | १७२ |
| मांसधातु के क्षय-लक्षण | १६४ | पित्त के पाँच भेद | १७२ |
| मेदोधातु के क्षय-लक्षण | १६४ | पाचकपित्त का वर्णन | १७२ |
| अस्थिधातु के क्षय-लक्षण | १६४ | रञ्जकपित्त का वर्णन | १७२ |
| मज्जाधातु के क्षय-लक्षण | १६४ | साधकपित्त का वर्णन | १७२ |
| शुक्रधातु के क्षय-लक्षण | १६४ | आलोचकपित्त का वर्णन | १७२ |
| पुरीषक्षय के क्षय-लक्षण | १६४ | भ्राजकपित्त का वर्णन | १७३ |
| मूत्रक्षय के क्षय-लक्षण | १६४ | कफ का वर्णन | १७३ |
| अवलम्बक कफ का वर्णन | १७३ | ||
| वलेदक कफ का वर्णन | १७३ |
( २६ )
विषय
बोधक कफ का वर्णन तर्पक कफ का वर्णन श्लेषक कफ का वर्णन उपसंहार वात के चय, कोप, शम का वर्णन पित्त के चय, कोप, शम का वर्णन कफ के चय, कोप, शम का वर्णन दोषों के चय का वर्णन दोषों के प्रकोप का वर्णन चय, कोप, शम का वर्णन चय आदि का विशेष वर्णन कालस्वभाव का वर्णन दोषों की व्याप्ति एवं निवृत्ति निदान, रूप, चिकित्सा-वर्णन रोगों की उत्पत्ति के कारण दोषों के प्रकोप के कारण हीनयोग आदि का वर्णन काल का वर्णन कर्म का वर्णन उपसंहार एवं रोगमार्ग बाहरी रोगमार्ग आभ्यन्तर रोगमार्ग मध्यम रोगमार्ग वातदोष के कर्म पित्तदोष के कर्म कफदोष के कर्म दोषलक्षण निर्वाचन का हेतु चिकित्सा में अभ्यास का महत्त्व रोगों के तीन भेद रोगों का परिचय त्रिविध रोग-चिकित्सा रोगों के दो भेद रोग-भेदों के नाम स्वतन्त्र रोग परतन्त्र रोग मलों का विचार दोषों का विचार चिकित्सासूत्र उपद्रवचिकित्सा-निर्देश
पृष्ठांक
१७३ १७३ १७३ १७४ १७४ १७४ १७४ १७४ १७५ १७५ १७५ १७५ १७६ १७६ १७६ १७७ १७७ १७७ १७७ १७८ १७८ १७८ १७८ १७९ १७९ १७९ १७९ १८० १८० १८० १८० १८० १८० १८० १८० १८०
विषय
रोगनामनिर्धारण-विचार दोषों का रोगकर्तृत्व चिकित्साविधि-निर्देश दूष्य आदि ज्ञान-निर्देश रोग की गुरुता-लघुता का विचार भ्रिषणबूब की निन्दा शूल का दुष्परिणाम चिकित्सक का कर्तव्य दोषभेदों का वर्णन दोषवृद्धि के तीन भेद संसर्ग के तीन भेद संसर्ग के छः भेद समस्त दोषवृद्धि के १३ भेद १३ भेदों के उदाहरण एक भेद का निर्देश पुनः छः भेद वृद्ध दोषों का योग क्षीण दोषों का योग वृद्धि, सम, क्षय भेद से छः क्षय-वृद्धि भेद से पुनः छः ६ भेद ६२ दोषभेद ६३वों भेद दोषों के अनन्त भेद
पृष्ठांक
१८० १८० १८१ १८१ १८१ १८१ १८२ १८२ १८२ १८२ १८२ १८२ १८२ १८२ १८२ १८२ १८२ १८२ १८२ १८२ १८२ १८२ १८२ १८२ १८२ १८२ १८२ १८२ १८२ १८२ १८२
( १३ ) दोषोपक्रमणीयाध्यायः
