भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

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आयुष्कार्याध्यायः १ ]

सूत्रस्थानम्

२५

चिकित्सितस्थान के अध्याय—चिकित्सितस्थान के अध्यायों की गणना की जा रही है—१. ज्वर, २. रक्तपित्त, ३. कास, ४. श्वासहिका, ५. राजयश्मादि, ६. छर्द्विद्वद्गोतुष्णा, ७. मदात्ययादि, ८. अर्शसां चिकित्सित, ९. अतिसार, १०. ग्रहणीरोग, ११. मूत्राघात, १२. प्रमेह, १३. विद्विघ्नद्विष्ट, १४. गुल्म, १५. उदर, १६. पाण्डुरोग, १७. श्वयशु, १८. विसर्प, १९. कुष्ठ, २०. शिवबक्रिमि, २१. वातव्याधि तथा २२. वातशोणित। ये अध्याय चिकित्सितस्थान में हैं। ४२-४३ ॥

—कल्पसिद्धिरतः परम्। कल्पो वमेविरैकस्य तत्सिद्धिर्बस्तिकल्पना ॥ ४४ ॥

सिद्धिर्बस्थापदां षष्ठो द्व्यकल्पः—

कल्प-सिद्धिस्थान के अध्याय—कल्प-सिद्धिस्थान के अध्यायों की गणना की जा रही है—१. वमनकल्प, २. विरेचनकल्प, ३. वमनविरेचनसिद्धि, ४. बस्तिकल्प, ५. बस्तिव्याप्तिसिद्धि तथा ६. भेषजकल्प। ये अध्याय कल्प-सिद्धिस्थान में हैं। ४४ ॥

—अत उत्तरम्। बालोपचारे तद्व्याधौ तद्वग्ने, द्वौ च भूतगे ॥ ४५ ॥

उन्मादेऽथ स्मृतिभ्रंशे, द्वौ द्वौ वर्त्तसु सन्धिषु। दूकमोलिङ्गनाशेषु त्रयो, द्वौ द्वौ च सर्वगे ॥ ४६ ॥

कर्णनासामुखशिरोब्रणै, भङ्गे भगन्दरे। ग्रन्थ्यादौ शुद्धरोगेषु गुह्यारोगे पुण्यद्वयम् ॥ ४७ ॥

विषे भुजङ्गे कीटेषु मूषकेषु रसायने। चत्वारिशोऽनपत्यानामध्यायो बीजपोषणः ॥ ४८ ॥

उत्तरस्थान के अध्याय—उत्तरस्थान के अध्यायों की गणना की जा रही है—१. बालोपचरणीय, २. बालामयप्रतिषेध, ३. बालग्रहप्रतिषेध, ४. भूतविज्ञानीय, ५. भूतप्रतिषेध, ६. उन्मादप्रतिषेध, ७. अपस्मार-(स्मृतिभंश)प्रतिषेध, ८. वर्त्तसुगविज्ञानीय, ९. वर्त्तसुगप्रतिषेध, १०. सन्धिस्तितासितरोगविज्ञानीय, ११. सन्धिस्तितासितरोगप्रतिषेध, १२. दृष्टिरोगविज्ञानीय, १३. तिमिरप्रतिषेध, १४. लिङ्गनाशप्रतिषेध, १५. सर्वाशिरोगविज्ञानीय, १६. सर्वाकिरोगप्रतिषेध, १७. कर्णरोगविज्ञानीय, १८. कर्णरोगप्रतिषेध, १९. नासा-रोगविज्ञानीय, २०. नासारोगप्रतिषेध, २१. मुखरोगविज्ञानीय, २२. मुखरोगप्रतिषेध, २३. शिरोरोगविज्ञानीय, २४. शिरोरोगप्रतिषेध, २५. ब्रणविज्ञानीय, २६. सद्योब्रणप्रतिषेध, २७. भङ्गप्रतिषेध, २८. भगन्दरप्रतिषेध, २९. ग्रन्थि-अर्बुद-श्लोपद-अपची-नाडीविज्ञानीय, ३०. ग्रन्थि-अर्बुद-श्लोपद-अपची-नाडी-प्रतिषेध, ३१. शुद्धरोगविज्ञानीय, ३२. शुद्धरोगप्रतिषेध, ३३. गुह्यारोगविज्ञानीय, ३४. गुह्यारोगप्रतिषेध, ३५. विषप्रतिषेध, ३६. सर्पविषप्रतिषेध, ३७. कीटलूताद्विप्रतिषेध, ३८. मूषिकलार्कविषप्रतिषेध, ३९. रसायनाध्याय तथा ४०. वाजीकरणध्याय। ये अध्याय उत्तरस्थान में हैं। ४५-४८ ॥

इत्यध्यायशतं विशं षड्भिः स्थानैरुदीरितम् ॥

इति श्रीबैष्णवपतिसिंहगुप्तसूनुश्रीमद्भागवतविरचितायामष्टाङ्गहृदयसंहितायां

प्रथमे सूत्रस्थाने आयुष्कामीयो नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥


अष्टांगहृदय के छः स्थान—इस प्रकार सम्पूर्ण अष्टांगहृदय के १२० अध्यायों की नाम-गणना उक्त (१. सूत्र, २. शरीर, ३. निदान, ४. चिकित्सित, ५. कल्प-सिद्धि तथा ६. उत्तर नामक) छः स्थानों में कर दी गयी है। ४८ ॥

इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी द्वारा विरचित

‘निर्मला’ हिन्दी व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से विभूषित अष्टांगहृदय-सूत्रस्थान में

आयुष्कामीय नामक पहला अध्याय समाप्त ॥ १ ॥