अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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अष्टाङ्गहृदय
आचार्य पुनर्वसु 'रसना इन्द्रिय' के परीक्षा का विषय किसी को नहीं मानते। देखें—'रसं तु... रसानुमिमीत'। (च.वि. ४।७) अर्थात् रोगी के शरीर का रस यद्यपि रसना इन्द्रिय द्वारा ग्रहण किया जा सकता है, परन्तु उसे अनुमान से ही जान लेना चाहिए। इसका प्रत्यक्ष उपाय से ग्रहण करना उचित नहीं है। अतएव रोगी से पूछकर उसके मुखा का स्वाद कैसा है, जान ले; जू यदि रोगी के शरीर से हट गयी हो तो रोगी के शरीर को नीरस समझ लें। प्रायः साफ-सुथरे परिवार के रोगियों में यह लक्षण नहीं पाया जाता, तथापि रोगियों के शरीरों में यह लक्षण दिखलायी देता है। मस्तिष्यों के बार-बार शरीर पर बैठने से शरीर की मधुरता समझें। रक्तपित्तरोग में निकलने वाले रक्त की परीक्षा—क्या यह जीवरक्त तो नहीं निकल रहा है, इसके लिए उसे कुत्ते या कौए के सामने डालें, यदि प्राणी खा ले तो उसे जीवरक्त समझें, अन्यथा रक्तपित्त का दूषित रक्त समझें। इस प्रकार अन्य रसों का भी अनुमान कर लेना चाहिए। यह २२वाँ पद्य अ.सं. १।४५ में अविकल द्रष्टव्य है।
रोगी-परीक्षा के आधुनिक उपकरण
१. थर्मामीटर—यह स्पर्श द्वारा शरीर के तापमान को बतलाता है। इसमें वात-पित्त-कफ दोषों को बतलाने की क्षमता नहीं होती है।
२. स्टेथोस्कोप—यह थोत्रेन्द्रिय का प्रतिनिधि यन्त्र है। इसकी सहायता से कफ से होने वाली हृदय की आवाज सुनी जा सकती है। ब्लडप्रेसर जोचने में भी चिकित्सक इसका उपयोग करते हैं।
३. एक्स-रे—यह चक्षुरिन्द्रिय का प्रतिनिधि यन्त्र है। त्वचा तथा मांस से ढकी हुई जिन अस्थियों या अस्थिभंग को हम अपनी इन आँखों से नहीं देख सकते वहाँ यह यन्त्र सहायक होता है।
४. कार्डियोग्राम—हृदय-परीक्षा के लिए इसका उपयोग होता है। जो हृदय क्या कह रहा है, उसे यह टेढ़ी-सीधी रेखाओं द्वारा निर्दिष्ट कर देता है, तदनुसार चिकित्सक उसकी चिकित्सा करते हैं।
५. अल्ट्रासाउण्ड—यह स्थान-विशेष को चित्रित कर देता है, तदनुसार चिकित्सा की जाती है।
६. लिटमस पेपर—इसकी सहायता से हम मूत्र की धारता तथा अम्लता का ज्ञान कर लेते हैं।
७. सेक्रोमीटर—इससे मधुमेहरोगी के मूत्र की शंकरा नापी जाती है, इस दृष्टि से यह रसनेन्द्रिय का प्रतिनिधि यन्त्र है।
इस प्रकार के अन्य अनेक उपकरणों का इस क्षेत्र में आविष्कार होता जा रहा है, उन्हें भी देखें।
विशेष—नाडीज्ञान के लिए अभी तक जो यन्त्र अत्यधिक प्रयुक्त हुए हैं, वे अधिक श्रद्धेय नहीं हैं।
रोगं निदानप्रागुरुपलक्षणोपशयाप्तिभिः ॥ २२ ॥
रोग की परीक्षा—निदान, पूर्वरूप, लक्षण, उपशय तथा सम्प्राप्ति नामक रोगज्ञान के उपायों से रोग की परीक्षा करनी चाहिए ॥ २२ ॥
बक्तव्य—यहाँ मात्र इनके नामों का उल्लेख कर दिया गया है। विशेष देखें—अ.हृ.नि.अ. १ में।
भूमिदेहप्रभेदेन देशमाहुरिह दिधा।
देशभेदों का वर्णन—आयुर्वेदीय दृष्टिकोण के अनुसार देश दो प्रकार का होता है—१. भूमिदेश और २. देहदेश। शरीर के विभिन्न अवयवों को यहाँ देहदेश कहा गया है। भूमिदेश का वर्णन आगे किया जा रहा है।
बक्तव्य—आयुर्वेदशास्त्र में प्रधान महत्त्व निदान एवं चिकित्सा का ही है। यहाँ ग्रन्थकार सूत्र रूप में विषयों का वर्णन कर आगे यथास्थान इन विषयों का विस्तृत विवेचन करेंगे। यह इनकी अपनी शैली है। देह शब्द देश के अर्थ में केवल आयुर्वेद में ही प्रयुक्त हुआ है। देहदेश का क्षेत्र है—सिर, हाथ, पैर आदि।