भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

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अष्टाङ्गहृदये

शुक्रार्तवस्यैर्जन्मादौ विषेणेव विषक्रिमेः ॥१॥

तैश्च तित्रः प्रकृतयो हीनमध्येोत्तमाः पृथक्। समधातुः समस्तासु श्रेष्ठ, निन्द्या द्विदोषजाः ॥

दोषों से गर्भ-प्रकृति का वर्णन—गर्भाधान काल में माता-पिता के आर्तव तथा शुक्र में अधिकता से उपस्थित या वर्तमान उक्त तीनों (बात आदि) दोषों के अनुसार क्रमशः गर्भ की तीन प्रकृतियाँ बनती हैं। १. वातदोष की अधिकता से हीनप्रकृति, २. पित्तदोष की अधिकता से मध्यप्रकृति तथा ३. कफदोष की अधिकता से उत्तमप्रकृति बनती है; यही सबमें श्रेष्ठ मानी गयी है। जो प्रकृतियाँ दो-दो दोषों के मिश्रण से बनती हैं, वे निन्दनीय मानी जाती हैं और समधातुज प्रकृति सबमें श्रेष्ठ होती है।

शुक्र एवं आर्तव किंवा रजस् तथा वीर्य के मिश्रण से उत्पन्न गर्भ में बात आदि दोषों के गुण वैसे ही आ जाते हैं। जैसे विषक्रिमी में विष के गुण आ जाते हैं ॥१-१०॥

बक्तव्य—सात प्रकार की प्रकृतियाँ का वर्णन—१. वातप्रकृति हीन, २. पित्तप्रकृति मध्य, ३. कफप्रकृति उत्तम, ४. समधातुप्रकृति सबमें उत्तम। द्विदोषज प्रकृतियाँ—५. वातपित्तप्रकृति, ६. वातकफप्रकृति तथा ७. पित्तकफप्रकृति ये तीन निन्दित होती हैं। मनुष्यों की ही भांति अन्य प्राणियों की प्रकृति माता-पिता के अनुरूप ही होती है। जैसे—जहरीले सर्प की सन्तान अपने माता-पिता के समान ही जहरीली होती है, यह मात्र एक उदाहरण है। चरक-विमानस्थान अध्याय ६ में इन प्रकृतियों का विस्तार से वर्णन है।

भगवान् धन्वन्तरि ने प्रकृति-वर्णन के सम्बन्ध में सूश्रुत को जो उपदेश दिया था, वह इस प्रकार है—‘शुक्रशौणितसंयोगे यो भवेद् दोष उत्कटः। प्रकृतिजयते तेन’ ॥ (सु.शा. ४६३) यह पद्यात्मक वाक्य श्रीवाग्भट द्वारा उक्त विषय का पूर्ण रूप से समर्थन कर रहा है। इसी के आगे श्लोक ८० तक बात आदि प्रकृति वाले पुरुषों के स्वभाव आदि का वर्णन करने के बाद आगे सात्त्विक, राजस तथा तामस प्रकृतियों का भी वर्णन किया है। दोनों प्रकृतियों के वर्णन में मात्र इतना अन्तर है कि वातादि प्रकृतियाँ शारीरिक होती हैं और सात्त्विक आदि प्रकृतियाँ मानसिक होती हैं। इनका वर्णन सु.शा. ४८१ से ९९ तक में है। जहाँ एक ही माता-पिता की चार सन्तानें भिन्न-भिन्न प्रकृति की देवी जाती हैं, वही गर्भाधान काल में दोषों का तर-तम भाव ही कारण होता है। कुछ कारण और भी होते हैं, जैसे—माता के दोहद का प्रभाव। देखें—सु.शा. ३।१९ से २८ तक।

तत्र रूक्षो लघुः शीतः खरः सूक्ष्मश्लोडतिलः।

वातदोष के गुण—यह रूक्ष, लघु, शीत, खर, सूक्ष्म तथा चल (सदा गतिशील) होता है।

बक्तव्य—यहाँ जो बात का गुण ‘शीत’ कहा गया है, इसका विवेचन प्रस्तुत है। शरीर स्थित वातदोष अथवा प्रतिक्षण बहने वाला वायु जाड़ा में शीतल और गर्मियों में गरम प्रतीत होता है, अतः यह जैसे मौसम में होता है वैसा ही इसका स्पर्श होता है। वास्तव में यह वायु ‘अनुष्णाशीत’ है अर्थात् न यह गरम है और न शीतल है। शास्त्र में इसे ‘योगबाही’ कहा गया है। ऐसे कुछ पुरुष भी होते हैं जिनका कोई अपना अस्तित्व नहीं होता। जैसे—‘गंगा गये गंगादास, जमुना गये जमुनादास’, अस्तु। ‘योगबाही पर वायुः संयोगादुभयार्थकृत। दाहकृतेजसा युक्तः शीतकृतसोमसंधयात्’ ॥ (च.चि. ३।३८) तथा ‘पवने योगबाहिल्वाच्छीतं श्लेष्मयुते भवेत्। दाहः पित्तयुते’। इति। (अ.हृ.नि. २।४८)

पित्तं सस्नेहतीक्ष्णोष्णं लघु विषं सरं द्रवम् ॥११॥

पित्तदोष के गुण—यह कुछ स्निग्ध, तीक्ष्ण, उष्ण, लघु, विष (आम गन्ध वाला), सर तथा द्रव होता है ॥११॥

बक्तव्य—जब बमन के साथ पित्तदोष हरा-पीला रंग का निकलता है तब उसे सूँघने पर इसकी ‘विष’ गन्ध का ज्ञान होता है। यह एक प्रकार की अप्रिय गन्ध होती है। यहाँ ‘सस्नेह’ का अर्थ है—थोड़ा ‘स्नेहयुक्त’ होना। देखें—‘सस्नेहा गुडशर्करा’। (च.सू. २७।२४१)