वातदोष की चिकित्सा पित्तदोष की चिकित्सा कफदोष की चिकित्सा विषयोपसंहार चिकित्सा-निर्देश चिकित्सा का समय शुद्ध प्रयोग का परिचय दोषों का स्थानान्तर गमन दोषों का कोष्ठगमन पुनः रोगोत्पादन अन्य स्थानों में दोषप्रकोप चिकित्सा-निर्देश तिर्थगत दोष-चिकित्सा चिकित्सा-विधि साम-निराम दोषों के लक्षण
( २७ )
| विषय | पृष्ठांक | विषय | पृष्ठांक |
|---|---|---|---|
| आम का वर्णन | १८८ | स्थूलता से कृशता श्रेष्ठ | १९५ |
| आमसम्बन्धी मतान्तर | १८८ | कृशता, स्थूलता-चिकित्सा | १९५ |
| सामदोष एवं सामरोग | १८८ | कृशता चिकित्सा | १९६ |
| सामदोषों की चिकित्सा | १८८ | मांस की महत्ता | १९६ |
| दोषनिर्हरण-विधि | १८८ | स्थूलता-कृशता की चिकित्सा | १९६ |
| आसन्न दोष का निर्हरण | १८९ | ( १५ ) शोधनादिगणसंग्रहार्धध्यायः | |
| दोषनिर्हरण-निर्देश | १८९ | वमनकारक द्रव्य | १९७ |
| दोषनिर्हरण-विवेक | १८९ | विरेचनकारक द्रव्य | १९७ |
| शोधन का काल | १८९ | निर्हृणोपयोगी द्रव्य | १९८ |
| सहेतुक शोधनकाल | १८९ | शिरोविरेचनोपयोगी द्रव्य | १९८ |
| शोधन का दृष्टिकोण | १८९ | वातनाशक द्रव्य | १९८ |
| शोधन की विशिष्ट विधि | १८९ | पित्तनाशक द्रव्य | १९८ |
| औषधसेवन के १० काल | १९० | कफनाशक द्रव्य | १९८ |
| रोगानुसार औषध-सेवनकाल | १९० | जीवनीय गण | १९८ |
| ( १४ ) द्विविधोपक्रमणीयाध्यायः | विदार्यादि गण | १९८ | |
| चिकित्सा के दो भेद | १९१ | सारिवादि गण | १९९ |
| सन्तर्पण तथा अपतर्पण | १९१ | पद्माकादि गण | १९९ |
| तत्त्वों की प्रधानता | १९१ | पुरुषकादि गण | १९९ |
| स्नेहन आदि का वर्णन | १९१ | अञ्जनादि गण | १९९ |
| प्रत्येक के दो भेद | १९१ | पटोलादि गण | १९९ |
| शोधन कर्म एवं उसके भेद | १९२ | गुड्डुच्चादि गण | १९९ |
| शमन के लक्षण एवं उसके भेद | १९२ | आररब्धादि गण | १९९ |
| बृंहण के लक्षण | १९२ | असनादि गण | २०० |
| सन्तर्पण योग्य रोग-रोगी | १९२ | वर्हणादि गण | २०० |
| सन्तर्पण-चिकित्सा के उपादान | १९२ | ऊष्कादि गण | २०० |
| अपतर्पण योग्य रोग-रोगी | १९२ | वौरतर्वादि गण | २०० |
| शोधन, शमन के योग्य रोग-रोगी | १९३ | रोध्नादि गण | २०० |
| सन्तर्पण का निषेध | १९३ | अर्कादि गण | २०० |
| अपतर्पण-निर्देश | १९३ | सुरसादि गण | २०१ |
| सन्तर्पण के लाभ | १९३ | मुष्ककादि गण | २०१ |
| अपतर्पण के लाभ | १९४ | वत्सकादि गण | २०१ |
| योग, अतियोग, हीनयोग | १९४ | वचादि गण | २०१ |
| उनके लक्षण | १९४ | हरिद्रादि गण | २०१ |
| अतिस्थूलता आदि रोग | १९४ | प्रियङ्गन्वादि गण | २०१ |
| चिकित्सासूत्र | १९४ | अम्बच्छादि गण | २०२ |
