अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंआयुष्कामीयाध्यायः १ ]
सूत्रस्थानम्
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तेषां कायमनोभेदादधिष्ठानमपि द्विधा।
दो प्रकार के रोगाधिष्ठान—रोगों के अधिष्ठान (आथयस्थान) भी दो होते हैं—१. काय (शरीर) तथा २. मन।
वक्तव्य—प्रथम भेद से होने वाले रोगों का अधिष्ठान ‘काय’ है। वे रोग ज्वर, रक्तपित्त, कास, श्वास आदि हैं। दूसरे भेद से कहे जाने वाले रोगों का अधिष्ठान है ‘मन’। इससे सम्बन्धित रोग हैं—मद, मूच्छर्ण, संन्यास, ग्रहारिष्ट, भूतोन्माद, अपस्मार, राग, द्वेष आदि। अधिष्ठान—‘अधिष्ठित रोगाः अस्मिन् इति अधिष्ठानम्’। अर्थात् जिसमें रोग टिकते हैं। इस दृष्टि से भी कायिक एवं मानसिक दो प्रकार के रोग होते हैं। अब यहाँ शंका यह होती है कि शारीरिक रोगों की उत्पत्ति में प्रकृपित वात आदि दोष कारण कहे गये हैं, मानस रोगों की उत्पत्ति में किसे कारण माना जायेगा? उसी के समाधान के लिए कहा जा रहा है।
रजस्तमश्च मनसो द्वौ च दोषावुदाहृतौ॥२१॥
मानसिक दोषों का परिचय—मनस् के दो दोष हैं—१. रजस् (रजोगुण) और २. तमस् (तमोगुण)।
वक्तव्य—गुण तीन हैं—१. सत्त्व, २. रजस् और ३. तमस्। इसी विषय को महर्षि ऋक ने ‘मानसः पुनरहिष्टो रजश्च तम एव च’। (च.सू. १।५७) भी स्वीकार किया है और मानस रोगों की चिकित्सा के लिए उन्होंने अगले (५८वें) पद्य में कहा है—मानस रोगों की ज्ञान, विज्ञान, धैर्य, स्मृति तथा समाधि द्वारा चिकित्सा करें। इस विषय को आप ‘नियतस्त्वनुबन्धो रजस्तमसोः परस्परं, न ह्यरजस्के तमः प्रवर्तते’। (च.वि. ६।१) अर्थात् काम आदि मानस रोगों तथा ज्वर आदि शरीर सम्बन्धी रोगों का कदाचित् परस्पर अनुबन्ध हो जाता है, परन्तु रजस् और तमस् का परस्पर अनुबन्ध होना निश्चित ही है, क्योंकि तमस् रजस् के बिना प्रवृत्त ही नहीं होता। ये दोनों कभी भी एक-दूसरे का साथ नहीं छोड़ते और सत्त्व गुण सर्वथा निर्विकार है। अतः वह (सत्त्वगुण) मानसिक आरोग्य को देने में कारण है।
अष्टांगसंग्रह में वाग्भट ने सत्त्व, रजस्, तमस् को ‘महागुण’ कहा है, अतः ये तीनों कारण रजस् तथा शुक्र रूप बीज में भी रहते हैं और कार्य (श्रृण) में भी रहते हैं। अतएव इनके विषय में भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत से कहा है। देखें—सु.शा. १।३।
सत्त्व-रजस्-तमस् की निरुक्ति—
१. सत्त्वम्—अस्ति इति सत्, सतो भावः सत्त्वम् = अस्तित्व युक्त।
२. रजस्—रञ्जति अनेन इति रजः = रागः, आसक्तिः वा।
३. तमस्—ताम्यति अनेन इति तमः = विनाशकारक प्रधान गुण।
रजोगुण तथा तमोगुण का वर्णन करते हुए महर्षि पुनर्वसु ने कहा है—‘सृष्टि के समय पुरुष अव्यक्त अवस्था से व्यक्त अवस्था में आता है और पुनः प्रलयकाल में व्यक्त अवस्था से अव्यक्त अवस्था में चला जाता है। इस प्रकार बन्धन के कारण रजस् तथा तमस् गुणों से युक्त पुरुष संसार-चक्र के समान घूमता रहता है। (च.शा. १।६८)
दर्शनस्पर्शनप्रश्नैः परीक्षेत च रोगिणम्।
रोगी की परीक्षा—दर्शन (देखना), स्पर्शन (हाथ आदि से छूकर देखना) तथा रोग सम्बन्धी विविध प्रश्न पूछकर रोगी (रोग से पीड़ित शरीर वाले) की परीक्षा करनी चाहिए।
वक्तव्य—सुश्रुत ने ‘ततोऽप्रश्नेन चेति’। (सु.सू. १०।४) प्रारम्भ में रोगी देखने के सम्बन्ध में दूसरे किसी आचार्य का मत उद्धृत किया है कि ‘दूत, लक्षण, शकुन तथा मंगल की अनुकूलता होने पर रोगी के घर जाना चाहिए’। इस मत की सामान्य दृष्टि से उपेक्षा करते हुए वे कहते हैं—रोग जानने के छः उपाय हैं—पाँच श्रोत्र आदि इन्द्रियों से और छठा प्रश्न से।
२ अ० हू०