भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

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आयुष्कामीयाध्यायः १ ]

सूत्रस्थानम्

११

सिन्धः शीतो गुरुर्मन्दः श्लक्ष्णो मृत्तः स्थिरः कफः ।

कफदोष के गुण—सिन्ध, शीत, गुरु, मन्द, श्लक्ष्ण, मृत्त तथा स्थिर होता है।

बक्तव्य—‘मृत्त’ शब्द से यहाँ जो टीकाकारों ने ‘पिच्छला’ अर्थ लिया है, उसका कारण यह है—वास्तव में ‘मृत्त’ का अर्थ मिट्टी होता है और मिट्टी दो प्रकार की होती है—१. चिकनी, जिससे लिपायी-पोतायी होती है अथवा जिससे घड़े आदि पात्र बनते हैं और २. बलुही मिट्टी होती है। इस प्रकार यहाँ तक बात आदि दोषों में रहने वाले गुणों का वर्णन कर दिया गया है, क्योंकि गुण गुणी (अपने आधार) में रहते हैं। अतएव बात आदि दोषों का ग्रहण चिकित्सा आदि अवसरो पर उनके गुणों को देखकर किया जा सकता है।

संसर्गः सन्निपातश्च तद्विद्विषयकोपतः ॥ १२ ॥

संसर्ग तथा सन्निपात की परिभाषा—आयुर्वेदीय परिभाषा के अनुसार किन्हीं दो-दो दोषों के एक साथ क्षय या वृद्धि होने का नाम ‘संसर्ग’ है और तीनों दोषों का एक साथ क्षय अथवा वृद्धि होने का नाम सन्निपात है ॥ १२ ॥

बक्तव्य—इस विषय का विस्तृत वर्णन अष्टांगहृदय-सूत्रस्थान के ‘दोषभेदीय’ नामक १२वें अध्याय में किया गया है। चरकसंहिता-सूत्रस्थान के १२वें अध्याय में इन वातादि दोषों के रहस्य को जानने के लिए विभिन्न प्रदेशों से आये हुए तत्कालीन महर्षियों (विद्वानों) की एक सम्भाषापरिषद् हुई थी, जिसमें इनके गुण-धर्मों के सम्बन्ध में विचार हुआ था। उसमें यह भी विचार किया गया था कि इन तीनों दोषों में वातदोष प्रधान है, शेष दो दोष पंगु हैं। आप भी इसका परिशीलन करें। यहाँ जो दोषों की क्षय-वृद्धि का वर्णन किया है, इससे चिकित्साकाल में चिकित्सक क्षीण दोषों को बढ़ाने का और बड़े हुए दोषों को सम करने का प्रयास करता है; यही चिकित्सा है, क्योंकि दोषों का सम होना ही उत्तम स्वास्थ्य का लक्षण है।

रसासुद्धासमेदोऽस्थिमज्जशुक्राणि धातवः । सप्त दूष्याः—

धातुओं का वर्णन—आयुर्वेदशास्त्र में रस, रक्त, मांस, मेदा, अस्थि, मज्जा तथा शुक्र ये सात ‘धातु’ कहे जाते हैं और जब ये वात आदि दोषों द्वारा दूषित किये जाते हैं, तो इन्हें ‘दूष्य’ कहते हैं।

—मला मूत्रशुक्तत्वेदावयोऽपि च ॥ १३ ॥

मलों का वर्णन—मूत्र, पुरीष तथा स्वेद (पसीना) आदि मल कहे जाते हैं ॥ १३ ॥

बक्तव्य—भगवान् धन्वन्तरि की मान्यता है—‘दोषधातुमलमूलं हि शरीरम्’ । (मु.सू. १।५३) अर्थात् वात आदि तीनों दोष, रस-रक्त आदि सातों धातु तथा मूत्र आदि शरीर के मल ही शरीर के मूल हैं अथवा यों समझिये कि यह शरीर दोष, धातु, मल मय है; ये ही इसके तत्त्व हैं। आगे वे पुनः इसी सम्बन्ध में कहते हैं—‘त एते शरीरधारणाद् धातव इत्युच्यन्ते’ । (मु.सू. १।४२०) अर्थात् ये रस, रक्त आदि शरीर को धारण करने से धातु कहे जाते हैं। ‘धातु’ शब्द ‘डुधात्रु धारणपोषणयोः’ धातु से निष्पन्न होता है। इसका अर्थ है—जो द्रव्य शरीर का धारण एवं पोषण करते हैं, उन्हें ‘धातु’ कहते हैं। यही कारण है कि सम अवस्था में स्थित ‘वात’ आदि दोषों को भी धातु कहा जाता है। जो शरीर को दूषित करते हैं, उन्हें ‘दोष’ कहा जाता है। शास्त्रकार दोष शब्द की व्याख्या इस प्रकार प्रस्तुत करते हैं—‘बूषयन्ति दूषयन्ति वा दोषाः’ । जो दूसरों को दूषित करते हैं अथवा स्वयं दूषित होते हैं, वे दोष कहे जाते हैं और जो दूषित होते हैं, वे दूष्य कहे जाते हैं। महर्षि पुनर्वसु के अनुसार वात आदि दोष ही रस-रक्त आदि धातुओं को दूषित करते हैं। यथा—‘तत्र त्रयः शरीरदोषा वातपित्तश्लेष्माणाः, ते शरीरं दूषयन्ति’ । (च.शा. ४।३४) वात आदि दोष भी शास्त्रनिर्देश-विरुद्ध आहार-विहार के सेवन करने से ही दूषित होते हैं।