अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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अष्टाङ्गहृदये
बक्तव्य—इन त्याज्य रोगियों के लिए सरकारी अस्पताल बने हैं, अतः व्यक्तिगत चिकित्सक इन झंझतों में न पड़ें; यह शास्त्रीय उद्बोधन है। इनसे अपयश तो मिल सकता है किन्तु धर्म, अर्थ, यश की प्राप्ति नहीं हो सकती। महर्षि बरक ने भी प्रकारान्तर से इनकी चिकित्सा करने का निषेध किया है। देखें—ज.सि. २।४-६। इसी के आगे ७वें पद्य में कहा है—‘एभ्योऽन्ये समुपक्रम्या नराः सर्वैरुपक्रमैः’। वाभट ने अ.सं.सू. २।३४ में कहा है—पहले रोग की परीक्षा कर ले, तभी चिकित्सा करना प्रारम्भ करे।
तन्त्रस्यास्य परं चातो वक्ष्यतेऽध्यायसङ्ग्रहः ॥ ३५ ॥
अध्यायसंग्रह-वर्णन—अब यहाँ से सम्पूर्ण अष्टांगहृदयतन्त्र के अध्यायों के संग्रह का वर्णन किया जा रहा है ॥ ३५ ॥
बक्तव्य—यह क्रम संहिता के स्त्रियताओं का अथवा तन्त्रकारों का अन्यत्र भी देखा जाता है। ‘अतः परं’ इसके बाद तथा ‘अस्मात् ऊर्ध्व’ इसके आगे। इस प्रकार का संकेत तन्त्रकार अपने ग्रन्थ, संहिता या तन्त्र में किया करते हैं।
आयुष्कामदिनत्वीहरोपानुत्पादनद्रवाः । अन्नजानानन्नसंस्मात्राद्रव्यरसाश्रयाः ॥ ३६ ॥
दोषादिज्ञानतद्वेदतन्त्रचिकित्साद्वयुपक्रमः । शुद्ध्यादिस्नेहनस्वेदकास्थापनपावनम् ॥ ३७ ॥
धूम्रगण्डूषद्वृत्केतुत्पित्यन्त्रकशस्त्रकम् । शिराविधिः शल्यविधिः शस्त्रक्षाराश्रिकर्मिकौ ॥ ३८ ॥
सूत्रस्थानमिमेऽध्यायस्त्रिंशत्—
सूत्रस्थान के अध्याय—सूत्रस्थान के अध्यायों की गणना की जा रही है—१. आयुष्कामीय, २. दिनचर्या, ३. ऋतुचर्या, ४. रोगानुत्पादनीय, ५. द्रवद्रव्यविज्ञानीय, ६. अन्नस्वरूपविज्ञानीय, ७. अन्नरक्षाध्याय, ८. मात्रा-शिलीय, ९. द्रव्यादिविज्ञानीय, १०. रसभेदीय, ११. दोषादिविज्ञानीय, १२. दोषभेदीय, १३. दोषोपक्रमणीय, १४. द्विविधोपक्रमणीय, १५. शोधनादिगणसंग्रह, १६. स्नेहविधि, १७. स्वेदविधि, १८. वमन-विरेचनविधि, १९. वस्तिविधि, २०. नस्यविधि, २१. धूम्रपानविधि, २२. गण्डूषादि विधि, २३. आश्वतोत्तनाञ्जनविधि, २४. तर्पण-पुष्टपाकविधि, २५. यन्त्रविधि, २६. शस्त्रविधि, २७. सिराव्यधविधि, २८. शल्यारहरणविधि, २९. शस्त्रकर्मविधि तथा ३०. क्षाराश्रिकर्मविधि। ये अध्याय सूत्रस्थान में हैं ॥ ३६-३८ ॥
—शारीरमुच्यते । गर्भविक्रान्तितद्व्यापदङ्गमर्मविभागिकम् ॥ ३९ ॥
विकृतिर्दूतजं षष्ठं—
शारीरस्थान के अध्याय—शारीरस्थान के अध्यायों की गणना की जा रही है—१. गर्भविक्रान्ति, २. गर्भव्यापद, ३. अङ्गविभाग, ४. मर्मविभागीय, ५. विकृतिविज्ञानीय तथा ६. दूतादिविज्ञानीय। ये अध्याय शारीरस्थान में हैं ॥ ३९ ॥
—निदानं सार्वरोगिकम् । ज्वरासुकृत्वासयश्मादिमदाघशोऽतिसारिणाम् ॥ ४० ॥
मूत्राघातप्रमेहाणां विद्रध्याचुदरस्य च । पाण्डुकुष्ठानिलार्तानां वाताघ्नस्य च षोडश ॥ ४१ ॥
निदानस्थान के अध्याय—निदानस्थान के अध्यायों की गणना की जा रही है—१. सर्वरोगनिदान, २. ज्वरनिदान, ३. रक्तपित्तकासननिदान, ४. श्वासहिकानिदान, ५. राजयश्मानिदान, ६. मदात्ययनिदान, ७. अशोनिदान, ८. अतिसारग्रहणीरोगनिदान, ९. मूत्राघातनिदान, १०. प्रमेहननिदान, ११. विद्रधिबृद्धि-गुल्म-निदान, १२. उदररोगनिदान, १३. पाण्डुरोगशोफविसर्पनिदान, १४. कुष्ठश्वित्रक्रिमिनिदान, १५. वातव्याधि-निदान तथा १६. वातशोणितनिदान। ये अध्याय निदानस्थान में हैं ॥ ४०-४१ ॥
चिकित्सितं ज्वरे रक्ते कासे श्वासे च यक्षमणि । वमो मदात्ययेऽश्वः सु, विशि द्वौ, द्वौ च मूर्त्रिते ॥ विद्रधी गुल्मजठराण्डुशोफविसर्पिषु । कुष्ठश्वित्रानिलव्याघिवाताग्नेषु चिकित्सितम् ॥ ४३ ॥
द्वारविशतिरिमेऽध्यायाः—