भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

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द्वितीयोऽध्यायः

अथातो दिनचर्याध्यायं व्याख्यास्यामः ।

इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षयः ।

अब हम यहाँ से दिनचर्या नामक अध्याय का वर्णन करेंगे, इस विषय में आत्रेय आदि महर्षियों ने इस प्रकार कहा था ॥ १ ॥

उपक्रम —दिनचर्या शब्द से रात्रिचर्या, ऋतुचर्या आदि का भी ग्रहण कर लिया जाता है। दिनचर्या शब्द में इतने अर्थ छिपे हैं—'दिने-दिने चर्या, दिनस्य चर्या किं वा दिनानां चर्या = दिनचर्या'। इस प्रकार परिभाषित करने पर उक्त सभी अर्थों का इसमें समावेश हो जाता है। इस अध्याय में उन आचरणों की चर्चा की जायेगी जो नर-नारी के लिए दोनों लोकों में हितकर होती है। हमारा यह आयुर्वेद इस लोक और परलोक को मानता है। आपको इसके अनेक प्रमाण मिलेंगे, अस्तु। विशेष देखें—इसी अध्याय के ४८वें पद्य को।

निरुक्ति —गति तथा भक्षण अर्थ में प्रयुक्त चरू धातु से यत् + टापू प्रत्यय करने पर चर्या शब्द निष्पन्न होता है। इसका अर्थ है—आहार-विहार तथा आचरण विधि।

संक्षिप्त सन्दर्भ-संकेत—च.सू. ५, ७, ८; सु.चि. २४ तथा अ.सं.सू. ३ में देखें।

ब्राह्मो मूर्हते उत्तिष्ठेत् स्वस्थो रक्षार्थमायुषः ।

ब्राह्मामूर्हते में जागना —स्वस्थ (नीरोग) स्त्री-पुरुष को अपनी आयु (मुखायु-हितायु) की रक्षा करने के लिए प्रातःकाल ब्राह्मामूर्हते में उठना चाहिए।

वक्तव्य —ब्राह्मामूर्हते—रात के पिछले पहर की दो घड़ी या दो दण्ड। श्रीअरुणदत्त ब्राह्मामूर्हते की व्याख्या करते हुए कहते हैं—'रात्रेश्वतुर्दशो मूर्हते ब्राह्मो मूर्हतेः', किन्तु 'मूर्हतेचिन्तामणि' के विवाह-प्रकरण में दिये गये ५३वें पद्य में दिया गया रात्रि का १४वां मूर्हते 'त्वाष्ट्र' है, जिसका स्वामी चित्रा नामक नक्षत्र है। हाँ, आठवें मूर्हते का नाम 'ब्रह्मा' है, जो प्रसंगोचित नहीं है। इसके अगे वे कहते हैं—'ब्रह्म—ज्ञानं तदर्थमध्यनाद्यापि ब्रह्म, तस्य योग्यो मूर्हते ब्राह्मः'। यह व्याख्या युक्तियुक्त प्रतीत होती है। अन्यत्र कहा गया है—'रात्रेस्तु पश्चिमो यामो मूर्हते ब्राह्म उच्यते'। यह नियम केवल स्वस्थ पुरुष के लिए है। सूर्योदय से पहले रात्रि के अन्तिम पहर की चार घड़ियों को 'ब्राह्मामूर्हते' माना गया है। सुश्रुत ने केवल 'उत्थायोत्थाय सततं' (सु.चि. २४३) में प्रतिदिन प्रातःकाल उठकर, इतना ही कहा है।

शरीरचिन्तां निर्वर्त्य कृतशौचविधितस्ततः ॥ १ ॥

अर्कन्यग्रोधविदरकरञ्जककुभादिजम् । प्रातर्भुक्त्वा च मृद्वग्रं कपायकटुतिक्तकम् ॥ २ ॥ कनीन्यग्रसमस्थौल्यं प्रगुणं द्वादशाङ्गुलम् । भक्षयेद्भुतपवनं दन्तमांसात्म्यबाधयन् ॥ ३ ॥

दतवन का विधान —उठते ही शरीर की चिन्ता से निवृत्त होकर अर्थात् मैं उठने योग्य हूँ या नहीं—ऐसा विचार करके यदि वह अपने को दिनचर्या करने योग्य समझे तब वह शौचविधि (मल-मूत्र त्याग कर मल-मूत्र स्थानों को मिट्टी, जल आदि से शुद्ध करने के बाद अर्क, बरगद, बैर या बबूल, करञ्ज (डिठोरी), ककुभ (अर्जुन) आदि वृक्षों में से किसी की पतली शाखा को लेकर दतवन (दातौन) करे।