अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंआयुष्कायीयाध्यायः १ ]
सूत्रस्थानम्
२३
शस्त्रादिसाधनः कृच्छ्रः सङ्कृते च ततो गदः।
कष्टसाध्य रोग के लक्षण—कुच्छ्र शब्द का अर्थ है—कष्ट। कष्टसाध्य वे रोग होते हैं जिनमें शस्त्र, धार, अग्नि (दाह) कर्म तथा विष आदि के प्रयोग किये जाते हैं। जिन रोगों में ऊपर कहे गये सुखसाध्य के लक्षण संकर (मिले-जुले) हों अर्थात् पूर्णरूप से विद्यमान न हों।
शेषत्वादायुपो याप्यः पथ्याभ्यासाद्विपर्यये ॥ ३२ ॥
याप्य रोग के लक्षण—उम रोग को 'याप्य' कहते हैं जिसमें पूर्वोक्त सुखसाध्य के लक्षणों से विपरीत लक्षण हों, किन्तु आयु के शेष (बचे) रहने के कारण तथा पथ्य (हितकर) आहार-विहार तथा औषध (यथायोग्य चिकित्सा) के अभ्यास (लगातार सेवन) करने के कारण रोगी बल-फिर सक रहा हो ॥ ३२ ॥
वक्तव्य—'याप्य' चिकित्सा की वह स्थिति है जिसे चिकित्सक पूर्ण रूप से स्वस्थ कर देना चाहता है, किन्तु ऐसा कर नहीं सकता और यह चिकित्सा तब तक चल सकती है जब तक रोगी की आयु शेष है। इसके सम्बन्ध में विशेष विवरण देखें—'दत्त्वाऽल्य'-'हितैः'। (अ.सं.सू. २।३१-३२) अर्थात् जो रोग उचित चिकित्सा करने तथा पथ्य सेवन करते रहने से कुछ शान्त रहता है, उसे 'याप्य' कहते हैं। व्याकरणशास्त्र में 'याप्य' का अर्थ कुत्सित या निन्दिता है। देखें—याप्ये पाशष् (अ. ५।३।४७)।
अनुपक्रम एव स्यात्पित्तोऽत्यन्तविपर्यये। औत्सुक्यमोहारतिकृद् दृष्टिरष्टोऽक्षताशनः ॥ ३३ ॥
प्रत्याख्येय रोग के लक्षण—उम रोग को 'अनुपक्रम' भी कहते हैं जो सुखसाध्य लक्षणों से अत्यन्त विपरीत हो और जो औत्सुक्य, मोह तथा अरति (बेचैनी) लक्षणों वाला हो, जिसमें अरिष्ट लक्षण दिखलायी दे रहे हों एवं जिसमें ज्ञानेन्द्रियों का नाश हो गया हो ॥ ३३ ॥
वक्तव्य—उक्त ३३वें श्लोक में कहे गये सभी लक्षण असौम्य रोग के हैं। आप भी लक्षणों पर ध्यान दें। 'औत्सुक्य' भाव को आप रोगी में इस प्रकार देखेंगे—अधिक प्रसन्न होना या उठ-उठ कर दौड़ना आदि या मोह, बेहोशी, प्रलप (अंट-संट बकना) आदि। 'अरति' (बेचैनी), हाथ-पाँव का पटकना या सिर को घुमाते रहना। 'दृष्टिरष्टः'—जिसमें अरिष्ट (मृत्युकारक) लक्षण दिखलायी दे रहे हों। आयुर्वेद में 'रिष्ट' तथा अरिष्ट दोनों शब्द समानार्थक हैं। 'अक्षनाशनः'—अक्ष का अर्थ है ज्ञानेन्द्रियाँ, इनकी क्रियाशक्ति का जिस रोगी में नाश हो गया हो अर्थात् जो संज्ञाशून्य हो गया हो। उत्तम चिकित्सक घर के लोगों से उसके रोग की विषम (असाध्य) स्थिति को बतला कर उसकी चिकित्सा न करे। देखें—च.सू. १०।८। इस अध्याय में श्लोक ९ से २२ तक का अवश्य अवलोकन करें। देखें—इस विषय में महर्षि चरक ने अपने शब्दों में किस प्रकार कहा है?
त्यजेदार्ता भिषग्भूपैर्द्विष्टं तेषां द्विष्टं द्विषम्। हीनोपकरणं व्यग्रमविधेयं गतायुषम् ॥ ३४ ॥
चण्डं शोकातुरं भीरुं कृतघ्नं वैद्यमानिनम्।
त्याज्य रोगों—चिकित्सक को चाहिए कि निम्नलिखित प्रकार के रोगियों की चिकित्सा न करे—१. जिससे राजा या महान् जन्य द्रष्ट करता हो और जो स्वयं अपना द्रष्टी हो, २. जो राजाओं (श्रीमानों) से द्रष्ट करता हो, ३. वैद्य से द्रष्ट करता हो, ४. जिसके पास चिकित्सा के उपयोगी साधन न हों, ५. जो व्यग्र हो अर्थात् जो चिकित्सा कराने में सक्रिय न हो, इधर-उधर भटकता रहता हो, ६. जो रोगी चिकित्सक की आज्ञा के अनुसार चलना स्वीकार न करता हो, ७. जो गतायु हो (इसका ज्ञान ज्योतिषी आदि से किया जा सकता है) अर्थात् जो अब अधिक समय तक जीवित नहीं रहेगा, ८. जो अत्यन्त क्रोधी हो, ९. शोकातुर अर्थात् जो पुत्र-स्त्री-धन आदि के नाश से दुःखी हो, १०. जो भीरु (डरपोक) हो अर्थात् जो पञ्चकर्म आदि क्रियाओं से डरता हो, ११. कृतघ्न अर्थात् जो दूसरों द्वारा किये उपकार को न मानता हो और १२. जो वैद्यमानी हो अर्थात् जिसमें वैद्य का ज्ञान न हो, फिर भी अपने को वैद्य समझता हो ॥ ३४ ॥