| विशेष चिकित्सा | १९४ | मुस्तादि गण | २०२ |
| विडंग्गादि योग | १९४ | न्यग्रोधादि गण | २०२ |
| व्योषादियोग की फलश्रुति | १९५ | एलादि गण | २०२ |
| कृशता आदि रोग | १९५ | श्यामादि गण | २०२ |
विषय
द्रव्यग्रहण -निर्देशि
गणोक्त द्र॒व्यों के प्रयोग
(१६ ) स्नेहविधिरध्यायः
स्नेहन एवं रूक्षण-वर्णन
चार प्रकार के स्नेह
घुत की प्रधानता
स््नेहों के प्रमुख गुण
उत्तरोत्तर गुरुता
स्नेहयोगों के नाम
स्नेहनयोग्य व्यक्ति
स्नेहन के अयोग्य व्यक्ति
घृतस्नेह के योग्य व्यक्ति
तैलस्नेह के योग्य व्यक्ति
वसा-मज्जास्नेह
वसास्नेह का क्षेत्र
ऋतुभेद से स्नेह-निर्देश
दिन में स्नेहसेवन-निर्देश
शीतकाल में तैल-प्रयोग
रात्रि में घृतपान-विधान
कारण-भेद से रात्रि में घृतपान
स्नेहसेवन-विचार
स्नेहसेवन के भेद की युक्ति
स्नेहसेवन - प्रकार
, स्नेह की विचारणाएँ
विचारणा पर विचार
अच्छपेय के लाभ
स्नेहमात्रा-विचार
शोधनार्थ स्नेहमात्रा
शमनार्थ स्नेहमात्रा
बुंहणार्थ स्नेहपान- विधि
बृंहणस्नेहपान के योग्य व्यक्ति
स्नेहसेवन का प्रभाव
विविध स्नेहों के अनुपान
स्नेहपानार्थ आहार-विचार
स्नेहपानार्थ विहार-विचार
सर्वत्र त्याज्य कर्म
शमनस्नेहपान में उपचार
स्नेहपान की अवधि
सम्यक् स्निग्ध पुरुष के लक्षण
है जछ ॥
पृष्ठांक
२०३
२०३
. २०४ २०४ २०४ २०४ २०४
२०५
२०५
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२०९
२०९
२०९
२०९
विषय
अतिस्निग्ध के लक्षण
मिथ्या स्निग्ध के लक्षण
स्नेहव्यापत्-चिकित्सा
विरूक्षण -निर्देश
स्वेदन आदि के प्रयोग
स्नेहन के पूर्व रूक्षण विधि
असात्म्य स्नेह की शक्ति
सद्यःस्नेहन का निर्देश
सात सद्यःस्नेहन-योग
लवण के गुण
स्नेहनयोगों का निषेध
कुष्ठादि के योग्य स्नेह
क्षीण पुरुषों के योग्य स्नेह
स्नेहसेवन से लाभ
( १७ ) स्वेदविधिरध्याय:
स्वेदन के चार भेद
तापस्वेद का वर्णन
उपनाहस्वेद का वर्णन
बन्धनद्रव्य - निर्देश
ऊष्मस्वेद का वर्णन
द्रवस्वेद का वर्णन
अवगाहनस्वेद -विधि
स्वेदन-विधि
स्वेदन-विधिभेद
दोषभेद से स्वेदन
स्थानभेद से स्वेदन
अन्यत्र स्वेदन-निर्देश
स्वेदन का सम्यक् योग
स्वेदन का अतियोग
स्वेदन एवं स्तम्भन औषध
स्तम्भन के सम्यक् योग के लक्षण
स्तम्भन के अतियोग के लक्षण
स्वेदन के अयोग्य रोगी एवं रोग
स्वेदन के योग्य रोगी
अनाग्नेय स्वेदनयोग्य रोग
अनाग्नेय स्वेदों का वर्णन
स्वेदन-प्रयोग का फल
( १८ ) वमन-विरेचनविधिरध्याय:
वमन-विरेचन-व्यवस्था
पुष्ठांक
२१०
२१०
२१०
२१०
२१०
२१०
२११
२६११
२११
२११
२११
२११
९
२१२
२१३
२१३
२१३
२१४
२१४
२१४
३043.
