अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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अष्टाङ्गहृदये
औषध के भेद—संक्षिप्त रूप से औषध ( चिकित्सा ) दो प्रकार की होती है—१. शोधन अर्थात् वमन-विरेचन आदि विधियों से दोषों को निकालना शोधन कहा जाता है और २. शमन अर्थात् उभड़े हुए वात आदि दोषों को शान्त करने का उपचार।
बक्तव्य—शोधन-चिकित्सा से बड़े हुए दोषों को निकाल दिया जाता है एवं शमन-चिकित्सा द्वारा बड़े हुए दोषों को शान्त कर दिया जाता है। आयुर्वेदीक समस्त औषधों का समावेश शोधन तथा शमन औषधों में हो जाता है। उक्त श्लोक में जो 'औषध' शब्द का प्रयोग हुआ है, यहाँ इसका अर्थ है—'चिकित्सा'। देखें—च.सू. १०।३; च.वि. १।३ तथा अ.हृ.सू. के द्विविधोपक्रमणीय नामक १४वें अध्याय को भी इस प्रसंग में देखें।
शरीरजानां दोषाणां क्रमेण परमौषधम् ॥ २५ ॥
बस्तिविरको वमनं तथा तैलं घृतं मधु।
शारीरिक दोषों की चिकित्सा—शरीरसम्बन्धी दोषों की उत्तम चिकित्सा क्रमशः इस प्रकार है—वातदोष की चिकित्सा बस्ति-प्रयोग, पित्तदोष की चिकित्सा विरेचन-प्रयोग तथा कफदोष की चिकित्सा वमन-प्रयोग है तथा वातदोष में तैल, पित्तदोष में घृत और कफदोष में मधु का प्रयोग उत्तम शमन-चिकित्सा है ॥ २५ ॥
बक्तव्य—उक्त श्लोक द्वारा शारीरिक दोषों की संक्षिप्त चिकित्सा कही गयी है। इनका विस्तृत विवरण अ.हृ.सू. अध्याय १६ में स्नेहविधि, १८ में वमन एवं विरेचन विधि, १९ में बस्तिविधि को कहा गया है। अष्टांगहृदय का यह सूत्रस्थान है। आर्य आयुर्वेदीय संहिता-ग्रन्थों का यह प्राचीन विषय-विभागक्रम रहा है। इसमें यथासम्भव आयुर्वेद सम्बन्धी अर्थों की सूचना होती है। इसमें आयुर्वेद के सूत्रों को मणियों की भाँति गुँथा गया है और इन्हीं सूत्रों की अगले अध्यायों या स्थानों में विस्तृत व्याख्यान करने की इसमें प्रतिज्ञा की गयी है; अतः इसे 'सूत्रस्थान' कहा गया है। अतएव उक्त २५वाँ पद्य इसका एक उदाहरण मात्र है।
धीर्धैर्यत्मादिविज्ञानं मनोदोषोषधं परम् ॥ २६ ॥
मानसिक दोषों की चिकित्सा—मानसिक ( रजस् तथा तमस् ) दोषों की उत्तम चिकित्सा है—बुद्धि तथा धैर्य से व्यवहार करना और आत्मादि विज्ञान ( कौन मेरा है, क्या मेरा बल है, यह कौन देश तथा कौन मेरे हितैषी या सहायक हैं ) का विचार कर कार्य करना ॥ २६ ॥
बक्तव्य—नीति-उपदेश आचार्य चाणक्य ने कुल ऐसी ही स्थिति को ध्यान में रखकर यह पद्य कहा होगा—'कः कालः कानि मित्राणि को देशः को व्यायामो। कस्याऽहं का च मे शक्तिरिति चित्त्यं मुहुर्महुः' ॥ ( चाणक्यनीति )। बस्ति, विरेचन, वमन तथा तैल, घृत, मधु के प्रयोगों से क्रमशः वात, पित्त, कफ दोषों का शमन हो जाता है और बुद्धि, धैर्य आदि से रजोगुण एवं तमोगुण जनित रोग तथा क्रोध आदि की शान्ति हो जाती है।
भिषगद्रव्याण्युपस्थाता रोगो पादचतुष्टयम्। चिकित्सितस्य निर्दिष्टं, प्रत्येकं तच्चतुर्गुणम् ॥ २७ ॥
चिकित्सा के चार पाद—चिकित्सा-कर्म के चार पाद ( चरण या विभाग ) माने जाते हैं। जैसे—१. भिषक् ( वैद्य या चिकित्सक ), २. द्रव्य ( सैनफल आदि वमनकारक अर्थात् शोधन द्रव्य, गुरुच आदि शमन द्रव्य तथा बस्ति आदि शोधन उपकरण ), ३. उपस्थाता ( उप समीपे तिष्ठतीति )—परिचारक ( जो रोगी के पास में रहकर उसकी देख-भाल करे; उसे उठाये, बैठाये, खिलाये, पिलाये तथा मल-मूत्र करने में सहायता करे ) और ४. रोगी। इन चारों में प्रत्येक में चार-चार गुण होने चाहिए ॥ २७ ॥
दक्षतीर्थतित्ताश्चाप्यो दूषकर्मा शुचिभिषक्।