अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें॥ श्रीः ॥
श्रीमद्वाग्भटविरचितम्
अष्टाङ्गहृदयम्
‘निर्मल’ भिधया हिन्दीव्याख्यया विशेषवक्तव्यादिभिश्च विभूषितम्
सूत्रस्थानम्
प्रथमोऽध्यायः
मङ्गलाचरणम्
रागादिरोगान् सततानुपस्नानशेषकायप्रसृतानशेषान् । औत्सुक्यमोहारतिदाञ्चघान योऽपूर्ववैद्याय नमोऽस्तु तस्मै ॥ १ ॥
व्याख्याकर्तृर्मङ्गलाचरणम्
धन्वन्तरि पशुपतिं गिरिजां गणेशं नत्वाऽधुना चरकसुश्रुतवाग्भटादीन् ।
स्मृत्वा भिषगुरुवरान् यशसा समुद्धान् श्रीलालचन्द्रचरणान् प्रणतोऽस्मि शश्वत् ॥ १ ॥
युगानुरूपसन्दर्भसंज्ञया सफलकृतम् । अष्टाङ्गहृदयं येन वाग्भटं तं स्मराम्यहम् ॥ २ ॥
कृपाकटाक्षतो येषां प्रवृत्तोऽस्म्यलघीरपि । टीकायां वाग्भटस्यास्य वन्दे तान् गुरुपुङ्गवान् ॥ ३ ॥
अष्टाङ्गहृदये टीकाः प्राप्यन्ते पूर्वसूरिणाम् । तथाप्यभिनवां कुर्वं ‘निर्मलं’ विश्वार्थदाम् ॥ ४ ॥
तारादत्ततनुजस्य ब्रह्मानन्दत्रिपाठिनः । अनया टीकया भूयात् सन्तोषो विदुषां सताम् ॥ ५ ॥
यदि कथमपि किञ्चिद् बुद्धिदोषात् प्रमादान्मनुजसुलभभावाट्टीकने वाग्भटस्य ।
स्खलनमिह भवेच्चैन्मक्तुं तत्क्षमन्तां प्रमुतयुगकराब्जो याचतेऽयं त्रिपाठी ॥ ६ ॥
जो राग आदि रोग सदा मानव मात्र के पीछे लगे रहते हैं, जो सम्पूर्ण शरीर में फैले रहते हैं और जो उत्सुकता, मोह तथा अरति (बैबेनी) को उत्पन्न करते रहते हैं, उन सबको जिसने नष्ट किया उस अपूर्व वैद्य को हमारा (ग्रन्थकार का) नमस्कार हो ॥ १ ॥
बक्तव्य—रागादिरोगान्—राग, द्वेष, क्रोध, लोभ, मोह, मत्सर, ईर्ष्या आदि को मानसिक रोग कहा गया है। इन मानसिक रोगों में मन आदि का आधार देह है, अतः ये रोग आधारारधेयभाव से मन के साथ-ही-साथ देह को भी पीड़ित करते हैं। जैसे तपा हुआ लोहे का गोला जिस कड़ाही आदि पात्र में रखा रहेगा उसे भी तपाता है, ठीक उसी प्रकार राग आदि मानसिक रोग मन के साथ देह को भी पीड़ित करते हैं। शुद्ध चित्त वाले पुरुष को ये रागादि रोग नहीं होते।