9४७
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२९५
२९६
२१६
२१६
२९६
२१६
२१७
२१७
२१८
२१८
२१९
( २९ )
| विषय | पृष्ठांक | विषय | पृष्ठांक |
|---|---|---|---|
| वमन-निर्देश | २१९ | औषध-प्रयोग में सावधानी | २२७ |
| वमन के अयोग्य व्यक्ति | २२० | दुर्बल के दोषों पर विचार | २२७ |
| वमन आदि का निषेध | २२० | दोषनिर्हरण की आवश्यकता | २२७ |
| विरेचन के योग्य रोग | २२० | पुनः शोधन-निर्देश | २२७ |
| विरेचन के अयोग्य रोग | २२० | विरेचन में विविध विचार | २२७ |
| वमनकारक औषधद्रव्य एवं प्रयोग-विधि | २२१ | शोधन के अयोग्य रोगी | २२७ |
| वमन की प्रतीक्षा | २२१ | शोधन के भेद | २२७ |
| वमनकारक यल्ल | २२१ | स्नेहन-स्वेदन-प्रयोग | २२७ |
| वमन में औषध-प्रयोग | २२१ | मलों का उल्केशन | २२८ |
| वमन की अवधि | २२२ | स्नेहन-स्वेदन के लाभ | २२८ |
| हीनयोग में औषध-प्रयोग | २२२ | संशोधन से लाभ | २२८ |
| वमन का हीनयोग | २२२ | ( १९ ) बस्तिविधिरध्यायः | |
| वमन का सम्यगयोग | २२२ | बस्ति का वर्णन | २२९ |
| वमन का अतियोग | २२२ | बस्ति का प्रयोग | २२९ |
| वमन के पश्चात् कर्म | २२२ | बस्तिप्रयोग से लाभ | २२९ |
| स्नान एवं भोजन विधि | २२३ | बस्ति-परिचय | २३० |
| पेया आदि क्रम-निर्देश | २२३ | निरुहण के अयोग्य | २३० |
| पेया आदि से लाभ | २२३ | निरुहण एवं अनुवासन के योग्य | २३१ |
| वमन-विरेचन के वेग एवं परिमाण | २२३ | निरुहण एवं अनुवासन के अयोग्य | २३१ |
| वमन-विरेचन की अवधि एवं मान | २२४ | बस्तिनेत्र-परिचय | २३१ |
| भारमापन-विधि | २२४ | नेत्र-निरुक्ति | २३१ |
| वमन के बाद विरेचन | २२४ | नेत्र का आकार | २३१ |
| मुटुकोष्ठ का वर्णन | २२४ | नेत्र की मोटाई | २३२ |
| कूरकोष्ठ का वर्णन | २२४ | बस्तिनेत्र का छिद्र | २३२ |
| दोषानुसार विरेचन | २२४ | कर्णिका का वर्णन | २३२ |
| विरेचक उपाय | २२४ | बस्तिपुट का वर्णन | २३३ |
| पुनः विरेचन-प्रयोग | २२५ | अन्य बस्तिपुट-विधान | २३३ |
| हीनयोग के लक्षण | २२५ | निरुहणबस्ति की मात्रा | २३३ |
| समयोग के लक्षण | २२५ | अनुवासनबस्ति की मात्रा | २३३ |
| अतियोग के लक्षण | २२५ | बस्ति देने की विधि | २३३ |
| समयोग में पश्चात् कर्म | २२५ | बस्तिनेत्र के प्रवेश की विधि | २३४ |
| समयोग में भोजनविधि | २२५ | बस्ति के पश्चात् कर्म | २३४ |
| लंघन-निर्देश | २२५ | स्नेह के लौटने पर आहार | २३४ |
| लंघन का फल | २२६ | स्नेह के न लौटने पर चिकित्सा | २३४ |
| पेया आदि का आवश्यकता | २२६ | विशेष-चिकित्सा | २३४ |
| पेयासेवन का निषेध | २२६ | पुनः अनुवासन-प्रयोग | २३५ |
