भारतकोश
संग्रह पर लौटें

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

( ३३ )

विषयपृष्ठांकविषयपृष्ठांक
यन्त्रों के विविध कर्म२८२जौक रखने एवं लगाने की विधि२९०
कंकमुख यन्त्र२८२दुष्टरक्तग्रहण-दुष्टान्त२९०
( २६ ) शस्त्रविधिरध्यायःजौक छड़ाने की स्थिति२९०
शस्त्रों का वर्णन२८३जौक का उपचार२९१
मण्डलमशस्त्र२८४रक्तमद से रक्षा२९१
वृद्धिपत्रशस्त्र२८४रक्तवमन का सम्यग्योग२९१
उत्पल, अर्धघंटाकर शस्त्र२८४रक्तवमन का अतियोग२९१
सर्पवक्त्र-शस्त्र२८४रक्तवमन का मिथ्यायोग२९१
१. एषणी-शस्त्र२८४जलौका-पालनविधि२९१
२. एषणी-शस्त्र२८४जलौकावचारण का पश्चात् कर्म२९१
वेतस-शस्त्र२८५रक्तावरोधक उपचार२९१
शरारिमुख, त्रिकूर्चक शस्त्र२८५रक्तघ्रावण का फल२९२
कुशपत्रक एवं आटामुख शस्त्र२८५पुनः रक्तघ्रावण२९२
अन्तर्मुख-शस्त्र२८५अलाबूयन्त्र निषिद्ध२९२
ब्रीहिमुख-शस्त्र२८५अलाबूयन्त्रप्रयोग विहित२९२
कुठारी-शस्त्र२८५शृंगयन्त्रप्रयोग-निषेध२९२
ताम्रशलाका-शस्त्र२८५शृंगयन्त्रप्रयोग-निर्देश२९२
अंगुली-शस्त्र२८६प्रच्छानकर्म-निर्देश२९२
बडिशा-शस्त्र२८६प्रच्छान आदि का विकल्प२९२
करपत्र-शस्त्र२८६जलौका-प्रयोग२९२
कर्तरी-शस्त्र२८६तुम्बी एवं शृंगी यन्त्र२९३
नख-शस्त्र२८६सिरावेध-प्रयोग२९३
दन्तलेखनक-शस्त्र२८६रक्तघ्रावण-विधिविकल्प२९३
सूचीशस्त्र२८६रक्तघ्रावण में उपद्रव एवं शान्ति२९३
कूर्च-शस्त्र२८७( २७ ) सिराव्यधविधिरध्यायः
खजशस्त्र२८७शुद्धरक्त का वर्णन२९४
मृथिका-शस्त्र२८७रक्तदूषक तत्त्व२९४
आराशस्त्र२८७रक्तज रोग२९५
कर्णबिधनी सूची२८७सिरावेध का निर्देश२९५
अनुशस्त्रों का परिगणन२८८सिरावेध-विधि२९५
शस्त्रकर्मों का वर्णन२८८रोगविशेष में सिरावेध२९५
शस्त्रों के आठ दोष२८८कर्णरोग में सिरावेध२९५
शस्त्रग्रहण-विधि२८८नासारोग में सिरावेध२९६
शस्त्रकोष का विस्तार२८९पीनसरोग में सिरावेध२९६
जौकों का प्रयोग२८९मुखरोग में सिरावेध२९६
त्याज्य जौकों का वर्णन२८९जत्रुध्वंरोगों में सिरावेध२९६
त्याज्य जौकों का निषेध२८९उन्मादरोग में सिरावेध२९६
गह्म जौकों का वर्णन२९०अपस्माररोग में सिरावेध२९६
त्याज्य जौकों के लक्षण२९०विद्रधि एवं पाश्चर्वशूल में सिरावेध२९६

३ अ० भू०

( ३४ )

विषयपृष्ठांकविषयपृष्ठांक
तृतीयकज्वर में सिरावेध२९६पुनः सिरावेध३०२
चतुर्थकज्वर में सिरावेध२९६अधिक रक्तघ्राव का निषेध३०२
प्रवाहिकारोग में सिरावेध२९६भृंगयन्त्र का प्रयोग३०२
शुक्र एवं शिशुनरोगों में सिरावेध२९८रक्तशुद्धि के उपाय३०२
गलगण्डरोग में सिरावेध२९७स्तम्भनक्रिया-निर्देश३०२
गुग्घसीरोग में सिरावेध२९७रक्तस्सम्भन-उपचार३०२
अपचीरोग में सिरावेध२९७रक्तघ्रावण का पश्चात् कर्म३०२
प्रमुख वातरोगों में सिरावेध२९७रक्तघ्रावण में पथ्य३०३
पादवाह आदि में सिरावेध२९७रक्तशुद्धि के लक्षण३०३
विश्वनाचीरोग में सिरावेध२९७( २८ ) शल्याहरणविधिर्ध्यायः
अन्यत्र सिरावेध-निर्देश२९७शल्य की गतिर्था३०४
सिरायन्त्रण-विधि२९७अन्तःशल्य के लक्षण३०४
सिरावेधन-विधि२९८त्वचागत शल्य के लक्षण३०४
कुठारिका-प्रयोग२९८मांसगत शल्य के लक्षण३०५
उपनासिका-सिरावेध२९८पेशीगत शल्य के लक्षण३०५
जिह्वासिरावेध२९८स्नायुगत शल्य के लक्षण३०५
ग्रीवासिरावेध२९८सिरागत शल्य के लक्षण३०५
बाहुसिरावेध२९९स्रोतोगत शल्य के लक्षण३०५
पाशर्वस्थ सिरावेध२९९धमनीगत शल्य के लक्षण३०५
लिंग का सिरावेध२९९अस्थिसन्धिगत शल्य के लक्षण३०५
जंघासिरावेध२९९अस्थिगत शल्य के लक्षण३०६
पादसिरावेध२९९सन्धिगत शल्य के लक्षण३०६
सिरावेध-निर्देश२९९कोष्ठगत शल्य के लक्षण३०६
वेध का परिमाण२९९मर्मागत शल्य के लक्षण३०६
सम्यक् वेध का वर्णन२९९सामान्य निर्देश३०६
दुर्बेध आदि का वर्णन२९९शल्यव्रण का रोपण३०६
रक्त न बहने के कारण३००पुनः पीड़ाकर्तृत्व३०६
रक्तघ्रावण के उपाय३००शल्यज्ञान के उपाय३०७
रक्तघ्राव-वर्णन३००मांसगत शल्य३०७
घ्रावण-उपायों का निषेध३००पेशी आदिगत शल्य३०७
मूच्छ्छा में कर्तव्य३००अस्थिगत शल्य३०७
वातदूषित रक्त के लक्षण३००सन्धिगत शल्य३०७
पित्तदूषित रक्त के लक्षण३०१स्नायु आदिगत शल्य३०७
कफदूषित रक्त के लक्षण३०१मर्मागत शल्य३०७
द्वन्द्वज रक्त के लक्षण३०१सामान्य निर्देश३०७
त्रिदोषज रक्त के लक्षण३०१शल्य के स्वरूपों का अनुमान३०७
सिरावेध में रक्त का परिमाण३०१शल्यनिर्हरण के उपाय३०८
विविध चिकित्सा३०१अर्वाचीन आदि शल्य३०८
उपचार-विधि३०१तिर्यग्गत शल्य३०८

( ३५ )

विषय

निर्घातन के अयोग्य शल्य विशाल्यन्त शल्याहरण-निषेध शल्यनिर्हरण-विधि दृश्यशल्यनिर्हरण अदृश्यशल्यनिर्हरण संदेशवन्त्र-प्रयोग तालयन्त्र-प्रयोग नाडीयन्त्र-प्रयोग शेषयन्त्र-प्रयोग निर्हुत शल्य का पश्चात्कर्म सिरा, स्नायुगत शल्य हृदयगत शल्य शल्याहरण की अन्य विधि अस्थिगत शल्य दूसरी विधि तीसरी विधि चौथी विधि पाँचवीं विधि छठी विधि सातवीं विधि आठवीं विधि नवीं विधि दसवीं विधि पक्वाशयगत शल्य वात आदि शल्य कण्ठस्रोतोगत शल्य जतुशल्यनिर्हरण अन्य शल्यनिर्हरण गले में फँसे हुए शल्य को निकालना आँख एवं व्रण में पड़े शल्य को निकालना उदरगत जल निकालने की विधि कर्णगत जल एवं क्रिमि निकालने की विधि शरीर में शल्य का विलयन विलीन न होने वाले शल्य शल्यनिर्हरणोपाय शल्यनिर्हरण-निर्देश

पृष्ठांक

३०८ ३०८ ३०९ ३०९ ३०९ ३०९ ३०९ ३०९ ३०९ ३०९ ३१० ३१० ३१० ३१० ३१० ३१० ३१० ३१० ३१० ३११ ३११ ३११ ३११ ३११ ३११ ३११ ३१२ ३१२ ३१२ ३१२ ३१३ ३१३ ३१४

विषय

आमशोथ के लक्षण पच्यमान व्रणशोथ के लक्षण पक्वशोथ के लक्षण व्रण में वात आदि के लक्षण अतिपक्व व्रण के लक्षण गम्भीर पाक का वर्णन दारण एवं पाटन लेप शस्त्रकर्म का निषेध शस्त्रकर्म का विधान अनिश्चितकारी वैद्य की निन्दा शस्त्रकर्म के पूर्वकर्म आहार एवं मरुपापन का निषेध शस्त्रप्रयोग-विधि महान् व्रणशोथ में कर्तव्य प्रशस्त शल्यचिकित्सक तिर्यक्छेदन-विधि पश्चात्कर्म-निर्देश पट्टी आदि का निर्देश व्रणरक्षा-विधान औषधधारण-निर्देश आचार-निर्देश दिन में सोने का निषेध अन्य निषिद्ध कर्म व्रणरोगी का आहार लाभ एवं हानि त्याज्य आहार व्रणोपचारार्थ उपदेश पुनः प्रशालन आदि कर्म विकेशिका-वर्णन इनके दुष्परिणाम विकेशिका का सद्‌उपयोग विरुद्धव्रण का उपचार सद्योव्रण के उपचार सीवनकर्म का निषेध सीवनकर्म-विधि सीवन का पश्चात् कर्म सीवनकर्म का निर्देश बन्धनद्रव्यों का वर्णन बन्धनभेदों का निर्देश

पृष्ठांक

३१५ ३१५ ३१६ ३१६ ३१६ ३१६ ३१६ ३१७ ३१७ ३१७ ३१७ ३१८ ३१८ ३१८ ३१९ ३१९ ३१९ ३२० ३२० ३२० ३२० ३२१ ३२१ ३२१ ३२१ ३२२ ३२२ ३२२ ३२२ ३२२ ३२३ ३२३ ३२४

( २९ ) शस्त्रकर्मविधिरध्यायः

व्रण के उपचार व्रणशोथ-चिकित्सा

३१५ ३१५

( ३६ )

विषयपृष्ठांकविषयपृष्ठांक
पुनः बन्धभेद-निर्देश३२४दुर्दग्ध के लक्षण३३२
ब्रणबन्धन आवश्यक३२५पुनः क्षार-प्रयोग३३२
ब्रणबन्धन से लाभ३२५अतिदग्ध के लक्षण३३२
पवदान-उपक्रम३२५अतिदग्ध गुद के लक्षण३३२
ब्रणबन्धन का निषेध३२६अतिदग्ध नासा के लक्षण३३२
ब्रणज क्रिमियों का वर्णन३२६श्रोत्रादि दग्ध के लक्षण३३२
रोपण में शीघ्रता का निषेध३२६क्षार का शमन कर्म३३३
रोपण के पश्चात् कर्म३२७क्षारप्रयोग से हानि-लाभ३३३
चिकित्सा-निर्देश३२७अश्विकर्म की प्रधानता३३३
( ३० ) क्षाराश्विकर्मविधिरध्यायःअश्विकर्म का प्रयोग३३३
क्षार-प्रशंसा३२८त्वचारोगों में अश्विकर्म३३३
पानीयक्षार-प्रयोग३२८मांसरोगों में अश्विकर्म३३३
अन्यत्र क्षार-प्रयोग३२८सिरादि रोगों में अश्विकर्म३३४
क्षारप्रयोग का निषेध३२९अश्विकर्म का निषेध३३४
मध्यम क्षारनिर्माण की विधि३२९सम्यग्दग्ध का पश्चात् कर्म३३४
क्षारगालन-विधि३३०सम्यग्दग्ध का लक्षण३३४
मुदु क्षार बनाने की विधि३३०दुर्दग्ध आदि के लक्षण३३४
तीक्ष्ण क्षार बनाने की विधि३३०अग्निदग्ध के भेद३३४
तीक्ष्ण, मध्य, मुदु क्षारों के प्रयोग३३०तुच्छ(त्य) दग्ध के लक्षण३३४
क्षार के १० गुण३३०दुर्दग्ध के लक्षण३३५
क्षार का सम्यक् योग३३१अतिदग्ध के लक्षण३३५
क्षारप्रयोग की विधि३३१अग्निदग्ध की चिकित्सा३३५
अशोर् पर क्षार-प्रयोग३३१दुर्दग्ध की चिकित्सा३३५
वर्त्मरोगों पर क्षार-प्रयोग३३१सम्यग्दग्ध-चिकित्सा३३५
नासाशर्ष पर क्षार-प्रयोग३३१अतिदग्ध-चिकित्सा३३५
कर्णाशर्ष पर क्षार-प्रयोग३३१स्नेहदग्ध-चिकित्सा३३५
क्षार का पश्चात् कर्म३३१शस्त्र आदि का प्रयोग३३५
क्षारदग्ध ब्रण का रोपण३३२विविध सूत्रों का वर्णन३३६
सम्यग्दग्ध के लक्षण३३२

