अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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अष्टाङ्गहृदये
अनुसार वैद्य, औषधोपयोगी द्रव्य, उपस्थाता (परिचारक) तथा रोगी—ये सब अपने-अपने प्रशस्त गुणों से युक्त हों तभी उचित चिकित्सा हो सकती है। सुश्रुत के अनुसार—“वत्स सुश्रुत! इह खलु आयुर्वेद-प्रयोजनम्—व्याध्युपमृष्टानां व्याधिपरिमोक्षः स्वस्थस्य स्वास्थ्यरक्षणं च”। (सु.सू. १।१४) अर्थात् आयुर्वेद के दो प्रयोजन हैं—रोगियों को रोग से मुक्ति दिलाना और स्वस्थ की स्वास्थ्य रक्षा। महर्षि वाग्भट ने स्वस्थवृत्त का वर्णन अ, २ से ७ तक और रोगशान्ति का वर्णन सम्पूर्ण ग्रन्थ में किया है।
वायुः पित्तं कफश्चेति त्रयो दोषाः समासतः॥६॥
दोषों का वर्णन —आयुर्वेदशास्त्र में संक्षेपतः तीन ही दोष माने जाते हैं; यथा—१. वात, २. पित्त तथा कफ॥६॥
वक्तव्य —इन बात आदि दोषों का विशेष परिचय अष्टाङ्गहृदय-सूत्रस्थान के ग्यारहवें ‘दोषादिविज्ञान’ नामक अध्याय में देखें। सुश्रुत-सूत्रस्थान (१।२२) में कहा गया गया है कि पृथिवी, जल, तेज, वायु तथा आकाश इन पाँच महाभूतों के संयोग का नाम पुरुष है और चरक-शरीरस्थान (१।१६) में ‘खादयश्चेतना षष्ठा धातवः पुरुषः स्मृतः’। अर्थात् उक्त पञ्चमहाभूत और चेतना धातु (चेतना का आधार मन सहित आत्मा) कहा गया है। यही आशय सुश्रुत का भी है। (मोक्ष-विषयक शास्त्र में २५ तत्त्वों के संयोग को पुरुष संज्ञा दी गयी है, अस्तु।) यही चिकित्स्य पुरुष है।
पञ्चमहाभूतों में आकाशतत्त्व अवाकाश (खाली स्थान) के रूप में शरीर में रहता है और पृथिवीतत्त्व आधारस्वरूप है, अतएव ये दोनों निष्क्रिय (निश्चेष्ट) हैं, अर्थात् इन दोनों में किसी प्रकार की क्रिया नहीं होती है। शेष तत्त्वों का विवरण इस प्रकार है—जलतत्त्व ‘कफ’ है, अग्नितत्त्व ‘पित्त’ है और वायुतत्त्व ही ‘वात’ है। अब आगे इनके विकृत तथा अविकृत रूपों की चर्चा की जायेगी।
आयुर्वेदशास्त्र में प्राणिमात्र का नाम ‘पुरुष’ है। यह वनस्पति (पुष्परहित फल वाले वृक्ष), वानस्पत्य (फूल-फल वाले वृक्ष), वीरुध (शाखा-प्रशाखा युक्त लता) तथा औषधियों का; हाथी, घोड़ा, गाय, भैंस आदि पशु एवं पक्षियों का भी उपदेश देता है, परन्तु इन सबमें पुरुष (मानव) प्रधान है। जैसा कि मनु ने कहा है—‘भूतानां प्राणिनः श्रेष्ठाः प्राणिनां बुद्धिजीविनः। बुद्धिमत्सु नराः श्रेष्ठाः……’॥ (मनु. १।१६)
त्रयो दोषाः समासतः —वाग्भट ने सुश्रुत द्वारा स्वीकृत ‘रक्त’ भी दोष है, इसका यहाँ खण्डन किया है, अपितु ये ‘आम’ को दोष स्वीकार करते हैं। ध्यान दें—‘दोषेण भस्मनेवाग्नी छत्तेऽन्नं न विपच्यते। तस्मादादोषपचनाज्ज्वरितानुपवासयेत्’॥ (अ.हृ.चि. १।१०) यहाँ ‘दोषेण’ पद के स्थान पर अनेक संस्करणों में ‘आमेन’ पाठ मिलता है। वास्तव में यहाँ चर्चा ‘आमदोष’ की है। इस प्रकार के सयुक्तिक विचारों या प्रसंगोचित परिवर्तनों को चरक ने उस-उस आचार्य का ‘बुद्धेविशेषः’ कहा है।
विकृताऽविकृता देहं ज्यन्ति ते बर्त्यन्ति च।
विकृत-अविकृत दोष —ये तीनों वात आदि दोष विकृत (असम अर्थात् बड़े हुए अथवा क्षीण हुए) शरीर का विनाश कर देते हैं और अविकृत (समभाव में स्थित) जीवनदान करते हैं अथवा स्वास्थ्य-सम्पादन करने में सहायक होते हैं।
वक्तव्य —प्राचीन टीकाकारों ने ‘विकृताः’ का अर्थ ‘स्वभावप्रच्युताः’ किया है, जो उचित है। तथापि दोषों का अपना स्वभाव क्या है, यह कहना थोड़ा कठिन है, क्योंकि ये मनुष्यों के आहार-विहार पर निर्भर रहते हैं और ऋतु-परिवर्तन आदि पर भी। आप ध्यान दें—वात-पित्त-कफ का नाम केवल दोष ही नहीं है, अपितु इन्हें ‘धातु’ तथा ‘मल’ भी कहा गया है। देखें—‘शरीरदूषणाद् दोषा धातवो देहधारणात्। वातपित्तकफा ज्ञेया मल्लिनीकरणात्मलाः’॥ हमारे शरीर में इन वात आदि की स्थिति इस प्रकार है—जब