| वमन-विरेचन की प्रतीक्षा | २२६ | निरुहणबस्ति-प्रयोग | २३५ |
| वमन-विरेचन की चिकित्सा | २२६ | निरुहण-प्रयोगविधि | २३५ |
| मुटुविरेचन का निर्देश | २२६ | बस्तिद्रव-निर्माणविधि | २३५ |
( ३० )
| विषय | पृष्ठांक | विषय | पृष्ठांक |
|---|---|---|---|
| अन्य आचार्यों का मत | २३६ | वमन आदि में कालनिर्देश | २४२ |
| बस्तिद्रव्य-मिश्रणविधि | २३६ | बस्ति द्वारा दोषनिर्हरण | २४३ |
| निरुहण का पश्चात्कर्म | २३६ | बस्तिप्रयोग की प्रशंसा | २४३ |
| बस्ति के लौटने की अवधि | २३६ | सिरावेध का महत्त्व | २४३ |
| अनेक बस्ति-प्रयोग | २३६ | ( २० ) नस्यविधिरध्यायः | |
| सम्यग्योग आदि का संकेत | २३७ | नस्य का वर्णन | २४४ |
| सम्यग्योग में पश्चात् कर्म | २३७ | नस्यकर्म के भेद | २४४ |
| विकारों का शमन | २३७ | विरेचननस्य का प्रयोग | २४४ |
| पुनः अनुवासन-प्रयोग | २३७ | बृंहणनस्य का प्रयोग | २४५ |
| अनुवासन के विविध योग | २३७ | शमननस्य का प्रयोग | २४५ |
| सम्यग्योग का वर्णन | २३७ | विरेचननस्य के द्रव्य | २४५ |
| दोषानुसार बस्तिसंख्या | २३७ | बृंहणनस्य के द्रव्य | २४५ |
| आहार-विधान | २३८ | शमननस्य के द्रव्य | २४५ |
| वातदोष में बस्तिप्रयोग | २३८ | नस्य के भेद | २४५ |
| पित्तदोष में बस्तिप्रयोग | २३८ | नस्य-प्रयोगविधि | २४५ |
| कफदोष में बस्तिप्रयोग | २३८ | नस्य की मात्रा | २४६ |
| सन्निपात में बस्तिप्रयोग | २३८ | नस्य के अयोग्य व्यक्ति | २४६ |
| तीन ही बस्तियाँ | २३८ | नस्य के योग्य समय | २४६ |
| बस्तिनाम-भेद | २३८ | रोगानुसार नस्य-प्रयोग | २४६ |
| उक्त मतों की प्रामाणिकता | २३८ | नस्यसेवन की सीमा | २४६ |
| बस्तिकर्म की अवधि | २३८ | नस्य का पूर्वकर्म | २४७ |
| बस्तिकर्म का वर्णन | २३९ | नस्य-प्रयोगविधि | २४७ |
| बस्तिकाल का वर्णन | २३९ | मूच्छाशान्ति की विधि | २४७ |
| बस्तियोग का वर्णन | २३९ | स्नेहनस्य-प्रयोग | २४७ |
| स्नेह एवं निरुहण प्रयोग | २३९ | नस्यप्रयोग की प्रतीक्षा | २४७ |
| बस्तियों का प्रयोगक्रम | २३९ | धूमपान-प्रयोग | २४७ |
| बस्ति की त्रिदोषनाशकता | २३९ | स्नेहननस्य का सम्यग्योग | २४८ |
| मात्राबस्ति का वर्णन | २३९ | लूक्षनस्य का हीनयोग | २४८ |
| मात्राबस्ति-सेवन | २४० | स्नेहननस्य का अतियोग | २४८ |
| मात्राबस्ति की विशेषता | २४० | विरेचननस्य का सम्यग्योग | २४८ |
| उत्तरबस्ति का वर्णन | २४० | मिथ्यायोग, हीनयोग के लक्षण | २४८ |
| उत्तरबस्ति में नेत्र का प्रमाण | २४० | प्रतिमर्शनस्य-प्रयोग | २४८ |
| स्नेहमात्रा का प्रमाण | २४० | प्रतिमर्शनस्य का निषेध | २४८ |