॥ श्रीः ॥

श्रीमद्वाग्भटविरचितम्

अष्टाङ्गहृदयम्

‘निर्मल’ भिधया हिन्दीव्याख्यया विशेषवक्तव्यादिभिश्च विभूषितम्


सूत्रस्थानम्

प्रथमोऽध्यायः

मङ्गलाचरणम्

रागादिरोगान् सततानुपस्नानशेषकायप्रसृतानशेषान् । औत्सुक्यमोहारतिदाञ्चघान योऽपूर्ववैद्याय नमोऽस्तु तस्मै ॥ १ ॥

व्याख्याकर्तृर्मङ्गलाचरणम्

धन्वन्तरि पशुपतिं गिरिजां गणेशं नत्वाऽधुना चरकसुश्रुतवाग्भटादीन् ।

स्मृत्वा भिषगुरुवरान् यशसा समुद्धान् श्रीलालचन्द्रचरणान् प्रणतोऽस्मि शश्वत् ॥ १ ॥

युगानुरूपसन्दर्भसंज्ञया सफलकृतम् । अष्टाङ्गहृदयं येन वाग्भटं तं स्मराम्यहम् ॥ २ ॥

कृपाकटाक्षतो येषां प्रवृत्तोऽस्म्यलघीरपि । टीकायां वाग्भटस्यास्य वन्दे तान् गुरुपुङ्गवान् ॥ ३ ॥

अष्टाङ्गहृदये टीकाः प्राप्यन्ते पूर्वसूरिणाम् । तथाप्यभिनवां कुर्वं ‘निर्मलं’ विश्वार्थदाम् ॥ ४ ॥

तारादत्ततनुजस्य ब्रह्मानन्दत्रिपाठिनः । अनया टीकया भूयात् सन्तोषो विदुषां सताम् ॥ ५ ॥

यदि कथमपि किञ्चिद् बुद्धिदोषात् प्रमादान्मनुजसुलभभावाट्टीकने वाग्भटस्य ।

स्खलनमिह भवेच्चैन्मक्तुं तत्क्षमन्तां प्रमुतयुगकराब्जो याचतेऽयं त्रिपाठी ॥ ६ ॥

जो राग आदि रोग सदा मानव मात्र के पीछे लगे रहते हैं, जो सम्पूर्ण शरीर में फैले रहते हैं और जो उत्सुकता, मोह तथा अरति (बैबेनी) को उत्पन्न करते रहते हैं, उन सबको जिसने नष्ट किया उस अपूर्व वैद्य को हमारा (ग्रन्थकार का) नमस्कार हो ॥ १ ॥

बक्तव्य—रागादिरोगान्—राग, द्वेष, क्रोध, लोभ, मोह, मत्सर, ईर्ष्या आदि को मानसिक रोग कहा गया है। इन मानसिक रोगों में मन आदि का आधार देह है, अतः ये रोग आधारारधेयभाव से मन के साथ-ही-साथ देह को भी पीड़ित करते हैं। जैसे तपा हुआ लोहे का गोला जिस कड़ाही आदि पात्र में रखा रहेगा उसे भी तपाता है, ठीक उसी प्रकार राग आदि मानसिक रोग मन के साथ देह को भी पीड़ित करते हैं। शुद्ध चित्त वाले पुरुष को ये रागादि रोग नहीं होते।

अष्टाङ्गहृदय

अशेषकायप्रसुतान्—नैसा कि ऊपर कहा गया है कि रागादि दोषों का प्रभाव मन तथा शरीर दोनों पर पड़ता है, अतएव ये उत्सुकता ( इन्द्रियों के विषयों को ग्रहण करने की प्रबल अभिलाषा ), मोह ( यह कार्य करना चाहिए या नहीं—इसका ज्ञान न होना ) तथा अरति ( किसी एक स्थान पर खड़ा होना या बैठने की इच्छा का न होना अर्थात् बेचैनी )—इन कारणों से मानव की मानसिक एवं शारीरिक स्थिति विषम हो जाती है, क्योंकि ये रोग सम्पूर्ण शरीर में फैले रहते हैं, इस वाक्य से समस्त शरीरधारियों व सभी रोगों का ग्रहण किया गया है।

‘औत्सुक्य’ शब्द की ऊपर व्याख्या की गयी है, तदनुसार श्रीकृष्ण द्वारा गीता में दिया सन्देश भी यहाँ स्मरणीय है—‘ध्यायतो विषयान् पुंसः...बुद्धिनाशात् प्रणशयति’॥ ( गीता २।६२-६३ ) अर्थात् इन्द्रिय सम्बन्धी विषयों को प्राप्त करने की जब मानव चिन्ता करता है तो सर्वप्रथम उसके वास्तविक मार्ग में रुकावट आती है अर्थात् राग ( रजोगुण ) का उदय होता है, इससे कामवासना का जन्म होता है, असफलता मिलने पर क्रोध की उत्पत्ति होती है। क्रोध के बाद सम्मोह ( चित्त में अनेक विकारों का उदय ) होता है, सम्मोह से स्मृतिविभ्रम, स्मृतिविभ्रम से बुद्धि ( विवेकशक्ति ) का नाश हो जाता है और बुद्धिनाश से मानव के इस लोक तथा परलोक सभी का नाश हो जाता है। यही विनाशकर्म है ‘रागादि रोगों’ का।

अपूर्ववैद्याय—श्री अरुणदत्त कहते हैं—‘पूर्वभ्यः प्रथमः’ अर्थात् सर्वप्रथम या सर्वथेष्ठ वैद्य, जिसने अपने राग आदि दोषों को नष्ट करके फिर प्राणिमात्र को रोगों से मुक्त होने के उपायों का सद्पुदेश दिया, उसे श्रीवाग्भट ग्रन्थारम्भ में प्रणाम करते हैं।

वाग्भट नाम से ‘अष्टांगसंग्रह’ तथा ‘अष्टांगहृदय’ दोनों ग्रन्थ जुड़े हैं। इस दृष्टि से जब हम अष्टाङ्ग-संग्रह-सूत्रस्थान के प्रथम मंगलाचरण पद्य ‘तुष्णादेव्यं...बुद्धाय तस्मै नमः’ का अवलोकन करते हैं, तो हमें ‘धम्मपद’ यमक वर्ग के एक पद्य का स्मरण हो आता है, जो इस प्रकार है—

‘अलपापि संहितां भाषम’गो धर्मस्य भवत्यनुधर्मचारी। रागद्वेषं प्रहाय मोहं सत्यक् प्रजानन् सुविमुक्तचित्तः॥ अनुपादददिह वाऽमुत्र वा स भगवान् श्रामण्यस्य भवति’।

अर्थात् जो मनुष्य थोड़ी-सी भी धर्मसंहिता को पढ़कर उसके अनुसार स्वयं धर्म का आचरण करने लगता है और जो राग-द्वेष आदि मानसिक विकारों का परित्याग करके सांसारिक कर्मों को भलीभाँति जानता हुआ भी उनका ग्रहण न करता हुआ विमुक्त ( उन कर्मों के प्रति अनासक्तभाव से ) रहता है, वह इस लोक तथा परलोक में धम्मणता का अधिकारी बनकर बन्धनों ( रागादि रोगों ) से मुक्त रहता है। इसी के आगे अष्टांगसंग्रह का दूसरा पद्य भी प्रायः इसी आशय का है—‘रागादिरोगाः...पितामहदादीन्’। पद्य का आशय इस प्रकार है—जिसने अपने तथा संसार के प्राणियों के स्वाभाविक राग आदि सब रोगों को जड़ से उखाड़ कर दूर फेंक दिया, उस एक मात्र वैद्य को तथा आयुर्वेदशास्त्र को जानने वाले अथवा उसके प्रवर्तक ब्रह्मा आदि को मैं प्रणाम करता हूँ। यहाँ भी पितामह आदि के पूर्वकथित ‘तमेकवैद्यं’ शब्द ‘अपूर्ववैद्य’ का स्मारक है, अथवा हम यह भी कह सकते हैं कि उक्त अष्टांगसंग्रहोक्त पद्य की भाषा को बदल कर ही अष्टांगहृदय यह पद्य कहा गया है।

अथात आयुष्कामीयमध्यायं व्याख्यास्यामः।

अब हम यहाँ से आयुष्कामीय ( आयु की कामना करने वालों के लिए जो हितकर है, उस ) अध्याय की व्याख्या करेंगे।

वक्तव्य—‘अथातः’ पद में प्रयुक्त ‘अथ’ मंगलवाचक शब्द है। ग्रन्थारम्भ में मंगल( कल्याण )वाचक शब्दों के प्रयोग का उद्देश्य यह होता है कि उस शास्त्र की पूर्ति तथा उसके अध्ययनकर्ताओं की अभोष्ट

आयुष्कामीयाध्यायः १ ]

सूत्रस्थानम्

सिद्धि निर्विघ्न हो जाती है। जैसा कि कहा गया है—‘अकारश्चाथशब्दश्च द्रावैतौ ब्रह्मणः पुरा। कण्ठं भित्त्वा विनिर्याती तेनेमौ मङ्गली स्मृतौ’॥

आयुष्कामीयम् —आयुः (दीर्घायुः पूर्णायुः च) कामयन्ते ये ते आयुष्कामाः, तेष्यो हितः अध्यायः आयुष्कामीयः। अर्थात् दीर्घायु अथवा पूर्णायु की कामना करने वालों के लिए जो हितकर अध्याय है, उसे ‘आयुष्कामीय’ अध्याय कहा जाता है। यहाँ प्रयुक्त ‘आयुः’ शब्द की व्याख्या महर्षि आत्रेय के अनुसार इस प्रकार है—‘शरीरिन्द्रियसत्त्वात्मसंयोगो धारि जीवितम्। नित्यगन्धानुबन्धश्च पययिरायुःकृत्ते’॥ (च.सू. १।४१)

अध्यायम् —पदसमुदाय का नाम ‘वाक्य’ है। यथा—‘मुत्तिडन्तचयो वाक्यम्’। वाक्यों के समूह का नाम ‘प्रकरण’ है, प्रकरण-समुदाय को ही ‘अध्याय’ कहते हैं, अध्याय-समूह को ‘स्थान’ कहते हैं। सूत्रस्थान आदि अन्य स्थानों के समूह को ‘तन्त्र’ कहते हैं। जैसे—चरकतन्त्र, सुश्रुततन्त्र आदि। काव्यालंकार में इस प्रकार की वाक्यरचना को उत्तरालंकार कहते हैं। यथा—‘उत्तरवचनश्रवणादुत्सयनं यत्र पूर्ववचनानाम्। क्रियते तदुत्तरं स्यादिति’। चरक ने अपनी संहिता में इस प्रकार के आशय से सम्पन्न अध्याय का नाम ‘दीर्घजीवतीय’ रखा है।

