भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

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आयुष्कामीयाध्यायः १ ]

सूत्रस्थानम्

१९

जाङ्गलं वातभूमिच्छमनूपं तु कफोल्बणम् ॥२३॥ साधारणं सममलं त्रिधा भूदेशमादिशेत्।

भूमिदेश का वर्णन—भूमिदेश तीन प्रकार का कहा गया है—१. जांगल देश; यहाँ हवा अधिक बलती है, २. आनूप देश; इस देश में कफदोष की प्रधानता रहती है और ३. साधारण देश; इस देश में वात आदि तीनों दोष समान अवस्था में रहते हैं ॥ २३ ॥

वक्तव्य—‘भूमिदेशग्रहभेदेन’ से लेकर ‘भूदेशमादिशेत्’ तक की उक्त तीन पंक्तियाँ संग्रह तथा हृदय में समान हैं। इस प्रकार यहाँ संक्षेप में भूमिदेशों का वर्णन किया गया है। इनका विस्तृत वर्णन च. वि. ३।४५-४८, च. क. १।८ तथा सु. सु. के ३६६ में भूमिप्रविभागीय अध्याय में देखें। इन देशों का परिचय औषधसंग्रह, रोगनिर्णय तथा साध्य-असाध्य का विचार करते समय अवश्य कर लेना चाहिए। उक्त तीन प्रकारों के देश-विवेचन से समस्त भूमण्डल का विचार किया जा सकता है।

शाङ्कघराचार्य ने तीन प्रकार के देशभेदों की चर्चा इस प्रकार की है—‘बहुदकनगोऽनूपः कफमातुरोगवान्। जाङ्गलोऽल्याम्बुशाखी च पितामुङ्गमातुरोत्तरः ॥ संमृष्टलक्षणो यस्तु देशः साधारणो मतः’। (शा. सं. पू. खं. ६४)

१. जाङ्गल देश—रूखा-सूखा मरुस्थल; जैसे—भारत का बीकानेर तथा जैसलमेर क्षेत्र तथा बाहरी प्रदेश अरब, अफ्रीका आदि। प्रायः ये जल तथा वृक्षरहित देश हैं। यहाँ पित्तज, रक्तज एवं वातज रोग अधिक होते हैं।

२. आनूप देश—त्रिपुल जल तथा पर्वतों से युक्त देश; जैसे—आसाम, ब्रह्मा तथा बंगाल की खाड़ी, नदी-नालों से व्याप्त भू-प्रदेश। यहाँ कफज तथा वातज रोग अधिक होते हैं।

३. साधारण देश—इसमें वात आदि सभी दोष सम रहते हैं, अतएव यहाँ अधिकांश रोग नहीं होते; फलतः यहाँ के निवासी अन्य देशवासियों की अपेक्षा स्वस्थ, सुन्दर, सुठिल शरीर वाले तथा नीरोग रहते हैं; जैसे—उत्तरप्रदेश, पंजाब आदि के निवासी।

क्षणदिव्याध्यवस्था च कालो भेषजयोगकृत ॥ २४ ॥

काल के भेद—आयुर्वेद में काल दो प्रकार का माना जाता है—१. क्षण अर्थात् प्रातःकाल तथा सार्यकाल और २. रोग की अवस्था (आमावस्था एवं जीर्णावस्था)। इन दोनों कालों के अनुसार भेषजयोग (चिकित्सा का प्रयोग) किया जाता है ॥ २४ ॥

वक्तव्य—कोष-साहित्य में ‘क्षण’ शब्द दिन के विभाजन या प्रमाण में प्रयुक्त होता है। दूसरा यह ‘काल-विशेष’ का भी सूचक है। क्षणादि—यहाँ आदि शब्द से लब्ध (३६ निमेष का समय), बुटि (दो क्षण या क्षण के चतुर्थांश के बराबर काल), मुहूर्त (१२ क्षण का या ४८ मिनट का समय), याम (पहर या तीन घण्टे का समय), अहोरात्र (२४ घण्टे का समय या १ दिन १ रात), पक्ष (१५ दिन), मास (३० दिन), ऋतु (२ मास का समय), अयन (६ मास का समय) तथा वर्ष से १२ मासों का ग्रहण कर लेना चाहिए। इस कालभेद का प्रयोग शास्त्र में इस प्रकार देखा जाता है। जैसे—प्रातःकाल वमनकारक औषधयोग को देना चाहिए, मध्याह्न में विरेचन करना चाहिए, फिर कुछ समय रुक कर बस्ति का प्रयोग करना चाहिए आदि। इसके पहले जो देशभेद की व्याख्या की गयी थी, तदनुसार विचार कर अर्थात् यह किस देश का निवासी है, इसका आहार-विहार, रहन-सहन कैसा है, इसे क्या सात्व्य होगा, क्या असात्व्य होगा, यह सब विचार कर तब चिकित्सा करनी चाहिए। अतएव आगे औषध-प्रयोग की चर्चा प्रस्तावित है।

शोधनं शमनं चेति समासादीषधं द्विधा।

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