भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

पृष्ठ 57, कुल 387 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 57

आयुष्कामीवाध्यायः १ ]

सूत्रस्थानम्

२१

वैद्य के चार लक्षण—१. दक्ष (चिकित्सार्क में कुशल), २. तीर्थ (आचार्य) से शास्त्र (आयुर्वेदशास्त्र) के अर्थ को ग्रहण कर चुका हो। ३. दृष्टकर्मा (चिकित्सा की विधियों को जो अनेक बार देख चुका हो) और ४. जो शुचि (शरीर तथा आचरण से पवित्र) हो।

बहुकल्पं बहुगुणं सम्पन्नं योग्यमौषधम् ॥ २८ ॥

औषध-द्रव्य के चार लक्षण—१. बहुकल्प (जो स्वरस, क्वाथ, फाण्ट, अवलेह, चूर्ण आदि अनेक रूपों में दिया जा सकता) हो, २. बहुगुण (जो औषध के सभी गुणों से सम्पन्न) हो, ३. सम्पन्न (अपने गुणों की सम्पत्ति से जो युक्त) हो और ४. योग्य (जो रोग-रोगी, देश, काल आदि के अनुकूल) हो ॥ २८ ॥

अनुरक्तः शुचिर्दक्षो बुद्धिमान् परिचारकः ।

परिचारक (उपस्थाता) के चार लक्षण—१. अनुरक्त (रोगी से स्नेह रखने वाला), २. शुचि (खान-पान, औषधि खिलाने, रखने आदि में साफ-सफाई रखने वाला), ३. दक्ष (कुशल) तथा ४. बुद्धिमान् (समयचित्त सूक्ष्म-बूझ वाला) होना चाहिए।

आदृढो रोगी भिषग्वश्यो ज्ञापकः सत्त्ववानपि ॥ २९ ॥

रोगी के चार लक्षण—१. आदृढ (धन-जन आदि से सम्पन्न), २. भिषग्वश्य (वैद्य की आज्ञानुसार औषध तथा पथ्य सेवन करने वाला), ३. ज्ञापक (अपने सुख-दुःख कहने में सक्षम) तथा ४. सत्त्ववान् (मानसिक शक्तिसम्पन्न अर्थात् चिकित्साकाल में होने वाले कष्टों से न घबड़ाते वाला) हो ॥ २९ ॥

बक्तव्य—चरक-सूत्रस्थान अध्याय ९ का नाम 'बुद्धाडकचतुष्पाद' है। इस सम्पूर्ण अध्याय में वैद्य, द्रव्य, परिचारक तथा रोगी इन्हीं चिकित्सा के चार पादों का वर्णन किया गया है, इसे देखें। इसके अगले दसवें अध्याय में मैत्रेय की शंकाओं का अन्रैय पुनर्वसु द्वारा जो समाधान दिया है, वह भी ध्यान देने योग्य है।

चिकित्सा के चार पादों में वैद्य सब में उत्तम (प्रधान) होता है, क्योंकि यदि वैद्य नहीं है तो अन्य तीन पाद गुणवान् होने पर भी अपना-अपना कार्य ठीक प्रकार से नहीं कर पाते। अतएव चिकित्सक को (च.सू. १।१० में) विज्ञाता, शासिता, योक्ता तथा प्रधान कहा गया है। इन विशेषणों का तात्पर्य है—१. विज्ञाता अर्थात् औषधियों का जानकार, २. शासिता—परिचारक या परिचारकों से समयोचित कार्य कराने में सक्षम एवं कुशल और ३. योक्ता—रोगी को यह खाओ, यह पीओ आदि व्यवस्था देने में चतुर। इस प्रकार औषध-द्रव्य आदि तीनों वैद्य के अधिकार में रहते हैं। इनमें विज्ञाता विशेष ज्ञानवान् होने के कारण वैद्य प्रधान एवं स्वतन्त्र होता है।

अष्टांगसंग्रह-सूत्रस्थान २।८-९ में सुयोग्य वैद्य के तथा श्लोक १२ में राजवैद्य के लक्षण दिये हैं। इसी प्रसंग में श्लोक १० में कुवैद्य के भी लक्षण सामाजिकों के परिचर्याय दिये गये हैं, इन्हें देखें। शाङ्गधराचार्य ने जो वैद्य के लक्षण दिये हैं, वे मनीय हैं—'तत्त्वाधिगतशास्त्रार्थो दृष्टकर्मा स्वयं कृती। लघुहस्तः शुचिः शूरः सज्जोपरकरभेषजः ॥ प्रत्युत्पन्नमतिर्दिमान् व्यवसायी प्रियेवदः। सत्यधर्मपरो यश्च वैद्य ईदृक् प्रशस्यते' ॥ (शा.सं.पू.खं. ३।२३-२४) अर्थ स्पष्ट है।

रोगी के गुणों में एक गुण 'ज्ञापक' है—जिसका अर्थ है—अपनी बात को जो ठीक प्रकार से कह सके। बालक रोगी में यह शक्ति नहीं होती, अतएव चिकित्सक को उसे समझने का प्रयत्न करना चाहिए। उसकी विधि वाग्भट ने अ.हू.उ. २ में बतलाई है, आप ध्यान दें।

चिकित्सा के चार पादों (पैरों) का यहाँ वर्णन किया गया है। इसका आशय है कि वह (चिकित्सा) अपने बल पर खड़ी रह सके, गतिशील हो और सफल हो। यदि कोई पाद कम पड़ जायेगा तो वह डगमगाने लगेगा, अतः चिकित्साकाल में चारों पादों की व्यवस्था सतर्कता से होनी चाहिए।

(साध्योऽसाध्य इति व्याधिर्द्विधा, तौ तु पुनर्द्विधा।

सुसाध्यः कुञ्च्यसाध्यश्च, याप्यो यश्चानुपक्रमः ॥ )

अष्टाङ्गहृदयम् · पृष्ठ 57, कुल 387 में से · BharatKosha