अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंदिनचर्चाध्यायः २ ]
सूत्रस्थानम्
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दतवन करने के दो समय होते हैं—१. प्रातःकाल और २. भोजन कर लेने के बाद। इससे मूष की मलिनता दूर होती है और भोजन करने के बाद दांतों या मसूड़ों में फंसे हुए अन्नकण आदि निकल जाते हैं।
दतवन करने की विधि —दतवन के अगले भाग को दांतों से चबाकर अथवा कूटकर मुलायम कर लेना चाहिए, नहीं तो उसकी रगड़ मसूड़ों में लग सकती है। इस (दतवन) का रस कठौला (खैर या बबूल का जैसा) या कटु (तेजबल या तिमूर का जैसा) अथवा तिक्त (नीम का जैसा) होना चाहिए। इसकी मोटाई कनीनिका (सबसे छोटी पांचवीं अंगुली) के समान तथा लम्बाई बारह अंगुल होनी चाहिए। इस प्रकार की दतवन को लेकर दांतों पर इस प्रकार घिमें जिससे मसूड़ों पर खरोश न लगे और दांत स्वच्छ हो जायें ॥१-३॥
बक्तव्य —वामभट ने 'अर्क' (मदार) की दतवन करने का विधान किया है, तथापि दूध सहित इसकी शाखा को मुख में न डाले, अन्यथा मुख पक जायेगा, घाव हो जायेगे। अतः इसकी बाहरी लंबा को छीलकर तथा पानी से धोकर ही इसका दतवन के लिए प्रयोग करें। आजकल अनेक चूर्णों तथा मञ्जनों का दांत साफ करने के लिए प्रयोग होने लगा है। इसका प्रयोग अंगुली या ब्रश से किया जाता है, अतः ब्रश का मुलायम होना अति आवश्यक है। दूसरी ओर 'कोलोट' आदि ट्यूपेस्टों का प्रयोग चल पड़ा है। जहाँ उचित गुण वाली दतवन सुलभ नहीं है वहाँ मुलभ विकल्पों का प्रयोग कर लेना चाहिए। ध्यान रहे—दांत जिससे साफ हों, मसूड़ों को हानि न पहुँचे उसका उपयोग करें। इसका प्रयोग करने से मुखरोग नहीं होते और मुख साफ बना रहता है।
शुश्रुत ने चि.२४४-१२ में जो मधुर रस वाली दतवन का विधान किया है, उसका तात्पर्य है—मुखपाक (सर्वसर) या मुखदाह आदि पित्तज विकारों में इसका प्रयोग करना चाहिए। इसके अतिरिक्त ऐसे अवसरों पर फिटकर का चूर्ण डालकर तैलगण्डूष भी अत्यन्त हितकर होता है।
जिह्वानिलेखन —इस प्रसंग में दतवन कर लेने के बाद जीभी का प्रयोग भी कर लेना चाहिए। इसका वर्णन चरक, शुश्रुत, वामभट (अष्टांगसंग्रह) ने किया है, किन्तु अष्टांगहृदय में नहीं हुआ है। इसकी हम सुश्रुतोक्त विधि कह रहे हैं—जीभ को साफ करने (उसमें जमे हुए मैल को खुरचने) के लिए सोने, चाँदी या लकड़ी की जीभी बनवा लेनी चाहिए। आजकल बाजार में ताँबा या स्टील की भी जीभी मिलती है। दतवन करने वाले उसी को दांतों से चिर कर जीभी बना लेते हैं। वास्तव में यह जीभी 'वाक्षी' (वृक्ष से सम्बन्धित) है। इस विषय को च.सू. ५।७४-७५ में देखें।
नाद्यादजीर्णवमयुधसासकासज्वरादिति। तुष्णास्पपाकहृन्नेत्रशिरःकर्णामयी च तत्॥४॥
दतवन का निषेध —अजीर्ण होने पर, छिद्रिरोग में, श्वासरोग में, कासरोग में, ज्वररोग में, अर्दित (मुख का लकवा) रोग में, तुधारोग में, मुखपाकरोग में, हृदयरोग में, नेत्ररोग में, शिरोरोग में तथा कर्णरोग में दतवन न करें ॥४॥
बक्तव्य —दतवन करने की क्रिया को आयुर्वेदशास्त्र में दो नामों से कहा गया है—१. दन्तपवन और २. दन्तधवन। इनमें 'पवन' का अर्थ है—पवित्र करना और 'धवन' का अर्थ है—धोना या साफ करना। अष्टांगसंग्रह-सू. ३।२०-२२ में निषिद्ध दतवनों का परिगणन इस प्रकार विस्तार से किया है—१. ल्मिओडा, २. रौठा, ३. बहेडा, ४. धव, ५. करौर, ६. बबूल, ७. सम्भालू, ८. महजन, ९. लोध, १०. तैन्तू, ११. कचनार, १२. शमी, १३. पीलू, १४. पीपल, १५. इंगुदी (हिगोट), १६. गुगल, १७. फरहद, १८. इमली, १९. मोच, २०. सफेद शाल्मली, २१. सेमल तथा २२. शप (सनई) की दतवन न करें। इनके अतिरिक्त जिन वृक्षों का रस मीठा, खट्टा अथवा नमकीन हो उनकी भी दतवन न करें। जो दतवन सूखी, खोखली, दुर्गन्धयुक्त तथा लसीली हो उसका भी निषेध किया है और पलाश तथा विजयसार की दतवन एवं खड़ाऊं का परित्याग करें।