| उत्तरबस्ति-प्रयोगविधि | २४१ | प्रतिमर्शनस्य के काल | २४८ |
| उत्तरबस्ति की संख्या | २४२ | प्रतिमर्शनस्य के लाभ | २४९ |
| स्त्रियों में उत्तरबस्ति | २४२ | अवस्था का विचार | २४९ |
| बस्तिनेत्र का परिमाण | २४२ | नस्य में तेल का प्रयोग | २४९ |
| स्नेहमात्रा का निर्देश | २४२ | मर्श-प्रतिमर्श में फलभेद | २४९ |
| उत्तरबस्ति-प्रयोगविधि | २४२ | अणुतेल का वर्णन | २५० |
( ३१ )
विषय
स्नेहनस्य से लाभ
( २१ ) धूमपानविधिरध्यायः
धूमपानविधि का वर्णन धूम के भेद तथा प्रयोग धूमपान का निषेध धूमपान से हानि धूमपानजनित रोगों की चिकित्सा त्रिविध धूम के सेवनकाल धूमनेत्र का वर्णन धूमनेत्र की लम्बाई धूमपान की विधि नासिका एवं मुख से धूमपान धूम का निर्हरण नासिका से धूम न निकालें तीन बार धूमपान करें धूमपान की संख्या मृदुधूम के द्रव्य मध्यधूम के द्रव्य तीक्ष्णधूम के द्रव्य धूमवर्ति-निर्माणविधि कासघ्न धूमपान-विधि धूमपान के लाभ
( २२ ) गण्डूषादिविधिरध्यायः
गण्डूष के भेद गण्डूषों के प्रयोग स्निग्ध-गण्डूष शमन-गण्डूष शोधन-गण्डूष रोपण-गण्डूष गण्डूषों में द्रव्यप्रयोग रोगानुसार गण्डूषप्रयोग स्वस्थ के लिए गण्डूष घी या दूध का गण्डूष मधुगण्डूष-प्रयोग काज़ी के गण्डूष क्षाराम्लगण्डूष सुवोष्णोदकगण्डूष गण्डूष-प्रयोगविधि गण्डूषधारण-अवधि
पृष्ठांक
विषय
२५० गण्डूष एवं कवल परिभाषा कवलधारण के लाभ २५१ प्रतिसारण के भेद २५१ प्रतिसारण का प्रयोग २५२ मुखालेप के तीन भेद २५२ मुखालेप का उपयोग २५२ मुखालेप का प्रमाण २५२ लेपसम्बन्धी निर्देश २५२ मुखालेप में अपथ्य २५२ मुखालेप का निषेध २५३ मुखालेप का सम्यग्योग २५३ मुखालेप के ६ योग २५३ मुखालेप से लाभ २५३ मूर्धतैल के ४ भेद २५३ उत्तरोत्तर गुणवत्ता २५३ अभ्यंग का प्रयोग २५४ परिषेक का प्रयोग २५४ पिचु का प्रयोग २५४ बस्ति का प्रयोगस्थल २५४ शिरोबस्ति-सेवनविधि २५४ शिरोबस्ति-धारणकाल २५५ पश्चात्-कर्म २५५ शिरोबस्तिसेवन-अवधि २५६ कर्णपूर्ण का काल २५६ मात्राकाल की परिभाषा २५६ मूर्धतैल का फल
( २३ ) आश्र्वोतनाञ्जनविधिरध्यायः
२६३ आश्र्वोतन का वर्णन २६३ दोषानुसार आश्र्वोतन २६३ आश्र्वोतन-विधि २६४ आश्र्वोतन का निषेध २६४ आश्र्वोतन के लाभ २६४ अंजनप्रयोग के लाभ २६४ अंजन के तीन भेद २६५ लेखन अंजन-परिचय २६५ रोपण अंजन-परिचय २६५ प्रसादन अंजन-परिचय २६५ प्रत्यञ्जन २६५ अञ्जनशलाका
पृष्ठांक
२५८ २५८ २५८ २५९ २५९ २५९ २५९ २५९ २५९ २६० २६० २६० २६० २६१ २६१ २६१ २६१ २६१ २६१ २६२ २६२
( ३२ )
| विषय | पृष्ठांक | विषय | पृष्ठांक |
|---|---|---|---|
| अज्ञनों की त्रिविध कल्पना | २६५ | यन्त्रों की विविधता | २७५ |