व्याख्यास्यामः —यद्यपि ‘अष्टांगहृदय’ नामक तन्त्र का तन्त्रकार एक (वाग्भट) ही है, फिर यहाँ बहुवचन के प्रयोग की क्या आवश्यकता है? इसका व्याकरणसम्मत समाधान इस प्रकार है—‘अस्मदो द्रव्योश्च (१।२।५९)—एकत्वे द्वित्वे च विवक्षितेऽस्मदो बहुवचनं वा स्यात्’। जैसे—हम जा रहे हैं अथवा मैं जा रहा हूँ।

इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षयः।

इस विषय में आत्रेय आदि महर्षियों ने इस प्रकार कहा था।

वक्तव्य —महर्षि वाग्भट का कथन है कि प्रस्तुत तन्त्र में जो कुछ भी कहा गया है, वह महर्षि आत्रेय तथा धन्वन्तरि आदि महर्षियों के वचनों के अनुसार ही कहा गया है। ये आप्त पुरुष थे, क्योंकि प्रामाणिकता आप्तपुरुषों के वचनों में ही होती है। इसीलिए हमने उक्त महर्षियों के वचनों का अनुसरण किया है, अतएव हमारे इस तन्त्र में भी कोई अप्रामाणिक विषय नहीं आया है, इसलिए हम (वाग्भट) भी आप्त (प्रामाणिक) हैं। इसीलिए अष्टांगसंग्रह में वाग्भट ने कहा है—‘न मात्रामात्रमप्यत्र किञ्चिदागमवर्जितम्’। (अ.सं. १।२२) अर्थात् इस ग्रन्थ में मात्रा (ज, अ, बिन्दु, विसर्ग) आदि भी आगम (शास्त्र) से अतिरिक्त नहीं है अर्थात् जो भी कहा या लिखा गया है, वह सब शास्त्रानुकूल ही है। इस कथन के द्वारा महर्षि ने अपने को तथा अपने ग्रन्थ को प्रामाणिक सिद्ध किया है।

आयुः कामयमानेन धर्मासुखसाधनम्। आयुर्वेदोपदेशेषु विधेयः परमादरः॥२॥

आयुर्वेद का प्रयोजन —धर्म, अर्थ, सुख (काम) नामक इन तीन पुरुषार्थों का साधन (प्राप्ति का उपाय) आयु है, अतः आयु (सुखायु) की कामना करने वाले पुरुष को आयुर्वेदशास्त्रों में निर्दिष्ट उपदेशों में परम (विशेष) आदर करना चाहिए॥२॥

वक्तव्य —शास्त्रों में उपदेश दो प्रकार के मिलते हैं—एक विधानात्मक (इन्हें करना चाहिए) और दूसरे निषेधात्मक (इन्हें नहीं करना चाहिए)। इस प्रकार के उपदेशों के प्रति समाज का आदर भाव होना चाहिए अर्थात् इस प्रकार आप्त (विश्वसनीय अतएव प्रामाणिक महर्षि) वचनों की उपेक्षा करने से सुखायु की प्राप्ति नहीं हो पाती है। हमें तो हितायु, सुखायु तथा दीर्घायु की कामना करनी है, अतः महर्षियों के त्रिकालसत्य उपदेशात्मक वचनों के प्रति परम आदर करना ही चाहिए।

अष्टाङ्गहृदये

महर्षि चरक ने 'आयुर्वेद' शब्द की व्याख्या करते हुए कहा है—'हिताऽहितं सुखं दुःखमायुस्तस्य हिताऽहितम्। मानं च तच्च यत्रोक्तमायुर्वेदः स उच्यते' ॥ (च.सू. १।४१) जिस शास्त्र में आयु, अहित आयु, सुख आयु तथा दुःख आयु का वर्णन हो एवं आयु के हित-अहित के लिए आहार-विहार तथा औषधों का वर्णन हो और आयु के मान (प्रमाण) का निर्देश किया गया हो; साथ ही आयु का भी वर्णन हो, उसे 'आयुर्वेद' कहते हैं। हित, अहित, सुख तथा दुःख आयु का वर्णन च.सू. ३०।२०-२५ में विस्तार से देखें।

धर्मायुर्वेदसुखसाधनम्— 'धर्म'—आजकल धर्माचार्य इस शब्द की अनेक व्याख्याएँ प्रस्तुत करते हैं, किन्तु आयुर्वेदशास्त्रसम्मत व्याख्या इस प्रकार है—'ध्रियते लोकः अनेन इति धर्मः'। जिससे लोक का धारण-पोषण होता है। 'अर्थ'—'अर्थ्यते याच्यते इति अर्थः' अर्थात् जिसे समाज प्राप्त करना चाहता है। यथा—धन-सम्पत्ति तथा जीवनोपयोगी समस्त साधन। सुख —यह दो प्रकार का होता है, एक सुख वह है जिससे तत्काल सुख की प्रतीति होती है और दूसरा सुख वह होता है जिसे 'आत्यन्तिक' कहते हैं, वह सुख है—मोक्षप्राप्ति। अथवा इस सुख को ऐहिक (इस लोक से सम्बन्धित) तथा पारलौकिक (परलोक से सम्बन्धित) रूप से समझा जा सकता है। तत्काल मिलने वाले सुख की महर्षि चरक ने निन्दा की है। देखें—च.सू. २८।४०। गीता में भी कहा गया है—'ये तु संस्पर्शजा भोगा दुःखयोन्य एव ते' ॥ (५।२२)

आयुर्वेदोपदेशेषु —प्राचीन काल से ही आयुर्वेदशास्त्र सम्बन्धी अनेक संहिताएँ विद्यमान हैं, उनमें विविध प्रकार के उपदेश मिलते हैं, उन सभी के प्रति व्यावहारिक आदरभाव रखना चाहिए। यही यहाँ उक्त वाक्य में प्रयुक्त बहुवचन की सार्थकता है।

ब्रह्मा स्मृत्याऽऽयुषो वेदं प्रजापतिमजिग्रहत्। सोऽग्निनौ तौ सहप्राक्षं सोऽत्रिपुत्रादिकात्मनीन् ॥ तेऽग्निवेशादिकांस्ते तु पृथक् तन्त्राणि तेनिर।

आयुर्वेदावतरण —ब्रह्माजी ने सबसे पहले आयुर्वेदशास्त्र का स्मरण (ध्यान) करके उसे दक्षप्रजापति को ग्रहण कराया अर्थात् पढ़ाया था। दक्षप्रजापति ने अश्विनीकुमारों को पढ़ाया था, अश्विनीकुमारों ने देवराज इन्द्र को पढ़ाया था, उन्होंने अत्रिपुत्र (पुनर्वसु आत्रेय) आदि महर्षियों को पढ़ाया था; आत्रेय आदि ने अग्निवेश, भेड़, जतुकर्ण, पराशर, हारीत, क्षारपाणि आदि को पढ़ाया था और फिर अग्निवेश आदि महर्षियों ने अलग-अलग तन्त्रों (आयुर्वेदशास्त्रों) की विस्तार के साथ रचना की ॥ ३ ॥

वक्तव्य —यह वाग्भटोक्त आयुर्वेद की अवतरणिका है। आयुर्वेदशास्त्र में ये अवतरणिकाएँ भिन्न-भिन्न रूपों में उपलब्ध होती हैं। पुराणों में भी ये स्वतन्त्र रूप से देखने को मिलती हैं। चरक-चिकित्सा-स्थान अ० १ पाद ४।३ में कहा है कि एक बार देवराज इन्द्र के पास आयुर्वेद सम्बन्धी उपदेश सुनने के लिए भृगु, अंगिरा, अत्रि, वसिष्ठ, कश्यप, अगस्त्य, पुलस्त्य, वामदेव, असित, गौतम आदि अनेक महर्षि गये थे। सुश्रुत-सूत्रस्थान १।३ में देवराज इन्द्र से धन्वन्तरि आदि ने आयुर्वेद का ज्ञान प्राप्त किया था। उस काल में श्रुति (श्रवण करना) तथा स्मृति (स्मरण करना) ये ही विद्याप्राप्ति तथा संग्रह के उपाय थे।

आयुषो वेदं —'आयुषः सम्बन्धी वेदः आयुर्वेदः', यहाँ सम्बन्ध का अर्थ है—पाल्य-पालक भाव। जैसा कि आचार्य ने अष्टांगसग्रह में कहा है—'आयुषः पालकं वेदमुपवेदमथर्वणः'। (अ.सं.सू. १।१०) अर्थात् अथर्ववेद का ही उपवेद यह आयुर्वेद है, जो आयु की रक्षा के उपदेशों का उपदेष्टा है।

तेभ्योऽतिविप्रकीर्णेभ्यः प्रायः सारतरोच्ययः ॥४॥ क्रियतेऽष्टाङ्गहृदयं नातिसङ्घेपविस्तरम्।

आयुष्कामायाध्यायः १ ]

सूत्रस्थानम्

अष्टांगहृदय का स्वरूप—महर्षि वामभट का कथन है कि द्धर-उधर बिखरे हुए उन प्राचीन तन्त्रों में से उत्तम-से-उत्तम ( सार ) भाग को लेकर यह उच्च्य ( संग्रह ) किया गया है। प्रस्तुत संग्रह-ग्रन्थ का नाम है—‘अष्टांगहृदय’। इसमें प्राचीन तन्त्रों में वर्णित विषय न अत्यन्त संक्षेप से और न अत्यन्त विस्तार से ही कहे गये हैं। ॥४॥

बक्तव्य—अन्य ( इसके पहले लिखी गयी ) संहिताएँ या तो अत्यन्त संक्षिप्त रही हैं; जैसे—रविगुप्त विरचित ‘सिद्धसारतन्त्र’, यह आज तक प्रकाशित नहीं हो पाया तथा अत्यन्त विस्तृत, जैसे—अष्टांगसंग्रह आदि। उसके बाद लिखा गया यह ‘अष्टांगहृदय’ ग्रन्थ ऐसा है जैसा मानव-शरीर में ‘हृदय’ होता है, ऐसा स्वयं ग्रन्थकार ने इसी ग्रन्थ के उत्तरस्थान (४०८९) में कहा है—‘हृदयमिव हृदयमेतत्’। अतिविस्तृत ग्रन्थ सरलता से सबके समझ में नहीं आता है, अतएव यह ग्रन्थ सर्वसामान्य के लिए बुद्धिगम्य होगा, सोचकर ही इसकी रचना की गयी है। अन्य प्राचीन संहिताओं की तुलना में ‘अष्टांगहृदय’ का प्रचार-प्रसार भी अधिक है।

कायबालग्रहोर्ध्वार्द्धशल्यदंष्ट्राजरावुषान् ॥५॥

अष्टावङ्गानि तस्याहुश्चिकित्सा येषु संभिता।

आयुर्वेद के आठ अंग—१. कायचिकित्सा, २. बालतन्त्र (कौमारभृत्य), ३. ग्रहचिकित्सा (भूतविद्या), ४. ऊर्ध्वगचिकित्सा (शालाक्यतन्त्र), ५. शल्यचिकित्सा (शल्यतन्त्र), ६. दंष्ट्राविषचिकित्सा (अगदतन्त्र), ७. जराचिकित्सा (रसायनतन्त्र) तथा ८. वृषचिकित्सा (वाजीकरण-तन्त्र) —ये आठ अंग कहे गये हैं। इन्हीं अंगों में सम्पूर्ण चिकित्सा आश्रित है ॥५॥

बक्तव्य—वामभट का यह पद्य अतिसंक्षेप का उदाहरण कहा जा सकता है, यद्यपि अन्य अंगों का अर्थ भले ही हम खींच-तान कर लगा लें, किन्तु ‘दंष्ट्रा’ शब्द से प्राणिज विष के बाद स्थावर विष तथा गरविष का अर्थ निकालना अत्यन्त दुष्कर कर्म है। आचार्य अरुणदत्त ‘दंष्ट्रा’ का अर्थ ‘पीडाकरणसामान्य’ करते हैं। यह किसी भी विष से सम्भव है। यदि ‘दंष्ट्रा’ शब्द को विष मात्र का उपलक्षण स्वीकार कर लिया जाय तो कुछ काम चल सकता है। आठों अंगों की गणना ऊपर कर दी गयी है, अब यहाँ उन अंगों का परिचय प्रस्तुत है।

