भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

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आयुष्कामीयाध्यायः १ ]

सूत्रस्थानम्

सिद्धि निर्विघ्न हो जाती है। जैसा कि कहा गया है—‘अकारश्चाथशब्दश्च द्रावैतौ ब्रह्मणः पुरा। कण्ठं भित्त्वा विनिर्याती तेनेमौ मङ्गली स्मृतौ’॥

आयुष्कामीयम् —आयुः (दीर्घायुः पूर्णायुः च) कामयन्ते ये ते आयुष्कामाः, तेष्यो हितः अध्यायः आयुष्कामीयः। अर्थात् दीर्घायु अथवा पूर्णायु की कामना करने वालों के लिए जो हितकर अध्याय है, उसे ‘आयुष्कामीय’ अध्याय कहा जाता है। यहाँ प्रयुक्त ‘आयुः’ शब्द की व्याख्या महर्षि आत्रेय के अनुसार इस प्रकार है—‘शरीरिन्द्रियसत्त्वात्मसंयोगो धारि जीवितम्। नित्यगन्धानुबन्धश्च पययिरायुःकृत्ते’॥ (च.सू. १।४१)

अध्यायम् —पदसमुदाय का नाम ‘वाक्य’ है। यथा—‘मुत्तिडन्तचयो वाक्यम्’। वाक्यों के समूह का नाम ‘प्रकरण’ है, प्रकरण-समुदाय को ही ‘अध्याय’ कहते हैं, अध्याय-समूह को ‘स्थान’ कहते हैं। सूत्रस्थान आदि अन्य स्थानों के समूह को ‘तन्त्र’ कहते हैं। जैसे—चरकतन्त्र, सुश्रुततन्त्र आदि। काव्यालंकार में इस प्रकार की वाक्यरचना को उत्तरालंकार कहते हैं। यथा—‘उत्तरवचनश्रवणादुत्सयनं यत्र पूर्ववचनानाम्। क्रियते तदुत्तरं स्यादिति’। चरक ने अपनी संहिता में इस प्रकार के आशय से सम्पन्न अध्याय का नाम ‘दीर्घजीवतीय’ रखा है।

व्याख्यास्यामः —यद्यपि ‘अष्टांगहृदय’ नामक तन्त्र का तन्त्रकार एक (वाग्भट) ही है, फिर यहाँ बहुवचन के प्रयोग की क्या आवश्यकता है? इसका व्याकरणसम्मत समाधान इस प्रकार है—‘अस्मदो द्रव्योश्च (१।२।५९)—एकत्वे द्वित्वे च विवक्षितेऽस्मदो बहुवचनं वा स्यात्’। जैसे—हम जा रहे हैं अथवा मैं जा रहा हूँ।

इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षयः।

इस विषय में आत्रेय आदि महर्षियों ने इस प्रकार कहा था।

वक्तव्य —महर्षि वाग्भट का कथन है कि प्रस्तुत तन्त्र में जो कुछ भी कहा गया है, वह महर्षि आत्रेय तथा धन्वन्तरि आदि महर्षियों के वचनों के अनुसार ही कहा गया है। ये आप्त पुरुष थे, क्योंकि प्रामाणिकता आप्तपुरुषों के वचनों में ही होती है। इसीलिए हमने उक्त महर्षियों के वचनों का अनुसरण किया है, अतएव हमारे इस तन्त्र में भी कोई अप्रामाणिक विषय नहीं आया है, इसलिए हम (वाग्भट) भी आप्त (प्रामाणिक) हैं। इसीलिए अष्टांगसंग्रह में वाग्भट ने कहा है—‘न मात्रामात्रमप्यत्र किञ्चिदागमवर्जितम्’। (अ.सं. १।२२) अर्थात् इस ग्रन्थ में मात्रा (ज, अ, बिन्दु, विसर्ग) आदि भी आगम (शास्त्र) से अतिरिक्त नहीं है अर्थात् जो भी कहा या लिखा गया है, वह सब शास्त्रानुकूल ही है। इस कथन के द्वारा महर्षि ने अपने को तथा अपने ग्रन्थ को प्रामाणिक सिद्ध किया है।

आयुः कामयमानेन धर्मासुखसाधनम्। आयुर्वेदोपदेशेषु विधेयः परमादरः॥२॥

आयुर्वेद का प्रयोजन —धर्म, अर्थ, सुख (काम) नामक इन तीन पुरुषार्थों का साधन (प्राप्ति का उपाय) आयु है, अतः आयु (सुखायु) की कामना करने वाले पुरुष को आयुर्वेदशास्त्रों में निर्दिष्ट उपदेशों में परम (विशेष) आदर करना चाहिए॥२॥

वक्तव्य —शास्त्रों में उपदेश दो प्रकार के मिलते हैं—एक विधानात्मक (इन्हें करना चाहिए) और दूसरे निषेधात्मक (इन्हें नहीं करना चाहिए)। इस प्रकार के उपदेशों के प्रति समाज का आदर भाव होना चाहिए अर्थात् इस प्रकार आप्त (विश्वसनीय अतएव प्रामाणिक महर्षि) वचनों की उपेक्षा करने से सुखायु की प्राप्ति नहीं हो पाती है। हमें तो हितायु, सुखायु तथा दीर्घायु की कामना करनी है, अतः महर्षियों के त्रिकालसत्य उपदेशात्मक वचनों के प्रति परम आदर करना ही चाहिए।