भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

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अष्टाङ्गहृदये

वक्तव्य—काल— आयुर्वेदीय दृष्टि से यह तीन प्रकार का होता है, इसी को मौसम या मौसिम भी कहते हैं। इसका विभाजन इस प्रकार किया गया है—१. शीतकाल, २. उष्णकाल तथा ३. वर्षाकाल। इन कालों के समूह को वर्ष, वत्सर तथा संवत्सर कहते हैं। यहाँ इन्हीं तीन कालों से सम्बन्ध है। इन कालों में क्रमशः शीत, उष्ण, वर्षा का अधिक होना 'अतियोग' है, थोड़ा होना 'हीनयोग' है और अपनी सीमा के विपरीत होना 'मिथ्यायोग' है।

अर्थ— श्रोत्र आदि ज्ञानेन्द्रियों द्वारा जिन-जिन विषयों का ग्रहण किया जाता है, उन्हीं को इस प्रकरण में 'अर्थ' कहा गया है। इन अर्थों का अपनी-अपनी इन्द्रियों के साथ अधिक संयोग होना उन-उनका 'अतियोग' है, थोड़ा संयोग होना 'हीनयोग' है और अनिष्टकारक संयोग होने को 'मिथ्यायोग' कहते हैं।

कर्म— वाणी, मन तथा शरीर की प्रवृत्ति या चेष्टा का नाम 'कर्म' है। न्यायशास्त्र के अनुसार 'संयोग-भिन्नत्वे सति संयोगाऽसमवायिकारणत्वं कर्मत्वम्'। (तर्कसंग्रह) यह कर्मत्व भी हमारा उपकारक है। उक्त तीनों के या दो के अथवा एक के कर्म की अधिकता का नाम 'अतियोग' है, कर्म की कमी को 'हीनयोग' तथा अहितकर या हानिकर कर्म के योग को 'मिथ्यायोग' कहते हैं।

इस प्रकार काल, अर्थ तथा कर्म के अतियोग, हीनयोग, मिथ्यायोग किसी-न-किसी रोग को उत्पन्न करने में कारण होता है। उक्त अतियोग आदि शारीरिक एवं मानसिक रोगों की उत्पत्ति में कारण होते ही हैं। शीत, उष्ण एवं वर्षा का अतियोग, हीनयोग, मिथ्यायोग प्राकृतिक रूप से भी देखा जाता है और मानव द्वारा भी किया जाता है किन्तु फल दोनों का रोगोत्पत्ति में कारण होता ही है।

सम्यग्योग— काल, अर्थ एवं कर्म का अतियोग, हीनयोग तथा मिथ्यायोग के अतिरिक्त जो समुचित योग होता है, उसे 'सम्यग्योग' कहते हैं। यह 'आरोम्य' (स्वास्थ्य-वृद्धि) का कारण होता है। इसका विशेष विवरण अ.हृ.सू. के 'रोगानुत्पादनीय' नामक ४थे अध्याय में देखें। यही विषय अष्टांगसंग्रह के पाँचवें अध्याय में देखें। प्रस्तुत पद्य अष्टांगसंग्रह १।४२ में द्रष्टव्य है।

इस विषय को चरक की दृष्टि से देखें—च.सू. ११।३७-४१ तक। इन कर्मों को महर्षि चरक ने 'प्रजापराध' संज्ञा दी है, अन्यथा बुद्धि-प्रधान मानव इन कर्मों की ओर कैसे प्रवृत्त हो सकता है?

रोगस्तु दोषवैषम्यं, दोषसाम्यमरोगता।

रोग-आरोम्य में भेद— वात, पित्त, कफ इन तीन दोषों की विषमता या विषम अवस्था का नाम 'रोग' है। अर्थात् दोषों के विषम (किसी का बढ़ जाना और किसी का घट जाना) हो जाने से किसी-न-किसी प्रकार का रोग हो जाता है और जब उक्त दोष समान स्थिति में रहते हैं तब आरोम्य की प्राप्ति होती है अर्थात् मानव 'सुखी' रहता है।

वक्तव्य— दोष या दोषों की विषमता अर्थात् तीनों में से एक या दो दोषों का बढ़ या घट जाना, इसी की विषमता को सम का विपरीत भाव कहा जाता है। यहाँ दोष शब्द रोग का अन्तरंग (भीतरी) कारण मात्र है। दोषों का सम होना ही 'आरोम्य' है। आगे जो दो श्लोक अ.हृ.सू. में क्रम सं० २०-२१ पर हैं, ये ही दो श्लोक अ.सं.सू. १।४३-४४ में हैं।

निजागन्तुविभागेन तत्र रोगा द्विधा स्मृताः ॥ २० ॥

रोगों के दो भेद— सामान्य रूप से रोग दो प्रकार के होते हैं—१. निज (वात आदि भीतरी दोषों की विषमता से होने वाले) तथा २. आगन्तुज (अभिघात आदि बाहरी कारणों से होने वाले) ॥ २० ॥

वक्तव्य— महर्षि चरक के शब्दों में रोगों के दो भेद इस प्रकार कहे गये हैं—'तत्र निजः शारीर-दोषसमृत्यः, आगन्तुर्भूतविषवाव्यभिपसम्प्रहारादिसमृत्यः'। (च.सू. ११।४५) अर्थात् शारीरिक वात आदि दोषों से उत्पन्न रोग 'निज' कहा जाता है और 'आगन्तुज' रोग अभिघात, भूतावेश, सर्प आदि के दंश, शीत, उष्ण, आम, तेजाब आदि आश्रय द्रव्यों के लग जाने से या गदा, लाठी, हाकी, तलवार आदि के लग जाने से होता है।