(१) कायचिकित्सा—‘चिञ् चयने’ धातु से ‘घञ्’ प्रत्यय तथा ‘च’ के स्थान पर ‘क’ करने से इसकी निष्पत्ति होती है। ‘चीयते अस्त्रादिभिः’ इति कायः ‘अथवा’ ‘चीयते प्रशस्तदोषधातुमैः’ इति कायः दोनों ही व्युत्पत्तियाँ यहाँ अपेक्षित हैं। इसी में सम्पूर्ण शरीर को पीड़ित करने वाले आमाशय तथा पक्वाशय से उत्पन्न होने वाले ज्वर आदि समस्त रोगों की शान्ति का उपाय किया जाता है। अतः इसे कायचिकित्सा नामक प्रथम अंग कहते हैं। यह ‘काय’ यौवन आदि अवस्थाओं वाला है। इस अंग के प्रधान तन्त्र ‘अग्निवेशतन्त्र’ (चरकसंहिता), भेलसंहिता तथा हारीतसंहिता आदि हैं।

(२) बालतन्त्र या कौमारभृत्य—बालकों के शरीर में परिपूर्ण बल तथा धातुओं आदि का अभाव होने के कारण इस अंग का स्वतन्त्र वर्णन किया गया है। क्योंकि इनकी सभी प्रकार की औषधियाँ भिन्न प्रकार की होती हैं। दूध भी इन्हें माता या धात्री (धाय = उम्माता) का देने की प्राचीन काल से व्यवस्था है, जिसका वर्णन साहित्यिक ग्रन्थों में भी उपलब्ध होता है। यहाँ एक शंका होती है कि बालकों की भाँति वृद्धों की चिकित्सा का भी स्वतन्त्र उपदेश आचार्यों ने क्यों नहीं किया? इसका समाधान इस प्रकार है—वृद्धावस्था पूर्ण युवावस्था के बाद में आती है, अतः इसकी चिकित्सा का अधिकांश अंग कायचिकित्सा में ही समाविष्ट हो जाता है और जो कुछ अंश शेष रह जाता है, उसके निराकरण के लिए ७वें रसायनतन्त्र की व्यवस्था की गयी है। इस विषय का प्राचीन ग्रन्थ केवल ‘काश्यपसंहिता’ है, जो सम्प्रति खण्डित उपलब्ध

अष्टाङ्गहृदये

होती है। इसके अतिरिक्त चरक-शारीर अध्याय ८ तथा चरक-चिकित्सास्थान अध्याय ३०, सुश्रुत-शारीरस्थान अध्याय १० एवं सुश्रुत-उ.त.अ. २७ से ३७ तक देखें।

(३) ग्रहचिकित्सा (भूतविद्या) —इसमें देव, असुर, पूतना आदि ग्रहों से गृहीत (आविष्ट) प्राणियों के लिए शान्तिकर्म की व्यवस्था की जाती है। इनमें बालग्रह तथा स्कन्दग्रहों का भी समावेश है, साथ ही इनकी शान्ति के उपायों की भी चर्चा की गयी है। इस विषय का आज कोई प्राचीन स्वतन्त्र तन्त्र उपलब्ध नहीं है। केवल चरकसंहिता-निदानस्थान ७१०-१६, चरक-चि. ९।१६-२१ और सुश्रुतसंहिता-उत्तरतन्त्र अध्याय २७ से ३७ तक तथा अध्याय ६० में भूतविद्या का वर्णन मिलता है। इसके अतिरिक्त सुश्रुतसंहिता-सूत्रस्थान अध्याय ५।१७-३३ तक शस्त्रकर्म करने के बाद रक्षोच्च मन्त्रों द्वारा रोगी की रक्षा का विधान कहा गया है। खेद है कि युगों से गुरु-परम्परा से चली आने वाली यह विद्या आज शोचनीय दशा को पहुँच गयी है, आज भी इसकी सुरक्षा के उपाय नहीं किये जा रहे हैं।

(४) ऊर्ध्वार्ङ्गचिकित्सा (शालाक्यतन्त्र) —ऊर्ध्वजगृत आँख, मुख, कान, नासिका आदि में आधारित रोगों की शलाका आदि द्वारा की जाने वाली चिकित्सा ही इस अंग का प्रधान क्षेत्र है। शालाक्यतन्त्र के नाम से आज कोई ग्रन्थ स्वतन्त्र रूप से नहीं मिलता। सुश्रुतसंहिता के उत्तरतन्त्र के अध्याय १ से १९ तक में उत्तमांग (शिरःप्रदेश) में स्थित नेत्ररोगों का, २० तथा २१वें अध्यायों में कर्णरोगों का, २२ से २४ तक नासारोगों का और २५ एवं २६वें अध्यायों में शिरोरोगों का वर्णन किया है। सुश्रुत-निदानस्थान में मुखरोगों का वर्णन तथा सुश्रुत-चिकित्सास्थान अध्याय २२ में मुखरोगों की चिकित्सा का उल्लेख किया है। चरक-चिकित्सास्थान अध्याय २६ में श्लोक १०४ से ११७ तक नासारोगनिदान, ११८ में शिरोरोगनिदान, ११९ से १२३ तक मुखरोगनिदान, १२७-१२८ में कर्णरोगनिदान तथा १२९ से १३१ तक नेत्ररोगनिदान का वर्णन मिलता है। वैसे भी शालाक्यतन्त्र पर अधिकारपूर्वक कुछ कहना यह चरक की प्रतिज्ञा के विरुद्ध विषय था। जैसा कि उन्होंने कहा है—'पराधिकारे तु न विस्तरोक्तिः शस्तेति तेनाऽयत्र न नः प्रयासः'। अतएव वे इसके विस्तार में नहीं गये।

(५) शल्यतन्त्र —उक्त आयुर्वेद के आठ अंगों में यही अंग सबसे प्रधान है। क्योंकि प्रथम देवासुर-संग्राम में युद्ध में हुए घावों की सद्यःपूरति के लिए इसी की आवश्यकता पड़ी थी। उस समय देववैद्य अश्विनी-कुमारों ने इस तन्त्र का समुचित प्रयोग कर दिखाया था। आज भी शल्यचिकित्सा-कुशल चिकित्सक उनका प्रतिनिधित्व करते ही हैं। देखें-सु.सू. १।१७ तथा १८। भगवान् धन्वन्तरि का अवतार शल्य आदि अंगों की पुनः प्रतिष्ठा के लिए ही हुआ था। देखें-सु.सू. १।२१। कायचिकित्सा-प्रधान चरकसंहिता में भी अर्थ, उदर तथा गुल्म आदि रोगों में शल्यकर्मविशेषज्ञ से सहायता लेने का संकेत है। मूलतः शल्यतन्त्र में यन्त्र, शस्त्र, धार, अग्नि के प्रयोगों का निर्देश मिलता है।

(६) दण्डाविषचिकित्सा (अगदतन्त्र) —महर्षि वाग्भट द्वारा रचित दोनों संहिताओं (संग्रह तथा हृदय) में अष्टांग रूपी आयुर्वेद का विभाजक सूत्र अविकल रूप से प्राप्त होता है। इससे हम इस निर्णय पर पहुँचते हैं कि इन्होंने सुश्रुतसंहिता को आदर्श मानकर 'सर्पकीटलूता' आदि में प्रथम परिगणित 'सर्प' शब्द को प्रमुख मानकर 'दण्डा' शब्द का प्रयोग किया होगा, क्योंकि 'प्राधान्येन व्यपदेशा भवन्ति' यह सूत्र सर्वत्र अपनाया जाता है और सभी प्रकार के विषों में 'पीडाकरणसामान्य' गुण तो होता ही है।

अगदतन्त्र उसे कहते हैं जिसमें सर्प आदि जंगम तथा वत्सनाभ आदि स्थावर विषों के लक्षणों का एवं विविध प्रकार के मिश्रित विषों (गरविषों) का वर्णन तथा उन-उनके शान्ति (शमन) के उपायों का वर्णन हो।

आयुष्कामीयाध्यायः १ ]

सूत्रस्थानम्

सामान्य रूप से 'अगद' शब्द औषध का पर्याय है। इसकी व्याख्या इस प्रकार मिलती है—'न गदः अस्मात्' अथवा 'गदविरुद्धम्'। ऐसा प्रतीत होता है कि यहाँ भी 'अगद' शब्द का अर्थ रोग को दूर करना ही रहा होगा। अस्तु।

सुश्रुत का सम्पूर्ण कल्पस्थान अगदतन्त्र है, जैसा कि सुश्रुत-सूत्रस्थान (३।२८) में कहा गया है—'अष्टौ कल्पाः समाख्याता विषभेषजकल्पनात्' ॥ इति। चूँकि इस कल्पस्थान में विषचिकित्सा की ही कल्पना की गयी है, अतः इसका नाम कल्पस्थान है। इस सन्दर्भ में चरक-चिकित्सास्थान का 'विषचिकित्सित' नामक २३वाँ अध्याय भी अवलोकनीय है।

(७) जराचिकित्सा (रसायनतन्त्र)—उक्त अगदतन्त्र के बाद रसायनतन्त्र के प्रस्तुतीकरण का औचित्य प्रतिपादित करते हुए श्री अरुणदत्त कहते हैं कि रसायनों के प्रयोग से विष का भी प्रभाव दूर हो जाता है। रसायन शब्द का विशेष परिचय देखें—च.चि. १।७-८।

रसायनतन्त्र उसे कहा गया है जो वयःस्थापन (कुरु समय के लिए पुनः यौवन को स्थिर करने में सहायक) होता है, आयु को बढ़ाता है, मेधा (धारणाशक्तियुक्ता धीः) अर्थात् जो धारणाशक्ति तथा सभी प्रकार के बल को बढ़ाने एवं रोगों का विनाश करने में समर्थ हो। इस प्रकार का भी कोई प्राचीन स्वतन्त्र ग्रन्थ उपलब्ध नहीं होता। इसकी पूर्ति के लिए देखें—चरक-चिकित्सास्थान अध्याय १ के चारों पाद तथा सु.चि.अ. २७ से ३०।

(८) वृषचिकित्सा (बाजीकरणतन्त्र)—'अवाजी वाजीव अत्यर्थ मैथुने शक्तः क्रियते येन तद् वाजीकरणम्'। वाजीकरणतन्त्र उसे कहते हैं जो अल्प मात्रा वाले शुक्र का सन्तर्पण करता है, दूषित शुक्र को शुद्ध करता है, क्षीण शुक्र को बढ़ाता है और सूखे हुए शुक्र के उत्पादन के उपायों का निर्देश करता है। लिंग में प्रहर्यता को उत्पन्न कर नर-नारी में सन्तानोत्पादनशक्ति को पैदा करता है। 'वर्षति इति वृषः' इस अभिप्राय से भले ही इस तन्त्र को 'वृषचिकित्सा' कहा जाय, अन्यथा वृष (साँड़) जिन चेष्टाओं के बाद सोच-सोचकर मैथुन में प्रवृत्त होता है, उसे सुश्रुत ने सौगन्धिक नामक नपुंसक कहा है। देखें—सु.शा. १।३९, जैसे—साँड़ तथा कुत्ता।

इस विषय से सम्बन्धित भी कोई प्राचीन ग्रन्थ उपलब्ध नहीं होता है। इसके लिए केवल च.चि. २ तथा च.चि. ३०।१२६ से २०३ तक के पद्य एवं सु.शा. २ तथा सु.चि. २६ सम्पूर्ण का अवलोकन करें। वाजीकरण के लिए 'वृष' एवं 'बाजी' शब्दों का प्रयोग हुआ है। वृष का अर्थ है—'वर्षतीति वृषः' अर्थात् जो योनि में वीर्य की वर्षा करें। किन्तु वह वृष (साँड़) वाजी (घोड़े) के समान वेग वाला नहीं होता, अतः अधिकांश क्षेत्रों में 'वाजीकरण' शब्द ही प्रसिद्ध है।

सावधान—रसायन एवं वाजीकरण प्रयोगों का उपयोग केवल स्वास्थ्यवर्धन एवं प्रजोत्पादन के लिए ही होना चाहिए, दुग्धचार या दुग्धवृत्ति के लिए कभी भी इनका प्रयोग न करें; ऐसा करने से हानि भी हो सकती है। साथ ही इनका प्रयोग योग्य चिकित्सक की देख-रेख में ही करें। इनके सेवनकाल में जितेन्द्रिय होना अति आवश्यक है, तभी पूरा लाभ मिलता है।

चिकित्सा येषु संश्रिता—ऊपर दिये गये आठ अंगों के साथ चिकित्सा शब्द का सम्बन्ध है। चरकसंहिता में चिकित्सा शब्द को इस प्रकार परिभाषित किया गया है—'चतुर्णां भिषगादीनां शस्तानां धातुवैकृते। प्रवृत्तिः धातुसात्पर्याथ चिकित्सेत्यभिधीयते' ॥ (च.सू. १।५)

