अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंआयुष्कामीयाध्यायः १ ]
सूत्रस्थानम्
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ये शरीर को रूग्ण, विकृत या दूषित करते हैं तब ये 'दोष' कहे जाते हैं, जब ये मानव को स्वस्थ रखते हैं तब 'धातु' और जब ये शरीर को मलिन करते हैं तब इन्हें 'मल' कहा जाता है। विशेष द्रष्टव्य—च.वि. १।५; च.सू. १ तथा च.सू. १।५७। कुछ संस्करणों में इसके आगे एक पद्य इस प्रकार का प्राप्त होता है—'प्रत्येकं ते त्रिधा वृद्धिक्षयसाम्यविभेदतः। उत्कृष्टमध्यात्मतया त्रिधा वृद्धिक्षयावपि' ॥
ते व्यापिनोऽपि हृन्नाभ्योरधोमध्योर्ध्वसंशयाः ॥७॥
दोषों के स्थान तथा प्रकोपकाल—ये तीनों बात आदि दोष सदा समस्त शरीर में व्याप्त रहते हैं। फिर भी नाभि से निचले भाग में वायु का, नाभि तथा हृदय के मध्य भाग में पित्त का और हृदय के ऊपरी भाग में कफ का आश्रयस्थान है ॥७॥
वयोऽहोरात्रिभुक्तां तेषस्तमध्यादिगः क्रमात्।
वय आदि के अनुसार काल—यद्यपि ये दोष सदा गति(क्रिया)शील रहते हैं, तथापि वयस् के अन्तकाल (वृद्धावस्था) में, वयस् के मध्य (यौवन) काल में तथा वयस् के आदि (बाल्य) काल में और दिन-रात तथा भुक्त (भोजन कर चुकने) के अन्त, मध्य एवं आदि काल में विशेष रूप से गतिशील होते हैं।
बक्तव्य—उक्त विषय को आप इस प्रकार समझें—यद्यपि वात-पित्त-कफ ये सभी सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त होकर रहते हैं, तथापि ये क्रम से विशेष कर के किस प्रकार रहते हैं, इसे बतलाया जा रहा है—अवस्था का अन्तिम भाग वृद्धावस्था, दिन का अन्तिम भाग २ से ६ बजे तक, रात्रि का अन्तिम भाग २ से ६ बजे तक, भुक्त (अन्न के पचने) का अन्तिम काल वायु के प्रकोप होने का है। अवस्था का मध्य भाग (युवावस्था), दिन का मध्य भाग १० से २ बजे तक, रात्रि का मध्य भाग १० से २ बजे तक, भुक्त (अन्न के पचने) का मध्यकाल पित्त के प्रकोप होने का है। अवस्था का आदि भाग (बाल्यावस्था), दिन का प्रथम भाग ६ से १० बजे तक, रात्रि का प्रथम भाग ६ से १० बजे तक, भुक्त (अन्न के पचने) का आदिकाल कफ के प्रकोप का काल है।
तैर्भेदद्विषमतीक्ष्णो मन्दश्चाग्निः समैः समः ॥८॥
दोषों का अग्नि पर प्रभाव—उक्त बात आदि दोषों के प्रभाव (वृद्धि) से अग्नि (जठराग्नि) भी दोषों के क्रम (वातदोष) से विषम, (पित्तदोष से) तीक्ष्ण और (कफदोष से) मन्द हो जाता है तथा इन तीनों के सम मात्रा में रहने पर अग्नि भी सम प्रमाण में रहता है ॥८॥
बक्तव्य—अग्नि तथा पित्त के गुण-धर्म समान होते हैं, अतएव पित्तदोष की वृद्धि से अग्नि का तीक्ष्ण होना स्वाभाविक ही है। क्योंकि महर्षि वरक ने कहा है—'सर्वदा सर्वभावानां सामान्यं वृद्धिकारणम्'। (च.सू. १।४४) आशय स्पष्ट है। अग्नि का विशेष वर्णन अ.हू.शा. ३।७४, अ.सं.सू. ११ तथा सू. २१ में देखें।
कोष्ठः क्रूरो मुर्दुमध्यो मध्यः स्यात्तेः समैरपि।
दोषों का कोष्ठ पर प्रभाव—जठराग्नि की भांति कोष्ठ भी वातदोष से क्रूर, पित्तदोष से मुर्दु एवं कफदोष से मध्यम रहता है और तीनों दोषों के सम रहने पर भी मध्यम रहता है।
बक्तव्य—कोष्ठ की क्रूरता आदि का वर्णन तथा उसके अनुरूप चिकित्सा का विधान अ.हू.सू.अ. १८।३४ में देखें। कोष्ठ-परिचय—'स्थानान्यामाग्निपक्वानां मृत्रस्य हृदिरस्य च। हृदुण्डुकः फुफ्फुसश्च कोष्ठ इत्यभिधीयते' ॥ (च.शा. ७।१२ तथा सू.चि. २।१२) अर्थात् आमाशय, पक्वाशय, अन्त्याशय, मूत्राशय, रक्ताशय, हृदय, उण्डुक तथा फुफ्फुस इन अवयवों की परिधि को आयुर्वेदशास्त्र में 'कोष्ठ' नाम से परिभाषित किया है। इस वृद्धि से मूढकोष्ठ, क्रूरकोष्ठ तथा मध्यकोष्ठ नामक पुरुषों के भेदों का वर्णन भी मिलता है। यथा—'श्लेष्मोत्तरश्छर्दयति हृदुः खं विरिच्यते मन्दकफस्तु सम्यक्' ॥ (च.सि. १।९) अर्थ स्पष्ट है।