भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

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अष्टाङ्गहृदये

सर्वोपधक्षमे देहे यूतः पुंसो जितात्मनः। अमर्मगोऽल्पहेत्वग्ररूपरूपोऽनुपद्रवः ॥ ३० ॥ अतुल्यदृष्यदेशतृप्रकृतिः पादसम्पदि। ग्रहेष्वनुगुणेष्वेकदोपमार्गो नवः सुखः ॥ ३१ ॥

साध्य-असाध्य के अनुसार व्याधि के भेद—१. साध्य तथा २. असाध्य इस प्रकार रोग के दो भेद होते हैं। इनके भी पुनः दो भेद होते हैं—१. सुखसाध्य एवं २. कुन्त्र (कष्ट) साध्य। इसके बाद असाध्य के पुनः दो भेद होते हैं—१. याप्य (कुछ दिन चिकित्सा द्वारा चलाने योग्य) और २. अनुपक्रम अर्थात् चिकित्सा के अयोग्य या प्रत्याश्रयेय (जवाब देकर चिकित्सा करने योग्य) ॥ १ ॥

सुखसाध्य रोग के लक्षण—जिस रोगी का शरीर सभी प्रकार की चिकित्साविधियों को सहन करने में समर्थ (सक्षम) हो, जो युवक (बालक या बृद्ध न) हो, जो जितेन्द्रिय हो, जिसका रोग किसी मर्मस्थल में उत्पन्न न हुआ हो, जिस रोग के उत्पादक हेतु (कारण), पूर्वरूप, रूप आदि थोड़े एवं सामान्य (उग्र न) हों, जिसमें अभी तक कोई उपद्रव पैदा न हुए हों तथा जिसमें दूष्य, देश, ऋतु एवं प्रकृति समान न हों, चिकित्साकाल में उक्त चारों पाद अपने-अपने गुणों से सम्पन्न हों; सूर्य-चन्द्र आदि ग्रह अनुकूल हों, रोग एक दोष से उत्पन्न हों, एकमार्गिणी हो (जैसे रक्तपित्तरोग—‘ऊर्ध्व साध्यम्’) और रोग नया हो ॥ ३०-३१ ॥

वक्तव्य—यद्यपि यह कोष्ठांकित पद्य अष्टांगसंग्रह-सूत्रस्थान अध्याय २।२६ का है, फिर भी यह प्रसंगोचित है, अतएव कुछ विद्वान् इसका यहाँ भी संग्रह करते हैं।

रोग के भेदों का वर्णन करने के बाद अब यहाँ साध्य रोगी के स्वरूप का विवेचन प्रस्तुत किया जा रहा है—‘सर्वोपधक्षमे देहे’ अर्थात् जो तीक्ष्ण, मध्य, मृदु सभी प्रकार की औषधियों को तथा शोधन-शमन चिकित्सा में प्रयुक्त विष-क्षार आदि द्रव्यों के प्रयोगों को सहन कर सके। इसके आगे ‘श्रीअरुणदत्त’ कहते हैं—‘पुंसो न स्त्रियाः’। ‘पुण्ग्रहणं स्त्रीनिवृत्त्यर्थम्’। यह विचार उनका केवल इस अंश में माना जा सकता है कि पुरुष-शरीर से स्त्री-शरीर ‘मृदु’ होता है, अन्यथा चिकित्सा-क्षेत्र में पुरुष शब्द से प्राणिमात्र का ग्रहण किया जाता है। आप देखें—‘खादयश्चैतना षष्ठा धातवः पुरुषः स्मृतः’ ॥ (च.शा. १।१६) और भी—‘वेदानामामधिष्ठानं मनो देहश्च सेन्द्रियः’ ॥ (च.शा. १।३६) रोगों की साध्यता एवं असाध्यता का विचार हम स्त्री-शरीर में भी करेंगे। जितात्मनः —जिसने अपनी इन्द्रियों के साथ आत्मा को जीत लिया है अर्थात् जिसे विषयों के उपभोग की प्रवृत्ति न हो। अमर्मगः —जो रोग मर्मों (प्राणहर मर्मों—सिर, हृदय, बस्ति आदि) में उत्पन्न न हुआ हो। अनुपद्रवः —वर्तमान में उत्पन्न रोग के बाद जो दूसरा रोग उत्पन्न हो जाता है, उसे ‘उपद्रव’ कहते हैं, उससे रहित अर्थात् पूर्व चिकित्सा में जो बाधक हो। अतुल्यदृष्यदेशतृप्रकृतिः —अतुल्य = जो रोग के समान न हो। जैसे दूष्य—मेदस् तथा मज्जा में उत्पन्न रोग, अनुपदेश में जाड़े में उत्पन्न रोग। रोगी वातप्रकृति का हो और उसका पित्तदोष प्रकृपित हो तो सुखसाध्य होता है। अतुल्यदृष्य—शीतगुण-प्रधान कफ से उष्णगुण-प्रधान रक्त का दूषित होना। अतुल्यदेश रोग—अनुपदेश में पित्तदोष से उत्पन्न रोग। अतुल्यऋतु—शरद ऋतु में कफज रोग। अतुल्यप्रकृति—पित्तप्रकृति वाले पुरुष को कफज रोग की उत्पत्ति। ये सुखसाध्य के लक्षण हैं।

कहाँ चिकित्सा क्षेत्र में विपरीत स्थिति के भी दर्शन होते हैं। यथा—‘ज्वरे तुल्यतृदोषत्वं प्रमेहे तुल्य-दृष्यता। रक्तगुलेषु पुराणत्वं सुखसाध्यस्य लक्षणम्’ ॥ अर्थ स्पष्ट है। पादचतुष्टय की उपलब्धि भी चिकित्सा-सौकर्य में सहायक होती है। ग्रहेष्वनुगुणेषु—आयुर्वेद का ज्योतिषशास्त्र से घनिष्ठ सम्बन्ध है, अतएव अनुकूल ग्रह-नक्षत्र आदि की चर्चा यहाँ की गयी है। एकदोषमार्गः—तीनों में से किसी एक दोष का होना। द्विदोषज, त्रिदोषज रोग उत्तरोत्तर कष्टसाध्य तथा असाध्य होते हैं। मार्ग तीन प्रकार के कहे गये हैं—१. बाह्य, २. अन्तर, ३. मध्य। नवः—प्रायः नये रोग सुखसाध्य होते हैं। वे ही रोग विलम्ब कर देने से कष्टसाध्य हो जाते हैं। अतएव कहा गया है—‘सुखसाध्यः सुबोपायः कालेनाल्पेन साध्यते’।