रोग या रोगों की शान्ति के लिए चिकित्सक द्वारा जो-जो उपाय किये जाते हैं उन सबका सम्मिलित नाम 'चिकित्सा' है। इसमें जो 'चतुर्णां भिषगादीनां शस्तानां' पद्यांश दिया गया है, इसके

अष्टाङ्गहृदये

अनुसार वैद्य, औषधोपयोगी द्रव्य, उपस्थाता (परिचारक) तथा रोगी—ये सब अपने-अपने प्रशस्त गुणों से युक्त हों तभी उचित चिकित्सा हो सकती है। सुश्रुत के अनुसार—“वत्स सुश्रुत! इह खलु आयुर्वेद-प्रयोजनम्—व्याध्युपमृष्टानां व्याधिपरिमोक्षः स्वस्थस्य स्वास्थ्यरक्षणं च”। (सु.सू. १।१४) अर्थात् आयुर्वेद के दो प्रयोजन हैं—रोगियों को रोग से मुक्ति दिलाना और स्वस्थ की स्वास्थ्य रक्षा। महर्षि वाग्भट ने स्वस्थवृत्त का वर्णन अ, २ से ७ तक और रोगशान्ति का वर्णन सम्पूर्ण ग्रन्थ में किया है।

वायुः पित्तं कफश्चेति त्रयो दोषाः समासतः॥६॥

दोषों का वर्णन —आयुर्वेदशास्त्र में संक्षेपतः तीन ही दोष माने जाते हैं; यथा—१. वात, २. पित्त तथा कफ॥६॥

वक्तव्य —इन बात आदि दोषों का विशेष परिचय अष्टाङ्गहृदय-सूत्रस्थान के ग्यारहवें ‘दोषादिविज्ञान’ नामक अध्याय में देखें। सुश्रुत-सूत्रस्थान (१।२२) में कहा गया गया है कि पृथिवी, जल, तेज, वायु तथा आकाश इन पाँच महाभूतों के संयोग का नाम पुरुष है और चरक-शरीरस्थान (१।१६) में ‘खादयश्चेतना षष्ठा धातवः पुरुषः स्मृतः’। अर्थात् उक्त पञ्चमहाभूत और चेतना धातु (चेतना का आधार मन सहित आत्मा) कहा गया है। यही आशय सुश्रुत का भी है। (मोक्ष-विषयक शास्त्र में २५ तत्त्वों के संयोग को पुरुष संज्ञा दी गयी है, अस्तु।) यही चिकित्स्य पुरुष है।

पञ्चमहाभूतों में आकाशतत्त्व अवाकाश (खाली स्थान) के रूप में शरीर में रहता है और पृथिवीतत्त्व आधारस्वरूप है, अतएव ये दोनों निष्क्रिय (निश्चेष्ट) हैं, अर्थात् इन दोनों में किसी प्रकार की क्रिया नहीं होती है। शेष तत्त्वों का विवरण इस प्रकार है—जलतत्त्व ‘कफ’ है, अग्नितत्त्व ‘पित्त’ है और वायुतत्त्व ही ‘वात’ है। अब आगे इनके विकृत तथा अविकृत रूपों की चर्चा की जायेगी।

आयुर्वेदशास्त्र में प्राणिमात्र का नाम ‘पुरुष’ है। यह वनस्पति (पुष्परहित फल वाले वृक्ष), वानस्पत्य (फूल-फल वाले वृक्ष), वीरुध (शाखा-प्रशाखा युक्त लता) तथा औषधियों का; हाथी, घोड़ा, गाय, भैंस आदि पशु एवं पक्षियों का भी उपदेश देता है, परन्तु इन सबमें पुरुष (मानव) प्रधान है। जैसा कि मनु ने कहा है—‘भूतानां प्राणिनः श्रेष्ठाः प्राणिनां बुद्धिजीविनः। बुद्धिमत्सु नराः श्रेष्ठाः……’॥ (मनु. १।१६)

त्रयो दोषाः समासतः —वाग्भट ने सुश्रुत द्वारा स्वीकृत ‘रक्त’ भी दोष है, इसका यहाँ खण्डन किया है, अपितु ये ‘आम’ को दोष स्वीकार करते हैं। ध्यान दें—‘दोषेण भस्मनेवाग्नी छत्तेऽन्नं न विपच्यते। तस्मादादोषपचनाज्ज्वरितानुपवासयेत्’॥ (अ.हृ.चि. १।१०) यहाँ ‘दोषेण’ पद के स्थान पर अनेक संस्करणों में ‘आमेन’ पाठ मिलता है। वास्तव में यहाँ चर्चा ‘आमदोष’ की है। इस प्रकार के सयुक्तिक विचारों या प्रसंगोचित परिवर्तनों को चरक ने उस-उस आचार्य का ‘बुद्धेविशेषः’ कहा है।

विकृताऽविकृता देहं ज्यन्ति ते बर्त्यन्ति च।

विकृत-अविकृत दोष —ये तीनों वात आदि दोष विकृत (असम अर्थात् बड़े हुए अथवा क्षीण हुए) शरीर का विनाश कर देते हैं और अविकृत (समभाव में स्थित) जीवनदान करते हैं अथवा स्वास्थ्य-सम्पादन करने में सहायक होते हैं।

वक्तव्य —प्राचीन टीकाकारों ने ‘विकृताः’ का अर्थ ‘स्वभावप्रच्युताः’ किया है, जो उचित है। तथापि दोषों का अपना स्वभाव क्या है, यह कहना थोड़ा कठिन है, क्योंकि ये मनुष्यों के आहार-विहार पर निर्भर रहते हैं और ऋतु-परिवर्तन आदि पर भी। आप ध्यान दें—वात-पित्त-कफ का नाम केवल दोष ही नहीं है, अपितु इन्हें ‘धातु’ तथा ‘मल’ भी कहा गया है। देखें—‘शरीरदूषणाद् दोषा धातवो देहधारणात्। वातपित्तकफा ज्ञेया मल्लिनीकरणात्मलाः’॥ हमारे शरीर में इन वात आदि की स्थिति इस प्रकार है—जब

आयुष्कामीयाध्यायः १ ]

सूत्रस्थानम्

ये शरीर को रूग्ण, विकृत या दूषित करते हैं तब ये 'दोष' कहे जाते हैं, जब ये मानव को स्वस्थ रखते हैं तब 'धातु' और जब ये शरीर को मलिन करते हैं तब इन्हें 'मल' कहा जाता है। विशेष द्रष्टव्य—च.वि. १।५; च.सू. १ तथा च.सू. १।५७। कुछ संस्करणों में इसके आगे एक पद्य इस प्रकार का प्राप्त होता है—'प्रत्येकं ते त्रिधा वृद्धिक्षयसाम्यविभेदतः। उत्कृष्टमध्यात्मतया त्रिधा वृद्धिक्षयावपि' ॥

ते व्यापिनोऽपि हृन्नाभ्योरधोमध्योर्ध्वसंशयाः ॥७॥

दोषों के स्थान तथा प्रकोपकाल—ये तीनों बात आदि दोष सदा समस्त शरीर में व्याप्त रहते हैं। फिर भी नाभि से निचले भाग में वायु का, नाभि तथा हृदय के मध्य भाग में पित्त का और हृदय के ऊपरी भाग में कफ का आश्रयस्थान है ॥७॥

वयोऽहोरात्रिभुक्तां तेषस्तमध्यादिगः क्रमात्।

वय आदि के अनुसार काल—यद्यपि ये दोष सदा गति(क्रिया)शील रहते हैं, तथापि वयस् के अन्तकाल (वृद्धावस्था) में, वयस् के मध्य (यौवन) काल में तथा वयस् के आदि (बाल्य) काल में और दिन-रात तथा भुक्त (भोजन कर चुकने) के अन्त, मध्य एवं आदि काल में विशेष रूप से गतिशील होते हैं।

बक्तव्य—उक्त विषय को आप इस प्रकार समझें—यद्यपि वात-पित्त-कफ ये सभी सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त होकर रहते हैं, तथापि ये क्रम से विशेष कर के किस प्रकार रहते हैं, इसे बतलाया जा रहा है—अवस्था का अन्तिम भाग वृद्धावस्था, दिन का अन्तिम भाग २ से ६ बजे तक, रात्रि का अन्तिम भाग २ से ६ बजे तक, भुक्त (अन्न के पचने) का अन्तिम काल वायु के प्रकोप होने का है। अवस्था का मध्य भाग (युवावस्था), दिन का मध्य भाग १० से २ बजे तक, रात्रि का मध्य भाग १० से २ बजे तक, भुक्त (अन्न के पचने) का मध्यकाल पित्त के प्रकोप होने का है। अवस्था का आदि भाग (बाल्यावस्था), दिन का प्रथम भाग ६ से १० बजे तक, रात्रि का प्रथम भाग ६ से १० बजे तक, भुक्त (अन्न के पचने) का आदिकाल कफ के प्रकोप का काल है।

तैर्भेदद्विषमतीक्ष्णो मन्दश्चाग्निः समैः समः ॥८॥

दोषों का अग्नि पर प्रभाव—उक्त बात आदि दोषों के प्रभाव (वृद्धि) से अग्नि (जठराग्नि) भी दोषों के क्रम (वातदोष) से विषम, (पित्तदोष से) तीक्ष्ण और (कफदोष से) मन्द हो जाता है तथा इन तीनों के सम मात्रा में रहने पर अग्नि भी सम प्रमाण में रहता है ॥८॥

बक्तव्य—अग्नि तथा पित्त के गुण-धर्म समान होते हैं, अतएव पित्तदोष की वृद्धि से अग्नि का तीक्ष्ण होना स्वाभाविक ही है। क्योंकि महर्षि वरक ने कहा है—'सर्वदा सर्वभावानां सामान्यं वृद्धिकारणम्'। (च.सू. १।४४) आशय स्पष्ट है। अग्नि का विशेष वर्णन अ.हू.शा. ३।७४, अ.सं.सू. ११ तथा सू. २१ में देखें।

कोष्ठः क्रूरो मुर्दुमध्यो मध्यः स्यात्तेः समैरपि।

दोषों का कोष्ठ पर प्रभाव—जठराग्नि की भांति कोष्ठ भी वातदोष से क्रूर, पित्तदोष से मुर्दु एवं कफदोष से मध्यम रहता है और तीनों दोषों के सम रहने पर भी मध्यम रहता है।

बक्तव्य—कोष्ठ की क्रूरता आदि का वर्णन तथा उसके अनुरूप चिकित्सा का विधान अ.हू.सू.अ. १८।३४ में देखें। कोष्ठ-परिचय—'स्थानान्यामाग्निपक्वानां मृत्रस्य हृदिरस्य च। हृदुण्डुकः फुफ्फुसश्च कोष्ठ इत्यभिधीयते' ॥ (च.शा. ७।१२ तथा सू.चि. २।१२) अर्थात् आमाशय, पक्वाशय, अन्त्याशय, मूत्राशय, रक्ताशय, हृदय, उण्डुक तथा फुफ्फुस इन अवयवों की परिधि को आयुर्वेदशास्त्र में 'कोष्ठ' नाम से परिभाषित किया है। इस वृद्धि से मूढकोष्ठ, क्रूरकोष्ठ तथा मध्यकोष्ठ नामक पुरुषों के भेदों का वर्णन भी मिलता है। यथा—'श्लेष्मोत्तरश्छर्दयति हृदुः खं विरिच्यते मन्दकफस्तु सम्यक्' ॥ (च.सि. १।९) अर्थ स्पष्ट है।

१०

अष्टाङ्गहृदये

शुक्रार्तवस्यैर्जन्मादौ विषेणेव विषक्रिमेः ॥१॥

तैश्च तित्रः प्रकृतयो हीनमध्येोत्तमाः पृथक्। समधातुः समस्तासु श्रेष्ठ, निन्द्या द्विदोषजाः ॥

दोषों से गर्भ-प्रकृति का वर्णन—गर्भाधान काल में माता-पिता के आर्तव तथा शुक्र में अधिकता से उपस्थित या वर्तमान उक्त तीनों (बात आदि) दोषों के अनुसार क्रमशः गर्भ की तीन प्रकृतियाँ बनती हैं। १. वातदोष की अधिकता से हीनप्रकृति, २. पित्तदोष की अधिकता से मध्यप्रकृति तथा ३. कफदोष की अधिकता से उत्तमप्रकृति बनती है; यही सबमें श्रेष्ठ मानी गयी है। जो प्रकृतियाँ दो-दो दोषों के मिश्रण से बनती हैं, वे निन्दनीय मानी जाती हैं और समधातुज प्रकृति सबमें श्रेष्ठ होती है।

