अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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अष्टाङ्गहृदये
सौवीरमञ्जनं नित्यं हितमक्षोस्ततो भजेत्।
अञ्जन-प्रयोग—मुखशुद्धि करने के बाद प्रतिदिन सौवीर अञ्जन को आँखों में लगाना चाहिए। यह आँखों के लिए हितकर होता है।
बक्तव्य—सुवीर (सिन्धु) देश में प्राप्त होने वाला यह अञ्जन (काला सुरमा) आँखों के लिए हितकर होता है। इसका विशेष विवेचन देखें—अ.सं.सू. २२।७-८। स्वस्थ आँखों में प्रतिदिन लगाने वाले अञ्जन को प्रत्यञ्जन कहते हैं। श्रीभावमिश्र ने इस सौवीराञ्जन को 'सफेद सुरमा' स्वीकार किया है। यह काला सुरमा से अधिक सौम्य होता है। इन दोनों सुरमों का प्रयोग नेत्रप्रसादन के लिए किया जाता है। सुश्रुत ने भी इस अञ्जन की प्रशंसा की है। देखें—सु.चि. २४।८-१९।
वक्षुस्तेजोमयं तस्य विशेषात् श्लेष्मतो भयम्॥५॥
योजयेत्सप्तरात्रेऽस्मात् प्रावणार्थं रसाञ्जनम्।
रसाञ्जन-प्रयोगविधि—प्रावण अञ्जन का प्रयोग चक्षु (आँख) तेजोमय अर्थात् अग्निगुण-प्रधान अवयव है। उसे (चक्षु को) विशेष करके शीतगुण-प्रधान कफ का भय रहता है। अतएव आँख से कफदोष को निकालने के लिए सप्ताह में एक बार रसाञ्जन का प्रयोग अवश्य करना चाहिए॥५॥
बक्तव्य—उक्त रसाञ्जन के साप्ताहिक प्रयोग से आँखों में से संचित कफदोष निकल जाता है, अतः कफदोषजनित कोई भी नेत्ररोग नहीं हो पाता। विशेष करके काच (मोतियाबिन्द) रोग का भय नहीं रहता है। सुश्रुत ने 'काच' रोग को 'नीलिका' तथा 'लिंगनाश' भी कहा है। देखें—सु.उ. ७।१८। 'काच' को सफेद मोतिया और 'नीलिका' को नीला या काला मोतिया भी कहते हैं। यह कफदोष आँख में संचित होते-होते मोती जैसा दिखलायी देता है, तब इसे मोतियाबिन्द कहते हैं। आपरेशन करके निकालने के बाद यह आकार में मसूर की दाल जैसा होता है। चरक ने उक्त प्रावणांजन का प्रयोग प्रतिदिन या पाँचवें अथवा आठवें दिन करने की सलाह दी है। चरक ने अंजन-प्रयोग का समय रात्रि में बतलाया है। यहाँ यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि जब प्रतिदिन लगाये जाने वाले अंजन को छोड़कर प्रातःकाल रसाञ्जन का प्रयोग किया जायेगा तब प्रतिदिन लगाये जाने वाले अंजन को रात में लगाना चाहिए, यह चरक के वचन का अभिप्राय है। इसी प्रसंग में मनु ने कहा है—'मैत्रं प्रसाधनं स्नानं दन्तधावनमञ्जनम्। पूर्वाहि एव कुर्वीत देवतानाञ्च पूजनम्'॥ (मनु० ४।५२) यहाँ 'मैत्रं' का अर्थ है—सूर्य की आराधना, उपासना या पूजा। इसलिए रसवत अथवा किसी प्रावण अंजन का प्रयोग सदा करता रहे।
ततो नावनगणद्वृषधूमताम्बूलभागभवेत्॥६॥
नस्य आदि सेवन-निर्देश—अंजनप्रयोग करने के बाद नस्य (सुंधनी), गणद्वृष (कुल्ली, देखें—बृहत् हिन्दी-कोश), धूम्रपान तथा ताम्बूल का सेवन करें॥६॥
बक्तव्य—उक्त नस्य आदि की विस्तृत सेवनविधियाँ क्रमशः इस प्रकार अष्टांगहृदय में दी गयी हैं। देखें—१. नस्यसेवनविधि अ.हृ.सू. २०।१-२। धूम्रपानविधि वहीं २१ तथा ३. गणद्वृषादि विधि वहीं २२। ताम्बूलभक्षण की विस्तृत विधि अ.सं.सू. ३।३६-३८ देखें।
ताम्बूल-सेवनविधि—भोजन के प्रति इच्छा अधिक हो, मुख स्वच्छ एवं सुगन्धित रहे, ऐसी इच्छा रखने वाले को धुला-धुलाकर पान खाना चाहिए। इसे भोजन की भाँति मुख में रखकर तत्काल निगलना नहीं चाहिए। पान के मसाले—जावियाँ, जायफल, लौंग, कपूर, पिपरमेण्ट, कंकोल (शीतल चीनी), कटुक (लताकस्तूरी के बीज) तथा इसमें सुपारी के भिगाये हुए टुकड़े भी रखें। इस प्रकार सेवन करने से पान हृदय को प्रिय लगता है और यह शक्तिवर्धक होता है। इसका सेवन सौकर उठने के बाद स्नान एवं भोजन करने के बाद तथा वमन करने के पश्चात् करना चाहिए। एक बार में अधिक-से-अधिक दो बीड़ा पान लें, जिसमें चूना, कल्या लगा हो और सुपारी के टुकड़े पड़े हों।