| अज्ञनों की मात्रा | २६५ | स्वस्तिकयन्त्र-परिचय | २७५ |
| तीक्ष्ण अज्ञनों की मात्रा | २६५ | सन्दशयन्त्र-परिचय | २७५ |
| अज्ञनप्रयोग-निर्देश | २६६ | सन्दशयन्त्र के भेद | २७५ |
| अन्य आचार्यों का मत | २६६ | मुजुण्डायन्त्र का वर्णन | २७५ |
| तीक्ष्णाज्ञन का रात्रिप्रयोग | २६६ | ताल्ययन्त्र-परिचय | २७६ |
| उष्णकाल में तीक्ष्णाज्ञन-निषेध | २६६ | नाडीयन्त्र-परिचय | २७६ |
| लौह एवं नेत्र की समानता | २६६ | कण्ठशल्यावलोकनी नाड़ी | २७६ |
| तीक्ष्ण अज्ञन का निषेध | २६६ | द्विकर्ण, चतुष्कर्ण नाडीयन्त्र | २७६ |
| अज्ञन के अयोग्य व्यक्ति | २६७ | विविध नाडीयन्त्र | २७६ |
| निषिद्ध अज्ञन का वर्णन | २६७ | शल्यनिर्घातनी नाड़ी | २७७ |
| अज्ञन-प्रयोगविधि | २६७ | अशौयन्त्र-परिचय | २७७ |
| नेत्रप्रक्षालन-विधि | २६७ | शमीयन्त्र-परिचय | २७७ |
| नेत्रशोधन-विधि | २६७ | भगन्दर-यन्त्र | २७७ |
| नेत्रशोधन में हेतु | २६७ | घ्राणयन्त्र-परिचय | २७७ |
| तीक्ष्णाज्ञन या धूमपान | २६८ | अंगुलित्राणक यन्त्र | २७७ |
| प्रत्यञ्जन का वर्णन | २६८ | योनिव्रणेश्मण यन्त्र | २७८ |
| ( २४ ) तर्पणपुटपाकविधिरध्यायः | नाडीव्रण के यन्त्र | २७८ | |
| तर्पणविधि-वर्णन | २६९ | नाडीयन्त्र | २७८ |
| तर्पण की दूसरी विधि | २६९ | अन्य अनेक यन्त्र | २७८ |
| स्नेह-धारणकाल | २७० | भृंगानाडीयन्त्र | २७८ |
| तर्पण का पश्चात् कर्म | २७० | तुम्बीयन्त्र-परिचय | २७९ |
| दोषानुसार तर्पण | २७० | घटीयन्त्र-परिचय | २७९ |
| तर्पण के विविध योग | २७० | शलाकायन्त्र | २७९ |
| पुटपाक का वर्णन | २७१ | एषणी शलाका | २७९ |
| दोषानुसार पुटपाक-प्रयोग | २७१ | स्रोतःशल्यहारिणी शलाका | २७९ |
| स्नेहन पुटपाक के द्रव्य | २७१ | छः शंकुयन्त्र | २८० |
| लेखन पुटपाक के द्रव्य | २७१ | व्युहन शंकुयन्त्र | २८० |
| प्रसादन पुटपाक के द्रव्य | २७१ | चालन शंकुयन्त्र | २८० |
| पुटपाक-रचनाविधि | २७२ | आहार्य शंकुयन्त्र | २८० |
| धारणकाल-अवधि | २७२ | गर्भशंकुयन्त्र | २८० |
| उष्णशीत-प्रयोगभेद | २७२ | अश्मरीहरण यन्त्र | २८० |
| पश्चात्-कर्म | २७२ | दन्तपातन यन्त्र | २८० |
| योगों का निर्देश | २७२ | प्रमार्जनी शलाकायन्त्र | २८० |
| तर्पण एवं पुटपाक का निषेध | २७२ | पायुयन्त्र | २८० |
| तर्पण एवं पुटपाक की अवधि | २७२ | घ्राण एवं कर्णयन्त्र | २८१ |
| नेत्ररक्षा की आवश्यकता | २७३ | कर्णशोधन-यन्त्र | २८१ |
| ( २५ ) यन्त्रविधिरध्यायः | विविध शलाकायन्त्र | २८१ | |
| यन्त्रों का वर्णन | २७४ | अनुयन्त्रों का वर्णन | २८१ |