शुक्र एवं आर्तव किंवा रजस् तथा वीर्य के मिश्रण से उत्पन्न गर्भ में बात आदि दोषों के गुण वैसे ही आ जाते हैं। जैसे विषक्रिमी में विष के गुण आ जाते हैं ॥१-१०॥

बक्तव्य—सात प्रकार की प्रकृतियाँ का वर्णन—१. वातप्रकृति हीन, २. पित्तप्रकृति मध्य, ३. कफप्रकृति उत्तम, ४. समधातुप्रकृति सबमें उत्तम। द्विदोषज प्रकृतियाँ—५. वातपित्तप्रकृति, ६. वातकफप्रकृति तथा ७. पित्तकफप्रकृति ये तीन निन्दित होती हैं। मनुष्यों की ही भांति अन्य प्राणियों की प्रकृति माता-पिता के अनुरूप ही होती है। जैसे—जहरीले सर्प की सन्तान अपने माता-पिता के समान ही जहरीली होती है, यह मात्र एक उदाहरण है। चरक-विमानस्थान अध्याय ६ में इन प्रकृतियों का विस्तार से वर्णन है।

भगवान् धन्वन्तरि ने प्रकृति-वर्णन के सम्बन्ध में सूश्रुत को जो उपदेश दिया था, वह इस प्रकार है—‘शुक्रशौणितसंयोगे यो भवेद् दोष उत्कटः। प्रकृतिजयते तेन’ ॥ (सु.शा. ४६३) यह पद्यात्मक वाक्य श्रीवाग्भट द्वारा उक्त विषय का पूर्ण रूप से समर्थन कर रहा है। इसी के आगे श्लोक ८० तक बात आदि प्रकृति वाले पुरुषों के स्वभाव आदि का वर्णन करने के बाद आगे सात्त्विक, राजस तथा तामस प्रकृतियों का भी वर्णन किया है। दोनों प्रकृतियों के वर्णन में मात्र इतना अन्तर है कि वातादि प्रकृतियाँ शारीरिक होती हैं और सात्त्विक आदि प्रकृतियाँ मानसिक होती हैं। इनका वर्णन सु.शा. ४८१ से ९९ तक में है। जहाँ एक ही माता-पिता की चार सन्तानें भिन्न-भिन्न प्रकृति की देवी जाती हैं, वही गर्भाधान काल में दोषों का तर-तम भाव ही कारण होता है। कुछ कारण और भी होते हैं, जैसे—माता के दोहद का प्रभाव। देखें—सु.शा. ३।१९ से २८ तक।

तत्र रूक्षो लघुः शीतः खरः सूक्ष्मश्लोडतिलः।

वातदोष के गुण—यह रूक्ष, लघु, शीत, खर, सूक्ष्म तथा चल (सदा गतिशील) होता है।

बक्तव्य—यहाँ जो बात का गुण ‘शीत’ कहा गया है, इसका विवेचन प्रस्तुत है। शरीर स्थित वातदोष अथवा प्रतिक्षण बहने वाला वायु जाड़ा में शीतल और गर्मियों में गरम प्रतीत होता है, अतः यह जैसे मौसम में होता है वैसा ही इसका स्पर्श होता है। वास्तव में यह वायु ‘अनुष्णाशीत’ है अर्थात् न यह गरम है और न शीतल है। शास्त्र में इसे ‘योगबाही’ कहा गया है। ऐसे कुछ पुरुष भी होते हैं जिनका कोई अपना अस्तित्व नहीं होता। जैसे—‘गंगा गये गंगादास, जमुना गये जमुनादास’, अस्तु। ‘योगबाही पर वायुः संयोगादुभयार्थकृत। दाहकृतेजसा युक्तः शीतकृतसोमसंधयात्’ ॥ (च.चि. ३।३८) तथा ‘पवने योगबाहिल्वाच्छीतं श्लेष्मयुते भवेत्। दाहः पित्तयुते’। इति। (अ.हृ.नि. २।४८)

पित्तं सस्नेहतीक्ष्णोष्णं लघु विषं सरं द्रवम् ॥११॥

पित्तदोष के गुण—यह कुछ स्निग्ध, तीक्ष्ण, उष्ण, लघु, विष (आम गन्ध वाला), सर तथा द्रव होता है ॥११॥

बक्तव्य—जब बमन के साथ पित्तदोष हरा-पीला रंग का निकलता है तब उसे सूँघने पर इसकी ‘विष’ गन्ध का ज्ञान होता है। यह एक प्रकार की अप्रिय गन्ध होती है। यहाँ ‘सस्नेह’ का अर्थ है—थोड़ा ‘स्नेहयुक्त’ होना। देखें—‘सस्नेहा गुडशर्करा’। (च.सू. २७।२४१)

आयुष्कामीयाध्यायः १ ]

सूत्रस्थानम्

११

सिन्धः शीतो गुरुर्मन्दः श्लक्ष्णो मृत्तः स्थिरः कफः ।

कफदोष के गुण—सिन्ध, शीत, गुरु, मन्द, श्लक्ष्ण, मृत्त तथा स्थिर होता है।

बक्तव्य—‘मृत्त’ शब्द से यहाँ जो टीकाकारों ने ‘पिच्छला’ अर्थ लिया है, उसका कारण यह है—वास्तव में ‘मृत्त’ का अर्थ मिट्टी होता है और मिट्टी दो प्रकार की होती है—१. चिकनी, जिससे लिपायी-पोतायी होती है अथवा जिससे घड़े आदि पात्र बनते हैं और २. बलुही मिट्टी होती है। इस प्रकार यहाँ तक बात आदि दोषों में रहने वाले गुणों का वर्णन कर दिया गया है, क्योंकि गुण गुणी (अपने आधार) में रहते हैं। अतएव बात आदि दोषों का ग्रहण चिकित्सा आदि अवसरो पर उनके गुणों को देखकर किया जा सकता है।

संसर्गः सन्निपातश्च तद्विद्विषयकोपतः ॥ १२ ॥

संसर्ग तथा सन्निपात की परिभाषा—आयुर्वेदीय परिभाषा के अनुसार किन्हीं दो-दो दोषों के एक साथ क्षय या वृद्धि होने का नाम ‘संसर्ग’ है और तीनों दोषों का एक साथ क्षय अथवा वृद्धि होने का नाम सन्निपात है ॥ १२ ॥

बक्तव्य—इस विषय का विस्तृत वर्णन अष्टांगहृदय-सूत्रस्थान के ‘दोषभेदीय’ नामक १२वें अध्याय में किया गया है। चरकसंहिता-सूत्रस्थान के १२वें अध्याय में इन वातादि दोषों के रहस्य को जानने के लिए विभिन्न प्रदेशों से आये हुए तत्कालीन महर्षियों (विद्वानों) की एक सम्भाषापरिषद् हुई थी, जिसमें इनके गुण-धर्मों के सम्बन्ध में विचार हुआ था। उसमें यह भी विचार किया गया था कि इन तीनों दोषों में वातदोष प्रधान है, शेष दो दोष पंगु हैं। आप भी इसका परिशीलन करें। यहाँ जो दोषों की क्षय-वृद्धि का वर्णन किया है, इससे चिकित्साकाल में चिकित्सक क्षीण दोषों को बढ़ाने का और बड़े हुए दोषों को सम करने का प्रयास करता है; यही चिकित्सा है, क्योंकि दोषों का सम होना ही उत्तम स्वास्थ्य का लक्षण है।

रसासुद्धासमेदोऽस्थिमज्जशुक्राणि धातवः । सप्त दूष्याः—

धातुओं का वर्णन—आयुर्वेदशास्त्र में रस, रक्त, मांस, मेदा, अस्थि, मज्जा तथा शुक्र ये सात ‘धातु’ कहे जाते हैं और जब ये वात आदि दोषों द्वारा दूषित किये जाते हैं, तो इन्हें ‘दूष्य’ कहते हैं।

—मला मूत्रशुक्तत्वेदावयोऽपि च ॥ १३ ॥

मलों का वर्णन—मूत्र, पुरीष तथा स्वेद (पसीना) आदि मल कहे जाते हैं ॥ १३ ॥

बक्तव्य—भगवान् धन्वन्तरि की मान्यता है—‘दोषधातुमलमूलं हि शरीरम्’ । (मु.सू. १।५३) अर्थात् वात आदि तीनों दोष, रस-रक्त आदि सातों धातु तथा मूत्र आदि शरीर के मल ही शरीर के मूल हैं अथवा यों समझिये कि यह शरीर दोष, धातु, मल मय है; ये ही इसके तत्त्व हैं। आगे वे पुनः इसी सम्बन्ध में कहते हैं—‘त एते शरीरधारणाद् धातव इत्युच्यन्ते’ । (मु.सू. १।४२०) अर्थात् ये रस, रक्त आदि शरीर को धारण करने से धातु कहे जाते हैं। ‘धातु’ शब्द ‘डुधात्रु धारणपोषणयोः’ धातु से निष्पन्न होता है। इसका अर्थ है—जो द्रव्य शरीर का धारण एवं पोषण करते हैं, उन्हें ‘धातु’ कहते हैं। यही कारण है कि सम अवस्था में स्थित ‘वात’ आदि दोषों को भी धातु कहा जाता है। जो शरीर को दूषित करते हैं, उन्हें ‘दोष’ कहा जाता है। शास्त्रकार दोष शब्द की व्याख्या इस प्रकार प्रस्तुत करते हैं—‘बूषयन्ति दूषयन्ति वा दोषाः’ । जो दूसरों को दूषित करते हैं अथवा स्वयं दूषित होते हैं, वे दोष कहे जाते हैं और जो दूषित होते हैं, वे दूष्य कहे जाते हैं। महर्षि पुनर्वसु के अनुसार वात आदि दोष ही रस-रक्त आदि धातुओं को दूषित करते हैं। यथा—‘तत्र त्रयः शरीरदोषा वातपित्तश्लेष्माणाः, ते शरीरं दूषयन्ति’ । (च.शा. ४।३४) वात आदि दोष भी शास्त्रनिर्देश-विरुद्ध आहार-विहार के सेवन करने से ही दूषित होते हैं।

१२

अष्टाङ्गहृदये

मल—मूत्र आदि जो मल कहे गये हैं, वे भी दूष्य कहे जाते हैं। आगे चलकर वाग्भट ने अ.हू.शा. ३।६३ में रस आदि धातुओं के मलों का इस प्रकार वर्णन किया है। यथा—१. रस का मल—कफ, २. रक्त का—पित्त, ३. कान, नाक आदि छिद्रों में जो मल होता है, वह मांस का मल है। ४. मेदस् का—स्वेद (पसीना), क्योंकि मेदस्वी पुरुष के पसीने से मेदस् की जैसी दुर्गन्ध आती है। ५. अस्थियों के मल—तख तथा रोम, क्योंकि अस्थिसार पुरुष के शरीर में रोम-केश खूब होते हैं। ६. मज्जा का मल त्वचागत स्नेह तथा नेत्र एवं मल का स्नेह है। मज्जासार पुरुष का शरीर चिकना रहता है और जिसके शरीर में मज्जा की कमी रहती है, उसकी त्वचा खूबी होती है तथा ७. शुक्र का मल है—ओजस।

वृद्धिः समानैः सर्वेषां विपरीतैर्विपर्ययः।

दोष-धातु-मलों की वृद्धि एवं क्षय —शरीर से सम्बन्धित उक्त वात आदि दोषों, रस आदि धातुओं तथा मलों के समान गुण-धर्म वाले पदार्थों का सेवन करने से उन-उन की वृद्धि होती है और उन-उन के विपरीत गुण वाले पदार्थों का सेवन करने से उनका क्षय होता है।

