भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

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अष्टाङ्गहृदय

अशेषकायप्रसुतान्—नैसा कि ऊपर कहा गया है कि रागादि दोषों का प्रभाव मन तथा शरीर दोनों पर पड़ता है, अतएव ये उत्सुकता ( इन्द्रियों के विषयों को ग्रहण करने की प्रबल अभिलाषा ), मोह ( यह कार्य करना चाहिए या नहीं—इसका ज्ञान न होना ) तथा अरति ( किसी एक स्थान पर खड़ा होना या बैठने की इच्छा का न होना अर्थात् बेचैनी )—इन कारणों से मानव की मानसिक एवं शारीरिक स्थिति विषम हो जाती है, क्योंकि ये रोग सम्पूर्ण शरीर में फैले रहते हैं, इस वाक्य से समस्त शरीरधारियों व सभी रोगों का ग्रहण किया गया है।

‘औत्सुक्य’ शब्द की ऊपर व्याख्या की गयी है, तदनुसार श्रीकृष्ण द्वारा गीता में दिया सन्देश भी यहाँ स्मरणीय है—‘ध्यायतो विषयान् पुंसः...बुद्धिनाशात् प्रणशयति’॥ ( गीता २।६२-६३ ) अर्थात् इन्द्रिय सम्बन्धी विषयों को प्राप्त करने की जब मानव चिन्ता करता है तो सर्वप्रथम उसके वास्तविक मार्ग में रुकावट आती है अर्थात् राग ( रजोगुण ) का उदय होता है, इससे कामवासना का जन्म होता है, असफलता मिलने पर क्रोध की उत्पत्ति होती है। क्रोध के बाद सम्मोह ( चित्त में अनेक विकारों का उदय ) होता है, सम्मोह से स्मृतिविभ्रम, स्मृतिविभ्रम से बुद्धि ( विवेकशक्ति ) का नाश हो जाता है और बुद्धिनाश से मानव के इस लोक तथा परलोक सभी का नाश हो जाता है। यही विनाशकर्म है ‘रागादि रोगों’ का।

अपूर्ववैद्याय—श्री अरुणदत्त कहते हैं—‘पूर्वभ्यः प्रथमः’ अर्थात् सर्वप्रथम या सर्वथेष्ठ वैद्य, जिसने अपने राग आदि दोषों को नष्ट करके फिर प्राणिमात्र को रोगों से मुक्त होने के उपायों का सद्पुदेश दिया, उसे श्रीवाग्भट ग्रन्थारम्भ में प्रणाम करते हैं।

वाग्भट नाम से ‘अष्टांगसंग्रह’ तथा ‘अष्टांगहृदय’ दोनों ग्रन्थ जुड़े हैं। इस दृष्टि से जब हम अष्टाङ्ग-संग्रह-सूत्रस्थान के प्रथम मंगलाचरण पद्य ‘तुष्णादेव्यं...बुद्धाय तस्मै नमः’ का अवलोकन करते हैं, तो हमें ‘धम्मपद’ यमक वर्ग के एक पद्य का स्मरण हो आता है, जो इस प्रकार है—

‘अलपापि संहितां भाषम’गो धर्मस्य भवत्यनुधर्मचारी। रागद्वेषं प्रहाय मोहं सत्यक् प्रजानन् सुविमुक्तचित्तः॥ अनुपादददिह वाऽमुत्र वा स भगवान् श्रामण्यस्य भवति’।

अर्थात् जो मनुष्य थोड़ी-सी भी धर्मसंहिता को पढ़कर उसके अनुसार स्वयं धर्म का आचरण करने लगता है और जो राग-द्वेष आदि मानसिक विकारों का परित्याग करके सांसारिक कर्मों को भलीभाँति जानता हुआ भी उनका ग्रहण न करता हुआ विमुक्त ( उन कर्मों के प्रति अनासक्तभाव से ) रहता है, वह इस लोक तथा परलोक में धम्मणता का अधिकारी बनकर बन्धनों ( रागादि रोगों ) से मुक्त रहता है। इसी के आगे अष्टांगसंग्रह का दूसरा पद्य भी प्रायः इसी आशय का है—‘रागादिरोगाः...पितामहदादीन्’। पद्य का आशय इस प्रकार है—जिसने अपने तथा संसार के प्राणियों के स्वाभाविक राग आदि सब रोगों को जड़ से उखाड़ कर दूर फेंक दिया, उस एक मात्र वैद्य को तथा आयुर्वेदशास्त्र को जानने वाले अथवा उसके प्रवर्तक ब्रह्मा आदि को मैं प्रणाम करता हूँ। यहाँ भी पितामह आदि के पूर्वकथित ‘तमेकवैद्यं’ शब्द ‘अपूर्ववैद्य’ का स्मारक है, अथवा हम यह भी कह सकते हैं कि उक्त अष्टांगसंग्रहोक्त पद्य की भाषा को बदल कर ही अष्टांगहृदय यह पद्य कहा गया है।

अथात आयुष्कामीयमध्यायं व्याख्यास्यामः।

अब हम यहाँ से आयुष्कामीय ( आयु की कामना करने वालों के लिए जो हितकर है, उस ) अध्याय की व्याख्या करेंगे।

वक्तव्य—‘अथातः’ पद में प्रयुक्त ‘अथ’ मंगलवाचक शब्द है। ग्रन्थारम्भ में मंगल( कल्याण )वाचक शब्दों के प्रयोग का उद्देश्य यह होता है कि उस शास्त्र की पूर्ति तथा उसके अध्ययनकर्ताओं की अभोष्ट