वक्तव्य —उक्त पद्य अ.सं.सू. १।३२ में अविकल रूप से प्राप्त है। भगवान् पुनर्वसु ने इस आशय को पुष्ट करने वाला गद्य इस प्रकार दिया है—‘धातवः पुनः शारीराः समानगुणैः समानगुणभूयिष्ठैर्वाऽप्याहारविकारैरभ्यसमानैर्वृद्धिं प्राप्नुवन्ति, ह्लासं तु विपरीतगुणैर्विपरीतगुणभूयिष्ठैर्वाऽप्याहारैरभ्यसमानैः’। (च.शा. ६।९) अर्थात् शरीरस्थित धातु (दोष, धातु एवं मल) समान गुण वाले या अधिकांश समान गुणों वाले आहार के निमित्त बने विविध प्रकार के पदार्थों के सेवन से बढ़ने लगते हैं और उनके विपरीत गुण वाले या अधिकांश विपरीत गुण वाले पदार्थों के सेवन करते रहने से क्षीण होने लगते हैं। इसी बात को महर्षि पुनर्वसु ने—‘सर्वदा सर्वभावानां सामान्यं वृद्धिकारणम्। ह्लासहेतुविशेषश्च’। (च.सू. १।४४) में भी कहा है। दूसरे आचार्यों ने भी इस प्रत्यक्ष सत्य को स्वीकारा है।

दोष, धातु, मलों का उचित प्रकार का बढ़ना तथा क्षीण होना स्वास्थ्थ-वृद्धि में कारण होता है। अनुचित प्रकार से होने वाला वृद्धि-क्षय रोगोत्पत्ति का कारण हो जाता है। महर्षि सुश्रुत ने सूत्रस्थान के १५वें अध्याय में इसका विस्तृत वर्णन किया है। सारांश यह है कि समान गुण-कर्म वाले पदार्थों से सभी समान भावों (दोष-धातु-मलों) की वृद्धि होती है और असमान गुण-कर्म वाले पदार्थों से उन-उन भावों का क्षय हो जाता है। यही क्रम इनकी चिकित्सा का भी है—बढ़े हुए दोष-धातु-मलों को घटाकर सम करना और घटे हुए को बढ़ाकर सम अवस्था में ले आना।

रसाः स्वादुस्त्रलवणतित्कोष्णकषायकाः ॥ १४ ॥

षड् द्रव्यमाश्रितास्ते च यथापूर्वं बलवह्वाः।

रसों का वर्णन —आयुर्वेदशास्त्र में रसों की संख्या छः है—१. स्वादु (मीठा), २. अम्ल (खट्टा), ३. लवण (नमकीन), ४. तित्तक (नीम तथा चिरायता आदि), ५. ऊष्ण (कटु—कालीमिर्च आदि) तथा ६. कषाय (कसैला—हरीतकी आदि)। ये सभी रस भिन्न-भिन्न द्रव्यों में पाये जाते हैं। ये रस अन्त की ओर से आगे की ओर को बलवर्धक होते हैं अर्थात् मधुर रस सबसे अधिक बलवर्धक होता है और इसके बाद सभी रस उत्तरीतर बलनाशक होते हैं। १४॥

वक्तव्य —रसना (जीभ) के द्वारा जिसका रसास्वादन किया जाता है अथवा जो रसना का विषय है, उसे ‘रस’ कहते हैं। अतएव चरक ने कहा है—‘रसनाऽर्थो रसः’ (च.सू. १।६४) तथा ‘रसो निपाते द्रव्याणाम्’। (च.सू. २६।६६) अर्थात् किसी द्रव्य का जब जीभ से सम्बन्ध होता है तब उसके रस की प्रतीति होती है कि यह मीठा, खट्टा आदि कैसा रस है? रसों के विशेष परिचय के लिए देखें—अ.हू.सू. अध्याय १० सम्पूर्ण।

आयुष्कामाध्यायः १ ]

सूत्रस्थानम्

१३

तत्राद्या भारते ज्ञन्ति त्रयस्तिक्तादयः कफम् ॥ १५ ॥

कषायतिक्तमधुराः पित्तमन्ये तु कुर्वते ।

रसों का बात आदि पर प्रभाव—उनमें प्रथम तीन ( मधुर, अम्ल, लवण ) रस वातदोष को नष्ट करते हैं, तित्त, कटु, कषाय कफदोष को नष्ट करते हैं और कषाय, तित्त, मधुर रस पित्त को नष्ट करते हैं। इससे विपरीत रस वात, पित्त, कफ दोषों को बढ़ाते हैं ॥ १५ ॥

बक्तव्य—रसों का बात आदि पर किस प्रकार प्रभाव पड़ता है, इसकी चर्चा भगवान् पुनर्वसु ने इस प्रकार की है—‘तत्र दोषमेकैकं त्रयस्त्रयो रसा जनयन्ति, त्रयस्त्रयश्चोपशमयन्ति । तद्यथा—कटुतिक्त-कषाया वातं जनयन्ति, मधुराम्ललवणास्त्वेन’ शमयन्ति; कटुम्ललवणाः पित्तं जनयन्ति, मधुरतिक्त-कषायास्त्वेनचक्ष्मयन्ति; मधुराम्ललवणाः श्लेष्माणं जनयन्ति, कटुतिक्तकषायास्त्वेन शमयन्ति ॥ ( च.वि. १।६ ) अर्थात् तीन-तीन रस एक-एक दोष को पैदा करते हैं और तीन-तीन ही रस एक-एक दोष को शान्त करते हैं। यथा—कटु, तित्त, कषाय रस वातदोष को उत्पन्न करते हैं; मधुर, अम्ल, लवण रस इसे शान्त करते हैं। कटु, अम्ल, लवण रस पित्तदोष को उत्पन्न करते हैं; मधुर, तित्त, कषाय रस इसे शान्त करते हैं। कटु, अम्ल, लवण रस कफ को उत्पन्न करते हैं और कटु, तित्त, कषाय रस इसे शान्त करते हैं। यही अभिप्राय महर्षि वामभट का भी है।

शमनं कोपनं स्वस्थहितं द्रव्यमिति त्रिधा ॥ १६ ॥

द्रव्य का वर्णन—विधिभेद से द्रव्य तीन प्रकार का होता है—१. शमन ( वात आदि दोषों का शमन करने वाला ), २. कोपन ( वात आदि दोष को कुपित करने वाला ) तथा ३. स्वस्थहित ( स्वस्थ पुरुष के स्वास्थ्य को बनाये रखने वाला ) ॥ १६ ॥

बक्तव्य—ये द्रव्य परस्पर विपरीत गुणवाले होते हैं। जैसे—जो द्रव्य शमन ( शान्तिकारक ) होता है, वह उस दोष को प्रकुपित करने वाला नहीं होता है। इसी प्रकार जो द्रव्य ‘कोपन’ होगा, वह शमन नहीं हो सकता है। इन गुणों की विपरीतता को आप इस प्रकार समझें—जैसे गुरु गुण से लघु गुण एवं शीत से उष्ण सदा विपरीत रहता है। यहाँ ‘इति’ शब्द भेदवाचक है। यही द्रव्य अन्य प्रकारों से दो प्रकार का या अनेक प्रकार का होता है।

शमन द्रव्य—जैसे—तैल, घृत, मधु। तैल—स्निग्ध, उष्ण, गुरु गुण वाला होने के कारण वातदोष का शमन कर देता है, क्योंकि तैल वातदोष के विपरीत गुण वाला होता है। घृत—मधुर, शीत, मन्द गुण वाला होने के कारण अपने से विपरीत गुण वाले पित्तदोष का शमन कर देता है। मधु—रूक्ष, तीक्ष्ण, कषाय गुण वाला होने के कारण अपने से विपरीत गुण वाले कफदोष का शमन कर देता है।

कोपन—जो द्रव्य वात आदि दोषों, रस आदि धातुओं तथा मूत्र आदि मलों को कुपित करता है, उसे कोपन कहते हैं। जैसे—यवक ( शुक्धान्य-विशेष में पठित द्रव्य; देखें—च.सू. ५।११ ), पाटल ( पाटल व्रीहि—त्रिकाण्डशेष ), माष ( उड़द ), मछली, आममूलक, सरसों का तेल, मन्दक, दधि, किलाट आदि। विरुद्ध पदार्थ—जैसे—दूध तथा मछली का एक साथ सेवन करना आदि।

स्वस्थहितम्—‘ऋतुचर्या’ नामक अध्याय में जिन-जिनका सेवन करने को और जिनका सेवन न करने को कहा गया है, उन सबको यथाविधि, विधि-निषेध के अनुसार स्वीकार करना ही स्वस्थ ( हितकर ) चर्या है। इसका विशेष विवरण अ.हृ.सू. के मात्राशित्तीय नामक ८वें अध्याय में विस्तार से देखें।

भगवान् पुनर्वसु ने त्रिविध द्रव्य का वर्णन करते हुए कहा है—‘किञ्चिद् दोषप्रशमनं किञ्चिद् धातु-प्रदूषणम्। स्वस्थवृत्तौ मतं किञ्चित् त्रिविधं द्रव्यमुच्यते’ ॥ ( च.सू. १।६७ ) अर्थात् कोई द्रव्य प्रकुपित वात

१४

अष्टाङ्गहृदये

आदि दोष का प्रशमन करता है, कोई द्रव्य प्रकृतिस्थ घातु को बढ़ा या घटा देता है और कोई द्रव्य स्वस्थवृत्त के लिए उपयोगी माना जाता है।

शार्ङ्गधराचार्य ने शमनद्रव्य का वर्णन इस प्रकार किया है—‘न शोधयति न द्रेष्टि समान् दोषास्त-योद्भूताम्। समीकरोति विषमान् शमनं तद्यथाऽमुता’ ॥ (शा.प्र.अ. ४२) अर्थात् जो द्रव्य वमन या विरेचन द्वारा वात आदि दोषों का शोधन भी नहीं करता, सम दोषों को विकृत भी नहीं करता, किन्तु कुपित या विषम (बड़े अथवा क्षीण) दोषों को जो सम करता है, वह ‘शमन’ द्रव्य कहा जाता है। यथा—अमृता (गिलोय)।

उष्णशीतगुणोत्कर्षात्तत्र वीर्यं द्विधा स्मृतम्।

वीर्य का वर्णन—द्रव्यों में शीतगुण तथा उष्णगुण की अधिकता से दो प्रकार का ‘वीर्य’ माना जाता है।

वक्तव्य—महर्षि चरक अपनी संहिता में किन्हीं दो आचार्यों के मतों का उल्लेख करने के बाद वे अपनी बात को प्रसंगवश अन्त में कह रहे हैं। एक आचार्य का मत—वीर्य आठ प्रकार का होता है—१. मृदु, २. तीक्ष्ण, ३. गुरु, ४. लघु, ५. स्निग्ध, ६. रुक्ष, ७. उष्ण और ८. शीत। दूसरे आचार्य का मत—१. शीत तथा २. उष्ण दो प्रकार का वीर्य होता है। चरक का मत—‘वीर्य तु क्रियते येन या क्रिया। नावीर्यं कुर्वते किञ्चित् सर्वा वीर्यकृता क्रिया’ ॥ (च.सू. २६।६४-६५) इन्होंने द्रव्य की कर्मशक्ति को ही ‘वीर्य’ संज्ञा दी है। सुश्रुत का विचार भी इन्हीं के अनुरूप है। देखें—‘येन कुर्वन्ति तद्वीर्यम्’। (सु.सू. ४१।५) इन उदाहरणों से यह सिद्ध होता है कि उक्त दोनों संहिताकारों में इस विषय में किसी प्रकार का मतभेद नहीं है। द्विविध तथा अष्टविध वीर्य को सुश्रुत ने भी स्वीकार कर अपनी संहिता में स्थान दिया है। देखें—सु.सू. ४०।५। चरक की मान्यता का ऊपर उल्लेख कर ही दिया गया है।

आप ध्यान दें—संसार में सभी पदार्थ या तो उष्ण हैं अथवा शीत हैं, अतः दो प्रकार का वीर्य होना स्वाभाविक ही है; किन्तु वायु द्रव्य ऐसा है जो ‘अनुष्णाशीतस्पर्श’ वाला है, अतः यहाँ उक्त समाधान वायु को ‘योगवाही’ मान लेने से हो जायेगा।

त्रिधा विपाको द्रव्यस्य स्वादुस्लकटुकात्मकः ॥ १७ ॥

विपाक का वर्णन—भले ही कोई द्रव्य किसी रस से युक्त क्यों न हो, उसका विपाक तीन प्रकार का होता है—१. मधुर, २. अम्ल तथा ३. कटु ॥ १७ ॥

वक्तव्य—प्रायः सभी प्रकार के रस वाले द्रव्यों का भोजन के पाचनकाल के बाद कार्यरूप में जिसका अनुमान द्वारा निर्णय किया जा सकता है, वह रस जठराग्नि द्वारा पाक हो जाने पर उपर्युक्त तीन प्रकार का पाया जाता है। यथा—मधुर तथा लवण रस वाले द्रव्यों का मधुर, अम्ल रस वाले द्रव्यों का अम्ल और तित्त, कटु, कषाय रस वाले द्रव्यों का कटु विपाक होता है। इसी विषय को महर्षि वामभट आगे अ.हृ.सू. १।२० में कहेंगे। चरक ने उक्त विषय को अपनी संहिता में इस प्रकार से दिया है—‘रसो……च्छोपलभ्यते’ ॥ (च.सू. २६।६६) अर्थात् रसों का भिन्न-भिन्न ज्ञान जीभ के साथ स्पर्श होने पर होता है और विपाक का ज्ञान कर्म की समाप्ति होने पर होता है। आशय यह है कि विपाक का ज्ञान आहार के पचने पर दोषों एवं घातुओं की वृद्धि अथवा क्षीणता रूपी लक्षणों से जाना जाता है और वीर्य का ज्ञान जीभ के स्पर्श से लेकर शरीर में रहने तक होता रहता है।

निष्कर्ष—रस का ज्ञान जीभ के स्पर्श से, विपाक का ज्ञान उसके कार्य को देखकर और वीर्य का ज्ञान प्रत्यक्ष तथा अनुमान दोनों से होता है। इसके आगे च.सू. २६।६७-६८ इन दो श्लोकों का भी परिशीलन इस प्रसंग में कर लेना चाहिए, जो विषय को स्पष्ट करने में उपकारक हैं। इस विषय के विशेष विवेचन के लिए सु.सू. ४० का अध्ययन करें।

आयुष्कामीयाध्यायः १ ]

सूत्रस्थानम्

१५

शार्ङ्गधराचार्य ने विपाक का परिचय इस प्रकार दिया है—'जाठरेणाग्निना योगाद् यदुदेति रसान्तरम्। रसानां परिणामान्ते स विपाक इति स्मृतः' ॥ (शा.पू.खं.द्वि. ३३) अर्थात् मधुर आदि रसों का शरीर पर तात्कालिक प्रभाव पड़ जाने के बाद जठराग्नि के साथ संयोग होने के अनन्तर जो दूसरे रस की उत्पत्ति होती है, वह 'विपाक' कहा जाता है। आयुर्वेदशास्त्र में रस-गुण-वीर्य-विपाक का विपुल साहित्य है, फिर भी आप देखें—यह 'सम्यक् विपाक' हुआ है या 'मिथ्या विपाक', तभी आप ठीक निष्कर्ष पर पहुँच पायेंगे। फिर भी आप निम्न सन्दर्भों का अवलोकन अवश्य करें—च.सू. २६।५७-५८। च.सू. २६।६१-६२। सु.सू. ४०।१०-१२। च.चि. १५।९-११। शा.प्र.ख. ६।१-२।

गुरुमन्दहिमस्निग्धश्लक्ष्णसान्द्रमुदुस्थिराः। गुणाः ससूक्ष्मविशदा विशतिः सविपर्यायाः ॥ १८ ॥

द्रव्य के गुणों का वर्णन —द्रव्यों में परस्पर विपरीत ये २० गुण पाये जाते हैं—१. गुरु, २. लघु, ३. मन्द, ४. तीक्ष्ण, ५. शीत, ६. उष्ण, ७. स्निग्ध, ८. रुक्ष, ९. श्लक्ष्ण, १०. खर, ११. सान्द्र, १२. द्रव, १३. मुदु, १४. कठिन, १५. स्थिर, १६. सर, १७. सूक्ष्म, १८. रु, १९. विशद और २०. पिच्छल ॥ १८ ॥

वक्तव्य —अ.हृ.नि. ६।१ में मद्य के १० गुण और इनके विपरीत १० ओजस् के जो गुण गिनाये हैं, वे भी ये ही २० गुण हैं। चरक ने दूध के दस गुण गिनाकर यह बतलाया है कि जो गुण दूध के कहे गये हैं वे गुण ओजस् के भी हैं, अतएव दूध को पीने से ओजोगुण की वृद्धि होती है। चरक ने जो दिव्य जल के ६ गुणों का वर्णन च.सू. २७।१९८ में किया है, यदि हम इन्हें मानते हैं तो फिर गुणों की संख्या २० ही कैसे मानी जा सकती है? इसका समाधान इस प्रकार है—ये जो ६ अतिरिक्त गुणों का वर्णन यहाँ किया गया है, इनका अन्तर्भाव उक्त २० गुणों में ही कर लिया जाता है।

ध्यान दें —व्यवाधि, विकाशी, आशुकारी ये गुण मद्य में कहे गये हैं और 'प्रसन्न' नामक गुण दूध में। फिर यह भी कहा गया है कि मद्य के गुणों से विपरीत गुण ओजस् में होते हैं। साथ ही फिर यह भी कहा गया है कि जो गुण ओजस् में होते हैं वे ही गुण दूध में होते हैं। इन विषयों का समन्वय इस प्रकार किया गया है—व्यवायी गुण का अन्तर्भाव द्रव गुण में, विकाशी का खर में, आशुकारी का चल में और प्रसन्न का स्थूल में। इनका समर्थन चरक तथा सुश्रुत के वचनों द्वारा प्राप्त है।

उक्त २० गुणों के अर्थ

१. गुरु = भारी६. उष्ण = गरम११. सान्द्र = गाढ़ा१६. सर = चल
२. लघु = हल्का७. स्निग्ध = चिकना१२. द्रव = पतला१७. सूक्ष्म = बारीक
३. मन्द = चिरकारी८. रुक्ष = रुखा१३. मुदु = कोमल१८. स्थूल = मोटा
४. तीक्ष्ण = तीखा९. श्लक्ष्ण = साफ१४. कठिन = कठोर१९. विशद = टूटने वाला
५. शीत = शीतल१०. खर = खुरदरा१५. स्थिर = अचल२०. पिच्छल = लसीला

विशेष —३. मन्द—जो न शीघ्र हानि करता हो और न लाभ करता हो। ४. तीक्ष्ण—शीघ्र लाभ या हानि करने वाला। १६. सर—फैलने वाला या गतिशील। १७. सूक्ष्म—छोटे-से-छोटे स्रोतों में प्रवेश करने वाला। २०. पिच्छल—लुआबदार।

कालार्थकर्मणों योगो हीनमिथ्यातिमात्रकः। सम्यग्योगश्च विज्ञेयो रोगारोग्येककारणम् ॥ १९ ॥

रोग एवं आरोग्य के कारण —काल, अर्थ तथा कर्म के हीनयोग, मिथ्यायोग एवं अतियोग रोग या रोगों की उत्पत्ति में एक मात्र कारण होते हैं तथा काल, अर्थ और कर्म का सम्यक् योग आरोग्य (स्वस्थ रहने) का एक मात्र कारण होता है ॥ १९ ॥

१६

अष्टाङ्गहृदये

वक्तव्य—काल— आयुर्वेदीय दृष्टि से यह तीन प्रकार का होता है, इसी को मौसम या मौसिम भी कहते हैं। इसका विभाजन इस प्रकार किया गया है—१. शीतकाल, २. उष्णकाल तथा ३. वर्षाकाल। इन कालों के समूह को वर्ष, वत्सर तथा संवत्सर कहते हैं। यहाँ इन्हीं तीन कालों से सम्बन्ध है। इन कालों में क्रमशः शीत, उष्ण, वर्षा का अधिक होना 'अतियोग' है, थोड़ा होना 'हीनयोग' है और अपनी सीमा के विपरीत होना 'मिथ्यायोग' है।

अर्थ— श्रोत्र आदि ज्ञानेन्द्रियों द्वारा जिन-जिन विषयों का ग्रहण किया जाता है, उन्हीं को इस प्रकरण में 'अर्थ' कहा गया है। इन अर्थों का अपनी-अपनी इन्द्रियों के साथ अधिक संयोग होना उन-उनका 'अतियोग' है, थोड़ा संयोग होना 'हीनयोग' है और अनिष्टकारक संयोग होने को 'मिथ्यायोग' कहते हैं।

कर्म— वाणी, मन तथा शरीर की प्रवृत्ति या चेष्टा का नाम 'कर्म' है। न्यायशास्त्र के अनुसार 'संयोग-भिन्नत्वे सति संयोगाऽसमवायिकारणत्वं कर्मत्वम्'। (तर्कसंग्रह) यह कर्मत्व भी हमारा उपकारक है। उक्त तीनों के या दो के अथवा एक के कर्म की अधिकता का नाम 'अतियोग' है, कर्म की कमी को 'हीनयोग' तथा अहितकर या हानिकर कर्म के योग को 'मिथ्यायोग' कहते हैं।

इस प्रकार काल, अर्थ तथा कर्म के अतियोग, हीनयोग, मिथ्यायोग किसी-न-किसी रोग को उत्पन्न करने में कारण होता है। उक्त अतियोग आदि शारीरिक एवं मानसिक रोगों की उत्पत्ति में कारण होते ही हैं। शीत, उष्ण एवं वर्षा का अतियोग, हीनयोग, मिथ्यायोग प्राकृतिक रूप से भी देखा जाता है और मानव द्वारा भी किया जाता है किन्तु फल दोनों का रोगोत्पत्ति में कारण होता ही है।

सम्यग्योग— काल, अर्थ एवं कर्म का अतियोग, हीनयोग तथा मिथ्यायोग के अतिरिक्त जो समुचित योग होता है, उसे 'सम्यग्योग' कहते हैं। यह 'आरोम्य' (स्वास्थ्य-वृद्धि) का कारण होता है। इसका विशेष विवरण अ.हृ.सू. के 'रोगानुत्पादनीय' नामक ४थे अध्याय में देखें। यही विषय अष्टांगसंग्रह के पाँचवें अध्याय में देखें। प्रस्तुत पद्य अष्टांगसंग्रह १।४२ में द्रष्टव्य है।

इस विषय को चरक की दृष्टि से देखें—च.सू. ११।३७-४१ तक। इन कर्मों को महर्षि चरक ने 'प्रजापराध' संज्ञा दी है, अन्यथा बुद्धि-प्रधान मानव इन कर्मों की ओर कैसे प्रवृत्त हो सकता है?

रोगस्तु दोषवैषम्यं, दोषसाम्यमरोगता।

रोग-आरोम्य में भेद— वात, पित्त, कफ इन तीन दोषों की विषमता या विषम अवस्था का नाम 'रोग' है। अर्थात् दोषों के विषम (किसी का बढ़ जाना और किसी का घट जाना) हो जाने से किसी-न-किसी प्रकार का रोग हो जाता है और जब उक्त दोष समान स्थिति में रहते हैं तब आरोम्य की प्राप्ति होती है अर्थात् मानव 'सुखी' रहता है।

वक्तव्य— दोष या दोषों की विषमता अर्थात् तीनों में से एक या दो दोषों का बढ़ या घट जाना, इसी की विषमता को सम का विपरीत भाव कहा जाता है। यहाँ दोष शब्द रोग का अन्तरंग (भीतरी) कारण मात्र है। दोषों का सम होना ही 'आरोम्य' है। आगे जो दो श्लोक अ.हृ.सू. में क्रम सं० २०-२१ पर हैं, ये ही दो श्लोक अ.सं.सू. १।४३-४४ में हैं।

निजागन्तुविभागेन तत्र रोगा द्विधा स्मृताः ॥ २० ॥

रोगों के दो भेद— सामान्य रूप से रोग दो प्रकार के होते हैं—१. निज (वात आदि भीतरी दोषों की विषमता से होने वाले) तथा २. आगन्तुज (अभिघात आदि बाहरी कारणों से होने वाले) ॥ २० ॥

वक्तव्य— महर्षि चरक के शब्दों में रोगों के दो भेद इस प्रकार कहे गये हैं—'तत्र निजः शारीर-दोषसमृत्यः, आगन्तुर्भूतविषवाव्यभिपसम्प्रहारादिसमृत्यः'। (च.सू. ११।४५) अर्थात् शारीरिक वात आदि दोषों से उत्पन्न रोग 'निज' कहा जाता है और 'आगन्तुज' रोग अभिघात, भूतावेश, सर्प आदि के दंश, शीत, उष्ण, आम, तेजाब आदि आश्रय द्रव्यों के लग जाने से या गदा, लाठी, हाकी, तलवार आदि के लग जाने से होता है।